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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ನನ್ನ ಕೈಕಾಲುಗಳು ವಿಫಲವಾಗಿವೆ, ನನ್ನ ಬಾಯಿ ಒಣಗಿದೆ, ನನ್ನ ದೇಹವು ನಡುಗುತ್ತಿದೆ ಮತ್ತು ನನ್ನ ಕೂದಲು ಕೊನೆಗೊಳ್ಳುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

എൻ്റെ കൈകാലുകൾ തകരാറിലാകുന്നു, എൻ്റെ വായ വരണ്ടിരിക്കുന്നു, എൻ്റെ ശരീരം വിറയ്ക്കുന്നു, എൻ്റെ രോമങ്ങൾ നിലക്കുന്നു.

MarathiIND

माझे हातपाय निकामी झाले आहेत, माझे तोंड सुकले आहे, माझे शरीर थरथरले आहे आणि माझे केस शेवटपर्यंत उभे आहेत.

PunjabiIND

ਮੇਰੇ ਅੰਗ ਫੇਲ ਹੋ ਗਏ ਹਨ, ਮੇਰਾ ਮੂੰਹ ਸੁੱਕ ਗਿਆ ਹੈ, ਮੇਰਾ ਸਰੀਰ ਕੰਬ ਗਿਆ ਹੈ, ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਵਾਲ ਸਿਰੇ 'ਤੇ ਖੜ੍ਹੇ ਹਨ।

BengaliIND

আমার অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ ব্যর্থ, আমার মুখ শুকিয়ে গেছে, আমার শরীর কাঁপছে, এবং আমার চুল শেষ হয়ে গেছে।

TamilIND

என் கைகால்கள் செயலிழந்து, என் வாய் வறண்டு, என் உடல் நடுங்குகிறது, என் தலைமுடி உதிர்கிறது.

SindhiIND

منهنجا عضوا ناڪام ٿي ويا آهن، منهنجو وات سڪل آهي، منهنجو جسم لرزندو آهي، ۽ منهنجا وار ختم ٿي ويا آهن.

GujaratiIND

મારા અંગો નિષ્ફળ જાય છે, મારું મોં સુકાઈ જાય છે, મારું શરીર કંપાય છે, અને મારા વાળ છેડે છે.

TeluguIND

నా అవయవాలు విఫలమయ్యాయి, నా నోరు ఎండిపోయింది, నా శరీరం వణుకుతోంది, నా వెంట్రుకలు వాలిపోయాయి.

NepaliIND

मेरा अंगहरू फेल छन्, मेरो मुख सुकेको छ, मेरो शरीर काँपिरहेको छ, र मेरो कपाल छेउमा खडा छ।

BhojpuriIND

अंग-अंग फेल हो जाला, मुँह सूख जाला, देह काँप जाला आ बाल सिरा पर खड़ा हो जाला।

MizoIND

Ka taksa pengte a chak lo a, ka hmui a ro a, ka taksa a khur a, ka sam pawh a ding chhuak vek bawk.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्'--अर्जुनको 'कृष्ण' नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका पार्थ' नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे सञ्जयने गीताके अन्तमें 'कृष्ण' और 'पार्थ' नामका उल्लेख किया है 'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः' (18। 78)। धृतराष्ट्रने पहले 'समवेता युयुत्सवः' कहा था और यहाँ अर्जुनने भी 'युयुत्सुं समुपस्थितम्' कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं--ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ 'मामकाः' और 'पाण्डवाः' कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है; अतः अर्जुनने यहाँ 'स्वजनम्' कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी। अबतक 'दृष्ट्वा' पद तीन बार आया है 'दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्' (1। 2), 'व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्' (1। 20) और यहाँ 'दृष्ट्वेमं स्वजनम्' (1। 28)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है। 'सीदन्ति मम गात्राणि ৷৷. भ्रमतीव च मे मनः'-- अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अङ्ग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है। जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमाञ्चित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं, वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है त्वचामें सारे शरीरमें जलन हो रही है । मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये--यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ! ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है। सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिह्नोंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शकुनोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

अङ्गेषु व्यथा मुखे परिशोषश्चेत्युभयं शोकलिङ्गमुक्तम् संप्रति वेपथुप्रभृतीनि भीतिलिङ्गान्युपन्यस्यति वेपथुश्चेति। रोमहर्षो रोम्णां गात्रेषु पुलकितत्वम्।

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Sri Dhanpati

हे कृष्णेति संबोधयन् यल्लोकोपकाराय मदीयज्ञानापकर्षणं त्वयां तन्मया बुद्धमिति गूढाभिसंधि सूचयति। आत्मतत्त्वापरिज्ञानकृताहंकारममकारोत्थयोः शोकमोहयोः लिङ्गानि स्वस्मिन्दर्शयति सीदन्तीत्यादिना। मम युयुत्सुं स्वजनं दृष्ट्वा एते मरिष्यन्तीति शोकेनाविष्टस्य व्याकुलचित्तस्य गात्राण्यङ्गानि सीदन्ति शिथिलानि भवन्ति। वेपुथः कम्पः। रोमहर्षो रोमाञ्चः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sīdantiquivering
mamamy
gātrāṇilimbs
mukhammouth
chaand
pariśhuṣhyatiis drying up vepathuḥ
chaand
śharīreon the body
memy
romaharṣhaḥ
chaalso
jāyateis happening
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.28
अर्जुन उवाच कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.30
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 29
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 29 translates to: "My limbs fail, my mouth is parched, my body quivers, and my hair stands on end. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati" mean in English?

"sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 29. My limbs fail, my mouth is parched, my body quivers, and my hair stands on end. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.