Bhagavad Gita 6.1 — Commentary
19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
श्री भगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः
śhrī bhagavān uvācha anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
"He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions—he is a sannyasi and a yogi, not he who is without fire and without action."
Scholar Commentaries (19)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
अनाश्रितः न आश्रितः अनाश्रितः। किम् कर्मफलं कर्मणां फलं कर्मफलं यत् तदनाश्रितः कर्मफलतृष्णारहित इत्यर्थः। यो हि कर्मफले तृष्णावान् सः कर्मफलमाश्रितो भवति अयं तु तद्विपरीतः अतः अनाश्रितः कर्मफलम्। एवंभूतः सन् कार्यं कर्तव्यंनित्यं काम्यविपरीतम् अग्निहोत्रादिकं कर्म करोति निर्वर्तयति यः कश्चित् ईदृशः कर्मी स कर्म्यन्तरेभ्यो विशिष्यते इत्येवमर्थमाह स संन्यासी च योगी च इति। संन्यासः परित्यागः स यस्यास्ति स संन्यासी च योगी च योगः चित्तसमाधानं स यस्यास्ति स योगी च इति एवंगुणसंपन्नः अयं मन्तव्यः न केवलं निरग्निः अक्रिय एव संन्यासी योगी च इति मन्तव्यः। निर्गताः अग्नयः कर्माङ्गभूताः यस्मात् स निरग्निः अक्रियश्च अनग्निसाधना अपि अविद्यमानाः क्रियाः तपोदानादिकाः यस्य असौ अक्रियः।।ननु च निरग्नेः अक्रियस्यैव श्रुतिस्मृतियोगशास्त्रेषु संन्यासित्वं योगित्वं च प्रसिद्धम्। कथम् इह साग्नेः सक्रियस्य च संन्यासित्वं योगित्वं च अप्रसिद्धमुच्यते इति। नैष दोषः कयाचित् गुणवृत्त्या उभयस्य संपिपादयिषितत्वात्। तत् कथम् कर्मफलसंकल्पसंन्यासात् संन्यासित्वम् योगाङ्गत्वेन च कर्मानुष्ठानात् कर्मफलसंकल्पस्य च चित्तविक्षेपहेतोः परित्यागात् योगित्वं च इति गौणमुभयम् न पुनः मुख्यं संन्यासित्वं योगित्वं च अभिप्रेतमित्येतमर्थँ दर्शयितुमाह
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
श्रीभगवानुवाच कर्मफल स्वर्गादिकम् अनाश्रितः कार्यं कर्मानुष्ठानमेव कार्यं सर्वात्मनास्मत्सुहृद्भूतपरमपुरुषाराधनरूपतया कर्मैव मम प्रयोजनं न तत्साध्यं किञ्चिद् इति यः कर्म करोति स संन्यासी च ज्ञानयोगनिष्ठश्च योगी च कर्मयोगनिष्ठश्च। आत्मावलोकनरूपयोगसाधनभूतोभयनिष्ठ इत्यर्थः। न निरग्निचाक्रियः न चोदितयज्ञादिकर्मसु अप्रवृत्तः केवलज्ञाननिष्ठः तस्य हि ज्ञाननिष्ठा एव कर्मयोगनिष्ठस्य तु उभयम् अस्ति इति अभिप्रायः।उक्तलक्षणे कर्मयोगे ज्ञानम् अपि अस्ति इत्याह
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
ँ़ ज्ञानान्तरङ्गं समाधियोगमाद्वानेनाध्यायेन। विवक्षितं सन्न्यासमाह योगेन सह अनाश्रित इति। चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्तादैवमेव 4।25 इत्यादौ।अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता इति च। तस्मान्निरग्निरक्रियः सन्न्यासी योगी च न भवत्येव।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
प्रथम अध्याय में अर्जुन का विचार युद्धभूमि से पलायन करके संन्यास जीवन व्यतीत करने का था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि निस्वार्थ भाव से कर्म करने वाला कर्मयोगी पुरुष ही सबसे बड़ा संन्यासी है। स्वार्थ का त्याग किये बिना कर्म का आचरण अथवा उससे पलायन करने का अर्थ है विश्व के सामंजस्य में अनर्थकारी हस्तक्षेप करना।मन की अपरिपक्व स्थिति में जीवन संघर्ष से पलायन करके गंगा के किनारे शान्त वातावरण में ध्यानाभ्यास के लिए जाने से सामान्य स्तर के अच्छे मनुष्य का भी गंगा में पड़े पाषाण के स्तर तक पतन होगा इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के इस त्रुटिपूर्ण विचार की मानो हंसी उड़ाते हैं। परन्तु भगवान् के व्यंग्य में किसी प्रकार की कटुता नहीं है। हम आगे देखेंगे कि अर्जुन को स्वयं भी अपनी गलत धारणा पर हंसी आती है।निदिध्यासन की सफलता के लिए आन्तरिक शक्तियों का विकास तथा उनका सही दिशा में उचित उपयोग करना भी अत्यन्त आवश्यक है। भगवान् ने इस अध्याय में हमारे मन के उद्देश्यों तथा भावनाओं मंे परिवर्तन लाने के लिए विशेष बल दिया है। इसके द्वारा हम आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश कर सकते हैं।
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
6.1 अनाश्रितः not depending (on)? कर्मफलम् fruit of action? कार्यम् bounden? कर्म duty? करोति performs? यः who? सः he? संन्यासी Sannyasi (ascetic)? च and? योगी Yogi? च and? न not? निरग्निः without fire? न not? च and? अक्रियः without action.Commentary Actions such as Agnihotra? etc.? performed without the expectation of their fruits purify the mind and become the means to Dhyana Yoga or the Yoga of Meditation.Karyam Karma bounden duty.Niragnih without fire. He who has renounced the daily rituals like Agnihotra? which are performed with the help of fire.Akriya without action. He who has renounced austerities and other meritorious acts like building resthouses? charitable dispensaries? digging wells? feeding the poor? etc.Sannyasi he who has renounced the fruits of his actions.Yogi he who has a steady mind. These two terms are applied to him in a secondary sense only. They are not used to denote that he is in reality a Sannyasi and a Yogi.The Sannyasi performs neither Agnihotra nor other ceremonies. But simply to omit these without genuine renunciation will not make one a real Sannyasi. (Cf.V.3)
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या--अनाश्रितः कर्मफलम् इन पदोंका आशय यह प्रतीत होता है कि मनुष्यको किसी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिका आश्रय नहीं रखना चाहिये। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश होनेसे नित्य-निरन्तर रहनेवाला है और यह जिन वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय लेता है, वे उत्पत्ति-विनाशशील तथा प्रतिक्षण परिवर्तित होनेवाले हैं। वे तो परिवर्तनशील होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं और यह (जीव) रीता-का-रीता रह जाता है। केवल रीता ही नहीं रहता, प्रत्युत उनके रागको पकड़े रहता है। जबतक यह उनके रागको पकड़े रहता है, तबतक इसका कल्याण नहीं होता अर्थात् वह राग उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाता है (गीता 13। 21)। अगर यह उस रागका त्याग कर दे तो यह स्वतः मुक्त हो जायगा। वास्तवमें यह स्वतः मुक्त है ही, केवल रागके कारण उस मुक्तिका अनुभव नहीं होता। अतः भगवान् कहते हैं कि मनुष्य कर्मफलका आश्रय न रखकर कर्तव्य-कर्म करे। कर्मफलके आश्रयका त्याग करनेवाला तो नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है, पर कर्मफलका आश्रय रखनेवाला बँध जाता है (गीता 5। 12)।स्थूल, सूक्ष्म और कारण--ये तीनों शरीर 'कर्मफल' हैं। इन तीनोंमेंसे किसीका भी आश्रय न लेकर इनको सबके हितमें लगाना चाहिये। जैसे, स्थूलशरीरसे क्रियाओँ और पदार्थोंको संसारका ही मानकर उनका उपयोग संसारकी सेवा-(हित-) में करे, सूक्ष्मशरीरसे दूसरोंका हित कैसे हो, सब सुखी कैसे हों, सबका उद्धार कैसे हो--ऐसा चिन्तन करे; और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता-(समाधि-) का भी फल संसारके हितके लिये अर्पण करे। कारण कि ये तीनों शरीर अपने (व्यक्तिगत) नहीं हैं और अपने लिये भी नहीं हैं, प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही हैं। इन तीनोंकी संसारके साथ अभिन्नता और अपने स्वरूपके साथ भिन्नता है। इस तरह इन तीनोंका आश्रय न लेना ही 'कर्मफलका' आश्रय न लेना' है और इन तीनोंसे केवल संसारके हितके लिये कर्म करना ही 'कर्तव्य-कर्म करना' है।आश्रय न लेनेका तात्पर्य हुआ कि साधनरूपसे तो शरीरादिको दूसरोंके हितके लिये काममें लेना है, पर स्वयं उनका आश्रय नहीं लेना है अर्थात् उनको अपना और अपने लिये नहीं मानना है। कारण कि मनुष्य-जन्ममें शरीर आदिका महत्त्व नहीं है ,प्रत्युत शरीर आदिके द्वारा किये जानेवाले साधनका महत्त्व है। अतः संसारसे मिली हुई चीज संसारको दे दें, संसारकी सेवामें लगा दें तो हम 'संन्यासी' हो गये और मिली हुई चीजमें अपनापन छोड़ दें तो हम 'त्यागी' हो गये।कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करनेसे क्या होगा? अपने लिये कर्म न करनेसे नयी आसक्ति तो बनेगी नहीं और केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुरानी आसक्ति मिट जायगी तथा कर्म करनेका वेग भी मिट जायगा। इस प्रकार आसक्तिके सर्वथा मिटनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओँको पकड़नेका नाम बन्धन है और उनसे छूटनेका नाम मुक्ति है। उन उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे छूटनेका उपाय है--उनका आश्रय न लेना अर्थात् उनके साथ ममता न करना और अपने जीवनको उनके आश्रित न मानना।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
इसी भावसे वह संन्यासी और योगी है इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है भगवान् श्रीकृष्ण बोले जिसने आश्रय नहीं लिया हो वह अनाश्रित है किसका कर्मफलका अर्थात् जो कर्मोंके फलका आश्रय न लेनेवाला कर्मफलकी तृष्णासे रहित है। क्योंकि जो कर्मफलकी तृष्णावाला होता है वही कर्मफलका आश्रय लेता है यह उससे विपरीत है इसलिये कर्मफलका आश्रय न लेनेवाला है। ऐसा ( कर्मफलके आश्रयसे रहित ) होकर जो पुरुष कर्तव्यकर्मोंको अर्थात् काम्यकर्मोंसे विपरीत नित्य अग्निहोत्रादि कर्मोंको पूरा करता है ऐसा जो कोई कर्मी है वह दूसरे कर्मियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है इसी अभिप्रायसे यह कहा है कि वह संन्यासी भी है और योगी भी है। संन्यास नाम त्यागका है वह जिसमें हो वही संन्यासी है और चित्तके समाधानका नाम योग है वह जिसमें हो वही योगी है अतः वह कर्मयोगी भी इन गुणोंसे सम्पन्न माना जाना चाहिये। केवल अग्निरहित और क्रियारहित पुरुष ही संन्यासी और योगी है ऐसा नहीं मानना चाहिये। कर्मोंके अङ्गभूत गार्हपत्यादि अग्नि जिससे छूट गये हैं वह निरग्नि है और बिना अग्निके होनेवाली तपदानादि क्रिया भी जो नहीं करता वह अक्रिय है। पू0 जब कि निरग्नि और अक्रिय पुरुषके लिये ही श्रुति स्मृति और योगशास्त्रोंमें संन्यासित्व और योगित्व प्रसिद्ध है तब यहाँ अग्नियुक्त और क्रियायुक्त पुरुषके लिये अप्रसिद्ध संन्यासित्व और योगित्वका प्रतिपादन कैसे किया जाता है उ0 यह दोष नहीं है क्योंकि किसी एक गुणवृत्तिसे ( किसी एक गुणविशेषको लेकर ) संन्यासित्व और योगित्व इन दोनों भावोंको उसमें ( गृहस्थमें ) सम्पादन करना भगवान्को इष्ट है। पू0 वह कैसे उ0 कर्मफलके संकल्पोंका त्याग होनेसे संन्यासित्व है और योगके अङ्गरूपसे कर्मोंका अनुष्ठान होनेसे या चित्तविक्षेपके कारणरूप कर्मफलके संकल्पोंका परित्याग होनेसे योगित्व है इस प्रकार दोनों भाव ही गौणरूपसे माने गये हैं।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
ध्यानयोगप्रस्तावानन्तरं तद्योग्यताहेतुकर्मणः स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह श्रीभगवानिति। पूर्वोत्तराध्याययोः सङ्गतिमभिदधानो वृत्तमनूद्याध्यायान्तरमवतारयति अतीतेति। सम्यग्दर्शनप्रकरणे ध्यानयोगस्य प्रसङ्गाभावं व्युदस्यति सम्यगिति। संग्रहविवरणयोरतीतानन्तराध्याययोर्युक्तं हेतुहेतुमत्त्वमिति भावः। अध्यायसंबन्धमभिधायानाश्रितः कर्मफलमित्यादिश्लोकद्वयस्य तात्पर्यमाह तत्रेति। कर्मयोगस्य संन्यासहेतोर्मर्यादां दर्शयितुं साङ्गं च योगं विचारयितुमध्याये प्रवृत्ते सतीति सप्तम्यर्थः। संन्यासिना कर्तव्यं कर्मेत्येवं प्रतिभासं व्युदस्यति गृहस्थेनेति। कर्तव्यत्वं स्तुतियोग्यत्वमतःशब्दार्थः। समुच्चयवादी सीमाकरणमाक्षिपति नन्विति। यावज्जीवश्रुतिवशाद्ध्यानारोहणसामर्थ्ये सत्यपि कर्मानुष्ठानस्य दुर्वारत्वादिति हेतुमाह यावतेति। भार्यावियोगादिप्रतिबन्धाद्यावज्जीवश्रुतिचोदितकर्माननुष्ठानवद्वैराग्यप्रतिबन्धादपि तदननुष्ठानसंभवाद्भगवतो विशेषवचनाच्च न यावज्जीवं कर्मानुष्ठानप्रसक्तिरिति परिहरति नारुरुक्षोरिति। उक्तमेवार्थं व्यतिरेकद्वारेण विवृणोति आरुरुक्षोरित्यादिना। आरोढुमिच्छतीत्यारुरुक्षुरित्यत्रारोहणेच्छाविशेषणमारोहणं कृतवानित्यारूढ इत्यत्र पुनरिच्छाविषयभूतमारोहणं विशेषणमेवं शमकर्मविषययोर्भेदेन विशेषणं मर्यादाकरणानङ्गीकरणे विरुद्धमापद्येत तयोरेवं विभागकरणं च भागवतसीमानङ्गीकारे न युज्येतेत्यर्थः। विशेषणविभागकारणयोरन्यथोपपत्तिमाशङ्कते तत्रेति। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। षष्ठी निर्धारणे। भवत्वधिकारिणां त्रैविध्यं तथापि प्रकृते विशेषणादौ किमायातमित्याशङ्क्य तृतीयापेक्षया तदुपपत्तिरित्याह तानपेक्ष्येति। आरुरुक्षोरारूढस्य च भेदे तस्यैवेति प्रकृतपरामर्शानुपपत्तिरिति दूषयति न तस्येति। यद्यनारुरुक्षुं पुरुषमपेक्ष्यारुरुक्षोरिति विशेषणं तस्य च कर्मारोहणकारणमनारूढं च पुरुषमपेक्ष्यारूढस्येति विशेषणं तस्य च शमः संन्यासो योगफलप्राप्तौ कारणमिति विशेषणविभागकरणयोरुपपत्तिस्तदारुरुक्षोरारूढस्य च भिन्नत्वात्प्रकृतपरामर्शिनस्तच्छब्दस्यानुपपत्तेर्न युक्तमित्थं विशेषणाद्युपपादनमित्यर्थः। किञ्चयोगमारुरुक्षोस्तदारोहणे कारणं कर्मेत्युक्त्वा पुनर्योगारूढस्येति योगशब्दप्रयोगाद्यो योगं पूर्वमारुरुक्षुरासीत्तस्यैवापेक्षितं योगमारूढस्य तत्फलप्राप्तौ कर्मसंन्यासः शमशब्दवाच्यो हेतुत्वेन कर्तव्य इति वचनादारुरुक्षोरारूढस्य चाभिन्नत्वप्रत्यभिज्ञानान्न तयोर्भिन्नत्वं शङ्कितुं शक्यमित्याह पुनरिति। यत्तु यावज्जीवश्रुतिविरोधाद्योगारोहणसीमाकरणं कर्मणोऽनुचितमिति तत्राह अत इति। पूर्वोक्तरीत्या कर्मतत्त्यागयोर्विभागोपपत्तौ श्रुतेरन्यविषयत्वाद्योगमारूढस्य मुमुक्षोर्जिज्ञासमानस्य नित्यनैमित्तिककर्मस्वपि परित्यागसिद्धिरित्यर्थः। इतश्च यावज्जीवं कर्म कर्तव्यं न भवतीत्याह योगेति। संन्यासिनो योगभ्रष्टस्य विनाशशङ्कावचनान्न यावज्जीवं कर्म कर्तव्यं प्रतिभातीत्यर्थः। ननु योगभ्रष्टशब्देन गृहस्थस्यैवाभिधानात्तस्यैवास्मिन्नध्याये योगविधानाद्योगारोहणयोग्यत्वे सत्यपि यावज्जीवं कर्म कर्तव्यमिति नेत्याह गृहस्थस्येति। तेनापि मुमुक्षुणा कृतस्य कर्मणो मोक्षातिरिक्तफलानारम्भकत्वाद्योगभ्रष्टोऽसौ छिन्नाभ्रमिव नश्यतीति शङ्का सावकाशेत्याशङ्क्याह अवश्यं हीति। अपौरुषेयान्निर्दोषाद्वेदात्फलदायिनी कर्मणः स्वाभाविकी शक्तिरवगता ब्रह्मभावस्य च स्वतःसिद्धत्वान्न कर्मफलवत्त्वमतो मोक्षातिरिक्तस्यैव फलस्य कर्मारम्भकमिति कर्मिणि योगभ्रष्टेऽपि कर्मगतिं गच्छतीति निरवकाशा शङ्केत्यर्थः। ननु मुमुक्षुणाकाम्यप्रतिषिद्धयोरकरणात्कृतयोश्च नित्यनैमित्तिकयोरफलत्वात्कथं तदीयस्य कर्मणो नियमेन फलारम्भकत्वं तत्राह नित्यस्य चेति। चकारेण नैमित्तिकं कर्मानुकृष्यते। वेदप्रमाणकत्वेऽपि नित्यनैमित्तिकयोरफलत्वे दोषमाह अन्यथेति। कर्मणोऽनुष्ठितस्य फलारम्भकत्वध्रौव्याद्गृहस्थो योगभ्रष्टोऽपि कर्मगतिं गच्छतीति न तस्य नाशाशङ्केति शेषः। इतोऽपि गृहस्थो योगभ्रष्टशब्दवाच्यो न भवतीत्याह नचेति। ज्ञानं कर्म चेत्युभयं ततो विभ्रष्टोऽयं नश्यतीति वचनं गृहस्थे कर्मणि सति नार्थवद्भवितुमलं तस्य कर्मनिष्ठस्य कर्मणो विभ्रंशे हेत्वभावात्तत्फलस्यावश्यकत्वादित्यर्थः। कृतस्य कर्मणो मुमुक्षुणा भगवति समर्पणात्कर्तरि फलानारम्भकत्वादस्ति विभ्रंशकारणमिति शङ्कते कर्मेति। राजाराधनबुद्ध्या धनधान्यादिसमर्पणस्याधिकफलहेतुत्वोपलम्भादीश्वरे समर्पणं न भ्रंशकारणमिति दूषयति नेत्यादिना। अधिकफलहेतुत्वेऽपि मोक्षहेतुत्वमिष्यतामिति शङ्कते मोक्षायेति। तदेव चोद्यं विवृणोति स्वकर्मणामिति। सहकारिसामर्थ्यात्तस्य फलान्तरं प्रत्युपायत्वासिद्धिरिति हेतुं सूचयति योगेति। ध्यानसहितस्य संन्यासस्य मोक्षौपयिकत्वे कुतो योगभ्रष्टमधिकृत्य नाशाशङ्केत्याशङ्क्याह योगाच्चेति। सहकार्यभावे सामग्र्यभावात्फलानुपपत्तेर्युक्ता नाशाशङ्केत्यर्थः। ध्यानसहितमीश्वरे कर्मसमर्पणं मोक्षायेत्यत्र प्रमाणाभावाद्गृहस्थो योगभ्रष्टशब्दवाच्यो न भवतीति दूषयति नेति। गृहस्थस्य योगभ्रष्टशब्दवाच्यत्वाभावे हेत्वन्तरमाह एकाकीति। न खल्वेतानि विशेषणानि गृहस्थसमवायीनि संभवन्ति तेन तस्य ध्यानयोगविध्यभावान्न तं प्रति योगभ्रष्टशब्दवचनमुचितमित्यर्थः। एकाकित्ववचनं गृहस्थस्यापि ध्यानकाले स्त्रीसहायत्वाभावाभिप्रायेण भविष्यतीत्याशङ्क्याग्निहोत्रादिवद्ध्यानस्य पत्नीसाध्यत्वाभावादप्राप्तप्रतिषेधान्मैवमित्याह नचात्रेति। विशेषणान्तरपर्यालोचनयापि नायमेकाकिशब्दो गृहस्थपरो भवितुमर्हतीत्याह नचेति। किञ्चगृहस्थस्यैवैकाकित्वादि विवक्षित्वा ध्यानयोगविधौ तं प्रत्युभयभ्रष्टप्रश्नो नोपपद्यत इत्याह उभयेति। नहि गृहस्थं प्रत्युभयस्माज्ज्ञानात्कर्मणश्च विभ्रष्टत्वमुपेत्य प्रष्टुं युज्यते तस्य ज्ञानाद्भ्रंशेऽपि कर्मणस्तदभावादनुष्ठीयमानकर्मभ्रंशेऽपि प्रागनुष्ठितकर्मवशात्फलप्रतिलम्भादतो यथोक्तप्रश्नालोचनया न गृहस्थं प्रति ध्यानविधानोपपत्तिरित्यर्थः। ननु भगवता संन्यासस्य प्रतिषिद्धत्वाद्गृहस्थस्यैव योगविधानात्तस्यैव योगभ्रष्टशब्दवाच्यत्वमिति शङ्कते अनाश्रित इत्यनेनेति। भगवद्वाक्यं न प्रतिषेधपरमिति परिहरति न। ध्यानेति। स्तुतिपरत्वमेव स्फोरयति न केवलमिति। सत्त्वशुद्ध्यर्थमनुतिष्ठन्निति संबन्धः। वाक्यस्योभयपरत्वमाशङ्क्य वाक्यभेदप्रसङ्गान्मैवमित्याह नचेति। इतोऽपि भगवतः संन्यासाश्रमप्रतिषेधोऽभिप्रेतो न भवतीत्याह नच प्रसिद्धमिति। तस्य प्रसिद्धं संन्यासित्वं योगित्वं चेति संबन्धः। प्रसिद्धत्वमेव व्याकरोति श्रुतीति। इतोऽपि संन्यासाश्रमं भगवान्न प्रतिषेधतीत्याह स्ववचनेति। विरोधमेव साधयति सर्वकर्माणीत्यादिना। अनाश्रित इत्यादिवाक्यस्य यथाश्रुतार्थत्वानुपपत्तेः स्तुतिपरत्वमुपपादितमुपसंहरति तस्मादिति। कर्मफलसंन्यासित्वमत्र मुनिशब्दार्थः। स्तुतिपरं वाक्यमक्षरयोजनार्थमुदाहरति अनाश्रित इति। कर्मफलेऽभिलाषो नास्तीत्येतावता कथं तदनाश्रितत्ववाचोयुक्तिरित्याशङ्क्य व्यतिरेकमुखेन विशदयति यो हीति। कार्यमित्यादि व्याकरोति एवंभूतः सन्निति। कथं कर्मिणः संन्यासित्वं योगित्वं च कर्मित्वविरोधादित्याशङ्क्याह ईदृश इति। स्तुतेरत्र विवक्षितत्वान्नानुपपत्तिश्चोदनीयेति मन्वानः सन्नाह इत्येवमिति। न निरग्निरित्यादेरर्थमाह न केवलमिति। अग्नयो गार्हपत्याहवनीयान्वाहार्यपचनप्रभृतयः। नन्वनग्नित्वे सिद्धमक्रियत्वमग्निसाध्यत्वात्क्रियाणां तथाच न निरग्निरित्येतावतैवापेक्षितसिद्धेर्न चाक्रिय इत्यनर्थकमर्थपुनरुक्तेरिति तत्राह अनग्नीति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
पञ्चमाध्यायान्ते सम्यग्दर्शनं प्रत्यन्तरङ्गसाधनस्य ध्यानयोगस्य सूत्रस्थानीयास्त्रयः श्लोका उदाहृतास्तद्वृत्तिस्थानीयोऽयं षष्ठाध्याय आरभ्यते। तत्र तदधिकारसंपत्तये गृहस्थेनाधिकृतेन कर्तव्यमेव कर्मेत्यतस्तत्स्तौति अनाश्रित इति द्वाभ्याम्। कर्मणः फलमनाश्रितः कर्मफलतृष्णारहितः सन् कार्यमवश्यकर्तव्यं काम्यविपरीतं नित्याग्निहोत्रादिकं यः करोति स संन्यासी च योगी चेति कर्मफलतृष्णावद्य्भ इतरकर्मिभ्य उत्कृष्ट इति गौणप्रयोगेण स्तुयते। तथाच संन्यासः परित्यागः सोऽस्यास्तीति सः। योगश्चित्तसमाधानं सोऽस्यास्तीति स योगी चेत्येवमुभयगुणसंपन्नोऽयं मन्तव्यः न केवलं निरग्निरक्रिय एव संन्यासी योगी चेति मन्तव्यः। निर्गता अग्नयः कर्माङ्गभूता यस्मात्सः। अनग्निसाधना अप्यविद्यमानाः क्रियास्तपोदानादिका यस्य स नित्यसमाधिनिष्ठ इत्यर्थः। एतेन कार्यं कर्म यः करोति स एव संन्यासी च योगी च नतु निरग्निः नचाक्रिय इति प्रत्युक्तम्। न केवलं निरग्निरग्नयो गार्हपत्याहवनीयान्वाहार्यपचनप्रभृतयः तानुद्वास्य स्थित एव संन्यासी। तथा अन्याश्च तपोदानाद्याः क्रियास्तद्रहितः समाधिनिष्ठ एव योगी चेति। न चेति यथासंख्यमुभयव्यतिरेको व्याख्येयः। एतेनाग्निशब्देन सर्वाणि कर्माण्युपलक्ष्य निरग्निरिति संन्यासी। क्रियाशब्देन चित्तवृत्तीरुपलक्ष्याक्रिय इति निरुद्धचित्तवृत्तिर्योगीति कथ्यते इति लक्षणया व्याख्याय उभयव्यतिरेकप्रदर्शनं प्रत्युक्तम्। एवं भाष्योक्तेनर्जुमार्गेणाविरोधस्य सम्यगुपपत्त्या पूर्वाध्यायान्ते श्लोकद्वयेन सूत्रितं ज्ञानयोगं प्राधान्येन षष्ठे प्रपञ्चयिष्यन् श्रीभगवानुवाचेत्याद्यामूलतद्भाष्यतद्विरुद्धाः कल्पना उपेक्ष्याः।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
पूर्वाध्यायान्ते सूत्रितं ध्यानयोगं विवरीतुमिच्छंस्तत्राधिकारहेतुत्वात्कर्मयोगं तावत्स्तौति द्वाभ्याम् अनाश्रित इति। यः कर्मणां फलमनाश्रितोऽनपेक्षमाणः कार्यमवश्यकर्तव्यं नित्यं कर्म करोति स एव फलसंकल्पत्यागात्संन्यासी च योगी च भवति न तु निरग्निर्यो विधितः श्रौतस्मार्तकर्मत्यागी स एव संन्यासी नापि अक्रियस्त्यक्तवाङ्मनःकायक्रिय एव वा योगीति।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
चित्ते शुद्धेऽपि न ध्यानं विना संन्यासमात्रतः। मुक्तिः स्यादिति षष्ठेऽस्मिन्ध्यानयोगो वितन्यतेपूर्वाध्यायान्ते संक्षेपेणोक्तं योगं प्रपञ्चयितुं षष्ठाध्यायारम्भः। तत्र तावत्सर्वकर्माणि मनसेत्यारभ्य संन्यासपूर्विकाया ज्ञाननिष्ठायास्तात्पर्येणाभिधानाद्दुःखस्वरूपत्वाच्च कर्मणः सहसा संन्यासातिप्रसङ्गं प्राप्तं वारयितुं संन्यासादपि श्रेष्ठत्वेन कर्मयोगं स्तौति। श्रीभगवानुवाच अनाश्रित इति द्वाभ्याम्। कर्मफलमनाश्रितोऽनपेक्षमाणः अवश्यं कर्तव्यतया विहितं कर्म यः करोति स एव संन्यासी योगी च नतु निरग्निः अग्निसाध्येष्टाख्यकर्मत्यागी न चाक्रियोऽनग्निसाध्यपूर्ताख्यकर्मत्यागी च।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
षष्ठाध्यायोपक्रमस्य पूर्वोक्तार्थानुवादरूपतां दर्शयितुं पूर्वेणाविच्छिन्नानुसन्धानार्थमध्यायसङ्गतिवचनात् पूर्वमेव व्याख्येयोपादानम् वृत्तवर्तिष्यमाणाभिधानमुखेन सङ्गतिं दर्शयति उक्त इति। कर्मयोग उक्तः तत्साध्यतयोपक्षिप्तः समाधिलक्षणो योग एवात्र सानुबन्धः प्रतिपाद्यत इति सङ्गतिः।योगाभ्यासविधिरुच्यत इति योगाभ्यासविधिर्योगी चतुर्धा योगसाधनम्। योगसिद्धिः स्वयोगस्य पारम्यं षष्ठ उच्यते गी.सं.10 इति सङ्ग्रहश्लोके प्रथमं योगाभ्यासविधेरुपादानादन्येषां च तदर्थत्वात् स एवाध्यायप्रधानार्थतया संगृहीत इति भावः।अनाश्रितः इत्यादीनांसमबुद्धिर्विशिष्यते 6।9 इत्यन्तानां नवानां श्लोकानां प्रागुक्तानधिकार्थत्वान्निष्प्रयोजनत्वमाशङ्क्याह तत्रेति। अभ्यासो हि तात्पर्यलिङ्गम् अव्यवहितनिर्देशश्च नैरपेक्ष्यं सूचयेदिति भावः।ज्ञानाकारो योगशिरस्क इति पदाभ्यां साधनस्य प्रागुक्तमन्तर्गतात्मज्ञानत्वादिलक्षणं पौष्कल्यं साध्यस्यात्मावलोकनस्याव्यवहितत्वं चाभिप्रेतम्।अनाश्रितः इतिश्लोके पूर्वार्धेन ज्ञानाकारकर्मयोगानुवादः उत्तरार्धेन नैरपेक्ष्यदृढीकरणम्।भोक्तारं यज्ञतपसाम् 5।29 इत्यव्यवहितपूर्वश्लोकालोचनयासर्वात्मनाऽस्मत्सुहृद्भूतेत्यादिकमुक्तम्। ततश्चकर्मफलमनाश्रितः इत्युक्ते निष्फलप्रवृत्तिः स्यादिति शङ्कायां कर्मस्वरूपफलत्वस्य वक्तुमुचितत्वात् कार्यशब्दः प्रयोजनविषय इति दर्शयितुं कर्मानुष्ठानमेव कार्यमिति वचनव्यक्तिर्दर्शिता। कार्यशब्दस्य चोदितविषयत्वे मन्दप्रयोजनत्वं स्यादिति भावः। ननु कर्मयोगनिष्ठमनूद्य तस्यैव ज्ञानयोगनिष्ठत्वं कर्मयोगनिष्ठत्वं च विधातुमयुक्तम् प्रथमे विरोधात् द्वितीये तूद्देश्योपादेयविभागाभावपौनरुक्त्यनिष्प्रयोजनत्वेभ्य इति शङ्कायामाह आत्मावलोकनेति। पृथक्साधनभूतोभयसाध्यं फलमनेन लब्धमित्युभयनिष्ठत्वमुपचारादुच्यते ततश्च कर्मयोगस्य निरपेक्षसाधनत्वं विवक्षितमिति भावः। यद्वा कर्मयोगांशभूतज्ञानक्रियाभेदेन परिहार इति भावः। अग्निशब्दस्यात्राग्निसम्बन्धि कर्मलक्षकत्वव्यञ्जनाय यज्ञादिशब्दः। लक्ष्यार्थानां सङ्ग्राहकं चोदितत्वम्।निरग्निः इत्यनेनैव कर्मनिवृत्तेरुक्तत्वादक्रियशब्दः क्रियानिवृत्तिमुखेन क्रियाव्यतिरिक्तनिष्ठत्वलक्षकः व्यतिरिक्तश्चात्रासन्नो ज्ञानयोग इति दर्शयितुंकेवलज्ञाननिष्ठ इत्युक्तम् यद्वान निरग्निर्न चाक्रियः इत्युभाभ्यां श्रौतस्मार्तक्रियाविशेषनिषेधकाभ्यां फलितमाहन चोदितेत्यादि। तदभिप्रेतमाह नच केवलज्ञाननिष्ठ इति।अनग्निरनिकेतः स्यात् मनुः 6।256।43त्यक्त्वा द्रव्याग्निसाध्यानि कर्माणि इत्यादिप्रतिपादितसन्न्यासाश्रमव्यवच्छेद इहासङ्गत इति भावः।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
श्रीवेङ्कटेशाय नमः। सङ्गतिं सूचयन्नेतदध्यायप्रतिपाद्यमर्थमाह ज्ञानान्तरङ्गमिति।योगे त्विमां शृणु 2।39 इति प्रतिज्ञाय द्वितीयषट्के वक्ष्यमाणं भगवज्ज्ञानं प्रति कर्मयोगस्य बहिरङ्गत्वात्स प्राधान्येनातीते ग्रन्थे प्रतिपादितः। तत्साध्यत्वाज्ज्ञानान्तरङ्गत्वाच्चावसरप्राप्तं समाधियोगमाहानेन षष्ठाध्यायेनेत्यर्थः। आसनादीनामङ्गानां वक्ष्यमाणत्वेऽपि तेषां समाध्यर्थत्वात् प्राधान्येन समाधियोगस्य ग्रहणम्। पञ्चमान्तोक्तस्य प्रपञ्चोऽयमित्यदोषः।गृहस्थस्यापि स्तुत्यर्थमुपचरितं सन्न्यासित्वं योगित्वं चाद्येन श्लोकेनोच्यते इति परकीयतात्पर्यकथनमसदिति भावेनाह विवक्षितमिति। समाधियोगं विधातुं तत्राधिकारिणं ज्ञापयिष्यन् साङ्ख्याद्यभिमततदधिकारिनिरासाय तद्विशेषणं प्राग्विवक्षितं कामादिवर्जनलक्षणं सन्न्यासमीश्वराराधनस्वकर्मानुष्ठानलक्षणेन योगेन सहाहेत्यर्थः। यदि हि सन्न्यासो यत्याश्रमोऽत्र विवक्षितः स्यात् योगश्च कश्चिद्गृहस्थासम्भवी स्यात् तदोपचारेण तत्स्तुतिरियम्। न चैवमिति भावः। न केवलं निरग्निरक्रियश्चतुर्थाश्रमी सन्न्यासी योगी च किन्त्वनाश्रित इत्याद्युक्तो गृहस्थोऽपीति (शां.) परकीयां योजनां निराकरोति चतुर्थेति। अत्रैव स्पष्टं वाक्यान्तरं पठति अग्निरिति। चस्त्वर्थः। अतो न परकीया योजना युक्तेति शेषः। तर्हि कथं इत्यत आह तस्मादिति परकृतयोजनाया निरस्तत्वात्। ननु निरग्नेरक्रियस्य चतुर्थाश्रमिणोऽपि सन्न्यासित्वाद्योगित्वाच्च कथं न निरग्निरित्याद्युक्तं इत्यतो वाहचतुर्थाश्रमिणोऽपीत्यादि। न भवत्येवेति युक्तमिति शेषः। अनग्नित्वादिप्रवादश्च बाह्याग्न्याद्यभावनिबन्धन इति भावः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
योगसूत्रं त्रिभिः श्लोकैः पञ्चमान्ते यवदीरितम्। षष्ठस्त्वारभ्यतेऽध्यायस्तद्व्याख्यानाय विस्तरात्।।तत्र सर्वकर्मत्यागेन योगं विधास्यंस्त्याज्यत्वेन हीनत्वमाशङ्क्य कर्मयोगं स्तौति द्वाभ्याम् श्रीभगवानुवाच कर्मणां फलमनाश्रितोऽनपेक्षमाणः फलाभिसंधिरहितः सन् कार्यं कर्तव्यतया शास्त्रेण विहितं नित्यमग्निहोत्रादि कर्म करोति यः स कर्म्यपि सन् संन्यासी योगी चेति स्तूयते। संन्यासो हि त्यागः। चित्तगतविक्षेपाभावश्च योगः। तौ चास्य विद्येते फलत्यागात् फलतृष्णारूपचित्तविक्षेपाभावाच्च। कर्मफलतृष्णात्याग एवात्र गौण्या वृत्त्या संन्यासयोगशब्दाभ्यामभिधीयते सकामानपेक्ष्य प्राशस्त्यकथनाय। अवश्यंभाविनौ हि निष्कामकर्मानुष्ठातुर्मुख्यौ संन्यासयोगौ। तस्मादयं यद्यपि न निरग्निरग्निसाध्यश्रौतकर्मत्यागी न भवति न चाक्रियोऽग्निनिरपेक्षस्मार्तक्रियात्यागी च न भवति तथापि संन्यासी योगी चेति मन्तव्यः। अथवा न निरग्निर्न चाक्रियः संन्यासी योगी चेति मन्तव्यः किंतु साग्निः सक्रियश्च निष्कामकर्मानुष्ठायी संन्यासी योगी चेति मन्तव्य इति स्तूयते।अपशवो वा अन्ये गोअश्वेभ्यः पशवो गोअश्चान् इत्यत्रेव प्रशंसालक्षणयानया नञन्वयोपपत्तिः। अत्र चाक्रियं इत्यनेनैव सर्वकर्मसंन्यासिने लब्धे निरग्निरिति व्यर्थं स्यादित्यग्निशब्देन सर्वाणि कर्माण्युपलक्ष्य निरग्निरिति संन्यासी क्रियाशब्देन चित्तवृत्तीरुपलक्ष्याक्रिय इति निरुद्धचित्तवृत्तिर्योगी च कथ्यते। तेन न निरग्निः संन्यासी मन्तव्यो न चाक्रियो योगी मन्तव्य इति यथासंख्यमुभयव्यतिरेको दर्शनीयः। एंव सति नञ्द्वयमप्युपपन्नमिति द्रष्टव्यम्।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
कृत्वाऽपि सर्वसन्न्यासं जडवच्चरणादिह। न भक्तिं प्राप्नुयात्तस्माद्ध्यानयोगमुवाच ह।।पूर्वाध्याये सन्न्यासमुक्त्वाऽध्यायान्ते इच्छादिविहीनो विषयमोक्षेच्छुर्विषयभोक्तृत्वात्तेभ्यो विमुक्तो भवेदित्युक्तम् ततस्तद्विमुक्तिरेव न फलं किन्तु तद्विमुक्त्या भगवद्ध्यानेन भगवदावेशः फलमिति ध्यानस्वरूपमाह भगवान् अनाश्रित इति। कर्मफलं स्वर्गादिरूपमनाश्रितः कार्यं कर्म भगवदुक्तत्वादवश्यकर्तव्यं कर्म सेवादिरूपं यः करोति स सन्न्यासी त्यागवान् च पुनर्योगी च भवतीति शेषः। न निरग्निः न गार्हपत्यादित्यागवान् सन्न्यासी। न च अक्रियः न सेवादिरहितो योगी भवतीत्यर्थः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
उक्तौभयैकार्थसिद्धिरात्मसंयमधर्मतः। भवत्येवमिदं वक्तुं पार्थायाह हरिः पुनःश्रीभगवानुवाच अनाश्रित इति। साङ्ख्ययोगयोरेकार्थतां तस्मै कर्मयोगे दर्शयति। यः कर्मफलमनाश्रितः कर्तव्यत्वात्कार्यं कर्म अग्निहोत्रादिकं करोति तदोभयोरेकार्थरूपसिद्धिः फलत्यागात्साङ्ख्यस्य कर्मकरणाच्च योगस्यैकार्थ्यमुपदिष्टं भवति। तदाह स सन्न्यासी स योगी चेति। नह्यग्निहोत्रादिसकलकर्मरहितः सन्न्यासी मे मतः। न चानग्निसाध्यपूर्त्तकर्मरहितोऽपि तथा। अनेनात्मसंयमयोगेन कर्मणां कर्त्ताऽभिमतो लक्षितः।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
6.1 Anasritah, without depending on;-on what?-on that which is karma-phalam, the result of action- i.e. without craving for the result of action-. He who craves for the results of actions becomes dependent on the results of actions. But this person is the opposite of such a one. Hence (it is said), 'wihtout depending on the result of action. Having become so, yah he who; karoti, performs accomplishes; (karma, an action;) which is his karyam, duty, the nityakarmas such as Agnihotra etc. which are opposed to the kamya-karmas-. Whoever is a man of action of this kind is distinguished from the other men of action. In order to express this idea the Lord says, sah, he ; is a sannyasi, monk, and a yogi. Sanyyasa, means renunciation. he who is possessed of this is a sannyasi, a monk. And he is also a yogi. Yoga means concentration of mind. He who has that is a yogi. It is to be understood that this man is possessed of these alities. It is not to be understood that, only that person who does not keep a fire (niragnih) and who is actionless (akriyah) is a monk and a yogi. Niragnih is one from whom the fires [viz Garhapatya, Ahavaniya, Anvaharya-pacana, etc.], which are the accessories of rites, have bocome dissociated. By kriya are mean austerity, charity, etc. which are performed wityout fire. Akriyah, actionless, is he who does not have even such kriyas. Objection: Is it not only with regard to one who does not keep a fire and is acitonless that monasticsm and meditativeness are well known in the Vedas, Smrtis and scriptures dealing with meditation? Why are monasticism and meditativeness spoken of here with regard to one who keeps a fire and is a man of action-which is not accepted as a fact? Reply: This defect does not arise, because both are sought to be asserted in some secondary sense. Objection: How is that? Reply: His being monk is by virtue of his having given up hankering for the results of actions; and his being a man of meditation is from the fact of his doing actions as accesories to meditation or from his rejection of thoughts for the results of actions which cause disturbances in the mind. Thus both are used in a figurative sense. On the contrary, it is not that monasticism and meditativeness are meant in the primary sense. With a veiw to pointing out this idea, the Lord says:
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
6.1 The Lord said He who, without depending on such fruits of works as heaven, etc., performs them, reflecting, 'The performance of works alone is my duty (Karya). Works themselves are my sole aim, because they are a form of worship of the Supreme Person who is our Friend in every way. There is nothing other than Him to be gained by them' - such a person is a Sannyasin, i.e., one devoted to Jnana Yoga, and also a Karma Yogin, i.e., one devoted to Karma Yoga. He is intent on both these, which is the means for attaining Yoga, which is of the nature of the vision of the self. 'And not he who maintains no sacred fires and performs no works,' i.e., not he who is disinclined to perform the enjoined works such as sacrifices, etc., nor he who is devoted to mere knowledge. The meaning is that such a person is devoted only to knowledge, whereas a person who is devoted to Karma Yoga has both knowledge and works. Now Sri Krsna teaches that there is an element of knowledge in the Karma Yoga as defined above.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 6.1?
अनाश्रितः न आश्रितः अनाश्रितः। किम् कर्मफलं कर्मणां फलं कर्मफलं यत् तदनाश्रितः कर्मफलतृष्णारहित इत्यर्थः। यो हि कर्मफले तृष्णावान् सः कर्मफलमाश्रितो भवति अयं तु तद्विपरीतः अतः अनाश्रितः कर्मफलम्। एवंभूतः सन् कार्यं कर्तव्यंनित्यं काम्यविपरीतम् अग्निहोत्रादिकं कर्म करोति निर्वर्तयति यः कश्चित् ईदृशः कर्मी स कर्म्यन्तरेभ्यो विशिष्यते इत्येवमर्थमाह स संन्यासी च योगी च इति। संन्यासः परित्यागः स यस्यास
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 6.1, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.