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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

উপলব্ধির সহিত এই বিদ্যা সম্বন্ধে আমি তোমাকে পূর্ণরূপে ঘোষণা করিতেছি, যা জানার পর এখানে আর কিছুই জানার বাকি থাকে না।

MizoIND

He hriatna hi hriatchhuahna nena inzawm hian a famkimin ka puang ang che u, chu chu hetah hian hriat tur dang a la awm lo tih ka hriat hnuah.

DogriIND

मैं तुसें गी एहसास कन्नै मिलियै इस ज्ञान गी पूरी चाल्ली घोशित करगा, एह् जानने दे बाद जेह्ड़ा इत्थें होर किश नेईं जानना बाकी ऐ।

ManipuriIND

ꯑꯩꯍꯥꯛꯅꯥ ꯑꯗꯣꯃꯗꯥ ꯔꯤꯑꯦꯂꯥꯏꯖꯦꯁꯅꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯑꯁꯤ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯅꯥ ꯂꯥꯑꯣꯊꯣꯛꯀꯅꯤ, ꯃꯐꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯀꯔꯤꯁꯨ ꯈꯉꯕꯥ ꯉꯃꯗ꯭ꯔꯤ ꯍꯥꯌꯕꯥ ꯈꯉꯂꯕꯥ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ꯫

BhojpuriIND

हम रउरा सभे के एहसास के संगे मिल के एह ज्ञान के पूरा घोषणा करब, एकरा के जानला के बाद जवना के इहाँ अवुरी कुछूओ जानल बाकी नईखे।

GujaratiIND

અનુભૂતિ સાથે મળીને આ જ્ઞાન હું તમને સંપૂર્ણ રીતે જાહેર કરીશ, જે જાણ્યા પછી અહીં બીજું કશું જાણવાનું બાકી રહેતું નથી.

TamilIND

இந்த அறிவை உணர்தலுடன் இணைத்து உங்களுக்கு முழுமையாக அறிவிக்கிறேன், இதைத் தெரிந்து கொண்ட பிறகு, இங்கு அறியப்பட வேண்டிய வேறு எதுவும் இல்லை.

NepaliIND

साक्षात् सहितको यो ज्ञान म तिमीलाई पूर्ण रूपमा बताउछु, जसलाई थाहा पाएपछि यहाँ अरू केही पनि थाहा हुँदैन।

MarathiIND

हे ज्ञान प्राप्तीसह मी तुम्हाला संपूर्णपणे घोषित करीन, जे जाणून घेतल्यावर येथे दुसरे काहीही कळायचे नाही.

MalayalamIND

ഇവിടെ അറിയാൻ ബാക്കിയൊന്നുമില്ലെന്ന് അറിഞ്ഞതിന് ശേഷം ഈ അറിവ് സാക്ഷാത്കാരവുമായി സംയോജിപ്പിച്ച് ഞാൻ നിങ്ങളോട് പൂർണ്ണമായി പ്രഖ്യാപിക്കും.

PunjabiIND

ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਸ ਗਿਆਨ ਨੂੰ ਬੋਧ ਸਮੇਤ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਿਆਨ ਕਰਾਂਗਾ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਜਾਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਇੱਥੇ ਹੋਰ ਕੁਝ ਜਾਣਨਾ ਬਾਕੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

مان توهان کي هن علم سان گڏ مڪمل طور تي بيان ڪندس، جنهن کي ڄاڻڻ کان پوء هتي ٻيو ڪجهه به نه بچندو.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः'--भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन! अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा , तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है; परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन? जो समग्र परमात्मा है, वह मैं स्वयं! मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ, वैसा दूसरे नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं । उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटा-सा अंश है, वह कितना जान सकती है !वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं, पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है, न कभी था, न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा। दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं--'वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः' तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है इसलिये प्रधानतासे कहूँगा--'प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे'(10। 19)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है--'नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप' (10। 40)। यहाँ (7। 2 में) भगवान् कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, शेष नहीं रखूँगा--'अशेषतः।' इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलग-अलग शक्तियाँ हैं, उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य, ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है--

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वहीं यह अपने स्वरूपका ज्ञान मैं तुझे विज्ञानके सहित अर्थात् अपने अनुभवके सहित निःशेषतःसम्पूर्णतासे कहूँगा। श्रोताको सम्मुख अर्थात् सावधान करनेके लिये जिसका वर्णन करना है उस ज्ञानकी स्तुति करते हैं। जिस ज्ञानको जान लेनेपर फिर इस जगत्में पुरुषार्थका कोई साधन जानना शेष नहीं रहता अर्थात् जो मेरे तत्त्वको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ हो जाता है। अतः यह ज्ञान अति उत्तम फलवाला होनेके कारण दुर्लभ है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्कायां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षं ज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्भे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञात्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते। तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयति। अनवशेषेण तद्वेदनफलोपन्यासेन श्रोतारं तच्छवणप्रवणं करोति तज्ज्ञानमिति। एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानश्रुतिमाश्रित्योत्तरार्धतात्पर्यमाह यज्ज्ञात्वेति। भगवत्तत्त्वज्ञानस्य विशिष्टफलत्वमुक्त्वा फलितमाह अत इति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ज्ञास्यसीत्युक्तं तत्र ज्ञां स्तौति ज्ञानमिति। अत्र भाष्ये तच्च मद्विषयं ज्ञानं ते तुभ्यमहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवेन संयुक्तमिदं वक्ष्यामि कथयिष्याम्यशेषतः कात्स्त्रर्येन। तज्ज्ञानं विवक्षितं स्तोति श्रोतुरभिमुखीकरणाय। यज्ज्ञात्वा यज्ज्ञानं ज्ञात्वा नेह भूयः पुनर्ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनमवशिष्यते नावशेषो भवतीति मत्तत्त्वशो यः स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थ इति। अस्मिन्भाष्ये ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्क्यां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्मे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञातक्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयत इति तद्दीकाकृतः। तदेवाह ज्ञाममति। ज्ञानं शुद्धप्रधानंशुद्धप्रज्ञानघनं ब्रह्मसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति श्रुतं ते तुभ्यमहं वक्ष्यामि। अशेषतः साधनकलापसहितं किं वचनमात्रजेन परोक्षज्ञानेन शब्दस्य स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वानियमादित्याशङ्क्याह। सविज्ञानमनुभवसहितं दशमस्त्वमसीत्यादौ शब्दादप्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तिदर्शनादित्यन्ये। वस्तुस्तु तच्च मद्विषयं ज्ञानमिति भाष्याद्भाष्यकृतामयमर्थो नाभिप्रेतोः। सविज्ञानमिति मूलान्मूलानुगुणोऽपि न भवति। त्मान्मूलतद्भाष्यानुरोधेन ज्ञानं शास्त्रजन्यं विज्ञानमनुभव इति व्याख्येयम्। यज्ज्ञोत्वेत्यस्य तुयज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव इति श्लोकस्थभाष्यानुसारेण मद्विषयं ज्ञानं शास्त्रजन्यं सविज्ञानं लब्ध्वेत्यर्थं इत्यविरोधः। मद्विषयस्य ज्ञानस्य सकलाधिष्ठानविषयत्वात्। अन्यज्ज्ञातव्यं नावशिष्यतेयेनाश्रुतं श्रुतं भवति इत्यादिश्रुतिरिति भावः। यत्त्विदं मद्विषयं विज्ञानेन सहितमपरोक्षमेव ज्ञानं शास्त्रजन्यं ते तुम्यमहं वक्ष्यामि जज्ज्ञानं नित्यचैतन्यरुपं ज्ञात्वा वेदान्तजन्यमनोवृत्तिविषयीकृत्येति। तत्र यजज्ञानमित्याद्युपेक्ष्यं यच्छब्दस्य प्रस्तुतपरामर्शकत्वेन सविज्ञानस्य ज्ञानस्य यदा परामृष्टस्य चैतन्यरुपार्थकत्वायोगात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jñānamknowledge
teunto you
ahamI
sawith
vijñānamwisdom
idamthis
vakṣhyāmishall reveal
aśheṣhataḥin full
yatwhich
jñātvāhaving known
nanot
ihain this world
bhūyaḥfurther
anyatanything else
jñātavyamto be known
avaśhiṣhyateremains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 7.1
श्री भगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु

श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 7.3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः

हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 2 translates to: "I will declare to you in full this knowledge combined with realization, after knowing which nothing else remains to be known here. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवश" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ" mean in English?

"jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 2. I will declare to you in full this knowledge combined with realization, after knowing which nothing else remains to be known here. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.