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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु

पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

હું પૃથ્વીમાં મધુર સુવાસ છું અને અગ્નિમાં તેજ છું, સર્વ જીવોમાં જીવ છું અને તપસ્વીઓની તપસ્યા છું.

BengaliIND

আমি পৃথিবীতে মধুর সুগন্ধ এবং অগ্নিতে তেজ, আমি সমস্ত প্রাণীর জীবন এবং আমিই তপস্বীদের তপস্যা।

MalayalamIND

ഞാൻ ഭൂമിയിൽ സുഗന്ധവും അഗ്നിയിൽ തേജസ്സും, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളിലും ജീവനും, തപസ്സുകളുടെ തപസ്സും ഞാനാണ്.

NepaliIND

म धर्तीमा मधुर सुगन्ध हुँ र अग्निमा तेज हुँ, सबै प्राणीहरूमा प्राण हुँ र म तपस्या हुँ।

TeluguIND

నేనే భూమిలో సువాసనను, అగ్నిలో తేజస్సును, సమస్త జీవరాశిలో జీవుడిని, తపస్విల తపస్సును నేనే.

PunjabiIND

ਮੈਂ ਹੀ ਧਰਤੀ ਵਿੱਚ ਮਿੱਠੀ ਸੁਗੰਧੀ ਅਤੇ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਚਮਕ ਹਾਂ, ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਜੀਵਨ ਹਾਂ ਅਤੇ ਮੈਂ ਹੀ ਤਪੱਸਿਆ ਦੀ ਤਪੱਸਿਆ ਹਾਂ।

MarathiIND

मी पृथ्वीतला मधुर सुगंध आणि अग्नीतील तेज आहे, सर्व प्राणिमात्रांमध्ये प्राण आहे आणि मीच तपस्वी आहे.

SindhiIND

مان ڌرتيءَ ۾ مٺي خوشبوءِ آهيان ۽ باهه ۾ رونق آهيان، سڀني جاندارن ۾ جان آهيان، ۽ مان پرهيزگارن جو ساٿ آهيان.

DogriIND

धरती च मीठी सुगंध ते अग्ग च तेज, सारे प्राणी च जीवन ते मैं तपस्वी दा तप।

MaithiliIND

हम धरती मे मधुर सुगन्ध आ अग्नि मे तेज, सब प्राणी मे जीवन, आ हम तपस्वीक तपस्वी छी।

AssameseIND

মই পৃথিৱীত মধুৰ সুগন্ধি আৰু অগ্নিত উজ্জ্বল, সকলো জীৱৰ জীৱন আৰু মই তপস্বীসকলৰ তপস্যা।

BhojpuriIND

हम धरती में मधुर सुगंध आ अग्नि में तेज, सब जीव में जीवन आ हम तपस्वी के तपस्वी हईं।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्'--पृथ्वी गन्ध-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं कि पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।यहाँ गन्धके साथ पुण्यः'विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

पृथिवीमें मैं पवित्र गन्ध सुगन्ध हूँ अर्थात् उस सुगन्धरूप मुझ ईश्वरमें पृथिवी पिरोयी हुई है। जल आदिमें रस आदिकी पवित्रताका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ गन्धकी स्वाभाविक पवित्रता ही पृथिवीमें दिखलायी गयी है। गन्धरस आदिमें जो अपवित्रता आ जाती है वह तो सांसारिक पुरुषोंके अज्ञान और अधर्म आदिकी अपेक्षासे एवं भूतविशेषोंके संसर्गसे है ( वह स्वाभाविक नहीं है )। मैं अग्निमें प्रकाश हूँ तथा सब प्राणियोंमें जीवन हूँ अर्थात् जिससे सब प्राणी जीते हैं वह जीवन मैं हूँ और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ अर्थात् उस तपरूप मुझ परमात्मामें ( सब ) तपस्वी पिरोये हुए हैं।

VaniSagar Research Vault
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Sri Anandgiri

मयि सर्वमिदं प्रोतमित्यस्यैव परिमाणार्थं प्रकारान्तरमाह पुण्य इति। पृथिव्यां पुण्यशब्दितो यः सुरभिगन्धः सोऽहमस्मीत्यत्र वाक्यार्थं कथयति तस्मिन्निति। कथं पृथिव्यां गन्धस्य पुण्यत्वं तत्राह पुण्यत्वमिति। यत्तु पृथिव्यां गन्धस्य स्वाभाविकं पुण्यत्वं दर्शितं तदबादिषु रसादेरपि स्वाभाविकपुण्यत्वस्योपलक्षणार्थमित्याह पृथिव्यामिति। प्रथमोत्पन्नाः पञ्चापि गुणाः पुण्या एव सिद्धादिभिरेव भोग्यत्वादिति भावः। कथं तर्हि गन्धादीनामपुण्यत्वप्रतिभानं तत्राह अपुण्यत्वं त्विति। तदेव स्फुटयति संसारिणामिति। गन्धादयः स्वकार्यैर्भूतैः सह परिणममानाः प्राणिनां पापादिवशादपुण्याः संपद्यन्त इत्यर्थः।यच्चाग्नेस्तेजस्तद्भूते मयि श्रोतोऽग्निरित्याह तेज इति। जीवनभूते च मयि सर्वाणि भूतानि प्रोतानीत्याह तथेति। जीवनशब्दार्थमाह येनेति। अन्नरसेनामृताख्येनेत्यर्थः। तपश्चास्मीत्यादेस्तात्पर्यार्थमाह तस्मिन्निति। चित्तैकाग्र्यमनाशकादि वा तपस्तदात्मनीश्वरे प्रोतास्तपस्विनो विशेषणाभावे विशिष्टस्य वस्तुनोऽभावादित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

पृथ्वीसारभूते सुरभिगन्धे गन्धतन्मात्रभूते मयि पृथिवी प्रोता। रसादेः पुण्यत्वं स्वभावादेवापुण्यत्वं त्वविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषनिमित्तजं भवति। अग्निसारभूते तेजसि तेजोरुपे मयि विभावसुरग्निः प्रोतः।तथा जीवने सर्वमूतसारभूते आयरुपे अन्नरुपे वा तस्मिंस्तद्रूपे मयि सर्वे भूताः प्रोताः। तपस्विसारभूते तपोरुपे मयि तपस्विनः प्रोताः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
puṇyaḥpure
gandhaḥfragrance
pṛithivyāmof the earth
chaand
tejaḥbrilliance
chaand
asmiI am
vibhāvasauin the fire
jīvanamthe life
sarvain all
bhūteṣhubeings
tapaḥpenance
chaand
asmiI am
tapasviṣhuof the ascetics
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Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 9
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु

पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ: "पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 9?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 9 translates to: "I am the sweet fragrance in the earth and the brilliance in the fire, the life in all beings, and I am the austerity of ascetics. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्वि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 9 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "puṇyo gandhaḥ pṛithivyāṁ cha tejaśh chāsmi vibhāvasau" mean in English?

"puṇyo gandhaḥ pṛithivyāṁ cha tejaśh chāsmi vibhāvasau" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 9. I am the sweet fragrance in the earth and the brilliance in the fire, the life in all beings, and I am the austerity of ascetics. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.