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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्

हे पृथानन्दन ! अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़नेवाला मनुष्य) उसीको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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PunjabiIND

ਮਨ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਚੀਜ਼ ਵੱਲ ਨਾ ਜਾਣ ਦੇ ਨਾਲ, ਅਭਿਆਸ ਦੇ ਅਭਿਆਸ ਦੁਆਰਾ ਅਡੋਲ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ, ਅਤੇ ਨਿਰੰਤਰ ਸਿਮਰਨ ਕਰਨ ਨਾਲ, ਮਨੁੱਖ ਪਰਮ ਪੁਰਖ, ਪਰਤਾਪਵਾਨ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ ਕੋਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಮನಸ್ಸನ್ನು ಬೇರೆ ಯಾವುದೇ ವಿಷಯದ ಕಡೆಗೆ ಚಲಿಸದೆ, ಅಭ್ಯಾಸದ ಧ್ಯಾನದ ಅಭ್ಯಾಸದ ಮೂಲಕ ಸ್ಥಿರವಾಗಿ ಮತ್ತು ನಿರಂತರವಾಗಿ ಧ್ಯಾನ ಮಾಡುತ್ತಾ, ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಪರಮ ಪುರುಷನ ಬಳಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತಾನೆ.

MalayalamIND

മനസ്സ് മറ്റൊരു കാര്യത്തിലേക്കും നീങ്ങാതെ, ശീലിച്ച ധ്യാനത്തിലൂടെ സ്ഥിരത കൈവരിക്കുകയും, നിരന്തരം ധ്യാനിക്കുകയും ചെയ്യുമ്പോൾ, ഹേ അർജുനാ, പരമപുരുഷൻ്റെ അടുത്തേക്ക് പോകുന്നു.

BengaliIND

মনকে অন্য কিছুর দিকে না নিয়ে, অভ্যাসগত ধ্যান অনুশীলনের মাধ্যমে অবিচলিত হয়ে, এবং নিরন্তর ধ্যান করে, হে অর্জুন পরম পুরুষের কাছে যায়।

NepaliIND

चित्तलाई अन्य कुनै कुरामा नलागेर, अभ्यस्त ध्यानको अभ्यासद्वारा स्थिर भएर, निरन्तर ध्यान गर्दै, हे अर्जुन, परमपुरुषमा जान्छ।

TamilIND

மனம் வேறு எந்த விஷயத்தையும் நோக்கி நகராமல், வழக்கமான தியானத்தின் மூலம் உறுதியாக்கி, தொடர்ந்து தியானத்தில் ஈடுபட்டு, ஒருவன் பரம புருஷனாகிய அர்ஜுனாவிடம் செல்கிறான்.

TeluguIND

మనస్సు మరే ఇతర విషయం వైపు కదలకుండా, అలవాటైన ధ్యాన సాధన ద్వారా స్థిరంగా ఉండి, నిరంతరం ధ్యానం చేస్తూ, ఓ అర్జునా, పరమాత్ముని వద్దకు వెళతాడు.

SindhiIND

ذهن کي ڪنهن به شيءِ ڏانهن نه وڃڻ سان، عادت جي مراقبت جي ذريعي ثابت قدمي ۽ مسلسل غور ڪرڻ سان، انسان اعليٰ ذات ڏانهن وڃي ٿو، اي ارجن.

GujaratiIND

મન અન્ય કોઈ વસ્તુ તરફ ન જાય, આદત ધ્યાનની સાધના દ્વારા અડગ થઈને અને સતત ધ્યાન કરવાથી, હે અર્જુન, પરમ પુરૂષની પાસે જાય છે.

MarathiIND

हे अर्जुना, मनाने इतर कोणत्याही गोष्टीकडे न जाता, नेहमीच्या ध्यानाच्या अभ्यासाने स्थिर राहून आणि सतत ध्यान केल्याने, हे अर्जुना, परमपुरुषाकडे जाते.

OdiaIND

ମନ ଅନ୍ୟ କ thing ଣସି ଜିନିଷ ଆଡକୁ ନଆସିବା ସହିତ, ଅଭ୍ୟାସଗତ ଧ୍ୟାନ ଅଭ୍ୟାସ ମାଧ୍ୟମରେ ସ୍ଥିର ହୋଇ, ଏବଂ କ୍ରମାଗତ ଧ୍ୟାନ କରିବା ଦ୍ୱାରା ଜଣେ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ବ୍ୟକ୍ତି, ରେସପ୍ଲେଣ୍ଡେଣ୍ଟ, ହେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଏ |

MizoIND

Rilru chu thil dang lam hawia kal lovin, ngaihtuahna tih dan hmanga tih nghet a nih a, ngaihtuah reng chungin, Mi Chungnungber, Eng Resplendent, Aw Arjuna hnenah a kal a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --[सातवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें जो सगुणनिराकार परमात्माका वर्णन हुआ था उसीको यहाँ आठवें नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।] 'अभ्यासयोगयुक्तेन'-- इस पदमें अभ्यास और योग -- ये दो शब्द आये हैं। संसारसे मन हटाकर परमात्मामें बारबार मन लगानेका नाम अभ्यास है और समताका नाम योग है-- 'समत्वं योग उच्यते' (गीता 2। 48)। अभ्यासमें मन लगनेसे प्रसन्नता होती है और मन न लगनेसे खिन्नता होती है। यह अभ्यास तो है पर अभ्यासयोग नहीं है। अभ्यासयोग तभी होगा जब प्रसन्नता और खिन्नता -- दोनों ही न हों। अगर चित्तमें प्रसन्नता और खिन्नता हो भी जायँ तो भी उनको महत्त्व न दे केवल अपने लक्ष्यको ही महत्त्व दे। अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहना भी योग है। ऐसे योगसे युक्त चित्त हो।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, हे पार्थ अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा अर्थात् चित्तसमर्पणके आश्रयभूत मुझ एक परमात्मामें ही विजातीय प्रतीतियोंके व्यवधानसे रहित तुल्य प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम अभ्यास है वह अभ्यास ही योग है ऐसे अभ्यासरूप योगसे युक्त उस एक ही आलम्बनमें लगा हुआ विषयान्तरमें न जानेवाला जो योगीका चित्त है उस चित्तद्वारा शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार चिन्तन करता हुआ योगी परम निरतिशय -- दिव्य पुरुषको -- जो आकाशस्थ सूर्यमण्डलमें परम पुरुष है -- उसको प्राप्त होता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतश्च पूर्वश्लोकोक्तार्थानुष्ठायी भगवन्तमन्तकाले प्राप्नोतीत्याह -- किञ्चेति। अभ्यासं विभजते -- मयीति। नहि चित्तसमर्पणस्य विषयभूतं भगवतोऽर्थान्तरं वस्तु सदस्तीति मन्वानो विशनष्टि -- चित्तेति। अन्तरालकालेऽपि विजातीयप्रत्ययेषु विच्छिद्य विच्छिद्य जायमानेष्वपि सजातीयप्रत्ययावृत्तिरयोगिनोऽपि स्यादित्याशङ्क्याह -- विलक्षणेति। अभ्यासाख्येन योगेन युक्तत्वं चेतसो विवृणोति -- तत्रैवेति। तृतीयया परामृष्टोऽभ्यासयोगः सप्तम्यापि परामृश्यते। ननु (तु) प्राकृतानां चेतस्तथेत्याशङ्क्य विशिनष्टि -- योगिन इति।,तच्चेच्चेतो विषयान्तरं परामृशेन्न तर्हि परमपुरुषार्थप्राप्तिहेतुः स्यादित्याशङ्क्याह -- नान्यगामिनेति। प्रामादिकं विषयान्तरपारवश्यमभ्यनुज्ञातुं ताच्छील्यप्रत्ययस्तेन तात्पर्यादपरामृष्टार्थान्तरेण परमपुरुषनिष्ठेनेत्यर्थः। तदेव पुरुषस्य निरतिशयत्वं यदपरामृष्टाखिलानर्थत्वमनतिशयानन्दत्वं तच्च प्रागेव व्याख्यातं नेह व्याख्यानमपेक्षते।यश्चासावादित्ये इत्यादिश्रुतिमनुसृत्याह -- दिवीति। तत्र विशेषतोऽभिव्यक्तिरेव भवनम्। पूर्वोक्तेन चेतसा यथोक्तं पुरुषमनुचिन्तयन्याति तमेवेति संबन्धः। अनुचिन्तयन्नित्यत्रानुशब्दार्थं व्याचष्टे -- शास्त्रेति। चिन्तयन्निति व्याकरोति -- ध्यायन्निति।

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Sri Dhanpati

किंच चित्तादिसमर्पणविषयभूते एकस्मिन्मयि वासुदेवे विजातीयप्रत्ययानन्तरितः सजातीयप्रत्ययावृत्तिलक्षणोऽभ्यासः सचासौ योगः समाधिस्तेन युक्तं तत्रैव व्यापृतम्। प्रत्ययावृत्तिव्यापाराविष्टमितियावत्। तेन योगिनश्चेतसाऽनन्यगामिना नान्यस्मिन्विषये गन्तुं शीलमस्य तेन अभ्यासयोगादनन्यगामितां तत्फलभूतां प्राप्तेनेत्याशयः। परमं निरतिशयं पुरुषं पूर्ण दिव्यं द्योतमाने सूर्ये भवं यथा शास्त्राचार्योपदेशमनुध्यायन् याति गच्छिति मत्प्राप्त्यर्थं मय्यभ्यासयोगयुक्तेनानन्यगामिना चेतसा परमं दिव्यं पुरुषं वासुदेवं मामनुचिन्तय मच्चिन्तनं हि तव सलभमिति ध्वनयन्नाह -- हे पार्थेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
abhyāsayoga
yuktenabeing constantly engaged in remembrance
chetasāby the mind
na anyagāminā
paramam puruṣhamthe Supreme Divine Personality
divyamdivine
yātione attains
pārthaArjun, the son of Pritha
anuchintayanconstant remembrance
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Bhagavad Gita · 8.7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्

इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.9
कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्

जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप -- ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्

हे पृथानन्दन ! अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़नेवाला मनुष्य) उसीको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़नेवाला मनुष्य) उसीको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 8 translates to: "With the mind not moving towards any other thing, made steadfast through the practice of habitual meditation, and constantly meditating, one goes to the Supreme Person, the Resplendent, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़नेवाला मनुष्य) उसीको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā" mean in English?

"abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 8. With the mind not moving towards any other thing, made steadfast through the practice of habitual meditation, and constantly meditating, one goes to the Supreme Person, the Resplendent, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.