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Sudarshana Chakra
Adhyay 7, Shlok 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

हे अर्जुना, बलवानांपैकी मी इच्छा आणि आसक्ती रहित शक्ती आहे आणि सर्व प्राण्यांमध्ये मी धर्मानुसार इच्छा आहे.

BengaliIND

হে অর্জুন, সবলদের মধ্যে আমিই কামনা ও আসক্তি বর্জিত শক্তি এবং সকল প্রাণীর মধ্যে আমিই ধর্মানুসারে বাসনা।

TamilIND

வலிமையானவர்களில், நான் ஆசை மற்றும் பற்றுதல் இல்லாத பலம், மேலும் எல்லா உயிரினங்களிலும், நான் தர்மத்தின்படி ஆசையாக இருக்கிறேன், ஓ அர்ஜுனா.

TeluguIND

బలవంతులలో, నేను కోరిక మరియు అనుబంధం లేని బలాన్ని, మరియు అన్ని జీవులలో, నేను ధర్మానికి అనుగుణంగా కోరికను, ఓ అర్జునా.

GujaratiIND

બળવાનમાંથી, હું ઈચ્છા અને આસક્તિથી રહિત શક્તિ છું અને હે અર્જુન, હું સર્વ જીવોમાં, ધર્મને અનુરૂપ ઈચ્છા છું.

KannadaIND

ಬಲಶಾಲಿಗಳಲ್ಲಿ, ನಾನು ಆಸೆ ಮತ್ತು ಬಾಂಧವ್ಯವಿಲ್ಲದ ಶಕ್ತಿಯಾಗಿದ್ದೇನೆ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳಲ್ಲಿ, ನಾನು ಧರ್ಮಕ್ಕೆ ಅನುಗುಣವಾಗಿ ಬಯಕೆಯಾಗಿದ್ದೇನೆ, ಓ ಅರ್ಜುನ.

MalayalamIND

ശക്തരിൽ, ഞാൻ ആഗ്രഹവും ബന്ധവുമില്ലാത്ത ശക്തിയാണ്, എല്ലാ ജീവികളിലും, ഹേ അർജ്ജുനാ, ഞാൻ ധർമ്മപ്രകാരമുള്ള ആഗ്രഹമാണ്.

SindhiIND

طاقتور مان، مان خواهش ۽ وابستگي کان خالي طاقت آهيان، ۽ سڀني جاندارن ۾، مان مذهب جي مطابق خواهش آهيان، اي ارجن.

PunjabiIND

ਬਲਵਾਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ, ਮੈਂ ਇੱਛਾ ਅਤੇ ਮੋਹ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਸ਼ਕਤੀ ਹਾਂ, ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ, ਮੈਂ ਧਰਮ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਇੱਛਾ ਹਾਂ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ।

NepaliIND

हे अर्जुन, बलवानहरूमध्ये म इच्छा र आसक्तिरहित शक्ति हुँ, र सबै प्राणीहरूमा म धर्म अनुसार कामना हुँ।

ManipuriIND

ꯃꯄꯥꯉ꯭ꯒꯜ ꯀꯅꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯒꯤ, ꯑꯩꯅꯥ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯄꯥꯉ꯭ꯒꯂꯅꯤ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯖꯤꯕ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛꯇꯥ ꯑꯩꯅꯥ ꯙꯔꯝꯃꯒꯤ ꯃꯇꯨꯡ ꯏꯟꯅꯥ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯑꯗꯨꯅꯤ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ |

BhojpuriIND

बलवान के हम काम आसक्ति से रहित बल हईं आ सब जीव में हम धर्म के अनुरूप काम हईं हे अर्जुन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्'--कठिन-से-कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना-आसक्तिरहित शुद्ध, निर्मल उत्साह रहता है। काम पूरा होनेपर भी 'मेरा कार्य शास्त्र और धर्मके अनुकूल है तथा लोकमर्यादाके अनुसार सन्तजनानुमोदित है'--ऐसे विचारसे मनमें एक उत्साह रहता है। इसका नाम 'बल' है। यह बल भगवान्का ही स्वरूप है। अतः यह 'बल' ग्राह्य है। गीतामें भगवान्ने खुद ही बलकी व्याख्या कर दी है। सत्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'कामरागबलान्विताः' पदमें आया बल कामना और आसक्तिसे युक्त होनेसे दुराग्रह और हठका वाचक है। अतः यह बल भगवान्का स्वरूप नहीं है, प्रत्युत आसुरी सम्पत्ति होनेसे त्याज्य है। ऐसे ही 'सिद्धोऽहं बलवान्सुखी' (गीता 16। 14) और 'अहंकारं बलं दर्पम्' (गीता 16। 18 18। 53) पदोंमें आया बल भी त्याज्य है। छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें 'बलवद्दृढम्' पदमें आया बल शब्द मनका विशेषण है। वह बल भी आसुरी सम्पत्तिका ही है; क्योंकि उसमें कामना और आसक्ति है। परन्तु यहाँ (7। 11 में) जो बल आया है, वह कामना और आसक्तिसे रहित है, इसलिये यह सात्त्विक उत्साहका वाचक है और ग्राह्य है। सत्रहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें 'आयुःसत्त्वबलारोग्य ৷৷.' पदमें आया बल शब्द भी इसी सात्त्विक बलका वाचक है। 'धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ'--हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध अर्थात् धर्मयुक्त 'काम' मेरा स्वरूप है। कारण कि शास्त्र और लोक-मर्यादाके अनुसार शुभ-भावसे केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये जो काम होता है, वह काम मनुष्यके अधीन होता है। परंतु आसक्ति कामना सुखभोग आदिके लिये जो काम होता है उस काममें मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके वशमें होकर वह न करनेलायक शास्त्रविरुद्ध काममें प्रवृत्त हो जाता है। शास्त्रविरुद्ध काम पतनका तथा सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका हेतु होता है। कृत्रिम उपायोंसे सन्तति-निरोध कराकर केवल भोग-बुद्धिसे काममें प्रवृत्त होना महान् नरकोंका दरवाजा है। जो सन्तानकी उत्पत्ति कर सके, वह 'पुरुष' कहलाता है और जो गर्भ धारण कर सके, वह 'स्त्री' कहलाती है । अगर पुरुष और स्त्री आपरेशनके द्वारा अपनी सन्तानोत्पत्ति करनेकी योग्यता-(पुरुषत्व और स्त्रीत्व-) को नष्ट कर देते हैं, वे दोनों ही हिजड़े कहलानेयोग्य हैं। नपुंसक होनेके कारण देवकार्य (हवन-पूजन आदि) और पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) में उनका अधिकार नहीं रहता । स्त्रीमें मातृशक्ति नष्ट हो जानेके कारण उसके लिये परम आदरणीय एवं प्रिय 'माँ' सम्बोधनका प्रयोग भी नहीं किया जा सकता। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह या तो शास्त्र और लोकमर्यादाके अनुसार केवल सन्तानोत्पत्तिके लिये कामका सेवन करे अथवा ब्रह्मचर्यका पालन करे।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

बलवानोंका जो कामना और आसक्तिसे रहित बल ओज सामर्थ्य है वह मैं हूँ। ( अभिप्राय यह कि ) अप्राप्त विषयोंकी जो तृष्णा है उसका नाम काम है और प्राप्त विषयोंमें जो प्रीतितन्मयता है उसका नाम राग है उन दोनोंसे रहित केवल देह आदिको धारण करनेके लिये जो बल है वह मैं हूँ। जो संसारी जीवोंका बल कामना और आसक्तिका कारण है वह मैं नहीं हूँ। तथा हे भरतश्रेष्ठ प्राणियोंमें जो धर्मसे अविरुद्ध शास्त्रानुकूल कामना है जैसे देहधारणमात्रके लिये खानेपीनेकी इच्छा आदि वह ( इच्छारूप) काम भी मैं ही हूँ।

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Sri Anandgiri

यच्च बलवतां बलं तद्भूते मयि तेषां प्रोतत्वमित्याह बलमिति। कामक्रोधादिपूर्वकस्यापि बलस्यानुमतिं वारयति तच्चेति। कामरागयोरेकार्थत्वमाशङ्क्यार्थभेदमावेदयति कामस्तृष्णेत्यादिना। विशेषणसामर्थ्यसिद्धं व्यावर्त्य दर्शयति नत्विति। शास्त्रार्थाविरुद्धकामभूते मयि तथाविधकामवतां भूतानां प्रोतत्वं विवक्षित्वाह कि़ञ्चेति। धर्माविरुद्धं काममुदाहरति यथेति।

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Sri Dhanpati

बलं सामर्थ्यमोजस्तस्मिन्कामरागविवर्जिते कामोऽप्राप्तेषु विषयेषु प्राप्त्यभिलाषः रागः प्राप्तेषु तेषु रज्जनात्मकः प्रेम्णोऽतिशयः। क्रोधार्थो वा रागशब्दो व्याख्येयः। अस्मिन्पक्षे लक्षणादोष इति बोध्यम्। तद्रहिते देहधारणमात्रप्रयोजने बलभूते मयि बलवन्तः प्रोताः। तथा धर्मेण शास्त्रविहितेनाविरुद्धे देहधारणार्थेऽशनपानादिविषये कामे तद्रूपे मयि कामवतां भूतानां प्रोतत्वम्। भरतर्षमेति संबोधयन् भरतैः क्षत्रियवरैः सेवितं युद्धात्मकधर्मस्य साधकं कामरागविवर्जितं क्षत्रधर्मेण युद्धेन देहधारणमात्रप्रयोजनकं मद्विभूत्यात्मकं बलं स्वधर्मेण शत्रून्विजित्य धर्माविरुद्धं अन्नपानादिविषयं कामं च मद्विभूतिरुपं भरतानां मध्ये श्रेष्टत्वं त्युक्तुं नार्हसीति सूचयति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
balamstrength
balavatām
chaand
ahamI
kāmadesire
rāgapassion
vivarjitamdevoid of
dharmaaviruddhaḥ
bhūteṣhuin all beings
kāmaḥsexual activity
asmi(I) am
bharataṛiṣhabha
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हे पृथानन्दन ! सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान। बुद्धिमानोंमें बुद्धि और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। — VaniSagar

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(और तो क्या कहूँ) जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझ से ही होते हैं -- ऐसा समझो। पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 7Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 7, Shlok 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 7 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 11 translates to: "Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment, and in all beings, I am the desire in accordance with Dharma, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 7, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Paramahamsa Vijnana Yoga में संकलित है। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam" mean in English?

"balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 7 Verse 11. Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment, and in all beings, I am the desire in accordance with Dharma, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.