Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि

जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

আপনি প্রকৃতপক্ষে, রিজার্ভ ছাড়াই, আপনার ঐশ্বরিক মহিমা সম্পর্কে বলা উচিত যার দ্বারা আপনি বিদ্যমান, এই সমস্ত বিশ্বে বিস্তৃত। (অন্য কেউ তা করতে পারে না।)

AssameseIND

আপুনি সঁচাকৈয়ে, সংৰক্ষিত নোহোৱাকৈ, আপোনাৰ ঐশ্বৰিক মহিমাৰ বিষয়ে ক’ব লাগে, যাৰ দ্বাৰা আপুনি এই সকলো জগতত বিয়পি আছে। (আন কোনেও কৰিব নোৱাৰে।)

MaithiliIND

अहाँ केँ वास्तव मे, बिना कोनो आरक्षणक, अपन दिव्य महिमा केँ कहबाक चाही, जाहि सँ अहाँ एहि सब लोक मे व्याप्त, अस्तित्व मे छी। (आन कियो नहि क' सकैत अछि।)

TamilIND

இந்த உலகங்கள் அனைத்திலும் வியாபித்திருக்கும் உன்னுடைய தெய்வீக மகிமைகளைப் பற்றி நீங்கள் தயக்கமின்றி சொல்ல வேண்டும். (வேறு யாரும் அவ்வாறு செய்ய முடியாது.)

MarathiIND

या सर्व जगांत व्याप्त असलेले तुमचे दैवी वैभव ज्याच्या द्वारे तुम्ही अस्तित्वात आहात, त्याबद्दल तुम्ही निश्चितपणे सांगावे. (इतर कोणीही करू शकत नाही.)

GujaratiIND

તમારે ખરેખર, અનામત વિના, તમારા દૈવી મહિમા વિશે જણાવવું જોઈએ કે જેના દ્વારા તમે અસ્તિત્વમાં છો, આ બધી દુનિયામાં વ્યાપી છે. (બીજું કોઈ આવું કરી શકે નહીં.)

NepaliIND

यी सारा संसारमा व्याप्त आफ्नो दिव्य महिमा जसद्वारा तिमी अस्तित्वमा छौ, तिमीले निश्चय नै भन्नुपर्छ। (अरू कसैले त्यसो गर्न सक्दैन।)

PunjabiIND

ਤੁਹਾਨੂੰ ਸੱਚਮੁੱਚ, ਬਿਨਾਂ ਰਾਖਵੇਂ, ਆਪਣੀ ਬ੍ਰਹਮ ਮਹਿਮਾ ਬਾਰੇ ਦੱਸਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਤੁਸੀਂ ਹੋਂਦ ਵਿੱਚ ਹੋ, ਇਹਨਾਂ ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਹੈ। (ਕੋਈ ਹੋਰ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ।)

SindhiIND

توهان کي پنهنجي خدائي عظمتن جي باري ۾ ٻڌائڻ گهرجي، جنهن ۾ توهان موجود آهيو، انهن سڀني جهانن ۾ پکڙيل آهي. (ٻيو ڪو به ائين نٿو ڪري سگهي.)

MalayalamIND

ഈ ലോകങ്ങളിലെല്ലാം വ്യാപിച്ചുകിടക്കുന്ന നിങ്ങളുടെ ദൈവിക മഹത്വങ്ങളെക്കുറിച്ച് നിങ്ങൾ തീർച്ചയായും പറയണം. (മറ്റാർക്കും അങ്ങനെ ചെയ്യാൻ കഴിയില്ല.)

KonkaniIND

तुमी खरेंच सांगपाक जाय, राखण करिनासतना, तुमच्या दैवी वैभवांतल्यान तुमी अस्तित्वांत आसात, ह्या सगळ्या संवसारांत व्याप्त आसात. (आनीक कोणाकच तशें करपाक मेळना.)

MizoIND

I awmna Pathian ropuinate, heng khawvel zawng zawng huap vek tawhte hi, inkhung hran lovin, i sawi tur a ni tak zet a ni. (Midangin an ti thei lo.)

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि' -- भगवान्ने पहले (सातवें श्लोकमें) यह बात कही थी कि जो मनुष्य मेरी विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जानता है, उसका मेरेमें अटल भक्तियोग हो जाता है। उसे सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि भगवान्में दृढ़ भक्ति होनेका यह बहुत सुगम और श्रेष्ठ उपाय है; क्योंकि भगवान्की विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जाननेपर मनुष्यका मन भगवान्की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान्में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जाग्रत् हो जाती है। अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याणके लिये उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दीखती है। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियोंसे आप सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंका विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे वर्णन कीजिये। कारण कि उनको कहनेमें आप ही समर्थ हैं; आपके सिवाय उन विभूतियोंको और कोई नहीं कह सकता।'वक्तुमर्हस्यशेषेण' -- आपने पहले (सातवें, नवें और यहाँ दसवें अध्यायके आरम्भमें) अपनी विभूतियाँ बतायीं और उनको जाननेका फल दृढ़ भक्तियोग होना बताया। अतः मैं भी आपकी सब विभूतियोंको जान जाऊँ और मेरा भी आपमें दृढ़ भक्तियोग हो जाय, इसलिये आप अपनी विभूतियोंको पूरी-की-पूरी कह दें, बाकी कुछ न रखें।'दिव्या ह्यात्मविभूतयः' -- विभूतियोंको दिव्य कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो कुछ विशेषता दीखती है वह मूलमें दिव्य परमात्माकी ही है, संसारकी नहीं। अतः संसारकी विशेषता देखना भोग है और परमात्माकी विशेषता देखना विभूति है, योग है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अपनी दिव्य विभूतियोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें ( आप ही ) समर्थ हैं -- आपकी जो विभूतियाँ हैं? जिन विभूतियोंसे अर्थात् अपने माहात्म्यके विरतारसे आप इन सारे लोकोंको व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं? उन्हें कहनेमें आप ही समर्थ हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यस्मादस्मादृशामगोचरस्तवात्मा जिज्ञासितश्च। तस्मात्त्वयैव तद्रूपं वक्तव्यमित्याह -- वक्तुमिति। दिव्यत्वमप्राकृतत्वम्। संप्रत्यन्वयमन्वाचष्टे -- आत्मन इति। वक्तव्या विभूतीर्विशिनष्टि -- याभिरिति। यद्द्वारा लोकान्पूरयित्वा वर्तसे ता विभूतीरशेषेण वक्तुमर्हसीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अतोऽप्राकृता हि आत्मनो विभूतयः माहात्म्यविस्ताराः यास्ताः वक्तुमर्हसि। याभिर्विभूतिस्त्वमिमाँल्लोकान्वाप्य तिष्ठसि।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vaktumto describe
arhasiplease do
aśheṣheṇacompletely
divyāḥdivine
hiindeed
ātmayour own
vibhūtayaḥopulences
yābhiḥby which
vibhūtibhiḥopulences
lokānall worlds
imānthese
tvamyou
vyāpyapervade
tiṣhṭhasireside
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 10.15
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते

हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.17
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया

हे योगिन् ! हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ ? और हे भगवन् ! किन-किन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ ? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि

जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 16 translates to: "You should indeed tell, without reserve, of your divine glories by which you exist, pervading all these worlds. (No one else can do so.) — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vaktum arhasyaśheṣheṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ" mean in English?

"vaktum arhasyaśheṣheṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 16. You should indeed tell, without reserve, of your divine glories by which you exist, pervading all these worlds. (No one else can do so.) — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.