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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

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PunjabiIND

ਅਧਿਆਪਕ, ਪਿਤਾ, ਪੁੱਤਰ, ਅਤੇ ਦਾਦਾ, ਮਾਮਾ, ਸਹੁਰਾ, ਪੋਤੇ, ਜੀਜਾ, ਅਤੇ ਹੋਰ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ-

BengaliIND

শিক্ষক, পিতা, পুত্র, এবং পিতামহ, মামা, শ্বশুর, নাতি, ফুফা, এবং অন্যান্য আত্মীয়-

GujaratiIND

શિક્ષકો, પિતા, પુત્રો અને દાદાઓ, મામા, સસરા, પૌત્રો, વહુઓ અને અન્ય સંબંધીઓ-

MarathiIND

शिक्षक, वडील, मुलगे आणि आजोबा, मामा, सासरे, नातू, मेहुणे आणि इतर नातेवाईक-

TamilIND

ஆசிரியர்கள், தந்தைகள், மகன்கள் மற்றும் தாத்தாக்கள், தாய் மாமன்கள், மாமியார், பேரன்கள், மைத்துனர்கள் மற்றும் பிற உறவினர்கள்-

NepaliIND

शिक्षक, बुबा, छोरा र हजुरबुबा, मामा, ससुरा, नाति, दाजुभाइ र अन्य नातेदारहरू-

TeluguIND

ఉపాధ్యాయులు, తండ్రులు, కొడుకులు మరియు తాతలు, మామలు, మామలు, మనవళ్లు, అన్నదమ్ములు మరియు ఇతర బంధువులు-

KannadaIND

ಶಿಕ್ಷಕರು, ತಂದೆ, ಪುತ್ರರು ಮತ್ತು ಅಜ್ಜ, ತಾಯಿಯ ಚಿಕ್ಕಪ್ಪ, ಮಾವ, ಮೊಮ್ಮಕ್ಕಳು, ಸೋದರ ಮಾವ ಮತ್ತು ಇತರ ಸಂಬಂಧಿಕರು-

DogriIND

गुरु, पिता, पुत्तर, ते दादा, माँ दे चाचा, ससुर, पोते, देवर, ते होर रिश्तेदार—

MalayalamIND

അധ്യാപകർ, പിതാക്കന്മാർ, പുത്രന്മാർ, മുത്തച്ഛന്മാർ, മാതൃസഹോദരന്മാർ, അമ്മായിയപ്പന്മാർ, കൊച്ചുമക്കൾ, സഹോദരീ സഹോദരന്മാർ, മറ്റ് ബന്ധുക്കൾ-

SindhiIND

استاد، پيءُ، پٽ ۽ ڏاڏا، ماما، ڏاڏا، ڏاڏا، پوٽا، ڀائٽيا ۽ ٻيا مائٽ-

BhojpuriIND

गुरु, बाप, बेटा, आ दादा, मामा, ससुर, पोता, देवर, आ अउरी रिश्तेदार—

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --[भगवान् आगे सोलहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें कहेंगे कि काम, क्रोध और लोभ--ये तीनों ही नरकके द्वार हैं। वास्तवमें एक कामके ही ये तीन रूप हैं। ये तीनों सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिको महत्त्व देनेसे पैदा होते हैं। काम अर्थात् कामनाकी दो तरहकी क्रियाएँ होती हैं--इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति। इनमेंसे इष्टकी प्राप्ति भी दो तरहकी होती है --संग्रह करना और सुख भोगना। संग्रहकी इच्छाका नाम 'लोभ' है और सुखभोगकी इच्छाका नाम 'काम' है। अनिष्टकी निवृत्तिमें बाधा पड़नेपर 'क्रोध' आता है अर्थात् भोगोंकी, संग्रहकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंपर अथवा हमारा अनिष्ट करनेवालोंपर, हमारे शरीरका नाश करनेवालोंपर क्रोध आता है, जिससे अनिष्ट करनेवालोंका नाश करनेकी क्रिया होती है। इससे सिद्ध हुआ कि युद्धमें मनुष्यकी दो तरहसे ही प्रवृत्ति होती है --अनिष्टकी निवृत्तिके लिये अर्थात् अपने 'क्रोध' को सफल बनानेके लिये और इष्टकी प्राप्तिके लिये अर्थात् 'लोभ' की पूर्तिके लिये। परन्तु अर्जुन यहाँ इन दोनों ही बातोंका निषेध कर रहे हैं] 'आचार्याः पितरः৷৷. किं नु महीकृते'-- अगर हमारे ये कुटुम्बीजन अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर मेरेपर प्रहार करके मेरा वध भी करना चाहें, तो भी मैं अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। अगर ये अपनी इष्टप्राप्तिके लिये राज्यके लोभमें आकर मेरेको मारना चाहें, तो भी मैं अपनी इष्ट-प्राप्तिके लिये लोभमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। तात्पर्य यह हुआ कि क्रोध और लोभमें आकर मेरेको नरकोंका दरवाजा मोल नहीं लेना है। यहाँ दो बार 'अपि' पदका प्रयोग करनेमें अर्जुनका आशय यह है कि मैं इनके स्वार्थमें बाधा ही नहीं देता तो ये मुझे मारेंगे ही क्यों? पर मान लो कि 'पहले इसने हमारे स्वार्थमें बाधा दी है' ऐसे विचारसे ये मेरे शरीरका नाश करनेमें प्रवृत्त हो जायँ, तो भी (घ्नतोऽपि) मैं इनको मारना नहीं चाहता। दूसरी बात, इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिल जाय, यह तो सम्भावना ही नहीं है, पर मान लो कि इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिलता हो तो भी (अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः) मैं इनको मारना नहीं चाहता।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

मातुला इति। श्याला भार्याणां भ्रातरो धृष्टद्युम्नप्रभृतयः। वध्येष्वपि स्वराज्यपरिपन्थिष्वाततायिषु कृपाबुद्ध्या स्वधर्माद्युद्धात्पूर्वोक्तमोहादिवशात्प्रच्युतिं प्रदर्शयति एतानिति। जिघांसन्तं जिघांसीयात् इति न्यायादेतेषां हिंसा न दोषायेत्याशङ्क्याह घ्नतोऽपीति।

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Sri Dhanpati

तान्विशिनष्टि आचार्या इति। मातुला जननीभ्रातरः। भार्याभ्रातारः स्यालाः। स्पष्टमन्यत्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
āchāryāḥteachers
pitaraḥfathers
putrāḥsons
tathāas well
evaindeed
chaalso
pitāmahāḥgrandfathers
mātulāḥmaternal uncles
śhvaśhurāḥfathers
pautrāḥgrandsons
śhyālāḥbrothers
sambandhinaḥkinsmen
tathāas well
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.33
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च

जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 34
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 34 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 34 का हिंदी अर्थ: "आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 34?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 34 translates to: "Teachers, fathers, sons, and grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law, and other relatives— — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्ध" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 34 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "āchāryāḥ pitaraḥ putrās tathaiva cha pitāmahāḥ" mean in English?

"āchāryāḥ pitaraḥ putrās tathaiva cha pitāmahāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 34. Teachers, fathers, sons, and grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law, and other relatives— — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.