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Sudarshana Chakra
Adhyay 9, Shlok 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि

हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

இந்த தர்மத்தில் நம்பிக்கை இல்லாதவர்கள், ஓ பரந்தபா, என்னை அடையாமலேயே இவ்வுலகப் பாதைக்குத் திரும்புகின்றனர்.

SindhiIND

جن کي هن ڌرم ۾ ڪو به يقين نه آهي، اي پرانتپا، مون کي حاصل ڪرڻ کان سواءِ هن دنيا جي راهه تي موٽي اچن.

BengaliIND

এই ধর্মে যাদের বিশ্বাস নেই, হে পরন্তপ, তারা আমাকে না পেয়ে এই জগতের পথে ফিরে আসুন।

NepaliIND

जसको यस धर्ममा विश्वास छैन, हे परन्तपा, मलाई प्राप्त नगरी यस संसारको मार्गमा फर्कनुहोस्।

MarathiIND

हे परंतपा, ज्यांचा या धर्मावर अजिबात विश्वास नाही, ते मला प्राप्त न करता या जगाच्या मार्गावर परत या.

BhojpuriIND

जेकरा एह धर्म में कवनो श्रद्धा नइखे, हे परंतप, ऊ लोग हमरा के बिना प्राप्त कइले संसार के मार्ग पर लवट आवेला।

ManipuriIND

ꯙꯔꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯊꯥꯖꯕꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡ, ꯍꯦ ꯄꯔꯟꯇꯞ, ꯑꯩꯕꯨ ꯐꯪꯗꯅꯥ ꯃꯥꯂꯦꯃꯒꯤ ꯂꯝꯕꯤꯗꯥ ꯍꯜꯂꯀꯎ |

MaithiliIND

जिनका एहि धर्म मे कोनो विश्वास नहि छनि, हे परंतप, ओ हमरा प्राप्त केने बिना एहि संसारक मार्ग पर वापस आबि जाइत छथि |

AssameseIND

যিসকলৰ এই ধৰ্মত কোনো বিশ্বাস নাই, হে পৰন্তপ, তেওঁলোকে মোক লাভ নকৰাকৈ এই সংসাৰ পথলৈ উভতি যায়।

KannadaIND

ಈ ಧರ್ಮದಲ್ಲಿ ನಂಬಿಕೆಯಿಲ್ಲದವರು, ಓ ಪರಂತಪಾ, ನನ್ನನ್ನು ಪಡೆಯದೆ ಇಹಲೋಕದ ಮಾರ್ಗಕ್ಕೆ ಹಿಂತಿರುಗುತ್ತಾರೆ.

TeluguIND

ఈ ధర్మంపై విశ్వాసం లేనివారు, ఓ పరంతపా, నన్ను పొందకుండానే ఈ లోక మార్గానికి తిరిగి వెళతారు.

MalayalamIND

പരന്തപാ, ഈ ധർമ്മത്തിൽ വിശ്വാസമില്ലാത്തവർ എന്നെ പ്രാപിക്കാതെ ഈ ലോകത്തിൻ്റെ പാതയിലേക്ക് മടങ്ങുന്നു.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप'--धर्म दो तरहका होता है--स्वधर्म और परधर्म। मनुष्यका जो अपना स्वतःसिद्ध स्वरूप है, वह उसके लिये स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृतिका कार्यमात्र उसके लिये परधर्म है--'संसारधर्मैरविमुह्यमानः'(श्रीमद्भा0 11। 2। 49)। पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की और राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर जिसका बड़ा माहात्म्य बताया, उसीको यहाँ 'धर्म' कहा गया है। इस धर्मके माहात्म्यपर श्रद्धा न रखनेवाले अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको सच्चा मानकर उन्हींमें रचे-पचे रहनेवाले मनुष्योंको यहाँ 'अश्रद्दधानाः' कहा गया है।यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि मनुष्य अपने शरीरको, कुटुम्बको, धन-सम्पत्ति-वैभवको निःसन्देह-रूपसे उत्पत्ति-विनाशशील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी उनपर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं। वे ऐसा विचार नहीं करते कि इन शरीरादिके साथ हम कितने दिन रहेंगे और ये हमारे साथ कितने दिन रहेंगे श्रद्धा तो स्वधर्मपर होनी चाहिये थी, पर वह हो गयी परधर्मपर

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो --, इस आत्मज्ञानरूप धर्मकी श्रद्धासे रहित हैं? अर्थात् इसके स्वरूपमें और फलमें आस्तिक भावसे रहित हैं -- नास्तिक हैं वे असुरोंके सिद्धान्तोंका अनुवर्तन करनेवाले देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाले एवं पापकर्म करनेवाले इन्द्रियलोलुप मनुष्य? हे परंतप मुझ परमेश्वरको प्राप्त न होकर -- मेरी प्राप्तिकी तो उनके लिये आशङ्का भी नहीं हो सकती? मेरी प्राप्तिके मार्गकी साधनरूप भेदभक्तिको भी प्राप्त न होकर निश्चय ही घूमते रहते हैं। कहाँ घूमते रहते हैं मृत्युयुक्त संसारके मार्गमें? अर्थात् जो संसार मृत्युयुक्त है उस मृत्युसंसारके नरक और पशुपक्षी आदि योनियोंकी प्राप्तिरूप मार्गमें वे बारंबार घूमते रहते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

आत्मज्ञानाख्ये धर्मे श्रद्धावतां तन्निष्ठानां परमपदप्राप्तिमुक्त्वा ततो विमुखानां संसारप्राप्तिमाह -- ये पुनरिति। आत्मज्ञानतत्फलयोर्नास्तिकानेव विशिनष्टि -- पापेति। उक्तानामात्मंभरीणां भगवत्प्राप्तिसंभावनाभावादप्राप्य मामित्यप्रसक्तप्रतिषेधः स्यादित्याशङ्क्याह -- मत्प्राप्ताविति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

श्रद्धया ज्ञाननिष्ठानां ज्ञानप्राप्त्या मोक्षप्राप्तिरित्यन्वयमुखेन ज्ञानं स्तुत्वा व्यतिरेकमुखेन तत्स्तौति -- अश्रद्दधाना इति। ये पुनरस्य धर्मस्य ब्रह्मज्ञानलक्षणस्य स्वरुपे फले वा श्रद्धहीना नास्तिकाः अनेकजन्मार्जतपापैः पाप एव प्रवर्तिता देहमात्रात्मदर्शनमेव प्रतिपन्नाः केवलमसुर्तणनिष्ठाः। केनचिदुत्कटेन पुण्यलवेन मनुष्येयोनिं प्राप्ताः पुरुषा मामप्राप्य मृत्युक्ते संसारवर्त्मनि नरकतिर्यगादिप्राप्तिलक्षणे निवर्तन्ते। निश्चयेन वर्तन्त इत्यर्थः। मामप्राप्येत्यस्य मत्प्राप्तिमार्गसाधनविशेषभक्तिमार्गमप्राप्येत्यर्थः। अन्यथा तेषां परमेश्वरप्राप्तिसंभावनाया अप्यभावादप्रसक्तिप्रतिषेध आपद्येत। परंतपेति संबोधयन् परानश्रद्धादीन् शत्रून् तापयन् ब्रह्मज्ञाने श्रद्धां कर्तुं योग्योऽसि न त्वश्रद्धयाभिभूतः एतत्पङौ निवेष्टुमिति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
aśhraddadhānāḥpeople without faith
puruṣhāḥ(such) persons
dharmasyaof dharma
asyathis
parantapaArjun, conqueror the enemies
aprāpyawithout attaining
māmme
nivartantecome back
mṛityudeath
samsāramaterial existence
vartmaniin the path
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Bhagavad Gita · 9.2
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्

यह सम्पूर्ण विद्याओंका और सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है। यह अति पवित्र तथा अतिश्रेष्ठ है और इसका फल भी प्रत्यक्ष है। यह धर्ममय है, अविनाशी है और करनेमें बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 9.4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 9Shlok 3
Bhagavad Gita · Adhyay 9, Shlok 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि

हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 9 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 3?

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 3 translates to: "Those who have no faith in this Dharma, O Parantapa, return to the path of this world without attaining Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 9, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga में संकलित है। हे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa" mean in English?

"aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 3. Those who have no faith in this Dharma, O Parantapa, return to the path of this world without attaining Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.