Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 28
अर्जुन उवाच कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

हे कृष्ण, मेरा आफन्तहरू यहाँ युद्ध गर्न आतुर भएका देखेर,

TamilIND

ஓ கிருஷ்ணா, என் உறவினர்கள் இங்கே அணிவகுத்து, சண்டையிட ஆர்வத்துடன் இருப்பதைக் கண்டு,

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, నా బంధుమిత్రులు ఇక్కడ పోరుబాట పట్టడానికి ఉవ్విళ్లూరుతున్నారు.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਮੇਰੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ ਨੂੰ ਇੱਥੇ ਲੜਨ ਲਈ ਉਤਾਵਲੇ ਵੇਖ ਕੇ,

KonkaniIND

हे कृष्ण, हांगा सजलेले नातेदार पळोवन, झुजपाक उत्सुक,

ManipuriIND

ꯍꯦ ꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯁ꯭ꯟ, ꯑꯩꯒꯤ ꯏꯔꯩꯕꯥꯀꯆꯥꯁꯤꯡꯕꯨ ꯃꯐꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯁꯦꯝ ꯁꯥꯗꯨꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯎꯕꯗꯥ, ꯂꯥꯟꯊꯦꯡꯅꯅꯕꯥ ꯋꯥꯁꯛ ꯆꯦꯠꯄꯥ,

BhojpuriIND

हे कृष्ण, हमरा रिश्तेदारन के इहाँ सज-धज के देख के, लड़ाई करे खातिर आतुर,

MaithiliIND

हे कृष्ण, हमर रिश्तेदार लोकनि केँ एतय सज-धज कए, युद्ध करबाक लेल आतुर देखि,

KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣಾ, ನನ್ನ ಬಂಧುಗಳು ಇಲ್ಲಿ ಯುದ್ಧಮಾಡಲು ಉತ್ಸುಕರಾಗಿರುವುದನ್ನು ನೋಡಿ,

MarathiIND

हे कृष्णा, माझे नातलग येथे लढण्यास आतुर झालेले पाहून,

MalayalamIND

കൃഷ്ണാ, യുദ്ധം ചെയ്യാൻ ഉത്സാഹത്തോടെ ഇവിടെ അണിനിരന്നിരിക്കുന്ന എൻ്റെ ബന്ധുക്കളെ കണ്ടു.

SindhiIND

اي ڪرشنا، منهنجي مائٽن کي هتي صفا بيٺا ڏسي، وڙهڻ جو شوقين،

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्'--अर्जुनको 'कृष्ण' नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका 'पार्थ' नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे सञ्जयने गीताके अन्तमें 'कृष्ण' और 'पार्थ' नामका उल्लेख किया है 'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः' (18। 78)। धृतराष्ट्रने पहले 'समवेता युयुत्सवः' कहा था और यहाँ अर्जुनने भी 'युयुत्सुं समुपस्थितम्' कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं--ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ 'मामकाः' और 'पाण्डवाः' कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है, अतः अर्जुनने यहाँ 'स्वजनम्' कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी। अबतक 'दृष्ट्वा' पद तीन बार आया है 'दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्' (1। 2) 'व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्' (1। 20) और यहाँ 'दृष्ट्वेमं स्वजनम्' (1। 28)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है। 'सीदन्ति मम गात्राणि ৷৷. भ्रमतीव च मे मनः'-- अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अङ्ग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है। जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमाञ्चित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! त्वचामें--सारे शरीरमें जलन हो रही है । मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये--यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ! ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है। सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिह्नोंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शकुनोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तदेवेदंशब्दवाच्यं वचनमुदाहरति दृष्ट्वेति। आत्मीयं बन्धुवर्गं युद्धेच्छया युद्धभूमावुपस्थितमुपलभ्य शोकप्रवृत्तिं दर्शयति सीदन्तीति। देवांशस्यैवार्जुनस्यानात्मविदः स्वपरदेहेष्वात्मानात्मीयाभिमानवतस्तत्प्रियस्य युद्धारम्भे तन्मृत्युप्रसङ्गदर्शिनः शोको महानासीदित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

परया कृपया स्नेहजन्यकरुणयाविष्टो व्याप्तः सन्नहो एते पित्रादयो बन्धवों मरिष्यन्तीति विषादमुपतापं कूर्वन्निदं वक्ष्यमाणमब्रवीदुक्तवानित्यर्थः। तदेवेदंशब्दवाच्यं वचनमुदाहरति दृष्ट्वेति। इमं प्रत्यक्षेणोपलभ्यमानं स्वजनं स्वसंबन्धिवर्गं युयुत्सुं युद्धेच्छुं समुपस्थितं सभ्यग्युद्धभूमावुपस्थितं नतु साधारणयुयुत्सया साधारणमागतं दृष्ट्वोपलभ्य सीदन्तीति परेणान्वयः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
dṛiṣhṭvāon seeing
imamthese
svajanam
kṛiṣhṇaKrishna
yuyutsumeager to fight
samupasthitampresent
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.27
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि। तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्

अपनी-अपनी जगह पर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवों को देखकर वे कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरता से युक्त होकर विषाद करते हुए ये वचन बोले। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 28
अर्जुन उवाच कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्

अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 28 translates to: "O Krishna, seeing my kinsmen arrayed here, eager to fight, — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 28. O Krishna, seeing my kinsmen arrayed here, eager to fight, — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.