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Sudarshana Chakra
Adhyay 11, Shlok 51
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः

हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

ఈ నీ సున్నిత మానవ రూపాన్ని చూసి, ఓ కృష్ణా, ఇప్పుడు నేను కూర్చున్నాను మరియు నా స్వభావానికి పునరుద్ధరించబడ్డాను.

SindhiIND

تنهنجو هي نرم انساني روپ ڏسي، اي ڪرشن، هاڻي مان ٺهيل آهيان ۽ پنهنجي طبيعت ۾ بحال ٿي چڪو آهيان.

OdiaIND

ହେ କୃଷ୍ଣ, ତୁମର ନମ୍ର ମାନବ ରୂପ ଦେଖି ମୁଁ ବର୍ତ୍ତମାନ ରଚନା ହୋଇଛି ଏବଂ ମୋର ନିଜ ପ୍ରକୃତିକୁ ଫେରି ଆସିଛି |

MarathiIND

हे कृष्णा, तुझे हे कोमल मानवी रूप पाहून मी आता रचलो आहे आणि माझ्या स्वभावात परत आलो आहे.

AssameseIND

এই তোমাৰ এই কোমল মানৱ ৰূপটো দেখি হে কৃষ্ণ, এতিয়া মই সংযোজিত হৈ নিজৰ স্বভাৱলৈ ঘূৰি আহিছো।

MaithiliIND

ई तोहर सौम्य मानव रूप देखि हे कृष्ण आब हम संयमित छी आ अपन स्वभाव मे पुनर्स्थापित भ' गेल छी ।

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, তোমার এই সৌম্য মানবরূপ দেখে, এখন আমি রচনা করেছি এবং আমার নিজের প্রকৃতিতে ফিরে এসেছি।

ManipuriIND

ꯅꯉꯒꯤ ꯃꯤꯅꯨꯡꯁꯤ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯕꯒꯤ ꯃꯑꯣꯡ ꯑꯁꯤ ꯎꯔꯒꯥ, ꯍꯦ ꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯁ꯭ꯟ, ꯍꯧꯖꯤꯛ ꯑꯩ ꯁꯦꯝ ꯁꯥꯔꯦ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯩꯒꯤ ꯏꯁꯥꯒꯤ ꯃꯍꯧꯁꯥꯗꯥ ꯑꯃꯨꯛ ꯍꯟꯅꯥ ꯄꯨꯔꯛꯂꯦ |

NepaliIND

हे कृष्ण, तिम्रो यो कोमल मानव रूप देखेर अब म रचना भएको छु र आफ्नो स्वभावमा पुनर्स्थापित भएको छु।

MalayalamIND

കൃഷ്ണാ, നിൻ്റെ ഈ സൗമ്യമായ മനുഷ്യരൂപം കണ്ടിട്ട്, ഇപ്പോൾ ഞാൻ രചിക്കപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു, എൻ്റെ സ്വഭാവത്തിലേക്ക് പുനഃസ്ഥാപിക്കപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਤੇਰਾ ਇਹ ਕੋਮਲ ਮਨੁੱਖਾ ਸਰੂਪ ਵੇਖ ਕੇ, ਹੁਣ ਮੈਂ ਰਚਿਆ ਹੋਇਆ ਹਾਂ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਸੁਭਾਅ ਵਿੱਚ ਮੁੜ ਆ ਗਿਆ ਹਾਂ।

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣ, ನಿನ್ನ ಈ ಸೌಮ್ಯವಾದ ಮಾನವ ರೂಪವನ್ನು ನೋಡಿದ ನಂತರ ನಾನು ಈಗ ಸಂಯೋಜನೆಗೊಂಡಿದ್ದೇನೆ ಮತ್ತು ನನ್ನ ಸ್ವಂತ ಸ್ವಭಾವಕ್ಕೆ ಮರಳಿದ್ದೇನೆ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन'--आपके मनुष्यरूपमें प्रकट होकर लीला करनेवाले रूपको देखकर गायें, पशु-पक्षी, वृक्ष, लताएँ आदि भी पुलकित हो जाती हैं , ऐसे सौम्य द्विभुजरूपको देखकर मैं होशमें आ गया हूँ, मेरा चित्त स्थिर हो गया है--'इदानीमस्मि संवृत्तः' 'सचेताः', विराट्रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था, वह सब भय अब मिट गया है, सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ -- 'प्रकृतिं गतः।' यहाँ सचेताः कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी, तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट्रूप ! इसमें मेरी कोई योग्यता, अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपा-ही-कृपा है। सम्बन्ध--अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं --

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अर्जुन बोला -- हे जनार्दन अब मैं अपने मित्रकी आकृतिमें आपके इस प्रसन्नमुख सौम्य मानुषरूपको देखकर सचेता यानी प्रसन्नचित्त हुआ हूँ और अपनी प्रकृतिको -- वास्तविक स्थितिको प्राप्त हुआ हूँ।,

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

एवं भगवदाश्वासितः सन्नर्जुनस्तं प्रत्युक्तवानित्याह -- अर्जुन इति।

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Sri Dhanpati

स्वभिलषितं रुपं दृष्ट्वार्जुन उवाच। दृष्ट्वेदं प्रत्यक्षं मानुषं नराकारं मत्सखं सौभ्यं प्रसन्नं तव रुपं इदानीं सचेताः प्रसन्नमनाः प्रकृतिं स्वभावं गतः प्राप्तः संवृत्तः संजातोऽस्मि। जनार्दनेति संबोधयन् जनानसुरानर्दयति पीडयतीति जनार्दनस्तद्दर्शनजन्यं भियमिदानीं सौम्यरुपदर्शनेन निवृत्तामिति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
dṛiṣhṭvāseeing
idamthis
mānuṣhamhuman
rūpamform
tavayour
saumyamgentle
janārdanahe who looks after the public, Krishna
idānīmnow
asmiI am
saṁvṛittaḥcomposed
sachetāḥ
prakṛitimto normality
gataḥhave become
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 11.50
सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा

सञ्जय बोले -- वासुदेवभगवान् ने अर्जुनसे ऐसा कहकर फिर उसी प्रकारसे अपना रूप (देवरूप) दिखाया और महात्मा श्रीकृष्णने पुनः सौम्यवपु (द्विभुजरूप) होकर इस भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 11.52
श्री भगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 11Shlok 51
Bhagavad Gita · Adhyay 11, Shlok 51
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः

हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 51 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 51 का हिंदी अर्थ: "हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 51?

Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 51 translates to: "Having seen this Thy gentle human form, O Krishna, now I am composed and have been restored to my own nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 11, श्लोक 51 है जो Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga में संकलित है। हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 51. Having seen this Thy gentle human form, O Krishna, now I am composed and have been restored to my own nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.