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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव

हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है। — VaniSagar

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TeluguIND

అర్జునా, నా కంటే ఉన్నతమైనది ఏదీ లేదు. ఇదంతా ఒక తీగపై రత్నాల గుంపుల వలె నాపై వేయబడింది.

KannadaIND

ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ನನಗಿಂತ ಹೆಚ್ಚಿನದು ಯಾವುದೂ ಇಲ್ಲ. ದಾರದ ಮೇಲಿನ ರತ್ನಗಳ ಸಮೂಹಗಳಂತೆ ಇದೆಲ್ಲವೂ ನನ್ನ ಮೇಲೆ ಕಟ್ಟಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ.

GujaratiIND

હે અર્જુન, મારાથી ઊંચું કંઈ નથી. આ બધું મારા પર દોરવામાં આવ્યું છે, જેમ કે તાર પર રત્નોના ઝુમખા.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, എന്നേക്കാൾ ഉയർന്നതായി ഒന്നുമില്ല. ഒരു ചരടിലെ രത്നക്കൂട്ടങ്ങൾ പോലെ ഇതെല്ലാം എന്നിൽ പതിഞ്ഞിരിക്കുന്നു.

TamilIND

அர்ஜுனா, என்னை விட உயர்ந்தது எதுவுமில்லை. இவை அனைத்தும் ஒரு சரத்தில் உள்ள ரத்தினக் கொத்துகள் போல என் மீது கட்டப்பட்டுள்ளன.

NepaliIND

हे अर्जुन मभन्दा माथि अरू केही छैन। यो सबै ममा टाँसिएको छ, जस्तै तारमा रत्नहरूको समूह।

PunjabiIND

ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਮੇਰੇ ਉੱਤੇ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਇੱਕ ਤਾਰ ਉੱਤੇ ਰਤਨ ਦੇ ਗੁੱਛੇ।

MarathiIND

हे अर्जुना, माझ्यापेक्षा वरचे काहीही नाही. हे सर्व माझ्यावर तारेवर रत्नांच्या पुंज्यांसारखे आहे.

SindhiIND

مون کان اعليٰ ڪا به شيءِ ناهي، اي ارجن. اهو سڀ ڪجهه مون تي لڳل آهي، جيئن تارن تي جواهرن جا مجموعا.

BengaliIND

হে অর্জুন, আমার চেয়ে উচ্চতর কিছু নেই। এই সব আমার উপর রচিত হয়, একটি স্ট্রিং উপর রত্ন গুচ্ছ মত.

BhojpuriIND

हमरा से ऊँच कुछुओ नइखे हे अर्जुन। ई सब हमरा पर तारल बा, जइसे तार पर रत्नन के गुच्छा।

DogriIND

मेरे कोला उच्चा कोई चीज नेईं ऐ अर्जुन। एह् सब मेरे उप्पर तार दित्ता गेदा ऐ, जि'यां तार उप्पर रत्नें दे गुच्छे होंदे न।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय'--हे अर्जुन ! मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है, मैं ही सब संसारका महाकारण हूँ। जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही रहती है और आकाशमें ही लीन होती है अर्थात् आकाशके सिवाय वायुकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ऐसे ही संसार भगवान्से उत्पन्न होता है भगवान्में स्थित रहता है और भगवान्में ही लीन हो जाता है अर्थात् भगवान्के सिवाय संसारकी कोई पृथक् स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।यहाँ 'परतरम्' कहकर सबका मूल कारण बताया गया है। मूल कारणके आगे कोई कारण नहीं है अर्थात् मूल कारणका कोई उत्पादक नहीं है। भगवान् ही सबके मूल कारण हैं। यह संसार अर्थात् देश, काल, व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। परन्तु जिसके होनेपनसे इन सबका होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्तासे ये सभी 'है' दीखते हैं, वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं। भगवान्ने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिसको जाननेके बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा--'यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते' और यहाँ कहते हैं कि मेरे सिवाय दूसरा कोई कारण नहीं है--'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति।' दोनों ही जगह 'न अन्यत्'कहनेका तात्पर्य है कि जब मेरे सिवाय कुछ है ही नहीं, तब मेरेको जाननेके बाद जानना कैसे बाकी रहेगा? अतः भगवान्ने यहाँ 'मयि सर्वमिदं प्रोतम्'और आगे 'वासुदेवः सर्वम्' (7। 19) तथा 'सदसच्चाहम्'(9। 19) कहा है।जो कार्य होता है, वह कारणके सिवाय अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता। वास्तवमें कारण ही कार्यरूपसे दीखता है। इस प्रकर जब कारणका ज्ञान हो जायगा, तब कार्य कारणमें लीन हो जायगा अर्थात् कार्यकी अलग सत्ता प्रतीत नहीं होगी और 'एक परमात्माके सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है'--ऐसा अनुभव स्वतः हो जायगा। 'मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव'--यह सारा संसार सूतमें सूतकी ही मणियोंकी तरह मेरेमें पिरोया हुआ है अर्थात् मैं ही सारे संसारमें अनुस्यूत (व्याप्त) हूँ। जैसे सूतसे बनी मणियोंमें और सूतमें सूतके सिवाय अन्य कुछ नहीं है; ऐसे ही संसारमें मेरे सिवाय अन्य कोई तत्त्व नहीं है। तात्पर्य है कि जैसे सूतमें सूतकी मणियाँ पिरोयी गयी हों तो दीखनेमें मणियाँ और सूत अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसारमें जितने प्राणी हैं, वे सभी नाम, रूप, आकृति आदिसे अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला चेतन-तत्त्व एक ही है। वह चेतन-तत्त्व मैं ही हूँ--'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत'(गीता 13। 2) अर्थात् मणिरूप अपरा प्रकृति भी मेरा स्वरूप है और धागारूप परा प्रकृति भी मैं ही हूँ। दोनोंमें मैं ही परिपूर्ण हूँ, व्याप्त हूँ। साधक जब संसारको संसारबुद्धिसे देखता है, तब उसको संसारमें परिपूर्णरूपसे व्याप्त परमात्मा नहीं दीखते। जब उसको परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है, तब व्याप्य-व्यापक भाव मिटकर एक परमात्मतत्त्व ही दीखता है। इस तत्त्वको बतानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ कारणरूपसे अपनी व्यापकताका वर्णन किया है। सम्बन्ध--जो कुछ कार्य दीखता है, उसके मूलमें परमात्मा ही हैं--यह ज्ञान करानेके लिये अब भगवान् आठवेंसे बारहवें श्लोकतकका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा होनेके कारण मुझ परमेश्वरसे परतर ( अतिरिक्त ) जगत्का कारण अन्य कुछ भी नहीं है अर्थात् मैं ही जगत्का एकमात्र कारण हूँ। हे धनंजय क्योंकि ऐसा है इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् और समस्त प्राणी मुझ परमेश्वरमें दीर्घ तन्तुओंमें वस्त्रकी भाँति तथा सूत्रमें मणियोंकी भाँति पिरोया हुआ अनुस्यूत अनुगत बिंधा हुआ गूँथा हुआ है।

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Sri Anandgiri

प्रधानात्परतोऽक्षरात्पुरुषवत्परमात्मनोऽपि परादन्यत्परं स्यादित्याशङ्क्य प्रकृतिद्वयद्वारा सर्वकारणत्वमीश्वरस्योक्तमुपजीव्य परिहरति यतस्तस्मादिति। नान्यदस्ति परमित्यत्र हेतुमाह मयीति। परतरशब्दार्थमाह अन्यदिति। स्वातन्त्र्यव्यावृत्त्यर्थमन्तरशब्दः। निषेधफलं कथयति अहमेवेति। सर्वजगत्कारणत्वेन सिद्धमर्थं द्वितीयार्धव्याख्यानेन विशदयति यस्मादिति। अतो (यथा) दीर्घेषु तिर्यक्षु च पटघटितेषु तन्तुषु पटस्यावगतिरवगम्यते तद्वन्मय्येवानुगतं जगदित्याह दीर्घेति। यथा च मणयः सूत्रेऽनुस्यूतास्तेनैव ध्रियन्ते तदभावे विप्रकीर्यन्ते यथा मयैवात्मभूतेन सर्वं व्याप्तं ततो निकृष्टं विनष्टमेव स्यादिति श्लोकोक्तं दृष्टान्तमाह सूत्र इति।

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Sri Dhanpati

यस्मादेवं तस्मान्मत्तः परमेस्वरात्परतरमन्यत्कारणान्तरं किंचिन्नास्ति न विद्यते अहमेव सर्वस्मात्परः जगत्कारणमित्यर्थः। परतराभावप्रदर्शनेन परम्। अतःसेतून्मानसंबन्धभेदव्यपदेशेभ्यः इति सूत्रोक्ताशङ्कापि परिहृता। परमेश्वरात्परमन्यदस्ति। कुतःअयमात्मा स सेतुः इति सेतोश्चतुष्पादित्याद्युन्मानस्यसता सोभ्य तदा संपन्नो भवति इति संबन्धस्यअथ य एोऽन्तरादित्येय एषोऽन्तरक्षिणि इति भदस्य व्यपदेशेभ्य इति तदर्थः। तथाच सिद्धान्तसूत्राणिसामान्यात्तु बुद्य्धर्थः पादवत्स्थानविशेषात्प्रकाशादिवत्उपपत्तेश्च तथान्यप्रतिषेधात्अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दीदिभ्यः इति। तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। न ब्राह्मणोऽन्यात्किंचिद्भवितुमर्हति प्रमाणाभावात्। नह्यन्यस्यास्तित्वे किंचित्प्रमाणमुपलभामहे। सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य जन्मादि ब्रह्मणो भवतीति निर्धारितमनन्यत्वं च कारणात्कार्यस्य। नच ब्रह्मव्यतिरिक्तं किंचिदजं संभवतिसदेव सोभ्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्यवधारणादेकविज्ञानेन च सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानान्न ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वस्तित्वमवकल्पते। नतु सेत्वादिव्यपदेशो ब्रह्मव्यतिरिक्तत्वं सूचयतीत्युक्तं तत्प्रत्युच्यते। सेतुसामान्यात्सेतुशब्द आत्मनि प्रयुक्त इति श्लिष्यते जगतस्तन्मर्यादानां च विधारकत्वं सेतुसामान्यमात्मनोऽतः सेतुरिव सेतुरिति प्रकृत आत्मा स्तूयते। सेतुं तीर्त्वेत्यपि तरतेरतिक्रमासंभवात्प्राप्नोत्यर्थे एव वर्तते यथा व्याकरणं तीर्ण इति प्राप्त उच्यते नातिक्रान्तस्तद्वत् उन्मादव्यपदेशोऽपि न ब्रह्मव्यरिरिक्तवस्त्वस्तित्वप्रतिपत्त्यर्थः किंतु बुद्य्धर्थ उपासनार्थः पादवत्। यथा मनआकाशयोरध्यात्ममधितैवतं च ब्रह्मप्रतीकयोराम्रातयोश्चत्वारो वाक्प्राणचक्षुःश्रोत्राणीति सनःसंबन्धिनः पादाः कल्पिताः चत्वारश्चाग्निवायुसूर्यदिशः आकाशसंबन्धिनः आध्यानाय तद्वत्। यद्वा व्यवहाराय कार्षापणपादविभागकल्पनावत्। यदप्युक्तं संबन्धव्यपदेशाद्भेदव्यपदेशाच्च परमेश्वरात्परमिति तदप्यसत्। यत एकस्यापि स्थानविशेषापेक्षयैतौ य उपशमः स परमात्मना संबन्ध इत्युपाध्यपेक्षयोपचर्यते न मितत्वापेक्षया तथा भेदव्यपदेशोऽपि ब्रह्मण उपाधिभेदापेक्षयैव न स्वरुपभेदा पेक्षया। तत्र दृष्टान्तमाह प्रकाशवत्। यथैकस्यैव सौर्यादिप्रकाशस्य सूचीपाशादिषूपाध्यपेक्षस्यैव संबन्धभदव्यपदेशो तद्वत् मुख्यएव संबन्धादिः किं न स्यादित्याशङ्क्याह। उपपत्तेश्च उपचारस्यैवोपपत्तेश्च। एवं सेत्वादिव्यपदेशान्तपरपक्षे हेतूनुन्मथ्य संप्रति स्वपक्षं हेत्वन्तरेणोपसंहरति। तथान्यपर्तिषेधादपि न ब्रह्मणः परं बस्त्वन्तरमस्तीति गम्यते। तथाहिस एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्स एवोपरिष्टात्सर्वं तं पदादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद ब्रह्मैवेदं सर्वमात्मैवेदं सर्वं नेह नानास्ति किंचनयस्मात्परं नापरमस्ति किंचित्तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्मम् इत्येवमादीनि स्वप्रकरणस्थानि अन्यार्थत्वेन परिणेतुम शक्यानि ब्रह्मव्यतिरिक्तं वस्त्वन्तरं वारयन्ति। सर्वान्तरश्रुतेश्च न परमात्मनोऽन्तरोऽन्य आत्मास्तीत्यवधार्यते। अनेन सेत्वादिव्यपदेशनिराकरणेनान्यप्रतिषेधसमाश्रयणेन च सर्वगतत्वमप्यात्मनः सिद्धं भवति।सर्वगतत्वं चास्यायामशब्दादिभ्यो विज्ञायते। आयामशब्दो व्यापिवचनः।यावान्वायमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशःआकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःज्यायान्दिवो ज्यायानन्तरिक्षात्नित्यः सर्वगतः स्थाणुः इत्येवमादयो हि श्रुतिस्मृतिन्यायाः सर्वगतत्वमात्मनो बोधयन्तीति दिग्विजये उत्तरगोग्रहे च राज्ञो भीष्मादींश्च विजित्य धनमाहृतवतस्त्वत्तः परतर एतादृशकर्मकर्ताऽन्यो यथा नास्ति तथा मत्तः परमन्यज्जगत्कारणं नास्तीति ध्वनयन्संबोधयति धनंजयेति। यत एवं तस्मान्मयि परमेश्वरे सर्वमिदं कार्यकारणात्मकं जगत्प्रोतं ग्रथितं यथा सूत्रे मणिगणा ग्रथितास्तद्वत्। अनेन स्थितिहेतुस्वमपि स्वस्यैव दर्शितम्। केचित्तु यस्मादहमेव मायया सर्वस्य जगतो जन्मस्थितिभङ्गहेतुस्तस्मात्परमार्थतो निखिलदृश्याकारपरिणतमायाधिष्ठानात्परमार्थसत्यात्परतरं परमार्थ सत्यं अन्यात्किंचिन्नास्ति। मयि कल्पितं परमार्थतो मत्तो न भिद्यत इत्यर्थः।तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इति न्यायात्। व्यवहारदृष्ट्या तु मयि सद्रूपे स्फरणरुपे च सर्वमिदं जटजातं प्रोतं ग्रथितं मत्सत्तया सदिव मत्सफुरणेन स्फुरदिव व्यवहाराय मायामयाय कल्पते। सर्वस्य चैतन्यगथितत्वमात्रे दृष्टान्तः सूत्रे मणिगणा इव। अथवा सूत्रे तैजसात्मनि हिरण्यगर्भे स्वप्रदृशि स्वप्नप्राप्ता मणिगणा इव इति सर्वांशेऽपि दृष्टान्तो व्याख्यायेय इति वर्णयन्ति। अस्मिन्पक्षेनेह नानास्ति किंचन इतिवन्मत्तोऽन्यत्किंचिन्नास्तीत्येतावतैव मत्तः परमार्थसतोऽन्यद्भिन्नं किंचिद्वस्तु परमार्थसन्नास्तीत्यर्थस्य निर्वाहे मयि सर्वमिदं कल्पितं मनसि स्वप्नपदार्था इवेति वक्तव्ये परतरपदस्य प्रयोजनं प्रोतमित्यादेः स्वारस्यं च चिन्त्यम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
mattaḥthan me
parataram
nanot
anyat kiñchitanything else
astithere is
dhanañjayaArjun, conqueror of wealth
mayiin me
sarvamall
idamwhich we see
protamis strung
sūtreon a thread
maṇigaṇāḥ
ivalike
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा

अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु

हे कुन्तीनन्दन ! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव

हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 7 translates to: "There is nothing higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, like clusters of gems on a string. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya" mean in English?

"mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 7. There is nothing higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, like clusters of gems on a string. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.