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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे

हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

आणि हे केशवा, मला अशुभ चिन्ह दिसत आहेत. माझ्या नातलगांना युद्धात मारण्यात मला काही फायदा दिसत नाही.

PunjabiIND

ਅਤੇ ਹੇ ਕੇਸ਼ਵ, ਮੈਂ ਅਸ਼ੁਭ ਸੰਕੇਤ ਦੇਖਦਾ ਹਾਂ। ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ ਨੂੰ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਮਾਰਨ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਭਲਾਈ ਨਹੀਂ ਵੇਖਦਾ।

GujaratiIND

અને ઓ કેશવ, હું અશુભ સંકેતો જોઉં છું. મારા સગાઓને યુદ્ધમાં મારી નાખવામાં મને કોઈ ફાયદો દેખાતો નથી.

TeluguIND

మరియు నాకు అపశకునాలు కనిపిస్తున్నాయి, ఓ కేశవా. యుద్ధంలో నా బంధుమిత్రులను చంపడం వల్ల నాకు ఎలాంటి మేలు జరగదు.

KannadaIND

ಮತ್ತು ನಾನು ಕೆಟ್ಟ ಶಕುನಗಳನ್ನು ನೋಡುತ್ತೇನೆ, ಓ ಕೇಶವ. ಯುದ್ಧದಲ್ಲಿ ನನ್ನ ಬಂಧುಗಳನ್ನು ಸಂಹರಿಸುವುದರಿಂದ ನನಗೆ ಒಳ್ಳೆಯದೇನೂ ಕಾಣುತ್ತಿಲ್ಲ.

NepaliIND

अनि हे केशव, म अशुभ संकेत देख्छु। लडाइँमा आफ्ना आफन्तहरूलाई मार्नुमा म कुनै फाइदा देख्दिन।

TamilIND

கேசவா, நான் தீய சகுனங்களைக் காண்கிறேன். என் உறவினர்களை போரில் கொல்வதில் எனக்கு எந்த நன்மையும் இல்லை.

OdiaIND

ହେ କେସାଭା, ମୁଁ ଅସୁସ୍ଥତା ଦେଖୁଛି | ଯୁଦ୍ଧରେ ମୋର ସମ୍ପର୍କୀୟମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବାରେ ମୁଁ କ good ଣସି ଭଲ ଦେଖୁ ନାହିଁ |

MalayalamIND

കേശവാ, ഞാൻ ദുശ്ശകുനങ്ങൾ കാണുന്നു. എൻ്റെ ബന്ധുക്കളെ യുദ്ധത്തിൽ കൊല്ലുന്നതിൽ ഞാൻ ഒരു ഗുണവും കാണുന്നില്ല.

SindhiIND

۽ مون کي خراب شگون نظر اچن ٿا، اي ڪيسوا. مون کي جنگ ۾ پنهنجن مائٽن کي مارڻ ۾ ڪا چڱائي نظر نٿي اچي.

BengaliIND

এবং আমি অশুভ লক্ষণ দেখছি, হে কেশব। আমি আমার আত্মীয়দের যুদ্ধে মেরে ফেলার কোন কল্যাণ দেখি না।

BhojpuriIND

आ हम देखनी अशुभ शगुन हे केशव। लड़ाई में अपना रिश्तेदारन के हत्या से हमरा कवनो फायदा नइखे लउकत।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव'--हे केशव! मैं शकुनोंको भी विपरीत ही देख रहा हूँ। तात्पर्य है कि किसी भी कार्यके आरम्भमें मनमें जितना अधिक उत्साह (हर्ष) होता है, वह उत्साह उस कार्यको उतना ही सिद्ध करनेवाला होता है। परन्तु अगर कार्यके आरम्भमें ही उत्साह भङ्ग हो जाता है, मनमें संकल्प-विकल्प ठीक नहीं होते, तो उस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं होता। इसी भावसे अर्जुन कह रहे हैं कि अभी मेरे शरीरमें अवयवोंका शिथिल होना, कम्प होना, मुखका सूखना आदि जो लक्षण हो रहे हैं, ये व्यक्तिगत शकुन भी ठीक नहीं हो रहे हैं इसके सिवाय आकाशसे उल्कापात होना, असमयमें ग्रहण लगना, भूकम्प होना, पशु-पक्षियोंका भयंकर बोली बोलना, चन्द्रमाके काले चिह्नका मिट-सा जाना, बादलोंसे रक्तकी वर्षा होना आदि जो पहले शकुन हुए हैं, वे भी ठीक नहीं हुए हैं। इस तरह अभीके और पहलेके--इन दोनों शकुनोंकी ओर देखता हूँ, तो मेरेको ये दोनों ही शकुन विपरीत अर्थात् भावी अनिष्टके सूचक दीखते हैं। 'न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे'--युद्धमें अपने कुटुम्बियोंको मारनेसे हमें कोई लाभ होगा--ऐसी बात भी नहीं है। इस युद्धके परिणाममें हमारे लिये लोक और परलोक--दोनों ही हितकारक नहीं दीखते। कारण कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है। अतः कुलका नाश करनेसे हमें पाप ही लगेगा ,जिससे नरकोंकी प्राप्ति होगी। इस श्लोकमें 'निमित्तानि पश्यामि' और 'श्रेयः अनुपश्यामि'-- इन दोनों वाक्योंसे अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि मैं शुकुनोंको देखूँ अथवा स्वयं विचार करूँ, दोनों ही रीतिसे युद्धका आरम्भ और उसका परिणाम हमारे लिये और संसारमात्रके लिये हितकारक नहीं दीखता। सम्बन्ध-- जिसमें न तो शुभ शकुन दीखते हैं और न श्रेय ही दीखता है, ऐसी अनिष्टकारक विजयको प्राप्त करनेकी अनिच्छा अर्जुन आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

युद्धे स्वजनहिंसया फलानुपलम्भादपि तस्मादुपरिरंसा जायत इत्याह न चेति।

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Sri Dhanpati

विपरीतनिमित्तप्रवृत्तेरपि मोहो भवतीत्याह निमित्तानीति। निमित्तानि च विपरीतानि वामनेत्रस्फुरणादीनि पश्यामि। तथाचास्मन्निमित्तः स्वजननाशो भविष्यति नतु केश्यादिमारणेन भवता यथा स्वजनः पालितः तथा स्वजनरक्षणमिति सूचयन्संबोधयति हे केशवेति। अहमनात्मवित्त्वेन दुःखित्वाच्छोकनिबन्धनं क्लेशमनुभवामि त्वं तु सदानन्दरुपत्वाच्छोकासंसर्गीति कृष्णपदेन सूचितम्। अतः स्वजनदर्शने तुल्येऽपि शोकासंसर्गित्वलक्षणाद्विशेषात्त्वं मामशोकं कुर्विति भावः। केवपदेन च तत्करणसामर्थ्यं केशौ ब्रह्मरुद्रौ वात्यनुकम्प्यतया गच्छतीति तद्य्वत्पत्तेः। भक्तदुःखकर्षित्वं वा कृष्णपदेनोक्तम्। केशवपदेन च केश्यादिदुष्टनिबर्हणेन सर्वदा भक्तान्पालयसीत्यतो मामपि शोकनिवारणेन पालयिष्यसीति सूचितमिति केचित्। इदानीं शोकमोहाविष्टचित्तः स्वधर्मेऽधर्मतां निष्प्रयोजनतां चोरोपयन्नाह नचेति। आहवे युद्धभूमौ स्वजनं स्वबन्धुवर्गं हत्वा अनु पश्चाच्छ्रेयो न पश्यामि। अतो निष्फलाया बन्धुहिंसाया अधर्मनिमित्ताया निवृत्तिरेव युक्तेति भावः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nimittāniomens
chaand
paśhyāmiI see
viparītānimisfortune
keśhavaShree Krishna, killer of the Keshi demon
nanot
chaalso
śhreyaḥgood
anupaśhyāmiI foresee
hatvāfrom killing
svajanam
āhavein battle
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Bhagavad Gita · 1.30
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा

हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुखों को ही चाहता हूँ। हे गोविन्द! हमलोगों को राज्य से क्या लाभ? भोगों से क्या लाभ? अथवा जीने से भी क्या लाभ? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे

हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 31 translates to: "And I see ill omens, O Kesava. I do not see any good in slaying my kinsmen in battle. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। हे केशव! मैं लक्षणों - (शकुनों) को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनोंको मारकर श्रेय (लाभ) भी नहीं देख रहा हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "nimittāni cha paśhyāmi viparītāni keśhava" mean in English?

"nimittāni cha paśhyāmi viparītāni keśhava" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 31. And I see ill omens, O Kesava. I do not see any good in slaying my kinsmen in battle. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.