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Bhagavad Gita · BG 7.2

Bhagavad Gita 7.2 — Commentary

20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते

jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam-avaśhiṣhyate

"I will declare to you in full this knowledge combined with realization, after knowing which nothing else remains to be known here."

Scholar Commentaries (20)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

ज्ञानं ते तुभ्यम् अहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवयुक्तम् इदं वक्ष्यामि कथयिष्यामि अशेषतः कात्स्न्र्येन। तत् ज्ञानं विवक्षितं स्तौति श्रोतुः अभिमुखीकरणाय यत् ज्ञात्वा यत् ज्ञानं ज्ञात्वा न इह भूयः पुनः अन्यत् ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनम् अवशिष्यते नावशिष्टं भवति। इति मत्तत्त्वज्ञो यः सः सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः। अतो विशिष्टफलत्वात् दुर्लभं ज्ञानम्।।कथमित्युच्यते

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

अहं ते मद्विषयम् इदं ज्ञानं विज्ञानेन सह अशेषतो वक्ष्यामि। विज्ञानं हि विविक्ताकारविषयं ज्ञानम् यथा अहं मद्व्यतिरिक्तात् समस्तचिदचिद्वस्तुजातात् निखिलहेयप्रत्यनीकतया अनवधिकातिशयासख्येकल्याणगुणगणानन्तमहाविभूतितया च विविक्त तेन विविक्तविषयज्ञानेन सह मत्स्वरूपविषयज्ञानं वक्ष्यामि। किं बहुना यद् ज्ञानं ज्ञात्वा मयि पुनः अन्यद् ज्ञातव्यं न अवशिष्यते।वक्ष्यमाणस्य ज्ञानस्य दुष्प्रापताम् आह

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

इदं मद्विषयं ज्ञानम्। विज्ञानं विशेषज्ञानम्।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

श्री शंकराचार्य के अनुसार शास्योक्त पदार्थों का परिज्ञान ज्ञान है तथा शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का यथार्थ रूप में स्वानुभव होना विज्ञान है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे न केवल शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन करेंगे वरन् प्रवचनकाल में ही वे उसे आत्मानुभव के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा भी देंगे। उनका यह कथन कुछ अविश्वसनीय प्रतीत हो सकता है क्योंकि योग साधना तथा भारतीय दर्शन की अन्य शाखाओं में साधक को लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसकी प्राप्ति के लिये विशेष साधना करनी होती है। परन्तु वेदान्त शास्त्र इनसे भिन्न है क्योंकि इसमें साधक को उसके नित्यसिद्ध स्वरूप का ही बोध कराया गया है न कि स्व्ायं से भिन्न किसी वस्तु का। अत एक सुयोग्य विद्यार्थी को उपदेश ग्रहण के पश्चात् आत्मानुभव के लिये कहीं किसी वन प्रान्त में जाने की आवश्यकता नहीं होती है।यदि शिष्य ज्ञान के लिये आवश्यक गुणों से सम्पन्न है और गुरु के बताये हुए तर्कों को समझने में समर्थ है तो उसे अध्ययन काल में ही आत्मानुभव हो सकता है। यही कारण है कि वेदान्त केवल सुयोग्य विद्यार्थियों को ही पढ़ाया जाता है। उत्तम शिष्य के लिये आत्मानुभूति तत्काल प्राप्य है। उसे कालान्तर अथवा देशान्तर की अपेक्षा नहीं होती।यदि वेदान्त एक पूर्ण शास्त्र है और उपदेश काल में ही आत्मानुभव सिद्ध हो सकता है तो फिर क्या कारण है कि विश्वभर में ऐसे ज्ञानी पुरुष विरले ही होते हैं भगवान् कहते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

7.2 ज्ञानम् indirect knowledge of Sastras? ते to thee? अहम् I? सविज्ञानम् combined with realisation (direct knowledge of the Atman through experience)? इदम् this? वक्ष्यामि will declare? अशेषतः in full? यत् which? ज्ञात्वा having known? न not? इह here? भूयः more? अन्यत् anything else? ज्ञातव्यम् what ought to be known? अवशिष्यते remains.Commentary Jnanam is Paroksha Jnanam or indirect knowledge of Brahman obtained through the study of the Upanishads. Vijnanam is Visesha Jnanam? i.e.? Aparoksha Jnanam obtained through direct Selfrealisation (intuitional wisdom).In this verse the Lord praises knowledge in order to make Arjuna follow His instruction closely with rapt attention? faith and interest. The Lord says I shall teach thee in full. You will attain to omniscience or perfect knowledge of the Self? after knowing which nothing more remains to be known here. If anyone attains the knowledge of the Self? he will know everything. That is the reason why Saunaka? the great householder? approacehd Angirasa respectfully and asked What is that? O Lord? which being known all this becomes known (Cf.XIII.11)

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः'--भगवान् कहते हैं कि भैया अर्जुन! अब मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा , तुम्हें कहूँगा और मैं खुद कहूँगा तथा सम्पूर्णतासे कहूँगा। ऐसे तो हरेक आदमी हरेक गुरुसे मेरे स्वरूपके बारेमें सुनता है और उससे लाभ भी होता है; परन्तु तुम्हें मैं स्वयं कह रहा हूँ। स्वयं कौन? जो समग्र परमात्मा है, वह मैं स्वयं! मैं स्वयं मेरे स्वरूपका जैसा वर्णन कर सकता हूँ, वैसा दूसरे नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो सुनकर और अपनी बुद्धिके अनुसार विचार करके ही कहते हैं । उनकी बुद्धि समष्टि बुद्धिका एक छोटा-सा अंश है, वह कितना जान सकती है !वे तो पहले अनजान होकर फिर जानकार बनते हैं, पर मैं सदा अलुप्तज्ञान हूँ। मेरेमें अनजानपना न है, न कभी था, न होगा और न होना सम्भव ही है। इसलिये मैं तेरे लिये उस तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसको जाननेके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा। दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियोंको कहनेमें समर्थ हैं--'वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः' तो उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है इसलिये प्रधानतासे कहूँगा--'प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे'(10। 19)। फिर अन्तमें कहते हैं कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है--'नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप' (10। 40)। यहाँ (7। 2 में) भगवान् कहते हैं कि मैं विज्ञानसहित ज्ञानको सम्पूर्णतासे कहूँगा, शेष नहीं रखूँगा--'अशेषतः।' इसका तात्पर्य यह समझना चाहिये कि मैं तत्त्वसे कहूँगा। तत्त्वसे कहनेके बाद कहना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहेगा।दसवें अध्यायमें विभूति और योगकी बात आयी कि भगवान्की विभूतियोंका और योगका अन्त नहीं है। अभिप्राय है कि विभूतियोंका अर्थात् भगवान्की जो अलग-अलग शक्तियाँ हैं, उनका और भगवान्के योगका अर्थात् सामर्थ्य, ऐश्वर्यका अन्त नहीं आता। रामचरितमानसमें कहा है--

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

वहीं यह अपने स्वरूपका ज्ञान मैं तुझे विज्ञानके सहित अर्थात् अपने अनुभवके सहित निःशेषतःसम्पूर्णतासे कहूँगा। श्रोताको सम्मुख अर्थात् सावधान करनेके लिये जिसका वर्णन करना है उस ज्ञानकी स्तुति करते हैं। जिस ज्ञानको जान लेनेपर फिर इस जगत्में पुरुषार्थका कोई साधन जानना शेष नहीं रहता अर्थात् जो मेरे तत्त्वको जाननेवाला है वह सर्वज्ञ हो जाता है। अतः यह ज्ञान अति उत्तम फलवाला होनेके कारण दुर्लभ है।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्कायां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षं ज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्भे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञात्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते। तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयति। अनवशेषेण तद्वेदनफलोपन्यासेन श्रोतारं तच्छवणप्रवणं करोति तज्ज्ञानमिति। एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानश्रुतिमाश्रित्योत्तरार्धतात्पर्यमाह यज्ज्ञात्वेति। भगवत्तत्त्वज्ञानस्य विशिष्टफलत्वमुक्त्वा फलितमाह अत इति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

ज्ञास्यसीत्युक्तं तत्र ज्ञां स्तौति ज्ञानमिति। अत्र भाष्ये तच्च मद्विषयं ज्ञानं ते तुभ्यमहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवेन संयुक्तमिदं वक्ष्यामि कथयिष्याम्यशेषतः कात्स्त्रर्येन। तज्ज्ञानं विवक्षितं स्तोति श्रोतुरभिमुखीकरणाय। यज्ज्ञात्वा यज्ज्ञानं ज्ञात्वा नेह भूयः पुनर्ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनमवशिष्यते नावशेषो भवतीति मत्तत्त्वशो यः स सर्वज्ञो भवतीत्यर्थ इति। अस्मिन्भाष्ये ज्ञास्यसीत्युक्त्या परोक्षज्ञानशङ्क्यां तन्निवृत्त्यर्थं तदुक्तिप्रकारमेव विवृणोति तच्चेति। इदमपरोक्षज्ञानं चैतन्यम्। तस्य सविज्ञानस्य प्रतिलम्मे किं स्यादित्याशङ्क्याह यज्ज्ञातक्वेति। इदमा चैतन्यस्य परोक्षत्वं व्यावर्त्यते तदेव सविज्ञानमिति विशेषणेन स्फुटयत इति तद्दीकाकृतः। तदेवाह ज्ञाममति। ज्ञानं शुद्धप्रधानंशुद्धप्रज्ञानघनं ब्रह्मसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति श्रुतं ते तुभ्यमहं वक्ष्यामि। अशेषतः साधनकलापसहितं किं वचनमात्रजेन परोक्षज्ञानेन शब्दस्य स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वानियमादित्याशङ्क्याह। सविज्ञानमनुभवसहितं दशमस्त्वमसीत्यादौ शब्दादप्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तिदर्शनादित्यन्ये। वस्तुस्तु तच्च मद्विषयं ज्ञानमिति भाष्याद्भाष्यकृतामयमर्थो नाभिप्रेतोः। सविज्ञानमिति मूलान्मूलानुगुणोऽपि न भवति। त्मान्मूलतद्भाष्यानुरोधेन ज्ञानं शास्त्रजन्यं विज्ञानमनुभव इति व्याख्येयम्। यज्ज्ञोत्वेत्यस्य तुयज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव इति श्लोकस्थभाष्यानुसारेण मद्विषयं ज्ञानं शास्त्रजन्यं सविज्ञानं लब्ध्वेत्यर्थं इत्यविरोधः। मद्विषयस्य ज्ञानस्य सकलाधिष्ठानविषयत्वात्। अन्यज्ज्ञातव्यं नावशिष्यतेयेनाश्रुतं श्रुतं भवति इत्यादिश्रुतिरिति भावः। यत्त्विदं मद्विषयं विज्ञानेन सहितमपरोक्षमेव ज्ञानं शास्त्रजन्यं ते तुम्यमहं वक्ष्यामि जज्ज्ञानं नित्यचैतन्यरुपं ज्ञात्वा वेदान्तजन्यमनोवृत्तिविषयीकृत्येति। तत्र यजज्ञानमित्याद्युपेक्ष्यं यच्छब्दस्य प्रस्तुतपरामर्शकत्वेन सविज्ञानस्य ज्ञानस्य यदा परामृष्टस्य चैतन्यरुपार्थकत्वायोगात्।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

एतदेवाह ज्ञानमिति। ज्ञानं शुद्धप्रज्ञानघनं ब्रह्मसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्म इति श्रुतेः। ते तुभ्यमहं वक्ष्यामि। अशेषतः साधनकलापसहितम्। किं वचनमात्रजेन परोक्षज्ञानेन शब्दस्य स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वनियमादित्याशङ्क्याह सविज्ञानमनुभवसहितम्। दशमस्त्वमसीत्यादौ शब्दादप्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तिदर्शनात्कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातम् इत्येकविज्ञानात्सर्वविज्ञानप्रतिज्ञां श्रौतीमेव वर्णयति यज्ज्ञात्वेति। जगत्कारणाधिष्ठानस्य ज्ञानरूपस्य ब्रह्मणो ज्ञाने संशयोच्छेदात्सर्वस्यात्ममात्रत्वेन ज्ञातव्यानवशेषो युक्त इत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

वक्ष्यमाणं स्तौति ज्ञानमिति। ज्ञानं शास्त्रीयं विज्ञानमनुभवस्तत्सहितम्। इदं मद्विषयम्। अशेषतः साकल्येन वक्ष्यामि। यज्ज्ञात्वेह श्रेयोमार्गे वर्तमानस्य पुनरन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्टं न भवति। तेनैव कृतार्थो भवतीत्यर्थः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

ां.उ.7.26।2 इत्यादिसिद्धम् सा च ध्रुवा स्मृतिः सर्वग्रन्थिविप्रमोक्षहेतुतया विहिता दर्शनं च तद्धेतुतया विहितम् न चेदमुपायद्वयं गुरुलघुतारतम्यात् फलस्य चाविशिष्टत्वाल्लघौ सति नियमेन गुरोरपरिग्रहेणानुपायत्वप्रसङ्गात् न च द्वारद्वारिभावः एकस्मिन्वाक्ये विशिष्टैकविधिसम्भवे पृथग्विधेः परिग्रहायोगात् न च दर्शने स्मृतिशब्देनोपचारे कश्चिद्गुणः अतो ध्रुवा स्मृतिरेव दर्शनशब्देन विशेषिता स्मृतेश्च दर्शनसमानत्वं नाम विशदतमतया दर्शनसमानाकारत्वमेव। भवति च स्मृतेर्भावनाप्रकर्षाद्दर्शनसमानाकारता भीरुकामुकादिषु। यथावृक्षे वृक्षे च पश्यामि चीरकृष्णाजिनाम्बरम्। गृहीतधनुषं रामं पाशहस्तमिवान्तकम् वा.रा.3।14।15 इत्यादि। तथालीनेव प्रतिबिम्बितेव मा.मा.अं.5 इत्यादि। एवं च स्मृतिदर्शनशब्दयोरैकार्थ्ये सिद्धे द्रष्टव्यः ৷৷. निदिध्यासितव्यः इत्यनयोरेकवाक्यस्थयोरपि सामान्यविशेषरूपेणैकार्थ्यमेवेति।अथ द्वितीयां प्रतिज्ञामुपपादयितुमाह पुनश्चेति। एतदुक्तं भवतिनायमात्मा इत्यादिना केवलश्रवणमनननिदिध्यासननिषेधः अत्यन्तनिषेधे त्वनेकप्रमाणविरोधात्। यमेवैषः इत्यादिनापि वरणीयत्वहेतुभूतस्वक्रियासाध्यो गुणविशेषो विधीयते ईश्वरस्वाच्छन्द्यमात्राभिधाने वैषम्यनैर्घृण्यादिदोषप्रसङ्गाच्छास्त्रानर्थक्याच्च। तथा सिद्धगुणाभिधानेऽपि शास्त्रानर्थक्यमेव विधेयान्तराभावात्। स च वरणीयताहेतुः साध्यो गुणो भक्तिरेव। प्रियतम एव हि वरणीयो भवति। परमात्मविषयप्रीतिमानेव च परमात्मना वरणीयः।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः 7।17 इति स्ववचनादिभिस्तथावगतेः इति। तस्याश्च प्रीतेः स्वयमपि स्वावृतमत्वमुपायान्तरेष्वदृष्टपूर्वं दर्शयतिस्मर्यमाणेत्यादिना।तेषु तेष्वच्युता भक्तिरच्युताऽस्तु सदा त्वयि वि.पु.1।20।18 इत्यारभ्यया प्रीतिरविवेकानाम् वि.पु.1।20।19क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम्। क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम् वि.पु.2।6।44 इत्यादिभिर्भगवद्भक्ते स्वादुतमत्वं सिद्धम्। स्मृतिः सन्तन्यते यत्रेति वा स्मृतेः सन्तानो यत्रेति वा स्मृतिसन्तानशब्देन प्रकृतं वेदनं विशेष्यते इति नपुंसकत्वोपपत्तिः। पुँल्लिङ्गतया वा पठितव्यम्। अस्त्वेवं तथापि भक्तेर्मोक्षोपायत्वं कथमित्यत्राह तदेव हीति। महनीयविषये प्रीतिरेव हि भक्तिरिति भावः। तत्र प्रमाणमाह स्नेहेति। महनीयविषये स्नेहपूर्वमनुध्यानमिति भाव्यम् अन्यथा स्नेहपूर्वस्वप्रियतमानुध्यानस्यापि भक्तित्वप्रसङ्गात्। एवं भक्तिरूपत्वानभ्युपगमे श्रुतिस्मृत्योः परस्परविरोधः।अभ्युपगमे तदुपबृंहणीयत्वोपबृंहणत्वाभ्यां परस्परानुकूल्यमित्यभिप्रायेणाह अत इति। वेदनशब्दनिर्दिष्टस्य मुक्त्युपायस्य भक्तिरूपत्वादित्यर्थः। परमपुरुषव्यतिरिक्तोपायनिषेधमुखेन तज्ज्ञानव्यतिरिक्तोपायनिषेधः श्रुतौ सिद्धः। तद्भक्तिव्यतिरिक्तोपायनिषेधः स्मृतौ। तदेतद्भक्तिवेदनशब्दयोरैकार्थ्ये हि घटते। अन्यथा तु मिथो व्याघात इति। एवं प्रतिज्ञाद्वयं कण्ठोक्त्योपपादितम् अन्यत्प्रतिज्ञाद्वयं त्वर्थतः स्थापितम्। तथा हि वेदनव्यतिरिक्तनिषेधात्समुच्चयपक्षो निरस्तः। कर्मापेक्षणं त्वङ्गतयेति तत्तद्वाक्यार्थनिरूपणेन सिद्धं भवति। श्वेताश्वतरपुरुषसूक्तवाक्यविषययोरेकविषयतयोपादानात्सर्वशाखागतपुरुषसूक्तवाक्यैकार्थ्यं सर्वोपनिषदां दर्शितम्। तत्रच महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः श्वे.उ.3।12 इत्यादिबलात्पुरुषविषयत्वमेव व्यक्तम्। शिवादिशब्दास्तु शुद्धिगुणयोगादिना परमपुरुष एव मुख्याः। अथर्वशिरःप्रतर्दनविद्यादिष्वपि रुद्रेन्द्राद्यन्तर्यामिपरमपुरुषोपासनमेव विधेयमिति स्थापितं शारीरके।तत्रेति मध्यमषट्क इत्यर्थः।उपास्यभूतेत्यनेन प्रकृतसङ्गतिः सूचिता। उपास्यभूतः परमपुरुषो हि षष्ठाध्यायान्तिमश्लोकेमाम् 6।47 इति प्रसक्तः। एतेनस्वयाथात्म्यं प्रकृत्यास्य तिरोधिः शरणागतिः। भक्तभेदः प्रबुद्धस्य श्रैष्ठ्यं सप्तम उच्यते गी.सं.11 इति सङ्ग्रहश्लोकोऽपि व्याख्यातः।।अथ भजनीयतयामाम् 6।47 इति प्रस्तुतं स्वात्मानं भजननिर्वृत्तये यथावस्थितमुपदिशामीति भगवानुवाचमय्यासक्तमना इति।आसक्तः इत्यत्रोपासनार्थमाभिमुख्यमुपसर्गविवक्षितमित्याह आभिमुख्येनेति। तदेव सहेतुकं प्रपञ्चयति मत्प्रियत्वेत्यादिना। अहं प्रियः प्रीतिविषयो यस्य स मत्प्रियस्तस्य भावस्तत्त्वम्। यद्वा मम प्रियत्वातिरेकेण मत्प्रियत्वातिरेकेणेत्यर्थः।मद्विभूतिशब्देनात्र भगवदसाधारणपरिजनपरिबर्हभूषणादीनिगृह्यन्ते नतु विभूतिमात्रम् कदाचिदपि तद्विश्लेषायोगात्। यद्वा विभूतित्वेनाननुभवो विभूत्या विश्लेषः। स्वरूपादिभिरपि हि विश्लेषो यथाभिलषितानुभवाभाव एव।विशीर्यमाणस्वरूपतयेति कार्याक्षमत्वलक्षणशैथिल्येनेत्यर्थः। तेन चाप मनो विशेष्यते। पौनरुक्त्यप्रसङ्गं परिहर्तुंस्वयं चेत्युक्तम्।मदाश्रयः इत्यत्रअब्भक्षः इत्यादाविवावधारणं विवक्षितमिति दर्शयतिमदेकाधार इति मदनुभवैकधारक इत्यर्थः। योगोपकारकं भजनीयविषयतत्त्वज्ञानमिहोच्यते न तु योगस्य साक्षादनुष्ठानमित्यभिप्रायेणयुञ्जन् इति शत्रभिप्रेतमाहयोक्तुं प्रवृत्त इति। प्रारब्धापरिसमाप्तिरूपवर्तमाने प्रारम्भोऽत्र विवक्षित इति भावः। योगात्पूर्वमेव तत्त्वतो ज्ञातव्यत्वार्थंयोगविषयभूतमित्युक्तम्।असंशयं समग्रम् इत्युभयं क्रियाविशेषणम्। समग्रशब्दो निस्संशयत्वाय सर्वप्रकारविशिष्टत्वपर इति दर्शयितुंसकलपदम् विशेषदर्शनेन हि संशयनिवृत्तिः।तच्छृणु इति प्रतिनिर्देशवशादुत्तरश्लोकालोचनया उक्तिश्रवणयोरेकविषयत्वसिद्धेश्चात्रयथा इतिशब्दो ज्ञानपर इत्यभिप्रायेणयेन ज्ञानेनोक्तेन ज्ञास्यसीत्युक्तम्। उक्तेन वक्ष्यमाणवाक्यप्रतिपाद्येनेत्यर्थः। श्रूयमाणविषयस्यादृष्टचरत्वाच्छ्रोतुरवधानकरणं प्रथमश्लोकप्रयोजनमिति दर्शयति अवहितमना इति।तच्छृणु इत्युक्तमर्थं पुनः सावधानत्वातिशयसम्पादनायाहमपि सर्वज्ञः सर्वशक्तिर्वक्ष्यामीति वदन्असंशयं समग्रं माम् 7।1 इत्युक्तमर्थं किञ्चिद्विशदयति ज्ञानं तेऽहम् इति श्लोकेन। ज्ञानविज्ञानशब्दयोः पौनरुक्त्यव्युदासाय उपसर्गसिद्धं विशेषं दर्शयति विज्ञानं विविक्ताकारविषयं ज्ञानमिति। अत्र ज्ञानविज्ञानशब्दाभ्यां तज्जनकवाक्यलक्षणा। श्रोतव्यत्ववक्तव्यत्वे वा तज्जनकवाक्यद्वारा तत्रोपचरिते।ज्ञानं ज्ञात्वेति ओदनपाकं पचतीतिवत्। एतेन विज्ञानशब्दस्यात्र निदिध्यासनविषयत्वं परोक्तं प्रत्युक्तम्। अर्थस्थितिपरिज्ञानं ह्यत्रयज्ज्ञात्वा इत्यादिनाऽपि व्यज्यते। अतः स्वरूपनिरूपकनिरूपितस्वरूपविशेषकधर्मविषयतया ज्ञानविज्ञानशब्दयोरपुनरुक्तिः। उभयलिङ्गतयोभयविभूतिविशिष्टतया च वक्ष्यमाणं विविक्तत्वं दर्शयति यथाऽहमिति। अनवधिकातिशयासङ्ख्येयकल्याणगुणगणश्चानन्तमहाविभूतिश्चेति पृथग्बहुव्रीहिभ्याम्ज्ञानं तु विज्ञानगुणोपपन्नं कर्माशुभं पश्यति वर्जनीयम् इत्यत्रापि विज्ञानशब्देनैतदेव विवक्षितम् अतिशयित विषयज्ञानस्यान्यानादरहेतुत्वात्।अशेषतः इत्येतस्यैव विवरणे ज्ञानप्रशंसारूपं चोत्तरार्धं व्याख्याति किं बहुनेति।इह भूयः इत्यस्यार्थोमयि पुनरिति। अवश्यज्ञातव्यसमस्ताकारविशिष्टमिहोपदिशामीत्युक्तं भवति।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

मय्यासक्तेति ज्ञानमिति। ज्ञानविज्ञाने ज्ञानक्रिये एव। ततो न किञ्चिदवशिष्यते सर्वस्य ज्ञेयजातस्य ज्ञानक्रियानिष्ठत्वात्।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

ननु ज्ञानं वक्ष्यते न तूक्तं तत्कथमिदं इति परामर्श इत्यत आह इदमिति। मामिति स्वस्य प्रकृतत्वात् तत्सम्बन्धित्वेन ज्ञानमपि प्रकृतमिति भावः। सविज्ञानं स्वानुभवसंयुक्तं (शां.भा.) इत्येतदपाकर्तुं विज्ञानपदार्थमाह विज्ञानमिति। अस्यैव वक्ष्यमाणत्वादपरस्य तदभावादिति भावः।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

ज्ञास्यसीत्युक्ते परोक्षमेव तज्ज्ञानं स्यादिति शङ्कां व्यावर्तयन्स्तौति श्रोतुराभिमुख्याय इदं मद्विषयं स्वतोऽपरोक्षज्ञानम् असंभावनादिप्रतिबन्धेन फलमजनयत्परोक्षमित्युपचर्यते। असंभावानादिनिरासे तु विचारपरिपाकान्ते तेनैव प्रमाणेन जनितं ज्ञानं प्रतिबन्धाभावात्फलं जनयदपरोक्षमित्युच्यते। विचारपरिपाकनिष्पन्नत्वाच्च तदेव विज्ञानं तेन विज्ञानेन सहितमिदमपरोक्षमेव ज्ञानं शास्त्रजन्यं ते तुभ्यमहं परमाप्तो वक्ष्याम्यशेषतः साधनफलादिसहितत्वेन निरवशेषं कथयिष्यामि। श्रौतीमेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञामनुसरन्नाह यज्ज्ञानं नित्यचैतन्यरूपं ज्ञात्वा वेदान्तजन्यमनोवृत्तिविषयीकृत्येह व्यवहारभूमौ भूयः पुनरपि अन्यत्किंचिदपि ज्ञातव्यं नावशिष्यते। सर्वाधिष्ठानसन्मात्रज्ञानेन कल्पितानां सर्वेषां बाधे सन्मात्रपरिशेषात्तन्मात्रज्ञानेनैव त्वं कृतार्थो भविष्यसीत्यभिप्रायः।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

ननु योगस्वरूपनिरूपणे पूर्वमपि स्वरूपज्ञानमुक्तमेव पुनरेतज्ज्ञानं किंरूपं इत्याशङ्क्याह ज्ञानं तेऽहमिति। अहं पुरुषोत्तमः ते तव त्वदर्थं ज्ञानं शास्त्रोक्तप्रकारेण मत्स्वरूपविषयं अशेषतः सम्पूर्णं लीलादिसहितं वक्ष्यामि। कीदृशं तत् सविज्ञानं स्वरूपानुभवसहितम्। अनुभवस्वरूपमेवाह इदमिति अनुभूयमानस्वस्वस्पात्मकम्। एतज्ज्ञानान्तरं पुनरन्यज्ज्ञेयं नास्तीत्याह यदिति। यत् स्वस्वरूपानुभवसहितं स्वस्वरूपं ज्ञात्वा इह अस्मिन् मद्भक्तिमार्गे भरतखण्डे अस्मिन्मनुष्यजन्मनि वा ज्ञातव्यं न अवशिष्यते। एतज्ज्ञानेनैव दास्यानुभवो भवतीत्यर्थः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

वक्ष्यमाणं स्तौति ज्ञानमिति। माहात्म्यविषयकं ज्ञानं विज्ञानं विविधतया चिदचिद्रूपतया च तत्तद्विभूतिधर्मरूपतयाऽवान्तरविशेषैश्च यथार्थज्ञानं तेन सहितं अशेषतो वक्ष्यामि। यद्याथात्म्यं ज्ञात्वा भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमविशष्टं न भवति।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

7.2 Aham, I; vaksyami, shall tell; te, you; asesatah, in detail, fully; of that (Knowledge) about Myself, which is idam, this; jnanam, Knowlege; which is savijnanam, combined with realization, associated with personal enlightenment; yat jnatva, after experiencing which Knowledge; avasisyate, there remains; na anyat, nothing else, anything that can be a means to human ends; jnatavyam, to be known; bhuyah, again; iha, here. (In this way) the Lord praises that Knowledge which is intended to be spoken, in order ot draw the attention of the hearer. Thus, 'he who knows Me in reality becomes omniscient.' This is the idea. Therefore Knowledge is difficult to attain because of its superexcellent result. How so? This is being answered:

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

7.1-2 Mayi etc. Jnanam etc. The words jnana and vijnana mean [respectively] 'knowledge' and 'action'. There remains nothing apart from these [two]. For, all the knowables are rooted in the knowledge and action.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

7.2 I will declare to you in full this knowledge having Me for its object, along with Vijnana or distinguishing knowledge. Vijnana is that knowledge of God in which His nature is distinguished form all things. I am distinguished from all things, animate and inanimate, as the only Being opposed to all that is evil and endowed with infinitely great manifestation of countless multiples of attributes of all kinds which are auspicious, unsurpassed and without limit. I will declare to you that knowledge which has My essence as its object. Why say much? I shall declare to you that knowledge knowing which nothing else remains to be known again in relation to Myself. Sri Krsna declares that this knowledge, which will now be taught, is difficult to attain:

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 7.2?

ज्ञानं ते तुभ्यम् अहं सविज्ञानं विज्ञानसहितं स्वानुभवयुक्तम् इदं वक्ष्यामि कथयिष्यामि अशेषतः कात्स्न्र्येन। तत् ज्ञानं विवक्षितं स्तौति श्रोतुः अभिमुखीकरणाय यत् ज्ञात्वा यत् ज्ञानं ज्ञात्वा न इह भूयः पुनः अन्यत् ज्ञातव्यं पुरुषार्थसाधनम् अवशिष्यते नावशिष्टं भवति। इति मत्तत्त्वज्ञो यः सः सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः। अतो विशिष्टफलत्वात् दुर्लभं ज्ञानम्।।कथमित्युच्यते

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 7.2, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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