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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 30
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

গাণ্ডীব আমার হাত থেকে পিছলে যায়, এবং আমার সমস্ত চামড়া পুড়ে যায়; আমি দাঁড়াতে অক্ষম, এবং আমার মন রিল করছে, যেমন ছিল।

TamilIND

காண்டீவம் என் கையிலிருந்து நழுவி, என் தோல் முழுவதும் எரிகிறது; என்னால் நிற்க இயலவில்லை, என் மனம் அப்படியே துடிக்கிறது.

TeluguIND

గాండీవ నా చేతి నుండి జారిపోతుంది, మరియు నా చర్మం అంతా కాలిపోతుంది; నేను నిలబడలేక పోతున్నాను, అలాగే నా మనసు కుదుటపడుతోంది.

MarathiIND

माझ्या हातातून गांडिवा निसटला आणि माझी त्वचा सर्वत्र जळली; मला उभे राहता येत नाही, आणि माझे मन जसे होते तसे धडधडत आहे.

SindhiIND

گنديوا منهنجي هٿ مان ڦٽي ٿي، ۽ منهنجي چمڙي سڙي ٿي. مان بيهڻ جي قابل نه آهيان، ۽ منهنجو ذهن ڦري رهيو آهي، جيئن هو.

BhojpuriIND

हाथ से गांडीव फिसल जाला, आ चमड़ी चारो ओर जर जाला; हम खड़ा होखे में असमर्थ बानी, आ हमार मन डगमगात बा, जइसे कि कहल जा सकेला।

GujaratiIND

ગાંડીવ મારા હાથમાંથી સરકી જાય છે, અને મારી ચામડી બળી જાય છે; હું ઊભો રહી શકતો નથી, અને મારું મન ફરી વળે છે, જેવું હતું.

MalayalamIND

എൻ്റെ കൈയിൽ നിന്ന് ഗാന്ഡീവം വഴുതി, എൻ്റെ തൊലി മുഴുവൻ കത്തുന്നു; എനിക്ക് നിൽക്കാൻ കഴിയുന്നില്ല, എൻ്റെ മനസ്സ് അത് പോലെ തളരുന്നു.

KannadaIND

ಗಾಂಡೀವವು ನನ್ನ ಕೈಯಿಂದ ಜಾರುತ್ತದೆ, ಮತ್ತು ನನ್ನ ಚರ್ಮವು ಸುಟ್ಟುಹೋಗುತ್ತದೆ; ನಾನು ನಿಲ್ಲಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗುತ್ತಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ನನ್ನ ಮನಸ್ಸು ತತ್ತರಿಸುತ್ತಿದೆ.

NepaliIND

मेरो हातबाट गण्डिव खस्यो, र मेरो छाला चारैतिर जल्यो; म उभिन असमर्थ छु, र मेरो दिमाग रिलिङ्ग भइरहेको छ, जस्तै यो थियो।

PunjabiIND

ਗੰਦੀਵਾ ਮੇਰੇ ਹੱਥੋਂ ਖਿਸਕ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਚਮੜੀ ਸਾਰੇ ਪਾਸੇ ਸੜ ਜਾਂਦੀ ਹੈ; ਮੈਂ ਖੜ੍ਹਨ ਤੋਂ ਅਸਮਰੱਥ ਹਾਂ, ਅਤੇ ਮੇਰਾ ਮਨ ਉਲਝ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਇਹ ਸੀ.

DogriIND

गंडीवा मेरे हत्थ तों फिसल जांदी है, ते मेरी चमड़ी चारों पासे जली जांदी है; मैं खड़ोने च असमर्थ हां, ते मेरा मन डगमगांदा ऐ, मानो।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्'--अर्जुनको कृष्ण' नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका 'पार्थ' नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे सञ्जयने गीताके अन्तमें 'कृष्ण' और 'पार्थ' नामका उल्लेख किया है 'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः' (18। 78)। धृतराष्ट्रने पहले 'समवेता युयुत्सवः' कहा था और यहाँ अर्जुनने भी 'युयुत्सुं समुपस्थितम्' कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं--ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ 'मामकाः' और 'पाण्डवाः' कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है; अतः अर्जुनने यहाँ 'स्वजनम्' कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी। अबतक 'दृष्ट्वा' पद तीन बार आया है 'दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्' (1। 2) 'व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्' (1। 20) और यहाँ दृष्ट्वेमं स्वजनम् (1। 28)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है। 'सीदन्ति मम गात्राणि ৷৷. भ्रमतीव च मे मनः'-- अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अङ्ग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है। जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमाञ्चित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं, वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! त्वचामें--सारे शरीरमें जलन हो रही है । मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये--यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ! ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है। सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिह्नोंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शकुनोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

किं चाधैर्यमपि संवृत्तमित्याह न चेति। मोहोऽपि महान्भवतीत्याह भ्रमतीवेति। विपरीतनिमित्तप्रतीतेरपि मोहो भवतीत्याह निमित्तानीति। तानि विपरीतानि निमित्तानि यानि वामनेत्रस्फुरणादीनि।

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Sri Dhanpati

हस्ताद्गाण्डीवं स्त्रंसते पतति। स्वक्चैव परि समन्ताद्दह्यते। धैर्याभावादवस्थातुं च न शक्नोमि। मे मनो भ्रमतीव च। मम मनो मोहं प्राप्नोतीवेत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
gāṇḍīvamArjun’s bow
sraṁsateis slipping
hastātfrom (my) hand
tvakskin
chaand
evaindeed
paridahyateis burning all over
nanot
chaand
śhaknomiam able
avasthātumremain steady
bhramati ivawhirling like
chaand
memy
manaḥmind
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे

हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 30
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 30
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 30?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 30 translates to: "The Gandiva slips from my hand, and my skin burns all over; I am unable to stand, and my mind is reeling, as it were. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 30 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "gāṇḍīvaṁ sraṁsate hastāt tvak chaiva paridahyate" mean in English?

"gāṇḍīvaṁ sraṁsate hastāt tvak chaiva paridahyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 30. The Gandiva slips from my hand, and my skin burns all over; I am unable to stand, and my mind is reeling, as it were. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.