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Adhyay 6, Shlok 6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्

जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है। — VaniSagar

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TeluguIND

నేనే అతనికి నేనే మిత్రుడు, ఎవరి ద్వారా నేనే జయించబడ్డాడో; కానీ జయించబడని వ్యక్తికి, ఈ నేనే బాహ్య శత్రువులా శత్రువు స్థానంలో నిలుస్తుంది.

NepaliIND

आत्मा उसको आत्मको मित्र हो जसद्वारा आत्मलाई जितेको छ; तर अपराजित आत्मको लागि, यो आत्म बाह्य शत्रु जस्तै शत्रुको स्थितिमा उभिएको छ।

BengaliIND

যার দ্বারা নফসকে জয় করা হয়েছে তিনিই তার নফসের বন্ধু; কিন্তু পরাজিত আত্মার কাছে, এই আত্মা বাইরের শত্রুর মতো শত্রুর অবস্থানে দাঁড়িয়ে আছে।

MalayalamIND

സ്വയം കീഴടക്കപ്പെട്ടവൻ്റെ ആത്മസുഹൃത്താണ്; എന്നാൽ കീഴടക്കപ്പെടാത്ത സ്വയം, ഈ ആത്മാവ് ഒരു ബാഹ്യ ശത്രുവിനെപ്പോലെ ഒരു ശത്രുവിൻ്റെ സ്ഥാനത്ത് നിൽക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਆਪਾ ਉਸ ਦੇ ਆਪੇ ਦਾ ਮਿੱਤਰ ਹੈ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਆਪੇ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ ਗਿਆ ਹੈ; ਪਰ ਜਿੱਤੇ ਹੋਏ ਆਤਮਾਂ ਲਈ, ਇਹ ਸਵੈ ਬਾਹਰੀ ਦੁਸ਼ਮਣ ਵਾਂਗ ਦੁਸ਼ਮਣ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਖੜ੍ਹਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಆತ್ಮವು ಅವನ ಆತ್ಮದ ಸ್ನೇಹಿತ; ಆದರೆ ಜಯಿಸದ ಆತ್ಮಕ್ಕೆ, ಈ ಆತ್ಮವು ಬಾಹ್ಯ ವೈರಿಯಂತೆ ಶತ್ರುವಿನ ಸ್ಥಾನದಲ್ಲಿ ನಿಲ್ಲುತ್ತದೆ.

DogriIND

आत्भ उवके आत्भ का ऩयभात्भा शै जजववे आत्भ ऩय जीत शो गमा शै ; पर अजेय आत्म गी एह् आत्म दुश्मन दी स्थिति च खड़ोते दा ऐ, बाहरले दुश्मन दी तर्ज पर।

KonkaniIND

ज्या मनशान आत्मो जिखला ताचो आत्मो इश्ट; पूण अविजयीत आत्म्याक हो आत्मो दुस्मानाच्या सुवातेर, भायल्या दुस्मानाभशेन उबो रावता.

MarathiIND

ज्याच्याद्वारे आत्मविश्वास प्राप्त झाला आहे, तो स्वतःचा मित्र आहे; परंतु अजिंक्य आत्म्यासाठी, हा आत्मा बाह्य शत्रूप्रमाणे शत्रूच्या स्थितीत उभा आहे.

GujaratiIND

જેના દ્વારા આત્મ પર વિજય મેળવ્યો છે તે તેના સ્વનો મિત્ર છે; પરંતુ અવિજયી સ્વ માટે, આ સ્વયં બાહ્ય શત્રુની જેમ દુશ્મનની સ્થિતિમાં ઉભો છે.

TamilIND

சுயம் யாரால் சுயம் வெல்லப்பட்டதோ அவனுடைய சுயத்தின் நண்பன்; ஆனால் வெல்லப்படாத சுயத்திற்கு, இந்த சுயம் ஒரு எதிரியின் நிலையில் நிற்கிறது, ஒரு வெளிப்புற எதிரியைப் போல.

OdiaIND

ସେଲ୍ଫ ହେଉଛି ତାଙ୍କ ଆତ୍ମର ବନ୍ଧୁ ଯାହାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେଲ୍ଫ ପରାଜିତ ହୋଇଛି; କିନ୍ତୁ ପରାଜିତ ଆତ୍ମ ପାଇଁ, ଏହି ଆତ୍ମ ବାହ୍ୟ ଶତ୍ରୁ ପରି ଶତ୍ରୁ ସ୍ଥିତିରେ ଛିଡା ହୋଇଛି |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः'--अपनेमें अपने सिवाय दूसरेकी सत्ता है ही नहीं। अतः जिसने अपनेमें अपने सिवाय दूसरे-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि-) की किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं रखी है अर्थात् असत् पदार्थोंके आश्रयका सर्वथा त्याग करके जो अपने सम स्वरूपमें स्थित हो गया ,है उसने अपने-आपको जीत लिया है। वह अपने-आपमें स्थित हो गया--इसकी क्या पहचान है? उसका अन्तःकरण समतामें स्थित हो जायगा; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है। उस ब्रह्मकी निर्दोषता और समता उसके अन्तःकरणपर आ जाती है। इससे पता लग जाता है कि वह ब्रह्ममें स्थित है (गीता 5। 19)। तात्पर्य यह निकला कि ब्रह्ममें स्थित होनेसे ही उसने अपने द्वारा अपने-आपपर विजय प्राप्त कर ली है। वास्तवमें ब्रह्ममें स्थिति तो नित्य-निरन्तर थी ही, केवल मन, बुद्धि आदिको अपना माननेसे ही उस स्थितिका अनुभव नहीं हो रहा था।संसारमें दूसरोंकी सहायताके बिना कोई भी किसीपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता और दूसरोंकी सहायता लेना ही स्वयंको पराजित करना है। इस दृष्टिसे स्वयं पहले पराजित होकर ही दूसरोंपर विजय प्राप्त करता है। जैसे, कोई अस्त्र-शस्त्रोंसे दूसरेको पराजित करता है, तो वह दूसरोंको पराजित करनेमें अपने लिये अस्त्र-शस्त्रोंकी आवश्यकता मानता है; अतः स्वयं अस्त्र-शस्त्रोंसे पराजित ही हुआ। कोई शास्त्रके द्वारा, बुद्धिके द्वारा शास्त्रार्थ करके दूसरोंपर विजय प्राप्त करता है, तो वह स्वयं पहले शास्त्र और बुद्धिसे पराजित होता ही है और होना ही पड़ेगा। तात्पर्य यह निकला कि जो किसी भी साधनसे जिस किसीपर भी विजय करता है, वह अपने-आपको ही पराजित करता है। स्वयं पराजित हुए बिना दूसरोंपर कभी कोई विजय कर ही नहीं सकता--यह नियम है। अतः जो अपने लिये दूसरोंकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं समझता, वही अपने-आपसे अपने-आपपर विजय प्राप्त करता है और वही स्वयं अपना बन्धु है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है यह बात कही गयी उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो ( आप ही ) अपना मित्र होता है और कौन ( आप ही ) अपना शत्रु होता है सो कहा जाता है उस जीवात्माका तो वही आप मित्र है कि जिसने स्वयमेव कार्यकरणके समुदाय शरीररूप आत्माको अपने वशमें कर लिया हो अर्थात् जो जितेन्द्रिय हो। जिसने ( कार्यकरणके संघात ) शरीररूप आत्माको अपने वशमें नहीं किया उसका वह आपही शत्रुकी भाँति शत्रुभावमें बर्तता है। अर्थात् जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करनेवाला होता है वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करनेमें लगा रहता है।

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Sri Anandgiri

उक्तमनूद्य प्रश्नपूर्वकं श्लोकान्तरमवतारयति आत्मैवेत्यादिना। एकस्यैवात्मनो मिथो विरुद्धं बन्धुत्वं रिपुत्वं च लक्षणभेदमन्तरेणायुक्तमिति चोदिते वशीकृतसंघातस्यात्मानं प्रति बन्धुत्वमितरस्य शत्रुत्वमित्यविरोधं दर्शयति बन्धुरित्यादिना। वशीकृतसंघातस्य विक्षेपाभावादात्मनि समाधानसंभवादुपपन्नमात्मानं प्रति बन्धुत्वमिति साधयति तस्येति। अवशीकृतसंघातस्य पुनर्विक्षेपोपपत्तेरात्मनि समाधानायोगादात्मानं प्रति शत्रुभावे प्रसिद्धशत्रुवदात्मैव शत्रुत्वेन वर्तेतेत्युत्तरार्धं व्याकरोति अनात्मन इति। दृष्टान्तं व्याचष्टे यथेति।उक्तदृष्टान्तवशादवशीकृतसंघातः स्वस्य हितानाचरणादात्मानं प्रति शत्रुरेवेति दार्ष्टान्तिकमाह तथेति।

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Sri Dhanpati

उभयत्रैवकारं प्रत्युञ्जनस्यायमाशयः यत्रापि देवदत्तस्य यज्ञदत्तो बन्धुरुच्यते यत्र वा चैत्रस्य मैत्रो वैरीत्युच्यते तत्रापि चैतन्यस्योपधीयमानस्य स्वतोऽपरिणामित्वान्न बन्धुतारिते। उपाधेः परमन्तःकरणस्यैव रागाख्ये परिणामे बन्धुता द्वेषाख्ये तस्मिन् अरितेति नान्यत्रैतौ धर्मौ संभवत इति बन्धुत्वं रिपुत्वं चान्तःकरणस्य स्पष्टयति बन्धुरिति। तस्यात्मनो जीवस्यात्मान्तःकरणं बन्धुर्भवति येन नियन्त्रा जीवेनान्तःकरणेनैव पूर्वोक्तसहायसहकृतेनात्मा शरीराख्यः सेन्द्रियो जितः स्वाधीनः संपादितः तस्यान्तःकरणं बन्धुरित्यर्थः। कदा पुनरन्तःकरणं रिपुस्तत्राह अनात्मनः पूर्वमात्मशब्देनोक्तस्य देहस्य यदा शत्रुत्वं वशत्वाभावस्तदात्मान्तःकरणमेव शत्रुवद्वर्तत इति ज्ञेयमित्यर्थ इतीतरकल्पितं तत्पुनः पुनरात्मशब्दप्रयोगस्वारस्यान्निरसनीयम्। अन्यथा आत्मशब्दस्य मुख्यामुख्यवृत्त्या बह्वर्थकत्वादन्यदपि किंचित्कल्पयितुं शक्यम्। तथाहि आत्मनेश्वरेणात्मानं जीवमुद्धरेत्। नात्मानमवसादयेत्। यत आत्मा ईश्वर एक जीवस्य बन्धुः स एव चैतस्य रिपुरित्यर्थः। ईश्वरस्यैव बन्धुत्वं रिपुत्वं च स्फुटयति। तस्य जीवस्यात्मेश्वरो बन्धुरुद्धारकः। येनात्मना भक्तियुक्तेन मनसा आत्मेश्वरो जितः वशीकृतः। अनात्मनस्त्ववशीकृतपरमेश्वरस्य त्वीश्वर एव शत्रुवत् शत्रुत्वेन वर्तेत। यद्वा आत्मना पुण्यलब्धेन मनुष्यदेहेनात्मानमुद्धरेत्। यतः आत्मैव देह एवात्मनो बन्धुः सएव जीवस्य रिपुः। देहस्य बन्धुत्वं रिपुत्वं च स्फुटयति। तस्यात्मनः आत्मा देहो बन्धुः येनात्मना विवेकयुक्तेन मनसा आत्मा देहो जितः। अनात्मनस्तु अजितदेहस्य तु शत्रुवत्। शत्रुत्वं देहएव वर्तत इत्यर्थः। अथवा आत्मना अखण्डाकारबुद्धिरुपेणात्मानमहंकारमुत् ऊर्ध्वं नयेत् देहात् प्रच्याव्य ब्रह्मण्यहंब्रह्मास्मीति योजयेत्। नात्मानमहंकारमवसादयेत् परिच्छिन्ने देहे तदभिमानेन पीडयेत्। यत आत्मैवाहंकारएव ब्रह्मणि नियोजितो बन्धुरात्मनो जीवस्य ब्रह्माभेदसंपादनेन बन्धनिवर्तकत्वात्। सएव परिच्छिन्ने देहे पीडितः शत्रुर्जन्ममरणाद्यनर्थनिचयसंपादकत्वात्। अहंकारस्यैव बन्धुत्वं निपुत्वं च विशदयति। तस्यात्मन आत्मा अहंकाररुपो बन्धुर्येनाहंकार एव आत्मनोक्तबुद्धिरुपेण जितः वशीकृत्य ब्रह्माकारतां नीतः। अनात्मनस्त्ववशीकृताहंकारस्य तु शत्रुवच्छत्रुत्वे वर्तत इत्यर्थः। सर्वथाप्यनासक्तेन संसारनिवृत्तिः संपाद्येत्यलं विस्तरेण। तस्मात्प्रकृतानुसारिभाष्योक्तव्याख्यानमेव शरणीकरणीयमिति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
bandhuḥfriend
ātmāthe mind
ātmanaḥfor the person
tasyaof him
yenaby whom
ātmāthe mind
evacertainly
ātmanāfor the person
jitaḥconquered
anātmanaḥof those with unconquered mind
tubut
śhatrutvefor an enemy
vartetaremains
ātmāthe mind
evaas
śhatruvat
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.5
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः

जिसने अपने-आपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्

जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6 translates to: "The Self is the friend of the self of him by whom the Self has been conquered; but to the unconquered self, this Self stands in the position of an enemy, like an external foe. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ" mean in English?

"bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6. The Self is the friend of the self of him by whom the Self has been conquered; but to the unconquered self, this Self stands in the position of an enemy, like an external foe. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.