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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 21
अर्जुन उवाच हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

हे कृष्णा, माझा रथ दोन्ही सैन्यांच्या मध्यभागी ठेवा, जेणेकरून मी येथे उभे असलेले, युद्ध करण्यास इच्छुक असलेल्या लोकांना पाहू शकेन आणि जेव्हा युद्ध सुरू होणार आहे तेव्हा मला कोणाशी युद्ध करायचे आहे.

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, నా రథాన్ని రెండు సేనల మధ్యలో ఉంచు, నేను ఇక్కడ నిలబడి పోరాడాలని కోరుకునే వారిని చూస్తాను మరియు యుద్ధం ప్రారంభం కాబోతున్నప్పుడు నేను ఎవరితో యుద్ధం చేయాలో తెలుసుకుంటాను.

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, મારા રથને બે સેનાઓની મધ્યમાં મૂકો, જેથી હું યુદ્ધ કરવા ઇચ્છુક અહીં ઊભા રહેલા લોકોને જોઈ શકું અને જ્યારે યુદ્ધ શરૂ થવાનું હોય ત્યારે મારે કોની સાથે લડવું જોઈએ તે જાણું.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਮੇਰੇ ਰੱਥ ਨੂੰ ਦੋਹਾਂ ਸੈਨਾਵਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਰੱਖੋ, ਤਾਂ ਜੋ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਸਕਾਂ ਜੋ ਇੱਥੇ ਖੜੇ ਹਨ, ਲੜਨ ਦੇ ਇੱਛੁਕ ਹਨ, ਅਤੇ ਜਾਣ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਜਦੋਂ ਲੜਾਈ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਹੈ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਕਿਸ ਨਾਲ ਲੜਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, আমার রথটি দুই বাহিনীর মাঝখানে রাখুন, যাতে আমি যুদ্ধ করতে আগ্রহী যারা এখানে দাঁড়িয়ে আছে তাদের দেখতে পারি এবং যুদ্ধ শুরু হওয়ার সময় আমাকে কার সাথে যুদ্ধ করতে হবে তা জানতে পারি।

MaithiliIND

हे कृष्ण, हमर रथ केँ दुनू सेनाक बीच मे राखू, जाहि सँ हम एतय ठाढ़ लोक केँ देखि सकब, जे युद्ध करबाक इच्छा रखैत छथि, आ जानि सकब जे जखन युद्ध शुरू होमय बला अछि तखन हमरा केकरा संग लड़य पड़त।

DogriIND

हे कृष्ण, मेरा रथ दो फौजां दे बिच्च रखो, तां जे मैं इत्थें खड़ोते दे लोकें गी दिक्खी सकां, जेह्ड़े लड़ने दी इच्छा रखदे न, ते जान सकां जे जिसलै लड़ाई शुरू होने आह्ली ऐ तां मिगी कुस कन्नै लड़ना पौग।

KonkaniIND

हे कृष्ण, म्हजें रथ दोनूय सैन्या मदीं दवर, जाका लागून हांगा उबे रावपी, झुजपाची इत्सा आशिल्ल्यांक पळोवंक मेळटलें आनी झुज सुरू जावपाचें आसतना कोणा वांगडा झुजचें पडटलें तें कळटलें.

BhojpuriIND

हे कृष्ण, दुनो सेना के बीच में हमार रथ रख, ताकि हम ओहिजा खड़ा लोग के देख सकीले, जवन लड़ाई करे के इच्छुक बाड़े अवुरी जान सकी कि जब युद्ध शुरू होखे वाला बा त हमरा केकरा संगे लड़ाई करे के होई।

AssameseIND

হে কৃষ্ণ, মোৰ ৰথ দুই সৈন্যৰ মাজত ৰাখক, যাতে মই ইয়াত থিয় হৈ থকাসকলক দেখা পাওঁ, যুদ্ধ কৰিবলৈ ইচ্ছুক, আৰু যুদ্ধ আৰম্ভ হ’বলৈ ওলোৱাৰ সময়ত মই কাৰ লগত যুঁজিব লাগিব।

ManipuriIND

ꯍꯦ ꯀ꯭ꯔ꯭ꯏꯁ꯭ꯟ, ꯑꯩꯒꯤ ꯔꯊ ꯑꯁꯤ ꯂꯥꯟꯃꯤ ꯑꯅꯤꯒꯤ ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯊꯝꯃꯨ, ꯃꯔꯝ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯑꯩꯅꯥ ꯃꯐꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯂꯦꯞꯂꯤꯕꯥ, ꯂꯥꯟꯊꯦꯡꯅꯅꯤꯡꯂꯤꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯎꯕꯥ ꯐꯪꯒꯅꯤ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯥꯟ ꯍꯧꯔꯀꯄꯥ ꯃꯇꯃꯗꯥ ꯀꯅꯥꯒꯥ ꯂꯥꯟꯊꯦꯡꯅꯒꯗꯒꯦ ꯍꯥꯌꯕꯥ ꯈꯉꯕꯥ ꯉꯃꯒꯅꯤ |

OdiaIND

ହେ କୃଷ୍ଣ, ମୋର ରଥକୁ ଦୁଇ ସ ies ନ୍ୟ ମ between ିରେ ରଖ, ଯାହାଫଳରେ ମୁଁ ଏଠାରେ ଠିଆ ହୋଇଥିବା, ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବି ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେବାକୁ ଥିବାବେଳେ ମୁଁ କାହା ସହିତ ଲ fight ିବାକୁ ହେବ ଜାଣିବି |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

1.21।। व्याख्या--'अच्युत सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय'-- दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करनेके लिये एक-दूसरेके सामने खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओंमें इतनी दूरी थी कि एक सेना दूसरी सेनापर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं-का मध्यभाग दो तरफसे मध्य था--(1) सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाईका मध्यभाग और (2) दोनों सेनाओंका मध्यभाग, जहाँसे कौरव-सेना जितनी दूरीपर खड़ी थी उतनी ही दूरीपर पाण्डवसेना खड़ी थी। ऐसे मध्यभागमें रथ खड़ा करनेके लिये अर्जुन भगवान्से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओंको आसानीसे देखा जा सके।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

तदेव गाण्डीवधन्वनो वाक्यमनुक्रामति सेनयोरिति। उभयोरपि सेनयोः संनिहितयोर्मध्ये मदीयं रथं स्थापयेत्यर्जुनेन सारथ्ये सर्वेश्वरो नियुज्यते। किं हि भक्तानामशक्यं यद्भगवानपि तन्नियोगमनुतिष्ठति। युक्तं हि भगवतो भक्तपारवश्यम्। अच्युतेतिसंबोधनतया भगवतः स्वरूपं न कदाचिदपि प्रच्युतिं प्राप्नोतीत्युच्यते।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

वाचःप्रवर्तकेन तेनैव प्रेरित आहेति हृषीकेशपदेन सूचितम्। हृषीकेशं इन्द्रियप्रवर्तकत्वेन सर्वान्तःकरणवृत्तिज्ञमितिकेचित्। तथाच निर्बलैर्बुद्धिहीनैर्भवद्भिः कपटेन गृहीतं महीपतित्वं पाण्डवानामतिशूराणां भगवता हनूमता चानुगृहीतानां बुद्धिमतामेव भविष्यतीति भवता तत्प्राप्तिदुराशा त्याज्येति ध्वनयन् संबोधयति महीपते इति। वाक्यमेवोदाहरति सेनयोरिति। उभयोः सेनयोर्मध्ये मे मम रथं स्थापय। ननु मत्स्थापितं रथं ते चालयिष्यन्तीत्यत आह अच्युतेति। रथमप्यचलं कर्तुं समर्थोऽसीत्यभिप्रायः। तथाच परमेश्वरोऽपि यस्य सारय्ये स्थितः प्राकृतसारथिवन्नियुज्यते तस्य विजये को विस्मय इति भावः। युक्तं च भगवतो भक्तपारवश्यं कोपश्च न युक्तः। यतो भगवतः स्वरुपं न कदाचिदपि प्रज्युतिं प्राप्नोतीत्यच्युतेति संबोधनाशय इत्येके। नन्वेवं रथं स्थापयन्तं मामेते शत्रवो रथाच्च्यावयिष्यन्तीति भगवदाशङ्कामाशङ्काह अच्युतेति। देशकालवस्तुष्वच्युतं त्वां को वा च्यावयितुमर्हतीति भाव इति केचित्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
senayoḥarmies
ubhayoḥboth
madhyein the middle
rathamchariot
sthāpayaplace
memy
achyutaShree Krishna, the infallible One
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.20
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः

हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 21
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 21
अर्जुन उवाच हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ: "अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 21?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 21 translates to: "O Krishna, place my chariot in the middle between the two armies, so that I may behold those who stand here, desirous to fight, and know with whom I must fight when the battle is about to commence. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 21 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 21. O Krishna, place my chariot in the middle between the two armies, so that I may behold those who stand here, desirous to fight, and know with whom I must fight when the battle is about to commence. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.