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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

Global Translations

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MalayalamIND

കൃഷ്ണാ, അവരെന്നെ കൊന്നാലും മൂന്നുലോകത്തിൻ്റെയും ആധിപത്യത്തിനുവേണ്ടി ഇവരെ കൊല്ലാൻ ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നില്ല. ഭൂമിക്കുവേണ്ടി അവരെ കൊല്ലാൻ വിട്ടേക്കുക.

KannadaIND

ಇವುಗಳನ್ನು ಕೊಲ್ಲಲು ನಾನು ಬಯಸುವುದಿಲ್ಲ, ಓ ಕೃಷ್ಣ, ಅವರು ನನ್ನನ್ನು ಕೊಂದರೂ, ಮೂರು ಲೋಕಗಳ ಮೇಲೆ ಪ್ರಭುತ್ವಕ್ಕಾಗಿ; ಭೂಮಿಯ ಸಲುವಾಗಿ ಅವರನ್ನು ಕೊಲ್ಲುವುದನ್ನು ಬಿಟ್ಟುಬಿಡಿ.

MizoIND

Hengte hi ka that duh lo, Aw Krishna, min that mah se, khawvel pathum chunga thuneihna atan; leilung tana thah mai mai chu bansan rawh.

KonkaniIND

हीं हांवें मारपाची इत्सा ना, हे कृष्ण, ते म्हाका मारतात तरी, त्रिलोकांचेर प्रभुत्व मेळोवपा खातीर; धर्तरे खातीर तांकां मारप सोडून.

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, આ ત્રણે લોક પર આધિપત્ય ખાતર મને મારી નાખે તો પણ હું મારી નાખવા ઈચ્છતો નથી; પૃથ્વીની ખાતર તેમને મારવાનું છોડી દો.

BhojpuriIND

ई सब के हम ना मारे के चाहत बानी हे कृष्ण, भले ऊ लोग हमरा के मारत बा, तीन लोक पर प्रभुत्व खातिर; धरती के खातिर मारल छोड़ दीं।

TeluguIND

మూడు లోకాలపై ఆధిపత్యం కోసం వారు నన్ను చంపినప్పటికీ, ఓ కృష్ణా, వీటిని నేను చంపడానికి ఇష్టపడను; భూమి కొరకు వారిని చంపడం మాత్రమే వదిలివేయండి.

BengaliIND

ত্রিভুবনে আধিপত্যের জন্য এরা আমাকে হত্যা করলেও, হে কৃষ্ণ, এদের আমি হত্যা করতে চাই না; পৃথিবীর স্বার্থে তাদের হত্যা করা ছেড়ে দিন।

TamilIND

கிருஷ்ணா, அவர்கள் என்னைக் கொன்றாலும், மூவுலகின் மீதும் ஆதிக்கம் செலுத்துவதற்காக இவற்றை நான் கொல்ல விரும்பவில்லை; பூமிக்காக அவர்களைக் கொல்வதை விட்டுவிடு.

PunjabiIND

ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਮਾਰਨਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ, ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਭਾਵੇਂ ਇਹ ਤਿੰਨਾਂ ਜਹਾਨਾਂ ਉੱਤੇ ਰਾਜ ਕਰਨ ਲਈ ਮੈਨੂੰ ਮਾਰਦੇ ਹਨ; ਧਰਤੀ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਾਰਨਾ ਛੱਡ ਦਿਓ।

MarathiIND

हे कृष्णा, मला मारण्याची इच्छा नाही, जरी त्यांनी मला मारले तरी तिन्ही लोकांवर प्रभुत्व मिळवण्यासाठी; पृथ्वीच्या फायद्यासाठी त्यांना मारणे सोडा.

NepaliIND

हे कृष्ण, यिनीहरूलाई म मार्न चाहन्नँ, यिनीहरूले तीनै लोकमा आधिपत्यको लागि मलाई मारे पनि; पृथ्वीको खातिर तिनीहरूलाई मार्न छोड्नुहोस्।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[भगवान् आगे सोलहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें कहेंगे कि काम, क्रोध और लोभ--ये तीनों ही नरकके द्वार हैं। वास्तवमें एक कामके ही ये तीन रूप हैं। ये तीनों सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिको महत्त्व देनेसे पैदा होते हैं। काम अर्थात् कामनाकी दो तरहकी क्रियाएँ होती हैं--इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति। इनमेंसे इष्टकी प्राप्ति भी दो तरहकी होती है--संग्रह करना और सुख भोगना। संग्रहकी इच्छाका नाम 'लोभ' है और सुखभोगकी इच्छाका नाम 'काम' है। अनिष्टकी निवृत्तिमें बाधा पड़नेपर 'क्रोध' आता है अर्थात् भोगोंकी, संग्रहकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंपर अथवा हमारा अनिष्ट करनेवालोंपर, हमारे शरीरका नाश करनेवालोंपर क्रोध आता है जिससे अनिष्ट करनेवालोंका नाश करनेकी क्रिया होती है। इससे सिद्ध हुआ कि युद्धमें मनुष्यकी दो तरहसे ही प्रवृत्ति होती है --अनिष्टकी निवृत्तिके लिये अर्थात् अपने 'क्रोध' को सफल बनानेके लिये और इष्टकी प्राप्तिके लिये अर्थात् 'लोभ' की पूर्तिके लिये। परन्तु अर्जुन यहाँ इन दोनों ही बातोंका निषेध कर रहे हैं] 'आचार्याः पितरः৷৷. किं नु महीकृते'----अगर हमारे ये कुटुम्बीजन अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर मेरेपर प्रहार करके मेरा वध भी करना चाहें, तो भी मैं अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। अगर ये अपनी इष्टप्राप्तिके लिये राज्यके लोभमें आकर मेरेको मारना चाहें, तो भी मैं अपनी इष्टप्राप्तिके लिये लोभमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। तात्पर्य यह हुआ कि क्रोध और लोभमें आकर मेरेको नरकोंका दरवाजा मोल नहीं लेना है। यहाँ दो बार अपि पदका प्रयोग करनेमें अर्जुनका आशय यह है कि मैं इनके स्वार्थमें बाधा ही नहीं देता तो ये मुझे मारेंगे ही क्यों? पर मान लो कि पहले इसने हमारे स्वार्थमें बाधा दी' है ऐसे विचारसे ये मेरे शरीरका नाश करनेमें प्रवृत्त हो जायँ तो भी (घ्नतोऽपि) मैं इनको मारना नहीं चाहता। दूसरी बात इनको मारनेसे मुझे

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

पृथिवीप्राप्त्यर्थं हि हननमेतेषामिष्यते न च तत्प्राप्तिः समीहितेति कैमुतिकन्यायेन दर्शयति अपीति। नहि महदपि त्रैलोक्यलक्षणं राज्यं लब्धुं स्वजनहिंसायै मनो मदीयं स्पृहयति पृथिवीप्राप्त्यर्थं पुनर्बन्धुवधं न श्रद्दधामीति किं वक्तव्यमित्यर्थः। दुर्योधनादीनां शत्रूणां निग्रहे प्रीतिप्राप्तिसंभवाद्युद्धं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह निहत्येति।

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Sri Dhanpati

ननु स्वराज्यपरिपन्थिनामाततायिनां हननमेव युक्तंजिघांसन्तं जिघांसीयात् इति न्यायेनैतेषां हनने दोषाभावादित्याशङ्क्याह एतानिति। अपि त्रेलोक्यराज्यस्य हेतोर्घ्नातोऽप्येतानित्यन्वयः। पृथिवीप्राप्तयर्थं हि हननमेतेषामिष्यते नच तत्प्राप्तिः समीहितेति कैमुत्यन्यायेन दर्शयति अपीति। नहि महदपि त्रेलोक्यराज्यं लब्धुं स्वजनहिंसायै मनो मदीयं स्पृहयति पृथिवीप्राप्त्यर्थं पुनर्बन्धुवधं न श्रद्दध्यामिति किं वक्तव्यमित्यर्थ इति प्राञ्चः। मधोः सूदनेन त्वयापि स्वपुत्ररक्षणं कृतमिति कथमस्माभिः संबन्धिनाशः कर्तव्य इति ध्वनयन्संबोधयति मधुसूदनेति। यद्वा मधुरित्युपलक्षणं कैटभस्यापि। मधुकैटभयो रजस्तमसोः सूजनस्त्वं स्वभक्तं मां तदुभयात्मकेऽस्मिन्घोरे कर्मणि नियोजयितुं नार्हसीति सूचयन्नाह मधुसूदनेति। मधुसूदनेति संबोधयन् वैदिकमार्गप्रवर्तक्रत्वं भगवतः सूचयतीति केचित्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
etānthese
nanot
hantumto slay
ichchhāmiI wish
ghnataḥkilled
apieven though
madhusūdanaShree Krishna, killer of the demon Madhu
apieven though
trailokya
hetoḥfor the sake of
kim nuwhat to speak of
mahīkṛite
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः

हे जनार्दन! इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारकर हमलोगों को क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 35
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते

आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ: "आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 35?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 35 translates to: "These I do not wish to kill, O Krishna, even though they kill me, for the sake of dominion over the three worlds; leave alone killing them for the sake of the earth. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 35 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "etān na hantum ichchhāmi ghnato ’pi madhusūdana" mean in English?

"etān na hantum ichchhāmi ghnato ’pi madhusūdana" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 35. These I do not wish to kill, O Krishna, even though they kill me, for the sake of dominion over the three worlds; leave alone killing them for the sake of the earth. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.