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Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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NepaliIND

उहाँहरूप्रतिको दयाले गर्दा म तिनीहरूको भित्र वास गर्दै ज्ञानको प्रज्वलित दीपद्वारा अज्ञानताबाट जन्मेको अन्धकारलाई नष्ट गर्छु।

GujaratiIND

તેમના માટે કેવળ અનુકંપાથી, હું, તેમના અંતરમાં રહીને, અજ્ઞાનમાંથી જન્મેલા અંધકારને જ્ઞાનના પ્રજ્વલિત દીપથી નાશ કરું છું.

BengaliIND

তাদের প্রতি মমতা থেকে আমি, তাদের অন্তরে অবস্থান করে, জ্ঞানের প্রদীপ্ত প্রদীপ দিয়ে অজ্ঞানতা থেকে জন্ম নেওয়া অন্ধকারকে ধ্বংস করি।

TamilIND

அவர்கள் மீதுள்ள கருணையினால், அவர்கள் உள்ளத்தில் குடியிருக்கும் நான், அறியாமையால் பிறக்கும் இருளை அறிவின் ஒளிரும் விளக்கினால் அழிக்கிறேன்.

MalayalamIND

അവരോടുള്ള കേവലമായ അനുകമ്പയാൽ, അവരുടെ ഉള്ളിൽ വസിക്കുന്ന ഞാൻ, അറിവിൻ്റെ പ്രകാശമാനമായ വിളക്ക് കൊണ്ട് അജ്ഞാനത്തിൽ നിന്ന് ജനിച്ച അന്ധകാരത്തെ നശിപ്പിക്കുന്നു.

TeluguIND

వారిపట్ల కేవలం కరుణతో, వారి అంతరంగంలో నేను నివసిస్తూ, అజ్ఞానం వల్ల పుట్టిన చీకటిని జ్ఞానమనే ప్రకాశించే దీపంతో నాశనం చేస్తాను.

KannadaIND

ಅವರ ಬಗ್ಗೆ ಕೇವಲ ಕರುಣೆಯಿಂದ, ನಾನು, ಅವರ ಆತ್ಮದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುತ್ತಿದ್ದೇನೆ, ಜ್ಞಾನದ ಪ್ರಕಾಶಮಾನ ದೀಪದಿಂದ ಅಜ್ಞಾನದಿಂದ ಹುಟ್ಟಿದ ಕತ್ತಲೆಯನ್ನು ನಾಶಪಡಿಸುತ್ತೇನೆ.

SindhiIND

انهن لاءِ فقط شفقت جي ڪري، مان، سندن اندر ۾ رهي، علم جي روشن چراغ سان جهالت جي اونداهي کي ختم ڪريان ٿو.

ManipuriIND

ꯃꯈꯣꯌꯒꯤꯗꯃꯛ ꯁꯨꯞꯅꯇꯒꯤ ꯅꯨꯡꯁꯤꯕꯥ ꯈꯛꯇꯗꯒꯤ ꯑꯩꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯃꯅꯨꯡꯗꯥ ꯂꯩꯔꯤꯕꯥ ꯑꯃꯝꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯂꯧꯁꯤꯡꯒꯤ ꯃꯉꯥꯜ ꯌꯥꯑꯣꯕꯥ ꯃꯉꯥꯂꯅꯥ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯜꯂꯤ꯫

DogriIND

उंदे उप्पर सिर्फ करुणा दे कारण मैं उंदे अपने अंदर रौंह्दे होई अज्ञानता थमां पैदा होए दे न्हेरे गी ज्ञान दे प्रकाशमान दीपक कन्नै नष्ट करदा ऐ।

AssameseIND

তেওঁলোকৰ প্ৰতি কেৱল মমতাৰ বাবেই মই তেওঁলোকৰ নিজৰ ভিতৰত বাস কৰি অজ্ঞানৰ পৰা জন্ম হোৱা অন্ধকাৰক জ্ঞানৰ আলোকময় প্ৰদীপেৰে ধ্বংস কৰোঁ।

MizoIND

Anmahni lainatna mai mai avang hian kei, anmahni chhunga awm hian hriat lohna atanga lo piang thim chu hriatna êng êng tak hmangin ka tichhia a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः'--उन भक्तोंके हृदयमें कुछ भी सांसारिक इच्छा नहीं, होती। इतना ही नहीं, उनके भीतर मुझे छोड़कर मुक्तितककी भी इच्छा नहीं होती । अभिप्राय है कि वे न तो सांसारिक चीजें चाहते हैं और न पारमार्थिक चीजें (मुक्ति, तत्त्वबोध आदि) ही चाहते हैं। वे तो केवल प्रेमसे मेरा भजन ही करते हैं। उनके इस निष्कामभाव और प्रेमपूर्वक भजन करनेको देखकर मेरा हृदय द्रवित हो जाता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे द्वारा उनकी कुछ सेवा बन जाय, वे मेरेसे कुछ ले लें। परन्तु वे मेरेसे कुछ लेते नहीं तो द्रवित हृदय होनेके कारण केवल उनपर कृपा करनेके लिये कृपा-परवश होकर मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको दूर कर देता हूँ। मेरे द्रवित हृदय होनेका कारण यह है कि मेरे भक्तोंमें किसी प्रकारकी किञ्चिन्मात्र भी कमी न रहे।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

आपकी प्राप्तिके कौनसे प्रतिबन्धके कारणका नाश करनेवाला बुद्धियोग आप उन भक्तोंको देते हैं और किसलिये देते हैं इस आकाङ्क्षापर कहते हैं --, उन ( मेरे भक्तों ) का किसी तरह भी कल्याण हो ऐसा अनुग्रह करनेके लिये ही मैं उनके आत्मभावमें स्थित हुआ अर्थात् आत्माका भाव जो अन्तःकरण है उसमें स्थित हुआ उनके अविवेकजन्य मिथ्या प्रतीतिरूप,मोहमय अन्धकारको प्रकाशमय विवेकबुद्धिरूप ज्ञानदीपकद्वारा नष्ट कर देता हूँ। अर्थात् जो भक्ितके प्रसादरूप घृतसे परिपूर्ण है और मेरे स्वरूपकी भावनाके अभिनिवेशरूप वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हो रहा है? जिसमें ब्रह्मचर्य आदि साधनोंके संस्कारोंसे युक्त बुद्धिरूप बत्ती है? आसक्ितरहित अन्तःकरण जिसका आधार है? जो विषयोंसे हटे हुए और रागद्वेषरूप कालुष्यसे रहित हुए चित्तरूप वायुरहित अपवारकमें ( ढकनेमें ) स्थित है और जो निरन्तर अभ्यास किये हुए एकाग्रतारूप ध्यानजनित? पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाशसे युक्त है? उस ज्ञानदीपकद्वारा ( मैं उनके मोहका नाश कर देता हूँ )।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

भगवत्प्राप्तेर्बुद्धिसाध्यत्वे सत्यनित्यत्वापत्तेस्त्वमापे भक्तेभ्यो बुद्धियोगं ददासीत्ययुक्तमिति शङ्कते -- किमर्थमिति। तेषां बुद्धियोगं किमर्थं ददासीति संबन्धः। भगवत्प्राप्तिप्रतिबन्धकनाशको बुद्धियोगस्तेन नास्ति तत्प्राप्तेरनित्यत्वमित्याशङ्क्याह -- कस्येति। भक्तानां तत्प्राप्तिप्रतिबन्धकं विविच्य दर्शयति -- इत्याकाङ्क्षायामिति। अविवेको नामाज्ञानं ततो जातं मिथ्याज्ञानं तदुभयमेकीकृत्य तमो विवक्ष्यते। नच तन्नाशकत्वं जडस्य कस्यचित्तदन्तर्भूतस्य युक्तं तेनाहं नाशयामीत्युक्तम्। केवलचैतन्यस्य जडबुद्धिवृत्तेरिवाज्ञानाद्यनाशकत्वमाशङ्क्य विशिनष्टि -- आत्मेति। तस्याशयस्तन्निष्ठो वृत्तिविशेषः। वाक्योत्थबुद्धिवृत्त्यभिव्यक्तश्चिदात्मा सहायसामर्थ्यादज्ञानादिनिवृत्तिहेतुरित्यर्थः। बुद्धीद्धबोधस्याज्ञानादिनिवर्तकत्वमुक्त्वा बोधेद्धबुद्धेस्तन्निवर्तकत्वमिति पक्षान्तरमाह -- ज्ञानेति। देहाद्यव्यक्तान्तानात्मवर्गातिरिक्तवस्तुगोचरत्वमाह -- विवेकेति। भगवति सदा विहितया भक्त्या तस्य प्रसादोऽनुग्रहः स एव स्नेहस्तेनासेचनद्वाराऽस्योत्पत्तिमाह -- भक्तीति। मय्येव भावनायामभिनिवेशो वातस्तेन प्रेरितोऽयं जायते? नहि वातप्रेरणमन्तरणादौ दीपस्योत्पत्तिरित्याह -- मद्भावनेति। ब्रह्मचर्यमष्टाङ्गमादिशब्देन शमादिग्रहः। तेन हेतुनाहितसंस्कारवती या प्रज्ञा तथाविधवर्तिनिष्ठश्चायं नहि वर्त्यतिरेकेण दीपो निर्वर्त्यते तदा -- ब्रह्मचर्येति। न चाधारादृते दीपस्योत्पत्तिरदृष्टत्वादित्याह -- विरक्तेति। यद्विषयेभ्यो व्यावृत्तं चित्तं रागाद्यकलुषितं तदेव निवातमपवारकं तत्र स्थितत्वमस्य दर्शयति -- विषयेति। भास्वतेति विशेषणं विशदयति -- नित्येति। सदातनं चित्तैकाग्र्यं तत्पूर्वकं ध्यानं तेन जनितं सम्यग्दर्शनं फलं तदेव भास्तद्वता तत्पर्यन्तेनेत्यर्थः। तेनाज्ञाने सकार्ये निवृत्ते भगवद्भावः स्वयमेव प्रकाशीभवतीति मत्वा व्याख्यातमेव पदमनुवदति -- ज्ञानेति।

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Sri Dhanpati

मत्प्राप्तिबन्धकनाशकं बुद्धियोगं ददामीत्याशयेनाह। तेषामेव मच्चित्तत्वादिप्रकारैर्भजतामनुकम्पार्थ दयाहेतोरहमज्ञानजं मूलाज्ञानाज्जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं तमो मोहाबन्धकारं ज्ञानदीपेन नाशयामि। अचेतनस्य नाशकत्वासंभवादहमित्युक्तं निखिलभ्रामधिष्ठानत्वेनाखिलभासकल्य केवलचैतन्यस्यापि तदसंभवात्। आत्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वतेत्युक्तं। आत्मनो भावोऽन्तःकरणाशयस्तस्मिन्नवस्थितः तत्त्वमस्यादिमहावाक्योत्यान्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तः सन् तेनैव वृत्तिज्ञानदीपेन भक्त्यादिना भास्वता देदीप्यमानेन समूलाज्ञानं मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकं मिथ्याप्रत्यवलक्षणं तमो नाशयामीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
teṣhāmfor them
evaonly
anukampāartham
ahamI
ajñānajam
tamaḥdarkness
nāśhayāmidestroy
ātmabhāva
sthaḥdwelling
jñānaof knowledge
dīpenawith the lamp
bhāsvatāluminous
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Bhagavad Gita · 10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते

उन नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.12
अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्

अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब-के-सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता

उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 11 translates to: "Out of mere compassion for them, I, dwelling within their selves, destroy the darkness born of ignorance with the luminous lamp of knowledge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ" mean in English?

"teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 11. Out of mere compassion for them, I, dwelling within their selves, destroy the darkness born of ignorance with the luminous lamp of knowledge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.