Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः

हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

हजारौं पुरुषहरूमध्ये, कसैले पूर्णताको लागि प्रयास गर्न सक्छ; ती सफल प्रयास गर्नेहरूमध्ये पनि मलाई सारमा कसैले चिन्न सक्छ।

GujaratiIND

હજારો પુરૂષો પૈકી, એક કદાચ પૂર્ણતા માટે પ્રયત્ન કરી શકે છે; તે સફળ પ્રયત્નોમાં પણ, ફક્ત એક જ કદાચ મને સારમાં ઓળખી શકે છે.

PunjabiIND

ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚੋਂ, ਸ਼ਾਇਦ ਕੋਈ ਵੀ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਲਈ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ; ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ਸਫਲ ਯਤਨਾਂ ਵਿੱਚ, ਕੇਵਲ ਇੱਕ ਹੀ ਮੈਨੂੰ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਜਾਣ ਸਕਦਾ ਹੈ।

BengaliIND

হাজার হাজার পুরুষের মধ্যে, একজন হয়তো পরিপূর্ণতার জন্য চেষ্টা করতে পারে; এমনকি সেই সফল প্রচেষ্টাকারীদের মধ্যে, কেবলমাত্র একজনই আমাকে সারমর্মে জানতে পারে।

AssameseIND

হাজাৰ হাজাৰ মানুহৰ মাজত কোনোবাই হয়তো সিদ্ধতাৰ বাবে চেষ্টা কৰিব পাৰে; আনকি সেই সফল চেষ্টাকাৰীসকলৰ মাজতো হয়তো এজনেহে মোক মূলতঃ চিনি পাব পাৰে।

TamilIND

ஆயிரக்கணக்கான மனிதர்களில், ஒருவர் முழுமைக்காக பாடுபடலாம்; அந்த வெற்றியாளர்களில் கூட, ஒருவரே என்னை சாராம்சத்தில் அறிந்திருக்கலாம்.

TeluguIND

వేలాది మంది పురుషులలో, ఒకరు పరిపూర్ణత కోసం ప్రయత్నించవచ్చు; ఆ విజయవంతమైన యోధులలో కూడా, ఒకరికి మాత్రమే సారాంశం నన్ను తెలుసు.

MalayalamIND

ആയിരക്കണക്കിന് മനുഷ്യർക്കിടയിൽ, ഒരാൾ പൂർണതയ്ക്കായി പരിശ്രമിച്ചേക്കാം; വിജയിച്ച ആ സമരക്കാരുടെ ഇടയിൽപ്പോലും, ഒരാൾ മാത്രമേ എന്നെ സാരാംശത്തിൽ അറിയൂ.

SindhiIND

ھزارين ماڻھن مان، ھڪڙو بھترين ڪوشش ڪري سگھي ٿو. جيتوڻيڪ انهن ڪامياب جدوجهد ڪندڙن مان، صرف هڪ ئي ٿي سگهي ٿو مون کي اصل ۾ سڃاڻي.

MarathiIND

हजारो पुरुषांमध्ये, एखाद्या व्यक्तीने परिपूर्णतेसाठी प्रयत्न करणे शक्य आहे; त्या यशस्वी प्रयत्न करणाऱ्यांमध्येही, केवळ एकच मला मूलतः ओळखू शकतो.

OdiaIND

ହଜାର ହଜାର ପୁରୁଷଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, ଜଣେ ସିଦ୍ଧତା ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କରିପାରନ୍ତି; ଏପରିକି ସେହି ସଫଳ ଡ୍ରାଇଭରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ, କେବଳ ଜଣେ ମୋତେ ଜାଣିପାରେ |

KannadaIND

ಸಾವಿರಾರು ಪುರುಷರಲ್ಲಿ, ಒಬ್ಬರು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಗಾಗಿ ಪ್ರಯತ್ನಿಸಬಹುದು; ಆ ಯಶಸ್ವಿ ಹೋರಾಟಗಾರರಲ್ಲಿ ಸಹ, ಕೇವಲ ಒಬ್ಬರು ಮಾತ್ರ ನನ್ನನ್ನು ಮೂಲಭೂತವಾಗಿ ತಿಳಿದಿರಬಹುದು.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये'-- 'हजारों मनुष्योंमें' कोई एक ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है। तात्पर्य है कि जिनमें मनुष्यपना है अर्थात् जिनमें पशुओंकी तरह खाना-पीना और ऐश-आराम करना नहीं है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं। उन मनुष्योंमें भी जो नीति और धर्मपर चलनेवाले हैं, ऐसे मनुष्य हजारों हैं। उन हजारों मनुष्योंमें भी कोई एक ही सिद्धिके लिये यत्न करता है अर्थात् जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं, जिसमें दुःखका लेश भी नहीं और आनन्दकी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं, कमीकी सम्भावना ही नहीं--ऐसे स्वतःसिद्ध नित्यतत्त्वकी प्राप्तिके लिये यत्न करता है।जो परलोकमें स्वर्ग आदिकी प्राप्ति नहीं चाहता और इस लोकमें धन, मान, भोग, कीर्ति आदि नहीं चाहता अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें नहीं अटकता और भोगे हुए भोगोंके तथा मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिके संस्कार रहनेसे उन विषयोंका सङ्ग होनेपर, उन विषयोंमें रुचि होते रहनेपर भी जो अपनी मान्यता, उद्देश्य, विचार, सिद्धान्त आदिसे विचलित नहीं होता--ऐसा कोई एक पुरुष ही सिद्धिके लिये यत्न करता है। इससे सिद्ध होता है कि परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धिके लिये यत्न करनेवाले अर्थात् दृढ़तासे उधर लगनेवाले बहुत कम मनुष्य होते हैं।परमात्मप्राप्तिकी तरफ न लगनेमें कारण है--भोग और संग्रहमें लगना। सांसारिक भोग-पदार्थोंमें केवल आरम्भमें ही सुख दीखता है। मनुष्य प्रायः तत्काल सुख देनेवाले साधनोंमें ही लगते हैं। उनका परिणाम क्या होगा--इसपर वे विचार करते ही नहीं। अगर वे भोग और ऐश्वर्यके परिणामपर विचार करने लग जायँ कि 'भोग और संग्रहके अन्तमें कुछ नहीं मिलेगा, रीते रह जायँगे और उनकी प्राप्तिके लिये किये हुए पाप-कर्मोंके फलस्वरूप चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंके रूपमें दुःख-ही-दुख मिलेगा', तो वे परमात्माके साधनमें लग जायँगे। दूसरा कारण यह है कि प्रायः लोग सांसारिक भोगोंमें ही लगे रहते हैं। उनमेंसे कुछ लोग संसारके भोगोंसे ऊँचे उठते भी हैं तो वे परलोकके स्वर्ग आदि भोग-भूमियोंकी प्राप्तिमें लग जाते हैं। परन्तु अपना कल्याण हो जाय, परमात्माकी प्राप्ति हो जाय--ऐसा दृढ़तासे विचार करके परमात्माकी तरफ लगनेवाले लोग बहुत कम होते हैं। इतिहासमें भी देखते हैं तो सकामभावसे तपस्या आदि साधन करनेवालोंके ही चरित्र विशेष आते हैं। कल्याणके लिये तत्परतासे साधन करनेवालोंके चरित्र बहुत ही कम आते हैं।वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कठिन या दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इधर सच्ची लगनसे तत्परतापूर्वक लगनेवाले बहुत कम हैं। इधर दृढ़तासे न लगनेमें संयोगजन्य सुखकी तरफ आकृष्ट होना और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा रखना ही खास कारण है। 'यततामपि सिद्धानाम्' --यहाँ 'सिद्ध' शब्दसे उनको लेना चाहिये, जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है और जो केवल एक भगवान्में ही लग गये हैं। उन्हींको गीतामें 'महात्मा' कहा गया है। यद्यपि 'सब कुछ परमात्मा ही है' ऐसा जाननेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको भी (7। 19में) महात्मा कहा गया है, तथापि यहाँ तो वे ही महात्मा साधक लेने चाहिये, जो आसुरी सम्पत्तिसे रहित होकर केवल दैवी सम्पत्तिका आश्रय लेकर अनन्यभावसे भगवान्का भजन करते हैं (गीता 9। 13)। इसका कारण यह है कि वे यत्न करते हैं--'यतताम्।'इसलिये यहाँ (7। 19 में वर्णित) तत्त्वज्ञ महात्माको नहीं लेना चाहिये।यहाँ 'यतताम्'पदका तात्पर्य मात्र बाह्य चेष्टाओंसे नहीं है। इसका तात्पर्य है--भीतरमें केवल परमात्मप्राप्तिकी उत्कट उत्कण्ठा लगना, स्वाभाविक ही लगन होना और स्वाभाविक ही आदरपूर्वक उन परमात्माका चिन्तन होना। 'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः'--ऐसे यत्न करनेवालोंमें कोई एक ही मेरेको तत्त्वसे जानता है। यहाँ 'कोई एक ही जानता है' ऐसा कहनेका यह बिलकुल तात्पर्य नहीं है कि यत्न करनेवाले सब नहीं जानेंगे, प्रत्युत यहाँ इसका तात्पर्य है कि प्रयत्नशील साधकोंमें वर्तमान समयमें कोई एक ही तत्त्वको जाननेवाला मिलता है। कारण कि कोई एक ही उस तत्त्वको जानता है और वैसे ही दूसरा कोई एक ही उस तत्त्वका विवेचन करता है--'आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः'(गीता 2। 29)। यहाँ 'तथैव चान्यः'(वैसे ही दूसरा कोई) कहनेका तात्पर्य न जाननेवाला नहीं है; क्योंकि जो नहीं जानता है, वह क्या कहेगा और कैसे कहेगा? अतः 'दूसरा कोई' कहनेका तात्पर्य है कि जाननेवालोंमेंसे कोई एक उसका विवेचन करनेवाला होता है। दूसरे जितने भी जानकार हैं, वे स्वयं तो जानते हैं, पर विवेचन करनेमें, दूसरोंको समझानेमें वे सब-के-सब समर्थ नहीं होते।प्रायः लोग इस (तीसरे) श्लोकको तत्त्वकी कठिनता बतानेवाला मानते हैं। परन्तु वास्तवमें यह श्लोक तत्त्वकी कठिनताके विषयमें नहीं है; क्योंकि परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति कठिन नहीं है, प्रत्युत तत्त्वप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होना और अभिलाषाकी पूर्तिके लिये तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंका मिलना दुर्लभ है, कठिन है। यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि 'मैं कहूँगा और तू जानेगा,' तो अर्जुन-जैसा अपने श्रेयका प्रश्न करनेवाला और भगवान-जैसा सर्वज्ञ कहनेका मिलना दुर्लभ है। वास्तवमें देखा जाय तो केवल उत्कट अभिलाषा होना ही दुर्लभ है। कारण कि अभिलाषा होनेपर उसको जाननेकी जिम्मेवारी भगवान्पर आ जाती है।यहाँ तत्त्वतः कहनेका तात्पर्य है कि वह मेरे सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि रूपोंमें प्रकट होनेवाले और समय-समयपर तरह-तरहके अवतार लेनेवाले मुझको तत्त्वसे जान लेता है अर्थात् उसके जाननेमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता और उसके अनुभवमें एक परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी किञ्चिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती। सम्बन्ध-- दूसरे श्लोकमें भगवान्ने ज्ञान-विज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अब भगवान् ज्ञान-विज्ञान कहनेका उपक्रम करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यह ( दुलर्भ ) कैसे है सो कहते हैं हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही ( मोक्षरूप ) सिद्धिके लिये प्रयत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें भी जो मोक्षके लिये यत्न करते हैं वे ( एक तरहसे ) सिद्ध ही हैं उनमें भी कोई एक ही मुझे तत्त्वसे यथार्थ जान पाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

ज्ञानस्य दुर्लभत्वं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। सहस्रशब्दस्य बहुवाचकत्वमुपेत्य व्याकरोति अनेकेष्विति। सिद्धये सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पत्त्यर्थमित्यर्थः। सिद्ध्यर्थं यतमानानां कथं सिद्धत्वमित्याशङ्क्याह सिद्धा एवेति। सर्वेषामेव तेषां ज्ञानोदयात्तस्य सुलभत्वमित्याशङ्क्याह तेषामिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अतो मद्विषयं तत्त्वज्ञानं सार्वज्ञ्यसंपादकत्वादतिदुर्लभमित्याह मनुष्याणामिति। मनुष्याणामनेकयोनिषु पुण्यवशाल्लब्धदेहानां सहस्त्रेषु असंख्यातेषुशतं सहस्त्रं लक्षं च सर्वमक्षय्यवाचकम् इत्युक्तेः। अक्षय्यमित्यस्यासंख्यातमित्यर्थः। कश्चिदनेकजन्मार्जितपुण्यपुञ्जवशाल्लब्धविवेकादिसाधनो यतते यत्नं श्रवणादिरुपं करोति। यततामपि यतमानानामपि सिद्धानां मुमुक्षणाम्। साधकत्वेऽपि सिद्धत्वकथनं तेषामुत्कर्षद्योतनार्थम्। अपरे तु सिद्धये आत्मज्ञानाय यतते। यततामपि सहस्त्रेषु कश्चिदेव प्रकृष्टपुण्यवशादात्मानं वेत्ति तादृशानामप्यात्मज्ञानसिद्धानां सहस्त्रेषु कश्चिदेव मां परमात्मानं मत्प्रसादेन तत्त्वतो वेत्तीति वर्णयन्ति। अस्मिन्पक्षे मुख्यसिद्धशब्दार्थालाभस्त्वस्त्येवात्मपदाध्याहारस्य कश्चिदत्यस्य वेत्तीत्यस्य चावृत्तेरध्याहारस्य वा क्लेशोऽतिरिच्यते इत्ययं षक्षश्चिन्त्यः। तेषां मध्ये कश्चितेव मां परमेश्वरं तत्त्वतो यथावतस्वाभिन्नत्वेन वेत्ति जानाति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
manuṣhyāṇāmof men
sahasreṣhuout of many thousands
kaśhchitsomeone
yatatistrives
siddhayefor perfection
yatatāmof those who strive
apieven
siddhānāmof those who have achieved perfection
kaśhchitsomeone
māmme
vettiknows
tattvataḥin truth
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 3
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः

हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 3?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 3 translates to: "Among thousands of men, one may perchance strive for perfection; even among those successful strivers, only one may perchance know Me in essence. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "manuṣhyāṇāṁ sahasreṣhu kaśhchid yatati siddhaye" mean in English?

"manuṣhyāṇāṁ sahasreṣhu kaśhchid yatati siddhaye" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 3. Among thousands of men, one may perchance strive for perfection; even among those successful strivers, only one may perchance know Me in essence. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.