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Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 15
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते

हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MalayalamIND

ഹേ പരമപുരുഷേ, ഹേ പരമപുരുഷേ, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളുടെയും ഉറവിടവും നാഥനും, ദൈവങ്ങളുടെ ദൈവമേ, ഹേ ലോകത്തിൻ്റെ അധിപൻ!

GujaratiIND

ખરેખર, તમે તમારી જાતને તમારા દ્વારા જ જાણો છો, હે પરમ પુરુષ, હે સ્ત્રોત અને તમામ જીવોના ભગવાન, હે દેવોના ભગવાન, હે વિશ્વના શાસક!

KannadaIND

ನಿಶ್ಚಯವಾಗಿಯೂ, ನೀನು ನಿನ್ನಿಂದಲೇ ನಿನ್ನನ್ನು ತಿಳಿದಿರುವೆ, ಓ ಸರ್ವೋತ್ತಮ ವ್ಯಕ್ತಿ, ಓ ಮೂಲ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಪ್ರಭು, ಓ ದೇವತೆಗಳ ದೇವರೇ, ಓ ಲೋಕದ ಅಧಿಪತಿಯೇ!

PunjabiIND

ਸੱਚਮੁੱਚ, ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦੁਆਰਾ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਪਰਮ ਪੁਰਖ, ਹੇ ਸ੍ਰੋਤ ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਮਾਲਕ, ਹੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੇ ਸੁਆਮੀ, ਹੇ ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਮਾਲਕ!

NepaliIND

निस्सन्देह, तपाईं आफैले आफैलाई आफैले जान्नुहुन्छ, हे सर्वोच्च पुरुष, हे स्रोत र सबै प्राणीहरूको स्वामी, हे देवताहरूका देवता, हे विश्वका शासक!

BengaliIND

নিঃসন্দেহে, আপনি নিজেই নিজেকে জানেন, হে পরম পুরুষ, হে উৎস ও সমস্ত প্রাণীর পালনকর্তা, হে দেবতাদের ঈশ্বর, হে জগতের অধিপতি!

TamilIND

மெய்யாகவே, நீயே உன்னால் உன்னை அறிகிறாய், ஓ உன்னத நபரே, ஓ ஆதாரமும் எல்லா உயிரினங்களின் இறைவனே, ஓ தேவர்களின் கடவுளே, ஓ உலகத்தின் அதிபதியே!

TeluguIND

నిశ్చయంగా, ఓ సర్వోన్నత వ్యక్తి, ఓ మూలాధారం మరియు అన్ని జీవులకు ప్రభువా, దేవతల దేవా, ఓ జగత్తు పాలకుడా!

AssameseIND

নিশ্চয় তুমি নিজকে নিজেই জানা, হে পৰম ব্যক্তি, হে সকলো সত্তাৰ উৎস আৰু প্ৰভু, হে দেৱতাৰ ঈশ্বৰ, হে জগতৰ শাসক!

MarathiIND

हे परमपुरुष, हे सर्व प्राणिमात्रांचे स्त्रोत आणि स्वामी, हे देवांच्या देवा, हे जगाच्या अधिपती, तू स्वतःलाच स्वतःला जाणतोस!

SindhiIND

بيشڪ تون پنهنجو پاڻ کي پاڻ ئي ڄاڻين ٿو، اي اعليٰ ذات، اي سرچشمو ۽ سڀني مخلوقن جا پالڻهار، اي معبودن جا معبود، اي دنيا جا حاڪم!

BhojpuriIND

सचमुच, तू खुद अपना से जानत बाड़ू, हे परमात्मा, हे सब जीव के स्रोत आ स्वामी, हे देवता के भगवान, हे संसार के शासक!

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते पुरुषोत्तम'--सम्पूर्ण प्राणियोंको संकल्पमात्रसे उत्पन्न करनेवाले होनेसे आप 'भूतभावन' हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके और देवताओंके मालिक होनेसे आप 'भूतेश' और 'देवदेव' हैं; जड-चेतन, स्थावर-जङ्गममात्र जगत्का पालन-पोषण करनेवाले होनेसे आप 'जगत्पति' हैं; और सम्पूर्ण पुरुषोंमें उत्तम होनेसे आप लोकमें और वेदमें 'पुरुषोत्तम' नामसे कहे गये हैं (गीता 15। 18) । इस श्लोकमें पाँच सम्बोधन आये हैं। इतने सम्बोधन गीताभरमें दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं आये। कारण है कि भगवान्की विभूतियोंकी और भक्तोंपर कृपा करनेकी बात सुनकर अर्जुनमें भगवान्के प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं और उन भावोंमें विभोर होकर वे भगवान्के लिये एक साथ पाँच सम्बोधनोंका प्रयोग करते हैं । 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्'--भगवान् अपने-आपको अपनेआपसे ही जानते हैं। अपने-आपको जाननेमें उन्हें किसी प्राकृत साधनकी आवश्यकता नहीं होती। अपने-आपको जाननेमें उनकी अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, कोई जिज्ञासा भी नहीं होती, किसी करण-(अन्तःकरण और बहिःकरण-) की आवश्यकता भी नहीं,होती। उनमें शरीर-शरीरीका भाव भी नहीं है। वे तो स्वतः-स्वाभाविक अपने-आपसे ही अपने-आपको जानते हैं। उनका यह ज्ञान करण-निरपेक्ष है, करण-सापेक्ष नहीं।इस श्लोकका भाव यह है कि जैसे भगवान् अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं, ऐसे ही भगवान्के अंश जीवको भी अपने-आपसे ही अपने-आपको अर्थात् अपने स्वरूपको जानना चाहिये। अपने-आपको अपने स्वरूपका जो ज्ञान होता है, वह सर्वथा करण-निरपेक्ष होता है। इसलिये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे अपने स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवान्का अंश होनेसे भगवान्की तरह जीवका अपना ज्ञान भी करण-निरपेक्ष है। सम्बन्ध--विभूतियोंका ज्ञान भगवान्में दृढ़ करानेवाला है (गीता 10। 7)। अतः अब आगेके श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि आप देवादिके आदि कारण हैं? इसलिये --, हे पुरुषोत्तम हे भूतप्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले भूतभावन हे भूतेशभूतोंके ईश्वर हे देवोंके देव हे जगत्पते आप स्वयं ही अपनेद्वारा अपने आपको अर्थात् निरतिशय ज्ञान? ऐश्वर्य? सामर्थ्य आदि शक्तियोंसे युक्त ईश्वरको जानते हैं।

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Sri Anandgiri

कश्चिदेव महता कष्टेनानेकजन्मसंसिद्धो जानाति त्वदनुगृहीतस्त्वद्रूपमित्यभिप्रेत्याह -- यत इति। स्वयमेवोपदेशमन्तरेणेत्यर्थः। आत्मना प्रत्यक्त्वेनाविषयतयेति यावत्। आत्मानं निरुपाधिकं रूपम्। नच तव सोपाधिकमपि रूपमन्यस्य गोचरे तिष्ठतीत्याह -- निरतिशयेति। पुरुषश्चासावुत्तमश्चेति क्षराक्षरातीतपूर्णचैतन्यरूपत्वं संबोधनेन बोध्यते। सर्वप्रकृतित्वं सर्वकर्तृत्वं च कथयति -- भूतानीति। सर्वेश्वरत्वमाह -- भूतानामिति। उक्तं ते सोपाधिकं रूपं देवादीनामाराध्यतामधिगच्छतीत्याह -- देवेति। जगतः सर्वस्य स्वामित्वेन पालयितृत्वमाह -- जगदिति।

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Sri Dhanpati

अतः सर्वेषामादिस्त्वं स्वयमेवान्योपदेशमन्तरेणात्मना नत्वन्तःकरणादिकरणेनात्मानं निरुपाधिकं सोपाधिकं च निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तं जानासि नत्वन्यस्त्वदननुग्रीतः। भगवतः निरुपाधिकात्मज्ञानसामर्थ्यं संबोधनेनाप्याह -- हे पुरुषोत्तमेति। निरुपाधिकः परमात्मा त्वं निरुपाधिकं स्वस्वरुपं वेत्थेति भावः। सोपाधिकोऽपि जगत्कर्तृत्वादिमांस्त्वमेवातस्तमपि त्वमेव जानासीति ध्वनयन् चतुर्धा संबोधयति। भूतभावनेत्यादिना। भूतोत्पादक? भूतेष भूतनियन्तः। देवदेव देवानां सूर्यादीनामपि द्योतक? जगत्पते जगत्पालक। तथाच जगत उत्प्तिस्थितिनियमकर्ता त्वमेव। ननु ब्रह्मादयः सूर्यादयो रुद्रादय एतत्कर्तारो दृश्यन्ते इत्याशङ्क्य देवानां ब्रह्मादीनामपि देव? त्वदधिष्ठिता एव ते उत्पत्त्यादिकर्तारो न स्वतन्त्रा इति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
swayamyourself
evaindeed
ātmanāby yourself
ātmānamyourself
vetthaknow
tvamyou
puruṣhauttama
bhūtabhāvana
bhūtaīśha
devadeva
jagatpate
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Bhagavad Gita · 10.14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा न दानवाः

हे केशव ! मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् ! आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि

जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 15
स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते

हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 15 translates to: "Verily, Thou Thyself knowest Thyself by Thyself, O Supreme Person, O source and Lord of all beings, O God of gods, O ruler of the world! — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "swayam evātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣhottama" mean in English?

"swayam evātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣhottama" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 15. Verily, Thou Thyself knowest Thyself by Thyself, O Supreme Person, O source and Lord of all beings, O God of gods, O ruler of the world! — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.