Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 1, Shlok 12
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्

दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MalayalamIND

കൗരവരിൽ ഏറ്റവും മൂത്തവനായ അവൻ്റെ മഹത്വമുള്ള മുത്തശ്ശി, ദുര്യോധനനെ സന്തോഷിപ്പിക്കാൻ സിംഹത്തെപ്പോലെ ഗർജിക്കുകയും ശംഖ് ഊതുകയും ചെയ്തു.

TeluguIND

అతని మహిమాన్విత ముత్తాత, కౌరవులలో పెద్దవాడు, దుర్యోధనుడిని ఉత్సాహపరిచేందుకు సింహంలా గర్జించాడు మరియు అతని శంఖాన్ని ఊదాడు.

KannadaIND

ಕೌರವರಲ್ಲಿ ಹಿರಿಯನಾದ ಅವನ ಮಹಿಮೆಯುಳ್ಳ ಅಜ್ಜನು ದುರ್ಯೋಧನನನ್ನು ಹುರಿದುಂಬಿಸಲು ಸಿಂಹದಂತೆ ಘರ್ಜಿಸಿದನು ಮತ್ತು ಅವನ ಶಂಖವನ್ನು ಊದಿದನು.

TamilIND

கௌரவர்களில் மூத்தவரான அவனது புகழ்பெற்ற பேரன் துரியோதனனை உற்சாகப்படுத்த சிங்கம் போல் கர்ஜித்து அவனது சங்கை ஊதினான்.

NepaliIND

कौरवहरूमध्ये सबैभन्दा पुरानो, उहाँको गौरवशाली नातिले दुर्योधनलाई जयजयकार गर्न सिंहझैँ गर्जे र शंख बजाए।

SindhiIND

هن جي عاليشان پوٽي، ڪورو جي سڀ کان پراڻي، شينهن وانگر گرجندي هئي ته دريوڌن کي خوش ڪرڻ لاء ۽ پنهنجي شنخ کي ڦوڪيو.

BengaliIND

তাঁর মহিমান্বিত পৌত্র, কৌরবদের মধ্যে প্রাচীনতম, দুর্যোধনকে খুশি করার জন্য সিংহের মতো গর্জন করেছিলেন এবং তাঁর শঙ্খ বাজিয়েছিলেন।

MarathiIND

कौरवांतील सर्वात जुनी, त्याची गौरवशाली नाती दुर्योधनाचा जयजयकार करण्यासाठी सिंहासारखी गर्जना करत शंख वाजवत होती.

PunjabiIND

ਉਸ ਦੇ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਪੋਤਰੇ, ਕੌਰਵਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਪੁਰਾਣੇ, ਦੁਰਯੋਧਨ ਨੂੰ ਖੁਸ਼ ਕਰਨ ਲਈ ਸ਼ੇਰ ਵਾਂਗ ਗਰਜਿਆ ਅਤੇ ਆਪਣਾ ਸ਼ੰਖ ਵਜਾਇਆ।

OdiaIND

ତାଙ୍କର ଗ ious ରବମୟ ନାତୁଣୀ, କ ur ରବଙ୍କର ସର୍ବ ପୁରାତନ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଖୁସି କରିବା ପାଇଁ ସିଂହ ପରି ଗର୍ଜନ କଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଶଙ୍ଖକୁ ଉଡ଼ାଇଲେ |

AssameseIND

কৌৰৱৰ ভিতৰত জ্যেষ্ঠ তেওঁৰ গৌৰৱময় নাতিয়ে দুৰ্যোধনক উল্লাস কৰিবলৈ সিংহৰ দৰে গৰ্জন কৰি শংখ উৰুৱাই দিলে।

MaithiliIND

कौरव मे सबसँ पैघ हुनक गौरवशाली पितामह दुर्योधन केँ जयजयकार करबाक लेल सिंह जकाँ गर्जैत अपन शंख उड़ा देलनि |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'तस्य संजनयन् हर्षम्'-- यद्यपि दुर्योधनके हृदयमें हर्ष होना शंखध्वनिका कार्य है और शंखध्वनि कारण है, इसलिये यहाँ शंखध्वनिका वर्णन पहले और हर्ष होनेका वर्णन पीछे होना चाहिये अर्थात् यहाँ 'शंख बजाते हुए दुर्योधनको हर्षित किया'--ऐसा कहा जाना चाहिये। परन्तु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि 'दुर्योधनको हर्षित करते हुये भीष्मजीने शंख बजाया'। कारण कि ऐसा कहकर सञ्जय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्मकी शंखवादन क्रियामात्रसे दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न हो ही जायगा। भीष्मजीके इस प्रभावको द्योतन करनेके लिये ही सञ्जय आगे 'प्रतापवान्' विशेषण देते हैं। 'कुरुवृद्धः'-- यद्यपि कुरुवंशियोंमें आयुकी दृष्टिसे भीष्मजीसे भी अधिक वृद्ध बाह्लीक थे (जो कि भीष्मजीके पिता शान्तनुके छोटे भाई थे), तथापि कुरुवंशियोंमें जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सबमें भीष्मजी धर्म और ईश्वरको विशेषतासे जाननेवाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होनेके कारण सञ्जय भीष्मजीके लिये 'कुरुवृद्धः' विशेषण देते हैं। 'प्रतापवान्'-- भीष्मजीके त्यागका बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनीके त्यागी थे अर्थात् उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्रको चलानेमें बड़े निपुण थे और शास्त्रके भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणोंका भी लोगोंपर बड़ा प्रभाव था। जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्यके लिये काशिराजकी कन्याओंको स्वयंवरसे हरकर ला रहे थे तब वहाँ स्वयंवरके लिये इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उनपर टूट पड़े। परन्तु अकेले भीष्मजीने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्रकी विद्या पढ़े थे, उन गुरु परशुरामजीके सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शस्त्रके विषयमें उनका क्षत्रियोंपर बड़ा प्रभाव था। जब भीष्म शरशय्यापर सोये थे, तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराजसे कहा कि 'आपको धर्मके विषयमें कोई शंका हो तो भीष्मजीसे पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञानका सूर्य अस्ताचलको जा रहा है अर्थात् भीष्मजी इस लोकसे जा रहे हैं ।' इस प्रकार शास्त्रके विषयमें उनका दूसरोंपर बड़ा प्रभाव था। 'पितामहः' इस पदका आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कही गयी बातोंका द्रोणाचार्यने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकीसे मेरेको ठगना चाहता है इसलिये वे चुप ही रहे। परन्तु पितामह (दादा) होनेके नाते भीष्मजीको दुर्योधनकी चालाकीमें उसका बचपना दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्यके समान चुप न रहकर वात्सल्यभावके कारण दुर्योधनको हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं। 'सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ'-- जैसे सिंहके गर्जना करनेपर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं ऐसे ही गर्जना करनेमात्रसे सभी भयभीत हो जायँ और दुर्योधन प्रसन्न हो जाय--इसी भावसे भीष्मजीने सिंहके समान गरजकर जोरसे शंख बजाया। सम्बन्ध-- पितामह भीष्मके द्वारा शंख बजानेका परिणाम क्या हुआ इसको सञ्जय आगेके श्लोकमें कहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

तमेवमाचार्यंप्रति संवादं कुर्वन्तं भयाविष्टं राजानं दृष्ट्वा तदभ्याशवर्ती पितामहस्तद्बुद्ध्यनुरोधार्थमित्थं कृतवानित्याह तस्येति। राज्ञो दुर्योधनस्य हर्षं बुद्धिगतमुल्लासविशेषं परपरिभवद्वारा स्वकीयविजयद्वारकं सम्यगुत्पादयन् भयं तदीयमपनिनीपुरुच्चैः सिंहनादं कृत्वा शङ्खमापूरितवान्। किमिति दुर्योधनस्य हर्षमुत्पादयितुं पितामहो यतते कुरुवृद्धत्वात्तस्य कुरुराजत्वात् पितामहत्वाच्चास्य दुर्योधनभयापनयनार्था प्रवृत्तिरुचिता तदुपजीवितया तद्वशत्वाच्च तस्य च सिंहनादे शङ्खशब्दे च परेषां हृदयव्यथा संभाव्यते दूरादेवारिनिवहंप्रति भयजननलक्षणप्रतापत्वादित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं स्वस्याप्राधान्यं श्रुत्वा तूष्णीं स्थितभाचार्यं तं दृष्ट्वा खिन्नं स्वस्मिन्नतिभक्तिमन्तं दुर्योधनं चालक्ष्य भीष्मस्तस्य हर्षोत्पादने प्रवृत्त इत्याह तस्येति। दुर्योधनस्य हर्षं बुद्धिगतमुल्लासविशेषं सिंहनादशङ्खशब्दकरणद्वारकं सभ्यगुत्पादयंस्तदीयखेदापनयार्थमुच्चैः सिंहनादं विनद्य कृत्वा शङ्खं दध्मौ आपूरितवान्। कुरुवृद्धः पितामहः कुरुवृद्धत्वात् पितामहत्वात् तदुपजीवितया तद्वशत्वाच्च भीष्मस्योक्तार्थे प्रवृत्तिरुचितैवेति भावः। असामर्थ्यं वारयति प्रतापवानिति। कुरुवृद्धत्वादाचार्यदुर्योधनयोरभिप्रायपरिज्ञातं पितामहत्वादनुपेक्षणं नत्वाचार्यवदुपेक्षणमिति केचित्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tasyahis
sañjanayancausing
harṣhamjoy
kuruvṛiddhaḥ
pitāmahaḥgrandfather
sinhanādam
vinadyasounding
uchchaiḥvery loudly
śhaṅkhamconch shell
dadhmaublew
pratāpavān
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 1.11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि

आप सब-के-सब लोग सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए ही पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 1.13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्

उसके बाद शंख, भेरी (नगाड़े), ढोल, मृदङ्ग और नरसिंघे बाजे एक साथ बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 1Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 1, Shlok 12
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्

दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 1 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 12 translates to: "His glorious grandsire, the oldest of the Kauravas, roared like a lion to cheer Duryodhana and blew his conch. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 1, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Arjuna Vishada Yoga में संकलित है। दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tasya sañjanayan harṣhaṁ kuru-vṛiddhaḥ pitāmahaḥ" mean in English?

"tasya sañjanayan harṣhaṁ kuru-vṛiddhaḥ pitāmahaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 12. His glorious grandsire, the oldest of the Kauravas, roared like a lion to cheer Duryodhana and blew his conch. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.