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Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 12
अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

நீயே உன்னத பிரம்மன், உன்னதமான இருப்பிடம், உன்னதமான தூய்மையாக்குபவன், நித்தியமான, தெய்வீக நபர், ஆதி கடவுள், பிறக்காதவர் மற்றும் எங்கும் நிறைந்தவர்.

MalayalamIND

നീ പരമമായ ബ്രഹ്മം, പരമമായ വാസസ്ഥലം, പരമമായ ശുദ്ധിയുള്ളവൻ, ശാശ്വതൻ, ദൈവിക വ്യക്തി, ആദിമദൈവം, ജനിക്കാത്തവനും, സർവ്വവ്യാപിയുമാണ്.

TeluguIND

నీవు సర్వోత్కృష్టమైన బ్రహ్మము, సర్వోన్నత నివాసము, పరమ శుద్ధి, శాశ్వతమైన, దివ్యమైన వ్యక్తి, ఆదిమ దేవుడు, పుట్టనివాడు మరియు సర్వవ్యాపి.

SindhiIND

تون اعليٰ برهمڻ آهين، اعليٰ مقام، عظيم پاڪائيندڙ، ابدي، خدائي ذات، اولياءَ خدا، اڻڄاتل ۽ سڀ کان وڏو آهين.

BengaliIND

আপনি পরম ব্রহ্ম, পরম আবাস, পরম শুদ্ধকারী, শাশ্বত, ঐশ্বরিক ব্যক্তি, আদি ঈশ্বর, অজাত এবং সর্বব্যাপী।

GujaratiIND

તમે પરમ બ્રહ્મ, પરમ ધામ, પરમ શુદ્ધિકરણ, શાશ્વત, દિવ્ય વ્યક્તિ, આદિમ ભગવાન, અજન્મા અને સર્વવ્યાપી છો.

KonkaniIND

तूं परम ब्रह्म, परम धाम, परम शुध्दकर्ता, शाश्वत, दिव्य व्यक्ति, आदिम देव, अजन्मा आनी सर्वव्यापी.

ManipuriIND

ꯅꯍꯥꯛ ꯑꯁꯤ ꯑꯊꯣꯏꯕꯥ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯅꯤ, ꯑꯊꯣꯏꯕꯥ ꯂꯩꯐꯝ, ꯑꯊꯣꯏꯕꯥ ꯁꯦꯡꯗꯣꯀꯄꯥ, ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ, ꯗꯤꯕ꯭ꯌ ꯃꯤꯑꯣꯏ, ꯑꯍꯥꯅꯕꯥ ꯏꯁ꯭ꯕꯔ, ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯐꯝ ꯈꯨꯗꯤꯡꯗꯥ ꯂꯩꯕꯥ |

MaithiliIND

आप परम ब्रह्म, परम धाम, परम शुद्धिकर्ता, शाश्वत, दिव्य व्यक्ति, आदि देव, अजन्मा, सर्वव्यापी हैं |

BhojpuriIND

तू परम ब्रह्म, परम धाम, परम शुद्धिकर्ता, शाश्वत, दिव्य व्यक्ति, आदिम भगवान, अजन्मा, आ सर्वव्यापी हईं।

PunjabiIND

ਤੁਸੀਂ ਪਰਮ ਬ੍ਰਾਹਮਣ, ਪਰਮ ਨਿਵਾਸ, ਪਰਮ ਪਵਿੱਤਰ, ਅਨਾਦਿ, ਬ੍ਰਹਮ ਪੁਰਖ, ਪਰਮ ਪੁਰਖ, ਅਜੰਮੇ, ਅਤੇ ਸਰਵ ਵਿਆਪਕ ਹੋ।

MarathiIND

तुम्ही परम ब्रह्म, परम निवास, परम शुद्धकर्ता, शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिम देव, अजन्मा आणि सर्वव्यापी आहात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्'-- अपने सामने बैठे हुए भगवान्की स्तुति करते हुए अर्जुन कहते हैं कि मेरे पूछनेपर जिसको आपने परम ब्रह्म (गीता 8। 3) कहा है, वह परम ब्रह्म आप ही हैं। जिसमें सब संसार स्थित रहता है, वह परम धाम अर्थात् परम स्थान आप ही हैं (गीता 9। 18)। जिसको पवित्रोंमें भी पवित्र कहते हैं -- 'पवित्राणां पवित्रं यः' वह महान् पवित्र भी आप ही हैं। 'पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं ৷৷. स्वयं चैव ब्रवीषि मे'-- ग्रन्थोंमें ऋषियोंने, देवर्षि नारदने, ? असित और उनके पुत्र देवल ऋषिने तथा महर्षि व्यासजीने आपको शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु कहा है। आत्माके रूपमें 'शाश्वत' (गीता 2। 20), सगुण-निराकारके रूपमें 'दिव्य पुरुष' (गीता 8। 10), देवताओँ और महर्षियों आदिके रूपमें 'आदिदेव' (गीता 10। 2), मूढ़लोग मेरेको अज नहीं जानते (गीता 7। 25) तथा असम्मूढ़लोग मेरेको 'अज' जानते हैं (गीता 10। 3 ) -- इस रूपमें अज और मैं अव्यक्तरूपसे सारे संसारमें व्यापक हूँ (गीता 9। 4) -- इस रूपमें 'विभु' स्वयं आपने मेरे प्रति कहा है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

ऊपर कही हुई भगवान्की विभूतिको और योगको सुनकर अर्जुन बोला --, आप परमब्रह्मपरमात्मा? परमधाम -- परमतेज और परमपावन हैं तथा आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं अर्थात् देवलोकमें रहनेवाले अलौकिक पुरुष हैं एवं आप सब देवोंसे पहले होनेवाले आदिदेव? अजन्मा और व्यापक हैं।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

निरस्ताशेषविशेषं निरुपाधिकं सोपाधिकं च सर्वात्मत्वादि भगवतो रूपं तद्धीफलं च श्रुत्वा निरुपाधिकरूपस्य प्राकृतबुद्ध्यनवगाह्योक्तिपूर्वकं मन्दानुग्रहार्थं सर्वदा सर्वबुद्धिग्राह्यं सोपाधिकं रूपं विस्तरेण,श्रोतुमिच्छन्पृच्छतीत्याह -- यथोक्तामिति। परं ब्रह्म भवानिति लक्ष्यनिर्देशः। तस्य लक्षणार्थं परं धामेत्यादिविशेषणत्रयम्। धामशब्दस्य स्थानवाचित्वं व्यावर्तयन्व्याचष्टे तेज इति। तस्य चैतन्यस्य परमत्वं जन्मादिराहित्येन कौटस्थ्यम्। प्रकृष्टं पावनमत्यन्तशुद्धत्वमुच्यते। यदेवंलक्षणं परं ब्रह्म तद्भवानेव नान्य इत्यर्थः। कुतस्त्वमेवमज्ञासीरित्याशङ्क्याप्तवाक्यादित्याह -- पुरुषमिति। दिवि परमे व्योम्नि भवतीति दिव्यस्तं सर्वप्रपञ्चातीतं दीव्यति द्योतत इति देवः स चादिः सर्वमूलत्वादत एवाजस्तं त्वां सर्वगतमाहुरिति संबन्धः।

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Sri Dhanpati

मच्चित्तत्वादिप्रकारभक्तिद्वाराऽविकम्पयोगसाधनभूतौ विभूतियोगौ संक्षेपतः श्रुत्वा विस्तरश्रवणोत्सुकः अर्जुन उवाच -- परमिति। भवान् वासुदेवः परं अक्षरं निरञ्जनं निर्गुणं ब्रह्म। परस्य ब्रह्मणो लक्षणमाह। परं धाम परं तेजः सूर्यादितेजसामपि तेजः।यस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति श्रुतेः। अस्यार्थस्य निरञ्जने ब्रह्मणि सामञ्जस्यमभिप्रेत्य परं धाम परं स्थानमित्यर्थ आचार्यैरुपेक्षितः। पवित्रं पावनं परमं प्रकृष्टं ज्ञानमात्रेण सवासनाऽविद्याकामकर्मेभ्यो मोचकत्वात्। एतादृशं परं ब्रह्म भवानेव नान्यः। नन्वेत्त्वया कुतो ज्ञातमिति चेदाप्तवाक्यादित्याह। पुरुषं परि शयं पूर्णं परमात्मानं अतएव शाश्वतं सर्वदैकरसं दिव्यं दिवि परमे व्योम्नि हृदयाकाशे भवं दिव्यम्। आदिदेवं सर्वेषां ब्रह्मादिदेवानामादिभवं अतएवाजं। विभुं विभवनशीलं। विभवनमित्यस्य विविधं भवनमिति व्यापनमिति वार्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
paramSupreme
brahmaBrahman
paramSupreme
dhāmaAbode
pavitrampurifier
paramamSupreme
bhavānyou
puruṣhampersonality
śhāśhvatamEternal
divyamDivine
ādidevam
ajamthe Unborn
vibhumthe Great
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Bhagavad Gita · 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.13
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे

अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 12
अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 12 translates to: "You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier, eternal, divine Person, the primeval God, unborn, and omnipresent. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमज" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 12. You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier, eternal, divine Person, the primeval God, unborn, and omnipresent. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.