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Sudarshana Chakra
Adhyay 8, Shlok 15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः

महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

আমাকে পেয়ে, এই মহান আত্মারা এখানে আবার জন্ম নেয় না - বেদনা এবং অস্থিরতার জায়গা - তবে মুক্তির সর্বোচ্চ পূর্ণতায় পৌঁছেছে।

TamilIND

என்னை அடைந்த பிறகு, இந்த பெரிய ஆத்மாக்கள் மீண்டும் இங்கு பிறக்கவில்லை - வலி மற்றும் நிரந்தரமற்ற இடம் - ஆனால் விடுதலையின் உயர்ந்த பரிபூரணத்தை அடைந்துவிட்டனர்.

KannadaIND

ನನ್ನನ್ನು ಪಡೆದ ನಂತರ, ಈ ಮಹಾನ್ ಆತ್ಮಗಳು ಇಲ್ಲಿ ಮತ್ತೆ ಹುಟ್ಟುವುದಿಲ್ಲ - ನೋವು ಮತ್ತು ನಶ್ವರತೆಯ ಸ್ಥಳ - ಆದರೆ ಮುಕ್ತಿಯ ಅತ್ಯುನ್ನತ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ತಲುಪಿದ್ದಾರೆ.

NepaliIND

मलाई प्राप्त गरेपछि यी महान् आत्माहरूले यहाँ फेरि जन्म लिँदैनन्—दुःख र अनित्यताको ठाउँ—बरु मुक्तिको सर्वोच्च सिद्धिमा पुगेका छन्।

GujaratiIND

મને પ્રાપ્ત કર્યા પછી, આ મહાન આત્માઓ અહીં ફરીથી જન્મ લેતા નથી - પીડા અને અસ્થાયીતાનું સ્થાન - પરંતુ મુક્તિની સર્વોચ્ચ પૂર્ણતા પર પહોંચી ગયા છે.

MalayalamIND

എന്നെ പ്രാപിച്ച ശേഷം, ഈ മഹാത്മാക്കൾ ഇവിടെ വീണ്ടും ജനിക്കുന്നില്ല - വേദനയുടെയും അനശ്വരതയുടെയും ഒരു സ്ഥലം - എന്നാൽ മുക്തിയുടെ ഏറ്റവും ഉയർന്ന പൂർണ്ണതയിൽ എത്തിയിരിക്കുന്നു.

SindhiIND

مون کي حاصل ڪرڻ بعد، اهي عظيم روح هتي ٻيهر جنم نه وٺندا آهن - درد ۽ عدم استحڪام جي جڳهه - پر آزاديء جي اعلي ڪمال تي پهچي ويا آهن.

TeluguIND

నన్ను పొందిన తరువాత, ఈ గొప్ప ఆత్మలు మళ్లీ ఇక్కడ జన్మించవు - నొప్పి మరియు అశాశ్వత ప్రదేశం - కానీ విముక్తి యొక్క అత్యున్నత పరిపూర్ణతను చేరుకున్నాయి.

MarathiIND

मला प्राप्त झाल्यानंतर, हे महान आत्मे येथे पुन्हा जन्म घेत नाहीत - वेदना आणि अनंतकाळ - परंतु मुक्तीच्या सर्वोच्च पूर्णतेला पोहोचले आहेत.

PunjabiIND

ਮੈਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ, ਇਹ ਮਹਾਨ ਰੂਹਾਂ ਇੱਥੇ ਦੁਬਾਰਾ ਜਨਮ ਨਹੀਂ ਲੈਂਦੀਆਂ - ਦਰਦ ਅਤੇ ਅਸਥਿਰਤਾ ਦਾ ਸਥਾਨ - ਬਲਕਿ ਮੁਕਤੀ ਦੀ ਉੱਚਤਮ ਪੂਰਨਤਾ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਗਈਆਂ ਹਨ।

OdiaIND

ମୋତେ ପ୍ରାପ୍ତ କରି, ଏହି ମହାନ ଆତ୍ମାମାନେ ପୁନର୍ବାର ଏଠାରେ ଜନ୍ମ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ - ଯନ୍ତ୍ରଣା ଏବଂ ଅପାରଗତା - କିନ୍ତୁ ମୁକ୍ତିର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସିଦ୍ଧତାରେ ପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି |

MizoIND

Keimah an thlen tawh avangin heng thlarau ropui tak takte hi hetah hian an piang leh tawh lo—natna leh awm reng lohna hmun—zalenna famkimna sang ber an thleng ta zawk a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मामुपेत्य पुनर्जन्म ৷৷. संसिद्धिं परमां गताः'--'मामुपेत्य' का तात्पर्य है कि भगवान्के दर्शन कर ले, भगवान्को तत्त्वसे जान ले अथवा भगवान्में प्रविष्ट हो जाय तो फिर पुनर्जन्म नहीं होता। पुनर्जन्मका अर्थ है--फिर शरीर धारण करना। वह शरीर चाहे मनुष्यका हो, चाहे पशु-पक्षी आदि किसी प्राणीका हो, पर उसे धारण करनेमें दुःख-ही-दुःख है। इसलिये पुनर्जन्मको दुःखालय अर्थात् दुःखोंका घर कहा गया है।मरनेके बाद यह प्राणी अपने कर्मोंके अनुसार जिस योनिमें जन्म लेता है, वहाँ जन्म-कालमें जेरसे बाहर आते समय उसको वैसा कष्ट होता है जैसा कष्ट मनुष्यको शरीरकी चमड़ी उतारते समय होता है। परन्तु उस समय वह अपना कष्ट, दुःख किसीको बता नहीं सकता, क्योंकि वह उस अवस्थामें महान् असमर्थ होता है। जन्मके बाद बालक सर्वथा परतन्त्र होता है। कोई भी कष्ट होनेपर वह रोता रहता है,-- पर बता नहीं सकता। थोड़ा बड़ा होनेपर उसको खाने-पीनेकी चीजें, खिलौने आदिकी इच्छा होती है और उनकी पूर्ति न होनेपर बड़ा दुःख होता है। पढ़ाईके समय शासनमें रहना पड़ता है। रातों जागकर अभ्यास करना पड़ता है तो कष्ट होता है। विद्या भूल जाती है तथा पूछनेपर उत्तर नहीं आता तो दुःख होता है। आपसमें ईर्ष्या, द्वेष, डाह, अभिमान आदिके कारण हृदयमें जलन होती है। परीक्षामें फेल हो जाय तो मूर्खताके कारण उसका इतना दुःख होता है कि कई आत्महत्यातक कर लेते हैं।जवान होनेपर अपनी इच्छाके अनुसार विवाह आदि न होनेसे दुःख होता है। विवाह हो जाता है तो पत्नी अथवा पति अनुकूल न मिलनेसे दुःख होता है। बाल-बच्चे हो जाते हैं तो उनका पालन-पोषण करनेमें कष्ट होता है। लड़कियाँ बड़ी हो जाती हैं तो उनका जल्दी विवाह न होनेपर माँ-बापकी नींद उड़ जाती है, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, हरदम बेचैनी रहती है।वृद्धावस्था आनेपर शरीरमें असमर्थता आ जाती है। अनेक प्रकारके रोगोंका आक्रमण होने लगता है। सुखसे उठना-बैठना, चलना-फिरना, खाना-पीना आदि भी कठिन हो जाता है। घरवालोंके द्वारा तिरस्कार होने लगता है। उनके अपशब्द सुनने पड़ते हैं। रातमें खाँसी आती है। नींद नहीं आती। मरनेके समय भी बड़े भयंकर कष्ट होते हैं। ऐसे दुःख कहाँतक कहें? उनका कोई अन्त नहीं।मनुष्य-जैसा ही कष्ट पशु-पक्षी आदिको भी होता है। उनको शीत-घाम, वर्षा-हवा आदिसे कष्ट होता है। बहुत-से जंगली जानवर उनके छोटे बच्चोंको खा जाते हैं तो उनको बड़ा दुःख होता है। इस प्रकार सभी योनियोंमें अनेक तरहके दुःख होते हैं। ऐसे ही नरकोंमें और चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगने पड़ते हैं। इसलिये पुनर्जन्मको 'दुःखालय' कहा गया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

आपके सुलभ हो जानेसे क्या होगा इसपर कहते हैं कि मेरी सुलभ प्राप्तिसे जो होता है वह सुन --, मुझ ईश्वरको पाकर अर्थात् मेरे भावको प्राप्त करके फिर ( वे महापुरुष ) पुनर्जन्मको नहीं पाते। किस प्रकारके पुनर्जन्मको नहीं पाते यह स्पष्ट करनेके लिये उसके विशेषण बतलाते हैं -- आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकारके दुःखोंका जो स्थान -- आधार है अर्थात् समस्त दुःख जिसमें रहते हैं केवल दुःखोंका स्थान ही नहीं जो अशाश्वत भी है अर्थात् जिसका स्वरूप स्थिर नहीं है ऐसे पुनर्जन्मको मोक्षरूप परम श्रेष्ठ सिद्धिको प्राप्त हुए महात्मा -- संन्यासीगण नहीं पाते। परंतु जो मुझे प्राप्त नहीं होते वे फिर संसारमें आते हैं।

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Sri Anandgiri

किं त्वां प्राप्तास्त्वय्येवावतिष्ठन्ते किं वा पुनरावर्तन्ते चन्द्रलोकादिवेति संदेहात्पृच्छति -- तवेति। तत्रोत्तरश्लोकेन निश्चयं दर्शयति -- उच्यत इति। ईश्वरोपगमनं न सामीप्यमात्रमिति व्याचष्टे -- मद्भावमिति। पुनर्जन्मनोऽनिष्टत्वं प्रश्नद्वारा स्पष्टयति -- किमित्यादिना। महात्मत्वं प्रकृष्टसत्त्ववैशिष्ट्यम्।,यतयस्तस्मिन्नेवेश्वरे समुत्पन्नसम्यग्दर्शिनो भूत्वेति शेषः। भगवन्तमुपगतानामपुनरावृत्तौ ततो विमुखानामनुपजातसम्यग्धियां पुनरावृत्तिरर्थसिद्धेत्याह -- ये पुनरिति।

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Sri Dhanpati

किं त्वां प्राप्ताश्चन्द्रलोकादिव पुनरावर्तन्ते उत नेति संदिहानं प्रत्याह -- मामिति। मामीश्वरमुपेत्य मद्भावं मत्सारुप्यादिकमापद्य पुनर्जन्म पुररुत्पत्तिं पुनरावृत्तिमितियावत्। किंविशिष्टं पुनर्जन्म न प्राप्तनुवन्तीति तद्विशेषणमाह। दुःखालयं दुःखानामाध्यात्मिकाधिकाधिभौतिकाधिदैविकानामालयमालीयन्ते दुःखान्यस्मिन्निति दुःखालयम्। दुःखाश्रयमिति यावत्। तत्राध्यात्मिकं द्विविधं शारीरं मानसं च। वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यनिमित्तं शारीरं कामक्रोधलोभमोहभयोर्ष्याविषयविशेषादर्शनादिनिबन्धनं मानसं। सर्वं चैतदान्तरोपायसाध्यत्वादाध्यात्मिकं मनुष्यपशुमृगपक्षिसरीसृपस्थावरनिमित्तामाधिभौतिकं यक्षराक्षसविनायकग्रहाद्यावेशनिबन्धनमाधिदैविकं। आधिभौतिकमादिदैविकं च दुःखं बाह्योपायसाध्यं पुनर्जन्मनो दुःखानां चालयं स्थानमिति। अस्मिन्पक्षेमामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते इति वक्ष्यमाणाननुरोधो विशेष्याध्याहारापत्त्यादि दोषश्चातपतत्यत आचार्यौरयं पक्ष उपेक्षतिः। गर्भवासयोनिद्वारनिर्गमनादिदुःखानां दुःखत्रयेष्वन्तर्भावो बोध्यः। न केवलं दुःखालयं अशाश्वतं अशश्वद्भवमनवस्थितरुपं चेदृशं पुनर्जन्म नाप्नुवन्ति। यतः महात्मानः विशुद्धचित्ताः तस्मिन्परमेश्वरे समुत्पन्नसम्यग्दर्शनाः संसिद्धिं परमां प्रकृष्टां मोक्षाभिधां गताः प्राप्ताः परमां सिद्धिं मोक्षं गता अगता अपि पत्यासन्नत्वात्गता एव। यथा ब्रह्मलोकगतान्प्रकृत्य स्मर्यतेब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्।। इति। प्रतिसंचरे ब्रह्मप्रलये। परस्य चतुर्मुखस्यान्ते नाशे इत्यन्ये। अस्मिन्पक्षे आब्रह्मभवनादित्यत्तरश्लोकवि रोधोमुख्यार्थपरित्यागश्च बोध्यः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
māmme
upetyahaving attained
punaḥagain
janmabirth
duḥkhaālayam
aśhāśhvatamtemporary
nanever
āpnuvantiattain
mahāātmānaḥ
sansiddhimperfection
paramāmhighest
gatāḥhaving achieved
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 8.14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः

हे पृथानन्दन ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 8.16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते

हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती है; परन्तु हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 8Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 8, Shlok 15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः

महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 8 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 15 translates to: "Having attained Me, these great souls do not take birth again here—a place of pain and impermanence—but have reached the highest perfection of liberation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 8, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Aksara-Parabrahman Yoga में संकलित है। महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam" mean in English?

"mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 8 Verse 15. Having attained Me, these great souls do not take birth again here—a place of pain and impermanence—but have reached the highest perfection of liberation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.