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Sudarshana Chakra
Adhyay 6, Shlok 5
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

ஒருவன் தன்னைத்தானே உயர்த்திக் கொள்ள வேண்டும்; ஒருவர் தன்னைத் தாழ்த்திக் கொள்ள வேண்டாம்; ஏனெனில் சுயம் மட்டுமே ஒருவரின் சொந்த நண்பன், சுயமே ஒருவரின் சொந்த எதிரி.

TeluguIND

ఒక వ్యక్తి తనంతట తాను మాత్రమే పెంచుకోవాలి; ఒకడు తనను తాను తగ్గించుకోకూడదు; ఎందుకంటే స్వయం మాత్రమే ఒకరి స్వంత స్నేహితుడు, మరియు స్వయం మాత్రమే ఒకరికి స్వంత శత్రువు.

MarathiIND

एकट्याने स्वतःला स्वतःला वाढवले ​​पाहिजे; एखाद्याने स्वतःला कमी करू नये. कारण एकटाच स्वतःचा मित्र असतो आणि एकटाच स्वतःचा शत्रू असतो.

MalayalamIND

ഒരാള് സ്വയം ഉയര് ത്തിക്കൊണ്ടുവരണം; സ്വയം താഴ്ത്തരുത്; എന്തെന്നാൽ, സ്വയം ഒരുവൻ്റെ സ്വന്തം സുഹൃത്താണ്, അവൻ മാത്രം സ്വന്തം ശത്രുവാണ്.

NepaliIND

एकले आफैंले आफैंले आफैलाई उठाउनुपर्छ; कसैले आफूलाई तल नबनाओस्। किनकी एक्लो स्वयम् नै आफ्नो मित्र हो, र एक्लो स्वयम् नै आफ्नो शत्रु हो।

KannadaIND

ಒಬ್ಬನು ತನ್ನನ್ನು ತಾನೇ ಬೆಳೆಸಿಕೊಳ್ಳಬೇಕು; ಒಬ್ಬನು ತನ್ನನ್ನು ತಾನು ತಗ್ಗಿಸಿಕೊಳ್ಳಬಾರದು; ಯಾಕಂದರೆ ಸ್ವಯಂ ಮಾತ್ರ ಒಬ್ಬರ ಸ್ವಂತ ಸ್ನೇಹಿತ, ಮತ್ತು ಸ್ವಯಂ ಮಾತ್ರ ಒಬ್ಬರ ಸ್ವಂತ ಶತ್ರು.

SindhiIND

پاڻ کي اڪيلائيءَ ۾ اٿارڻ گهرجي. ڪنهن کي به پاڻ کي هيٺ نه رکڻ ڏيو. ڇاڪاڻ ته اڪيلو پنهنجو پاڻ جو دوست آهي، ۽ اڪيلو پنهنجو دشمن آهي.

PunjabiIND

ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਇਕੱਲੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਉੱਚਾ ਚੁੱਕਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ; ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਨੀਵਾਂ ਨਾ ਕਰਨ ਦਿਓ; ਕਿਉਂਕਿ ਇਕੱਲਾ ਆਪ ਹੀ ਆਪਣਾ ਮਿੱਤਰ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਕੱਲਾ ਆਪ ਹੀ ਆਪਣਾ ਦੁਸ਼ਮਣ ਹੈ।

GujaratiIND

વ્યક્તિએ પોતાની જાતને એકલા પોતાના દ્વારા ઉછેરવી જોઈએ; કોઈએ પોતાને નીચું ન થવા દો; કારણ કે એકલો સ્વ જ પોતાનો મિત્ર છે, અને એકલો સ્વ જ પોતાનો દુશ્મન છે.

BengaliIND

একা একা নিজের দ্বারা নিজেকে বড় করা উচিত; কেউ যেন নিজেকে নিচু করে না দেয়; কারণ একা নফসই নিজের বন্ধু, আর একা নফসই নিজের শত্রু।

OdiaIND

ଜଣେ ନିଜକୁ ନିଜେ ବ raise ାଇବା ଉଚିତ୍; ଜଣେ ନିଜକୁ ନିମ୍ନମାନର କର ନାହିଁ। କାରଣ ନିଜେ କେବଳ ନିଜର ବନ୍ଧୁ, ଏବଂ ଆତ୍ମ କେବଳ ନିଜର ଶତ୍ରୁ |

MizoIND

Mi pakhat chu mahni chauhvin a insiamthat tur a ni; tumahin mahni inngaitlawm suh se; mahni chauh chu mahni ṭhian a ni si a, mahni chauh chu mahni hmelma a ni si a.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'उद्धरेदात्मनात्मानम्'--अपने-आपसे अपना उद्धार करे--इसका तात्पर्य है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिसे अपने-आपको ऊँचा उठाये। अपने स्वरूपसे जो एकदेशीय 'मैं'-पन दीखता है, उससे भी अपनेको ऊँचा उठाये। कारण कि शरीर, इन्द्रियाँ आदि और 'मैं'-पन--ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं; अपना स्वरूप नहीं है। जो अपना स्वरूप नहीं है, उससे अपनेको ऊँचा उठाये।अपना स्वरूप परमात्माके साथ एक है और शरीर, इन्द्रियाँ आदि तथा 'मैं'-पन प्रकृतिके साथ एक है। अगर यह अपना उद्धार करनेमें, अपनेको ऊँचा उठानेमें शरीर इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिकी सहायता मानेगा, इनका सहारा लेगा तो फिर जडताका त्याग कैसे होगा? क्योंकि जड वस्तुओंसे सम्बन्ध मानना, उनकीआवश्यकता समझना उनका सहारा लेना ही खास बन्धन है। जो अपने हैं, अपनेमें हैं, अभी हैं और यहाँ हैं, ऐसे परमात्माकी प्राप्तिके लिये शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिकी आवश्यकता नहीं है। कारण कि असत्के द्वारा सत्की प्राप्ति नहीं होती, प्रत्युत असत्के त्यागसे सत्की प्राप्ति होती है।दूसरा भाव, अभी पूर्वश्लोकमें आया है कि प्राकृत पदार्थ, क्रिया और संकल्पमें आसक्त न हो, उनमें फँसे नहीं, प्रत्युत उनसे अपने-आपको ऊपर उठाये। यह सबका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पदार्थ, क्रिया और संकल्पका आरम्भ तथा अन्त होता है, उनका संयोग तथा वियोग होता है, पर अपने (स्वयंके) अभावका और परिवर्तनका अनुभव किसीको नहीं होता। स्वयं सदा एकरूप रहता है। अतः उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ आदिमें न फँसना, उनके अधीन न होना, उनसे निर्लिप्त रहना ही अपना उद्धार करना है। मनुष्यमात्रमें एक ऐसी विचारशक्ति है, जिसको काममें लानेसे वह अपना उद्धार कर सकता है। 'ज्ञानयोग'का साधक उस विचारशक्तिसे जड-चेतनका अलगाव करके चेतन (अपने स्वरूप) में स्थित हो जाता है और जड (शरीर-संसार) से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है। 'भक्तियोग' का साधक उसी विचारशक्तिसे 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस प्रकार भगवान्से आत्मीयता करके अपना उद्धार कर लेता है। 'कर्मयोग' का साधक उसी विचारशक्तिसे मिले हुए शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि पदार्थोंको संसारका ही मानते हुए संसारकी सेवामें लगाकर उन पदार्थोंमें सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है और अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। इस दृष्टिसे मनुष्य अपनी विचारशक्तिको काममें लेकर किसी भी योग-मार्गसे अपना कल्याण कर सकता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जब मनुष्य इस प्रकार योगारूढ़ हो जाता है तब वह अनर्थोंके समूह इस संसारसमुद्रसे स्वयं अपना उद्धार कर लेता है इसलिये संसारसागरमें डूबे पड़े हुए अपनेआपको उस संसारसमुद्रसे आत्मबलके द्वारा ऊँचा उठा लेना चाहिये अर्थात् योगारूढ़ अवस्थाको प्राप्त कर लेना चाहिये। अपना अधःपतन नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको नीचे नहीं गिरने देना चाहिये। क्योंकि यह आप ही अपना बन्धु है। दूसरा कोई ( ऐसा ) बन्धु नहीं है जो संसारसे मुक्त करनेवाला हो। प्रेमादि भाव बन्धनके स्थान होनेके कारण सांसारिक बन्धु भी ( वास्तवमें ) मोक्षमार्गका तो विरोधी ही होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक यह कहना ठीक ही है कि आप ही अपना बन्धु है। तथा आप ही अपना शत्रु है। जो कोई दूसरा अनिष्ट करनेवाला बाह्य शत्रु है वह भी अपना ही बनाया हुआ होता है इसलिये आप ही अपना शत्रु है इस प्रकार केवल अपनेको ही शत्रु बतलाना भी ठीक ही है।

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Sri Anandgiri

योगारूढस्य किं स्यादित्याशङ्क्याह यदैवमिति। योगारोहस्य दृष्टादृष्टोपायैरवश्यकर्तव्यतायै मुक्तिहेतुत्वं तद्विपर्ययस्याधःपतनहेतुत्वं च दर्शयति अत इति। तत्र हेतुमाह आत्मैव हीति। उद्धरणापेक्षामात्मनः सूचयति संसारेति। संसारादूर्ध्वं हरणं कीदृगित्याशङ्क्याह योगारूढतामिति। योगप्राप्तावनास्था तु न कर्तव्येत्याह नात्मानमिति। योगप्राप्त्युपायश्चेन्नानुष्ठीयते तदा योगाभावे संसारपरिहारासंभवादात्माधो नीतः स्यादित्यर्थः। नन्वात्मानं संसारे निमग्नं तदीयो बन्धुस्तस्मादुद्धरिष्यति नेत्याह आत्मैव हीति। कुतोऽवधारणमन्यस्यापि प्रसिद्धस्य बन्धोः संभवात्तत्राह नहीति। अन्यो बन्धुः सन्नपि संसारमुक्तये न भवतीत्येतदुपपादयति बन्धुरपीति। स्नेहादीत्यादिशब्दात्तदनुगुणप्रवृत्तिविषयत्वं गृह्यते। आत्मातिरिक्तस्यापि शत्रोरपकारिणः सुप्रसिद्धत्वादवधारणमनुचितमित्याशङ्क्याह योऽन्य इति।

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Sri Dhanpati

यदैवं योगारुढस्तदा तेनात्मना त्माद्धृतो भवति संसारानर्थसमूहात् अतः संसारार्णवे निमग्नमात्मानमात्मनोद्धरेत् तत ऊर्ध्वं नयेद्योगारुढतामापादयेत्। आत्मनं नावसादयेन्नाधो नयेत्। हि यस्मादात्मैव बन्धुः संसारान्मोचको नान्यः कश्चन पुत्रादिः प्रत्युत मोक्षं प्रति प्रतिकूलएव स्नेहादिबन्धनायतनत्वात्।बन्धवो दृढबन्धन मित्युक्तत्वात् तथात्मैवात्मनो रिपुः नान्यो बाह्योऽपकारी। तस्यात्मप्रयुक्तत्वात्। तस्माद्युक्तमेवोभयत्रावधारणम्। आत्मैव बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन इत्युक्तं तत्र किंलक्षण आत्मात्मनो बन्धुरात्मात्मनो रिपुश्चेति तत्राह बन्धुरिति। तस्यात्मनः स आत्मा बन्धुः येनात्मना आत्मैव कार्यकरणसंघात एव जितः वशीकृतः श्रेयोऽभिमुखः जितेन्द्रिय इत्यर्थः। अनात्मनः अजितात्मनस्त्वजितकार्यकरणसंघातस्यात्मैव स्वयमेव शत्रुत्वे शत्रुभावे वर्तेत शत्रुवत्। यथात्मेतर आत्मनोपकारी तथात्मात्मनोपकारे वर्तेतेत्यर्थः। तथा चैतदनुरोधात्पुनःपुनरात्मशब्दस्वारस्याच्चोद्धरेदात्मनात्मानमित्यत्रापि स्वं स्वेनैवोद्धरेत्। हि यस्मात्स्वयमेव स्वस्य बन्धुः स्वयमेव स्वस्य शत्रुरित्यर्थः। एतेनात्मना विवेकयुक्तेन मनसा आत्मानं स्वं जीवं आत्मैव विवेकयुक्तं मनएवात्मनः स्वस्य बन्धुः येनात्मैवात्मना विवेकयुक्तेन मनसा जितो नतु शास्त्रादिनेति प्रत्युक्तम्। यत्तु नन्विन्द्रियार्थेष्वनासक्तौ तस्य सर्वसंकल्पसंन्यासिनः किं प्रयोजनं तत्राह उद्धरेदिति। अत्रोत्तरार्धस्थमात्मेतिपदं पूर्वार्धेऽनुषञ्जनीयम्। तथाचायं संबन्धः आत्मा पूर्वपूर्वापरिमितजन्मोपार्जितपुण्यपुञ्जपूर्णमन्तःकरणं कर्तृ आत्मानं प्रत्यञ्चं कर्म अन्तःकरणापरपर्यायजडाशयनिमग्नतया सकलानर्थभाजनतां गतं आत्मना विवेकवैराग्यादिसंपन्नेनोद्धरेदुक्तजडाशयात्पृथक् कुर्यात् न स्वधर्मैः कर्तृत्वादिभिस्तिरस्कुर्यात्। यत आत्मानं स्वस्य स्वधर्माणां च सत्तायाः प्रत्यगधीनत्वात् स्वजीवनभूतम् तथा चेदृशमुपकारं कुर्वत उद्धरणं तिरस्काराकरणं चोचितमेव। एवंच यदीन्द्रियार्थेषु सक्तः स्यात्तर्हि हविषा कृष्णवर्त्मेवेत्यादिन्यायेन कामानुपरमात् तत्क्रोधाद्युपस्थितौ न कदाचित्प्रतीचः संसारादुद्धारः स्यादिति युक्तएवेन्द्रियार्थेष्वनासक्त इत्याकूतम्। यद्वा आत्मा प्रत्यगात्मान्तर्यामी आत्मना विवेकादिसंपन्नेनान्तःकरणेन कर्तृत्वाद्यभिमानकलुषमन्तःकरणं उद्धरेत् कण्टकेनेव कण्टकं दूरेणोत्सादयेत्। कुतएवं कर्तव्यमत आह नात्मानमवसादयेदिति। आत्मानं प्रत्यग्रूपं स्वं नावसादयेत् न विशीर्ण परमात्मनो विभक्तरुपं कुर्यादित्यर्थः। ननु तदेवमेकमन्तःकरणमात्मन उपकारकमपकारकं च कथं भवतीत्याशङ्क्य स्वभावसहकारिवशात् विषस्येव मरणजीवनहेतुतया भेदं पुनरुक्तात्मपदप्रयोगात्सूचयन्नाह। आत्मैवान्तःकरणमेव विवेकादिसंपन्नं आत्मनो जीवस्य बन्धुः बन्धध्वंसहेतुः तथा विवेकाद्यसंपन्नमन्तःकरणमेव आत्मनः स्वभावज्जीवस्य सर्वानर्थात्मकबन्धनहेतुत्वादित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
uddharetelevate
ātmanāthrough the mind
ātmānamthe self
nanot
ātmānamthe self
avasādayetdegrade
ātmāthe mind
evacertainly
hiindeed
ātmanaḥof the self
bandhuḥfriend
ātmāthe mind
evacertainly
ripuḥenemy
ātmanaḥof the self
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 6.4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते

जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 6.6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्

जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 6Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 6, Shlok 5
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5 translates to: "One should raise oneself by one's own self alone; let not one lower oneself; for the self alone is one's own friend, and the self alone is one's own enemy. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet" mean in English?

"uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5. One should raise oneself by one's own self alone; let not one lower oneself; for the self alone is one's own friend, and the self alone is one's own enemy. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.