
“श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता। — VaniSagar”
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തൻ്റെ കർമ്മഫലങ്ങളെ ആശ്രയിക്കാതെ തൻ്റെ കർത്തവ്യം നിർവഹിക്കുന്നവൻ - അവൻ സന്ന്യാസിയും യോഗിയും ആണ്, തീയും പ്രവർത്തനവുമില്ലാത്തവനല്ല.
తన కర్మల ఫలాలపై ఆధారపడకుండా తన విధిని నిర్వర్తించేవాడు-అతను సన్యాసి మరియు యోగి, అగ్ని లేనివాడు మరియు చర్య లేనివాడు కాదు.
எவன் தன் செயல்களின் பலனைச் சார்ந்து இல்லாமல் தன் கடமையைச் செய்கிறானோ அவன் சந்நியாசியும் யோகியும் ஆவான், நெருப்பு இல்லாதவன், செயல் இல்லாதவன் அல்ல.
جيڪو پنهنجي عملن جي ميوي تي ڀروسو ڪرڻ کان سواءِ پنهنجو پابند فرض سرانجام ڏئي ٿو - اهو هڪ سنياسي ۽ يوگي آهي، نه ته اهو جيڪو بغير باهه ۽ عمل کان سواءِ آهي.
যিনি কর্মের ফলের উপর নির্ভর না করে তাঁর সীমাবদ্ধ কর্তব্য পালন করেন - তিনি সন্ন্যাসী এবং যোগী, তিনি নন যিনি অগ্নিবিহীন এবং কর্মহীন।
જે પોતાનાં કર્તવ્યનાં ફળ પર આધાર રાખ્યા વિના પોતાની ફરજ બજાવે છે - તે સંન્યાસી અને યોગી છે, તે નથી કે જે અગ્નિ અને ક્રિયા વિનાનો છે.
जो आपल्या कर्माच्या फळावर विसंबून न राहता आपले कर्तव्य पार पाडतो - तो संन्यासी आणि योगी आहे, जो अग्निरहित आणि कर्मरहित नाही.
जसले कर्मको फलमा निर्भर नभई आफ्नो बाध्यात्मक कर्तव्य गर्दछ, त्यो संन्यासी र योगी हो, अग्निरहित र कर्मरहित व्यक्ति होइन।
ਉਹ ਜੋ ਆਪਣੇ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਫਲ 'ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਕੀਤੇ ਬਿਨਾਂ ਆਪਣਾ ਸੀਮਿਤ ਕਰਤੱਵ ਕਰਦਾ ਹੈ - ਉਹ ਸੰਨਿਆਸੀ ਅਤੇ ਯੋਗੀ ਹੈ, ਉਹ ਨਹੀਂ ਜੋ ਅੱਗ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹੈ ਅਤੇ ਕਰਮ ਰਹਿਤ ਹੈ।
ತನ್ನ ಕಾರ್ಯಗಳ ಫಲವನ್ನು ಅವಲಂಬಿಸದೆ ತನ್ನ ಬದ್ಧ ಕರ್ತವ್ಯವನ್ನು ನಿರ್ವಹಿಸುವವನು - ಅವನು ಸನ್ಯಾಸಿ ಮತ್ತು ಯೋಗಿ, ಬೆಂಕಿಯಿಲ್ಲದ ಮತ್ತು ಕ್ರಿಯೆಯಿಲ್ಲದವನಲ್ಲ.
जो आपल्या कर्माच्या फळांचेर आदारून रावनासतना आपलें बाउंडन कर्तव्य करता-तो संन्यासी आनी योगी, अग्नीविहीन आनी कर्म नाशिल्लो न्हय.
जे अपन कर्मक फल पर निर्भर नहि रहने अपन बाउंडन कर्तव्यक निर्वहन करैत अछि—ओ संन्यासी आ योगी अछि, ओ नहि जे अग्निहीन आ कर्महीन अछि।
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या--अनाश्रितः कर्मफलम् इन पदोंका आशय यह प्रतीत होता है कि मनुष्यको किसी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिका आश्रय नहीं रखना चाहिये। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश होनेसे नित्य-निरन्तर रहनेवाला है और यह जिन वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय लेता है, वे उत्पत्ति-विनाशशील तथा प्रतिक्षण परिवर्तित होनेवाले हैं। वे तो परिवर्तनशील होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं और यह (जीव) रीता-का-रीता रह जाता है। केवल रीता ही नहीं रहता, प्रत्युत उनके रागको पकड़े रहता है। जबतक यह उनके रागको पकड़े रहता है, तबतक इसका कल्याण नहीं होता अर्थात् वह राग उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाता है (गीता 13। 21)। अगर यह उस रागका त्याग कर दे तो यह स्वतः मुक्त हो जायगा। वास्तवमें यह स्वतः मुक्त है ही, केवल रागके कारण उस मुक्तिका अनुभव नहीं होता। अतः भगवान् कहते हैं कि मनुष्य कर्मफलका आश्रय न रखकर कर्तव्य-कर्म करे। कर्मफलके आश्रयका त्याग करनेवाला तो नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है, पर कर्मफलका आश्रय रखनेवाला बँध जाता है (गीता 5। 12)।स्थूल, सूक्ष्म और कारण--ये तीनों शरीर 'कर्मफल' हैं। इन तीनोंमेंसे किसीका भी आश्रय न लेकर इनको सबके हितमें लगाना चाहिये। जैसे, स्थूलशरीरसे क्रियाओँ और पदार्थोंको संसारका ही मानकर उनका उपयोग संसारकी सेवा-(हित-) में करे, सूक्ष्मशरीरसे दूसरोंका हित कैसे हो, सब सुखी कैसे हों, सबका उद्धार कैसे हो--ऐसा चिन्तन करे; और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरता-(समाधि-) का भी फल संसारके हितके लिये अर्पण करे। कारण कि ये तीनों शरीर अपने (व्यक्तिगत) नहीं हैं और अपने लिये भी नहीं हैं, प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही हैं। इन तीनोंकी संसारके साथ अभिन्नता और अपने स्वरूपके साथ भिन्नता है। इस तरह इन तीनोंका आश्रय न लेना ही 'कर्मफलका' आश्रय न लेना' है और इन तीनोंसे केवल संसारके हितके लिये कर्म करना ही 'कर्तव्य-कर्म करना' है।आश्रय न लेनेका तात्पर्य हुआ कि साधनरूपसे तो शरीरादिको दूसरोंके हितके लिये काममें लेना है, पर स्वयं उनका आश्रय नहीं लेना है अर्थात् उनको अपना और अपने लिये नहीं मानना है। कारण कि मनुष्य-जन्ममें शरीर आदिका महत्त्व नहीं है ,प्रत्युत शरीर आदिके द्वारा किये जानेवाले साधनका महत्त्व है। अतः संसारसे मिली हुई चीज संसारको दे दें, संसारकी सेवामें लगा दें तो हम 'संन्यासी' हो गये और मिली हुई चीजमें अपनापन छोड़ दें तो हम 'त्यागी' हो गये।कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करनेसे क्या होगा? अपने लिये कर्म न करनेसे नयी आसक्ति तो बनेगी नहीं और केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुरानी आसक्ति मिट जायगी तथा कर्म करनेका वेग भी मिट जायगा। इस प्रकार आसक्तिके सर्वथा मिटनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध है। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओँको पकड़नेका नाम बन्धन है और उनसे छूटनेका नाम मुक्ति है। उन उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे छूटनेका उपाय है--उनका आश्रय न लेना अर्थात् उनके साथ ममता न करना और अपने जीवनको उनके आश्रित न मानना।
Sri Harikrishnadas Goenka
इसी भावसे वह संन्यासी और योगी है इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है भगवान् श्रीकृष्ण बोले जिसने आश्रय नहीं लिया हो वह अनाश्रित है किसका कर्मफलका अर्थात् जो कर्मोंके फलका आश्रय न लेनेवाला कर्मफलकी तृष्णासे रहित है। क्योंकि जो कर्मफलकी तृष्णावाला होता है वही कर्मफलका आश्रय लेता है यह उससे विपरीत है इसलिये कर्मफलका आश्रय न लेनेवाला है। ऐसा ( कर्मफलके आश्रयसे रहित ) होकर जो पुरुष कर्तव्यकर्मोंको अर्थात् काम्यकर्मोंसे विपरीत नित्य अग्निहोत्रादि कर्मोंको पूरा करता है ऐसा जो कोई कर्मी है वह दूसरे कर्मियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है इसी अभिप्रायसे यह कहा है कि वह संन्यासी भी है और योगी भी है। संन्यास नाम त्यागका है वह जिसमें हो वही संन्यासी है और चित्तके समाधानका नाम योग है वह जिसमें हो वही योगी है अतः वह कर्मयोगी भी इन गुणोंसे सम्पन्न माना जाना चाहिये। केवल अग्निरहित और क्रियारहित पुरुष ही संन्यासी और योगी है ऐसा नहीं मानना चाहिये। कर्मोंके अङ्गभूत गार्हपत्यादि अग्नि जिससे छूट गये हैं वह निरग्नि है और बिना अग्निके होनेवाली तपदानादि क्रिया भी जो नहीं करता वह अक्रिय है। पू0 जब कि निरग्नि और अक्रिय पुरुषके लिये ही श्रुति स्मृति और योगशास्त्रोंमें संन्यासित्व और योगित्व प्रसिद्ध है तब यहाँ अग्नियुक्त और क्रियायुक्त पुरुषके लिये अप्रसिद्ध संन्यासित्व और योगित्वका प्रतिपादन कैसे किया जाता है उ0 यह दोष नहीं है क्योंकि किसी एक गुणवृत्तिसे ( किसी एक गुणविशेषको लेकर ) संन्यासित्व और योगित्व इन दोनों भावोंको उसमें ( गृहस्थमें ) सम्पादन करना भगवान्को इष्ट है। पू0 वह कैसे उ0 कर्मफलके संकल्पोंका त्याग होनेसे संन्यासित्व है और योगके अङ्गरूपसे कर्मोंका अनुष्ठान होनेसे या चित्तविक्षेपके कारणरूप कर्मफलके संकल्पोंका परित्याग होनेसे योगित्व है इस प्रकार दोनों भाव ही गौणरूपसे माने गये हैं।
Sri Anandgiri
ध्यानयोगप्रस्तावानन्तरं तद्योग्यताहेतुकर्मणः स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह श्रीभगवानिति। पूर्वोत्तराध्याययोः सङ्गतिमभिदधानो वृत्तमनूद्याध्यायान्तरमवतारयति अतीतेति। सम्यग्दर्शनप्रकरणे ध्यानयोगस्य प्रसङ्गाभावं व्युदस्यति सम्यगिति। संग्रहविवरणयोरतीतानन्तराध्याययोर्युक्तं हेतुहेतुमत्त्वमिति भावः। अध्यायसंबन्धमभिधायानाश्रितः कर्मफलमित्यादिश्लोकद्वयस्य तात्पर्यमाह तत्रेति। कर्मयोगस्य संन्यासहेतोर्मर्यादां दर्शयितुं साङ्गं च योगं विचारयितुमध्याये प्रवृत्ते सतीति सप्तम्यर्थः। संन्यासिना कर्तव्यं कर्मेत्येवं प्रतिभासं व्युदस्यति गृहस्थेनेति। कर्तव्यत्वं स्तुतियोग्यत्वमतःशब्दार्थः। समुच्चयवादी सीमाकरणमाक्षिपति नन्विति। यावज्जीवश्रुतिवशाद्ध्यानारोहणसामर्थ्ये सत्यपि कर्मानुष्ठानस्य दुर्वारत्वादिति हेतुमाह यावतेति। भार्यावियोगादिप्रतिबन्धाद्यावज्जीवश्रुतिचोदितकर्माननुष्ठानवद्वैराग्यप्रतिबन्धादपि तदननुष्ठानसंभवाद्भगवतो विशेषवचनाच्च न यावज्जीवं कर्मानुष्ठानप्रसक्तिरिति परिहरति नारुरुक्षोरिति। उक्तमेवार्थं व्यतिरेकद्वारेण विवृणोति आरुरुक्षोरित्यादिना। आरोढुमिच्छतीत्यारुरुक्षुरित्यत्रारोहणेच्छाविशेषणमारोहणं कृतवानित्यारूढ इत्यत्र पुनरिच्छाविषयभूतमारोहणं विशेषणमेवं शमकर्मविषययोर्भेदेन विशेषणं मर्यादाकरणानङ्गीकरणे विरुद्धमापद्येत तयोरेवं विभागकरणं च भागवतसीमानङ्गीकारे न युज्येतेत्यर्थः। विशेषणविभागकारणयोरन्यथोपपत्तिमाशङ्कते तत्रेति। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। षष्ठी निर्धारणे। भवत्वधिकारिणां त्रैविध्यं तथापि प्रकृते विशेषणादौ किमायातमित्याशङ्क्य तृतीयापेक्षया तदुपपत्तिरित्याह तानपेक्ष्येति। आरुरुक्षोरारूढस्य च भेदे तस्यैवेति प्रकृतपरामर्शानुपपत्तिरिति दूषयति न तस्येति। यद्यनारुरुक्षुं पुरुषमपेक्ष्यारुरुक्षोरिति विशेषणं तस्य च कर्मारोहणकारणमनारूढं च पुरुषमपेक्ष्यारूढस्येति विशेषणं तस्य च शमः संन्यासो योगफलप्राप्तौ कारणमिति विशेषणविभागकरणयोरुपपत्तिस्तदारुरुक्षोरारूढस्य च भिन्नत्वात्प्रकृतपरामर्शिनस्तच्छब्दस्यानुपपत्तेर्न युक्तमित्थं विशेषणाद्युपपादनमित्यर्थः। किञ्चयोगमारुरुक्षोस्तदारोहणे कारणं कर्मेत्युक्त्वा पुनर्योगारूढस्येति योगशब्दप्रयोगाद्यो योगं पूर्वमारुरुक्षुरासीत्तस्यैवापेक्षितं योगमारूढस्य तत्फलप्राप्तौ कर्मसंन्यासः शमशब्दवाच्यो हेतुत्वेन कर्तव्य इति वचनादारुरुक्षोरारूढस्य चाभिन्नत्वप्रत्यभिज्ञानान्न तयोर्भिन्नत्वं शङ्कितुं शक्यमित्याह पुनरिति। यत्तु यावज्जीवश्रुतिविरोधाद्योगारोहणसीमाकरणं कर्मणोऽनुचितमिति तत्राह अत इति। पूर्वोक्तरीत्या कर्मतत्त्यागयोर्विभागोपपत्तौ श्रुतेरन्यविषयत्वाद्योगमारूढस्य मुमुक्षोर्जिज्ञासमानस्य नित्यनैमित्तिककर्मस्वपि परित्यागसिद्धिरित्यर्थः। इतश्च यावज्जीवं कर्म कर्तव्यं न भवतीत्याह योगेति। संन्यासिनो योगभ्रष्टस्य विनाशशङ्कावचनान्न यावज्जीवं कर्म कर्तव्यं प्रतिभातीत्यर्थः। ननु योगभ्रष्टशब्देन गृहस्थस्यैवाभिधानात्तस्यैवास्मिन्नध्याये योगविधानाद्योगारोहणयोग्यत्वे सत्यपि यावज्जीवं कर्म कर्तव्यमिति नेत्याह गृहस्थस्येति। तेनापि मुमुक्षुणा कृतस्य कर्मणो मोक्षातिरिक्तफलानारम्भकत्वाद्योगभ्रष्टोऽसौ छिन्नाभ्रमिव नश्यतीति शङ्का सावकाशेत्याशङ्क्याह अवश्यं हीति। अपौरुषेयान्निर्दोषाद्वेदात्फलदायिनी कर्मणः स्वाभाविकी शक्तिरवगता ब्रह्मभावस्य च स्वतःसिद्धत्वान्न कर्मफलवत्त्वमतो मोक्षातिरिक्तस्यैव फलस्य कर्मारम्भकमिति कर्मिणि योगभ्रष्टेऽपि कर्मगतिं गच्छतीति निरवकाशा शङ्केत्यर्थः। ननु मुमुक्षुणाकाम्यप्रतिषिद्धयोरकरणात्कृतयोश्च नित्यनैमित्तिकयोरफलत्वात्कथं तदीयस्य कर्मणो नियमेन फलारम्भकत्वं तत्राह नित्यस्य चेति। चकारेण नैमित्तिकं कर्मानुकृष्यते। वेदप्रमाणकत्वेऽपि नित्यनैमित्तिकयोरफलत्वे दोषमाह अन्यथेति। कर्मणोऽनुष्ठितस्य फलारम्भकत्वध्रौव्याद्गृहस्थो योगभ्रष्टोऽपि कर्मगतिं गच्छतीति न तस्य नाशाशङ्केति शेषः। इतोऽपि गृहस्थो योगभ्रष्टशब्दवाच्यो न भवतीत्याह नचेति। ज्ञानं कर्म चेत्युभयं ततो विभ्रष्टोऽयं नश्यतीति वचनं गृहस्थे कर्मणि सति नार्थवद्भवितुमलं तस्य कर्मनिष्ठस्य कर्मणो विभ्रंशे हेत्वभावात्तत्फलस्यावश्यकत्वादित्यर्थः। कृतस्य कर्मणो मुमुक्षुणा भगवति समर्पणात्कर्तरि फलानारम्भकत्वादस्ति विभ्रंशकारणमिति शङ्कते कर्मेति। राजाराधनबुद्ध्या धनधान्यादिसमर्पणस्याधिकफलहेतुत्वोपलम्भादीश्वरे समर्पणं न भ्रंशकारणमिति दूषयति नेत्यादिना। अधिकफलहेतुत्वेऽपि मोक्षहेतुत्वमिष्यतामिति शङ्कते मोक्षायेति। तदेव चोद्यं विवृणोति स्वकर्मणामिति। सहकारिसामर्थ्यात्तस्य फलान्तरं प्रत्युपायत्वासिद्धिरिति हेतुं सूचयति योगेति। ध्यानसहितस्य संन्यासस्य मोक्षौपयिकत्वे कुतो योगभ्रष्टमधिकृत्य नाशाशङ्केत्याशङ्क्याह योगाच्चेति। सहकार्यभावे सामग्र्यभावात्फलानुपपत्तेर्युक्ता नाशाशङ्केत्यर्थः। ध्यानसहितमीश्वरे कर्मसमर्पणं मोक्षायेत्यत्र प्रमाणाभावाद्गृहस्थो योगभ्रष्टशब्दवाच्यो न भवतीति दूषयति नेति। गृहस्थस्य योगभ्रष्टशब्दवाच्यत्वाभावे हेत्वन्तरमाह एकाकीति। न खल्वेतानि विशेषणानि गृहस्थसमवायीनि संभवन्ति तेन तस्य ध्यानयोगविध्यभावान्न तं प्रति योगभ्रष्टशब्दवचनमुचितमित्यर्थः। एकाकित्ववचनं गृहस्थस्यापि ध्यानकाले स्त्रीसहायत्वाभावाभिप्रायेण भविष्यतीत्याशङ्क्याग्निहोत्रादिवद्ध्यानस्य पत्नीसाध्यत्वाभावादप्राप्तप्रतिषेधान्मैवमित्याह नचात्रेति। विशेषणान्तरपर्यालोचनयापि नायमेकाकिशब्दो गृहस्थपरो भवितुमर्हतीत्याह नचेति। किञ्चगृहस्थस्यैवैकाकित्वादि विवक्षित्वा ध्यानयोगविधौ तं प्रत्युभयभ्रष्टप्रश्नो नोपपद्यत इत्याह उभयेति। नहि गृहस्थं प्रत्युभयस्माज्ज्ञानात्कर्मणश्च विभ्रष्टत्वमुपेत्य प्रष्टुं युज्यते तस्य ज्ञानाद्भ्रंशेऽपि कर्मणस्तदभावादनुष्ठीयमानकर्मभ्रंशेऽपि प्रागनुष्ठितकर्मवशात्फलप्रतिलम्भादतो यथोक्तप्रश्नालोचनया न गृहस्थं प्रति ध्यानविधानोपपत्तिरित्यर्थः। ननु भगवता संन्यासस्य प्रतिषिद्धत्वाद्गृहस्थस्यैव योगविधानात्तस्यैव योगभ्रष्टशब्दवाच्यत्वमिति शङ्कते अनाश्रित इत्यनेनेति। भगवद्वाक्यं न प्रतिषेधपरमिति परिहरति न। ध्यानेति। स्तुतिपरत्वमेव स्फोरयति न केवलमिति। सत्त्वशुद्ध्यर्थमनुतिष्ठन्निति संबन्धः। वाक्यस्योभयपरत्वमाशङ्क्य वाक्यभेदप्रसङ्गान्मैवमित्याह नचेति। इतोऽपि भगवतः संन्यासाश्रमप्रतिषेधोऽभिप्रेतो न भवतीत्याह नच प्रसिद्धमिति। तस्य प्रसिद्धं संन्यासित्वं योगित्वं चेति संबन्धः। प्रसिद्धत्वमेव व्याकरोति श्रुतीति। इतोऽपि संन्यासाश्रमं भगवान्न प्रतिषेधतीत्याह स्ववचनेति। विरोधमेव साधयति सर्वकर्माणीत्यादिना। अनाश्रित इत्यादिवाक्यस्य यथाश्रुतार्थत्वानुपपत्तेः स्तुतिपरत्वमुपपादितमुपसंहरति तस्मादिति। कर्मफलसंन्यासित्वमत्र मुनिशब्दार्थः। स्तुतिपरं वाक्यमक्षरयोजनार्थमुदाहरति अनाश्रित इति। कर्मफलेऽभिलाषो नास्तीत्येतावता कथं तदनाश्रितत्ववाचोयुक्तिरित्याशङ्क्य व्यतिरेकमुखेन विशदयति यो हीति। कार्यमित्यादि व्याकरोति एवंभूतः सन्निति। कथं कर्मिणः संन्यासित्वं योगित्वं च कर्मित्वविरोधादित्याशङ्क्याह ईदृश इति। स्तुतेरत्र विवक्षितत्वान्नानुपपत्तिश्चोदनीयेति मन्वानः सन्नाह इत्येवमिति। न निरग्निरित्यादेरर्थमाह न केवलमिति। अग्नयो गार्हपत्याहवनीयान्वाहार्यपचनप्रभृतयः। नन्वनग्नित्वे सिद्धमक्रियत्वमग्निसाध्यत्वात्क्रियाणां तथाच न निरग्निरित्येतावतैवापेक्षितसिद्धेर्न चाक्रिय इत्यनर्थकमर्थपुनरुक्तेरिति तत्राह अनग्नीति।
Sri Dhanpati
पञ्चमाध्यायान्ते सम्यग्दर्शनं प्रत्यन्तरङ्गसाधनस्य ध्यानयोगस्य सूत्रस्थानीयास्त्रयः श्लोका उदाहृतास्तद्वृत्तिस्थानीयोऽयं षष्ठाध्याय आरभ्यते। तत्र तदधिकारसंपत्तये गृहस्थेनाधिकृतेन कर्तव्यमेव कर्मेत्यतस्तत्स्तौति अनाश्रित इति द्वाभ्याम्। कर्मणः फलमनाश्रितः कर्मफलतृष्णारहितः सन् कार्यमवश्यकर्तव्यं काम्यविपरीतं नित्याग्निहोत्रादिकं यः करोति स संन्यासी च योगी चेति कर्मफलतृष्णावद्य्भ इतरकर्मिभ्य उत्कृष्ट इति गौणप्रयोगेण स्तुयते। तथाच संन्यासः परित्यागः सोऽस्यास्तीति सः। योगश्चित्तसमाधानं सोऽस्यास्तीति स योगी चेत्येवमुभयगुणसंपन्नोऽयं मन्तव्यः न केवलं निरग्निरक्रिय एव संन्यासी योगी चेति मन्तव्यः। निर्गता अग्नयः कर्माङ्गभूता यस्मात्सः। अनग्निसाधना अप्यविद्यमानाः क्रियास्तपोदानादिका यस्य स नित्यसमाधिनिष्ठ इत्यर्थः। एतेन कार्यं कर्म यः करोति स एव संन्यासी च योगी च नतु निरग्निः नचाक्रिय इति प्रत्युक्तम्। न केवलं निरग्निरग्नयो गार्हपत्याहवनीयान्वाहार्यपचनप्रभृतयः तानुद्वास्य स्थित एव संन्यासी। तथा अन्याश्च तपोदानाद्याः क्रियास्तद्रहितः समाधिनिष्ठ एव योगी चेति। न चेति यथासंख्यमुभयव्यतिरेको व्याख्येयः। एतेनाग्निशब्देन सर्वाणि कर्माण्युपलक्ष्य निरग्निरिति संन्यासी। क्रियाशब्देन चित्तवृत्तीरुपलक्ष्याक्रिय इति निरुद्धचित्तवृत्तिर्योगीति कथ्यते इति लक्षणया व्याख्याय उभयव्यतिरेकप्रदर्शनं प्रत्युक्तम्। एवं भाष्योक्तेनर्जुमार्गेणाविरोधस्य सम्यगुपपत्त्या पूर्वाध्यायान्ते श्लोकद्वयेन सूत्रितं ज्ञानयोगं प्राधान्येन षष्ठे प्रपञ्चयिष्यन् श्रीभगवानुवाचेत्याद्यामूलतद्भाष्यतद्विरुद्धाः कल्पना उपेक्ष्याः।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| śhrī | bhagavān uvācha |
| anāśhritaḥ | not desiring |
| karma | phalam |
| kāryam | obligatory |
| karma | work |
| karoti | perform |
| yaḥ | one who |
| saḥ | that person |
| sanyāsī | in the renounced order |
| cha | and |
| yogī | yogi |
| cha | and |
| na | not |
| niḥ | without |
| agniḥ | fire |
| na | not |
| cha | also |
| akriyaḥ | without activity |
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हे अर्जुन ! लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता। — VaniSagar
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“श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 6 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1?
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1 translates to: "He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions—he is a sannyasi and a yogi, not he who is without fire and without action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"श्री भगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 6, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Abhyasa Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?
"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1. He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions—he is a sannyasi and a yogi, not he who is without fire and without action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.