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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा

अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

GujaratiIND

જાણો કે આ બે સર્વ જીવોના ગર્ભ છે; આમ, હું સમગ્ર બ્રહ્માંડનો સ્ત્રોત અને વિસર્જન છું.

MalayalamIND

ഇവ രണ്ടും എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളുടെയും ഗർഭപാത്രമാണെന്നറിയുക; അങ്ങനെ, ഞാൻ മുഴുവൻ പ്രപഞ്ചത്തിൻ്റെയും ഉറവിടവും ലയനവുമാണ്.

BengaliIND

জেনে রেখো, এ দুটিই সকল প্রাণীর গর্ভ; এইভাবে, আমি সমগ্র মহাবিশ্বের উৎস এবং বিলুপ্তি।

TamilIND

இவை இரண்டும் எல்லா உயிர்களின் கருவாகும் என்பதை அறிக; எனவே, நான் முழு பிரபஞ்சத்தின் மூலமும் மற்றும் கலைப்பும்.

PunjabiIND

ਜਾਣੋ ਕਿ ਇਹ ਦੋਵੇ ਹੀ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਕੁੱਖ ਹਨ; ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਮੈਂ ਸਾਰੇ ਬ੍ਰਹਿਮੰਡ ਦਾ ਸਰੋਤ ਅਤੇ ਵਿਘਨ ਹਾਂ।

TeluguIND

ఈ రెండూ సమస్త ప్రాణుల గర్భం అని తెలుసుకో; అందువలన, నేను మొత్తం విశ్వం యొక్క మూలం మరియు రద్దు.

AssameseIND

এই দুই যে সকলো জীৱৰ গৰ্ভ বুলি জানি লওক; এইদৰে, মই সমগ্ৰ বিশ্বব্ৰহ্মাণ্ডৰ উৎস আৰু বিসৰ্জন।

MaithiliIND

ई जानि लिअ जे ई दुनू समस्त प्राणीक गर्भ थिक; एहि प्रकारेँ हम समस्त ब्रह्माण्डक स्रोत आ विघटन छी ।

MarathiIND

हे दोघे सर्व प्राण्यांचे गर्भ आहेत हे जाणून घ्या; अशा प्रकारे, मी संपूर्ण विश्वाचा उगम आणि विघटन आहे.

NepaliIND

जान्नु कि यी दुई सबै प्राणीका गर्भ हुन्; यसरी, म सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको स्रोत र विघटन हुँ।

SindhiIND

ڄاڻو ته اهي ٻئي سڀني مخلوقن جو پيٽ آهن. اهڙيءَ طرح مان سڄي ڪائنات جو سرچشمو ۽ تحليل آهيان.

KannadaIND

ಇವೆರಡೂ ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಗರ್ಭವೆಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ; ಹೀಗಾಗಿ, ನಾನು ಇಡೀ ಬ್ರಹ್ಮಾಂಡದ ಮೂಲ ಮತ್ತು ವಿಸರ್ಜನೆ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'एतद्योनीनि भूतानि' जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जङ्गम और वृक्ष, लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं। तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणियोंकी उत्पत्ति बतायी है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बतायी है कि स्थावर, जङ्गम योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके हैं, और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है, वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने 'परा प्रकृति' (7। 5) और 'अपना अंश' (15। 7) कहा है। 'सर्वाणीत्युपधारय'--स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृतिके संयोगसे ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि परा प्रकृतिने अपराको अपना मान लिया है, उसका सङ्ग कर लिया है, इसीसे सब प्राणी पैदा होते हैं--इसको तुम धारण करो अर्थात् ठीक तरहसे समझ लो अथवा मान लो।'अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा'--मात्र वस्तुओंको सत्ता-स्फूर्ति परमात्मासे ही मिलती है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव (उत्पन्न करनेवाला) और प्रलय (लीन करनेवाला) हूँ। 'प्रभवः'का तात्पर्य है कि मैं ही इस जगत्का निमित्तकारण हूँ; क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि मेरे संकल्पसे पैदा हुई है--'सदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छान्दोग्य0 6। 2। 3)।जैसे घड़ा बनानेमें कुम्हार और सोनेके आभूषण बनानेमें सुनार ही निमित्तकारण है ऐसे ही संसारमात्रकी उत्पत्तिमें भगवान् ही निमित्तकारण हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों परा और अपरा प्रकृति ही जिनकी योनि कारण है ऐसे ये समस्त भूतप्राणी प्रकृतिरूप कारणसे ही उत्पन्न हुए हैं ऐसा जान। क्योंकि मेरी दोनों प्रकृतियाँ ही समस्त भूतोंकी योनि यानी कारण हैं इसलिये समस्त जगत्का प्रभव उत्पत्ति और प्रलय विनाश मैं ही हूँ अर्थात् इन दोनों प्रकृतियोंद्वारा मैं सर्वज्ञ ईश्वर ही समस्त जगत्का कारण हूँ।

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Sri Anandgiri

उक्तप्रकृतिद्वये कार्यलिङ्गकमनुमानं प्रमाणयति एतद्योनीनीति। प्रकृतिद्वयस्य जगत्कारणत्वे कथमीश्वस्य जगत्कारणत्वं तदुपगतमित्याशङ्क्याह अहमिति। एतद्योनीनीत्युक्ते समनन्तरप्रकृतजीवभूतप्रकृतावेतच्छब्दस्याव्यवधानात्प्रवृत्तिमाशङ्क्य व्याकरोति एतदिति। सर्वाणि चेतनाचेतनानि जनिमन्तीत्यर्थः। सर्वभूतकारणत्वेन प्रकृतिद्वयमङ्गीकृतं चेत्कथमहमित्याद्युक्तमित्याशङ्क्याह यस्मादिति। मम प्रकृती परमेश्वरस्योपाधितया स्थिते इत्यर्थः। तर्हि प्रकृतिद्वयं कारणमीश्वरश्चेति जगतोऽनेकविधकारणाङ्गीकरणं स्यादित्याशङ्क्याह प्रकृतीति। अपरप्रकृतेरचेतनत्वात्परप्रकृतेश्चेतनत्वेऽपि किंचिज्ज्ञत्वादीश्वरस्यैव सर्वकारणत्वं युक्तमित्याह सर्वज्ञ इति।

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Sri Madhavacharya

न केवलं ते जगत्प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह अहमिति। प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादेः कारणत्वात्तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि। तथा च श्रुतिः सर्वकामः सर्वकर्मा सर्वगन्धो सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः छां.उ.3।14।2 इति। आह च स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता। यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽस्मीत्यषिभिः स्तुतः। सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः। आगमिष्यत्सुखं चापि तच्चास्त्येव सदाऽपि तु। तथाप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमतीव च। इति नारदीये।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
etat yonīnithese two (energies) are the source of
bhūtāniliving beings
sarvāṇiall
itithat
upadhārayaknow
ahamI
kṛitsnasyaentire
jagataḥcreation
prabhavaḥthe source
pralayaḥdissolution
tathāand
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस 'अपरा' प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा बनी हुुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव

हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा

अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 6 translates to: "Know that these two are the womb of all beings; thus, I am the source and dissolution of the whole universe. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। अपरा और परा -- इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "etad-yonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya" mean in English?

"etad-yonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 6. Know that these two are the womb of all beings; thus, I am the source and dissolution of the whole universe. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.