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Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 20
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः

हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले। — VaniSagar

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GujaratiIND

પછી, ધૃતરાષ્ટ્રના પક્ષના લોકોને સજ્જ થઈને ઊભા રહેલા અને શસ્ત્રોનું વિસર્જન શરૂ થતાં જોઈને, પાંડુના પુત્ર અર્જુને, જેની નિશાની વાનર હતી, તેણે ધનુષ્ય હાથમાં લીધું અને કૃષ્ણને કહ્યું, હે પૃથ્વીના ભગવાન.

BengaliIND

অতঃপর ধৃতরাষ্ট্রের দলের লোকদের সজ্জিত হয়ে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে এবং অস্ত্রের নিঃসরণ শুরু হতে দেখে, পাণ্ডুর পুত্র অর্জুন, যার চিহ্ন ছিল একটি বানর, ধনুক তুলে কৃষ্ণকে বললেন, হে পৃথিবীর ভগবান।

KannadaIND

ಆಗ, ಧೃತರಾಷ್ಟ್ರನ ಪಕ್ಷದ ಜನರು ವ್ಯೂಹರಚನೆಯಾಗಿ ನಿಂತಿರುವುದನ್ನು ಮತ್ತು ಅಸ್ತ್ರಗಳ ವಿಸರ್ಜನೆಯು ಪ್ರಾರಂಭವಾಗುವುದನ್ನು ನೋಡಿ, ವಾನರನಾದ ಪಾಂಡುವಿನ ಮಗನಾದ ಅರ್ಜುನನು ತನ್ನ ಧನುಸ್ಸನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಂಡು ಓ ಭೂಲೋಕದ ಪ್ರಭುವಾದ ಕೃಷ್ಣನಿಗೆ ಹೀಗೆ ಹೇಳಿದನು.

TeluguIND

అప్పుడు, ధృతరాష్ట్రుని పక్షంలోని ప్రజలు తండోపతండాలుగా నిలబడి, ఆయుధాల విసర్జన ప్రారంభమవుతుండటం చూసి, పాండు కుమారుడైన వానర కుమారుడైన అర్జునుడు తన విల్లును పట్టుకుని, ఓ భూలోక ప్రభువైన కృష్ణునితో ఇలా అన్నాడు.

SindhiIND

پوءِ، ڌرتراشٽر جي پارٽيءَ جي ماڻهن کي بيٺو ڏسي ۽ هٿيار ڦٽا ڪرڻ شروع ٿيڻ تي، پانڊو جو پٽ ارجن، جنهن جو نشان هڪ بندر هو، تنهن پنهنجو ڪمان کنيو ۽ ڪرشن کي چيو، اي ڌرتيءَ جا مالڪ.

MarathiIND

त्यानंतर धृतराष्ट्राच्या पक्षातील लोक सज्ज झालेले पाहून आणि शस्त्रास्त्रांचा विसर्जन सुरू होणार असल्याचे पाहून, पांडूचा मुलगा अर्जुन, ज्याचे चिन्ह वानर होते, त्याने धनुष्य हाती घेतले आणि कृष्णाला पुढीलप्रमाणे म्हटले, हे पृथ्वीचे स्वामी.

PunjabiIND

ਫਿਰ, ਧ੍ਰਿਤਰਾਸ਼ਟਰ ਦੇ ਦਲ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਰ ਖੜ੍ਹੇ ਵੇਖ ਕੇ ਅਤੇ ਸ਼ਸਤਰ ਛੱਡਣ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਹਨ, ਪਾਂਡੂ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਅਰਜੁਨ ਨੇ, ਜਿਸਦਾ ਝੰਡਾ ਇੱਕ ਬਾਂਦਰ ਸੀ, ਨੇ ਆਪਣਾ ਧਨੁਸ਼ ਚੁੱਕਿਆ ਅਤੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਨੂੰ ਕਿਹਾ, ਹੇ ਧਰਤੀ ਦੇ ਪ੍ਰਭੂ!

MalayalamIND

അപ്പോൾ, ധൃതരാഷ്ട്രരുടെ കക്ഷിയിലെ ആളുകൾ അണിനിരന്നു നിൽക്കുന്നതും ആയുധങ്ങളുടെ വിസർജ്ജനം ആരംഭിക്കുന്നതും കണ്ടപ്പോൾ, പാണ്ഡുവിൻ്റെ പുത്രനായ വാനരനായ അർജ്ജുനൻ തൻ്റെ വില്ലെടുത്ത് ഭൂമിയുടെ നാഥനായ കൃഷ്ണനോട് പറഞ്ഞു.

NepaliIND

त्यसपछि धृतराष्ट्रको दलका मानिसहरूलाई सजीलै उभिएको र हतियारहरू छोड्न सुरु भएको देखेर, पाण्डुका छोरा अर्जुन, जसको झण्डा बाँदर थियो,ले आफ्नो धनु उठाए र कृष्णलाई भने, हे पृथ्वीका भगवान।

TamilIND

அப்போது, ​​திருதராஷ்டிரனின் அணியினர் அணிவகுத்து நிற்பதையும், ஆயுதங்கள் வீசத் தொடங்குவதையும் கண்டு, பாண்டுவின் மகன் அர்ஜுனன், குரங்கைக் கொடியாகக் கொண்டவன், தன் வில்லை எடுத்து, பூமியின் இறைவனே, கிருஷ்ணரிடம் பின்வருமாறு கூறினான்.

KonkaniIND

मागीर धृतराष्ट्राच्या पंगडाचे लोक सजयल्ले उबे आनी शस्त्रांचो निर्वहन सुरू जावपाचो आसा तें पळोवन पांडुचो पूत अर्जुन, जाचो ध्वज माकड आशिल्लो, ताणें आपलें धनुर्धर उखलून श्रीकृष्णाक फुडले तरेन सांगलें, हे धर्तरेचे स्वामी.

MizoIND

Tichuan, Dhritarashtra-a pawl mipuite chu an insiamrem a, ralthuam chhuahna a intan dawn tih a hmuh chuan, Pandu fapa, a ensign chu sakeibaknei a ni, Arjuna chuan a thal chu a la a, Krishna hnenah, Aw Lei Lalpa hnenah hetiang hian a sawi a.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अथ'-- इस पदका तात्पर्य है कि अब सञ्जय भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप 'भगवद्गीता' का आरम्भ करते हैं। अठारहवें अध्यायके चौहत्तरवें श्लोकमें आये 'इति' पदसे यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीताके उपदेशका आरम्भ उसके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे होता है और अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें यह उपदेश समाप्त होता है। 'प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते'-- यद्यपि पितामह भीष्मने युद्धारम्भकी घोषणाके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पाण्डव-सेनाने उसको युद्धारम्भकी घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथमें उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेनाको शस्त्र उठाये देखकर वीरतामें भरकर अर्जुनने भी अपना गाण्डीव धनुष हाथमें उठा लिया। 'व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा'-- इन पदोंसे सञ्जय-का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेनाको देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्यके पास गया। परन्तु जब अर्जुनने कौरवोंकी सेनाको देखा, तब उनका हाथ सीधे गाण्डीव धनुषपर ही गया-- 'धनुरुद्यम्य'। इससे मालूम होता है दुर्योधनके भीतर भय है और अर्जुनके भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है। 'कपिध्वजः'-- अर्जुनके लिये 'कपिध्वज' विशेषण देकर सञ्जय धृतराष्ट्रको अर्जुनके रथकी ध्वजापर विराजमान हनुमान्जीका स्मरण कराते हैं। जब पाण्डव वनमें रहते थे, तब एक दिन अकस्मात् वायुने एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर द्रौपदीके सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उसने भीमसेनसे कहा कि 'वीरवर! आप ऐसे बहुत-से कमल ला दीजिये।' द्रौपदीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भीमसेन वहाँसे चल पड़े। जब वे कदलीवनमें पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान्जीसे भेंट हो गयी। उन दोनोंकी आपसमें कई बातें हुईँ। अन्तमें हनुमान्जीने भीमसेनसे वरदान माँगनेके लिये आग्रह किया तो भीमसेनने कहा कि 'मेरे पर आपकी कृपा बनी रहे।' इसपर हनुमान्जीने कहा 'हे वायुपुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्तिके आघातसे व्याकुल शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुनके रथकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी, जिससे तुमलोग अपने शत्रुओंको सुगमतासे मार सकोगे' । इस प्रकार जिनके रथकी ध्वजापर हनुमान्जी विराजमान हैं उनकी विजय निश्चित है। 'पाण्डवः'-- धृतराष्ट्रने अपने प्रश्नमें 'पाण्डवाः' पदका प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्रको बार-बार पाण्डवोंकी याद दिलानेके लिये सञ्जय (1। 14 में और यहाँ) 'पाण्डवः' शब्दका प्रयोग करते हैं। 'हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते'-- पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्यके पास जाकर चालाकीसे भरे हुए वचन बोलता है परन्तु अर्जुन कौरवसेनाको देखकर जो जगदगुरु हैं अन्तर्यामी हैं मन-बुद्धि आदिके प्रेरक हैं--ऐसे भगवान् श्रीकृष्णसे शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्यसे भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) वचन बोलते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

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Sri Anandgiri

दुर्योधनादीनां धार्तराष्ट्राणामेवं भयप्राप्तिं प्रदर्श्य पार्थादीनां पाण्डवानां तद्वैपरीत्यमिदानीमुदाहरति अथेत्यादिना। भीतिप्रत्युपस्थितेरनन्तरं पलायने प्राप्तेऽपि वैपरीत्याद्व्यवस्थितानप्रचलितानेव परान्प्रत्यक्षेणोपलभ्य हनूमन्तं वानरवरं ध्वजलक्षणत्वेनादायावस्थितोऽर्जुनो भगवन्तमाहेति संबन्धः। किमाहेत्यपेक्षायामिदं वक्ष्यमाणं हेतुमद्वचनमित्याह वाक्यमिदमिति। कस्यामवस्थायामिदमुक्तवानिति तत्राह प्रवृत्त इति। शस्त्राणामिषुप्रासप्रभृतीनां संपातः समुदायस्तस्मिन्प्रवृत्ते। प्रयोगाभिमुखे सतीति यावत्। किं कृत्वा भगवन्तं प्रत्युक्तवानिति तदाह धनुरिति। महीपतिशब्देन राजा प्रज्ञाचक्षुः संजयेन संबोध्यते।

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Sri Dhanpati

अथ तुमुलशब्देन व्यथाप्राप्त्यनन्तरमपि व्यवस्थितान्नतु पलायितान्धृतराष्ट्रसंबन्धिनो दृष्ट्वा प्रत्यक्षेणोपलभ्य प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते शस्त्राणां संपातः समुदायः तस्मिन्प्रवृत्ते प्रयोगाभिमुखे सति पाण्डवो धनुरुद्यम्य गाणडीवं धनुरुद्यतं कृत्वा हृषीकेशमुवाचेत्यन्वयः। पाण्डोरतिवीरस्य महीपतेः पुत्रत्वात्स्वयमतिशूरः कपिर्वानरो हनूमान सीतात्मिकां लक्ष्मीं भगवते रामचन्द्राय प्रापयिता। शत्रुपराजयं संपाद्य पाण्डवेभ्यो राज्यलक्ष्मीप्रदानाय यस्य ध्वजे स्थित इति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
athathereupon
vyavasthitānarrayed
dṛiṣhṭvāseeing
dhārtarāṣhṭrānDhritarashtra’s sons
kapidwajaḥ
pravṛitteabout to commence
śhastrasampāte
dhanuḥbow
udyamyataking up
pāṇḍavaḥArjun, the son of Pandu
hṛiṣhīkeśhamto Shree Krishna
tadāat that time
vākyamwords
idamthese
āhasaid
mahīpate
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्

पाण्डव-सेना के शंखों के उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए अन्यायपूर्वक राज्य हड़पनेवाले दुर्योधन आदि के हृदय विदीर्ण कर दिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.21
अर्जुन उवाच हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 20
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः

हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 20 translates to: "Then, seeing the people of Dhritarashtra's party standing arrayed and the discharge of weapons about to begin, Arjuna, the son of Pandu whose ensign was a monkey, took up his bow and said the following to Krishna, O Lord of the Earth. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "atha vyavasthitān dṛiṣhṭvā dhārtarāṣhṭrān kapi-dhwajaḥ" mean in English?

"atha vyavasthitān dṛiṣhṭvā dhārtarāṣhṭrān kapi-dhwajaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 20. Then, seeing the people of Dhritarashtra's party standing arrayed and the discharge of weapons about to begin, Arjuna, the son of Pandu whose ensign was a monkey, took up his bow and said the following to Krishna, O Lord of the Earth. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.