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Bhagavad Gita · BG 5.4

Bhagavad Gita 5.4 — Commentary

19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्

sānkhya-yogau pṛithag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ ekamapyāsthitaḥ samyag ubhayor vindate phalam

"Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action, or the performance of action, as though they are distinct and different; he who is truly established in one, obtains the fruits of both."

Scholar Commentaries (19)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

सांख्ययोगौ पृथक् विरुद्धभिन्नफलौ बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। पण्डितास्तु ज्ञानिन एकं फलम् अविरुद्धम् इच्छन्ति। कथम् एकमपि सांख्ययोगयोः सम्यक् आस्थितः सम्यगनुष्ठितवान् इत्यर्थः उभयोः विन्दते फलम्। उभयोः तदेव हि निःश्रेयसं फलम् अतः न फले विरोधः अस्ति।।ननु संन्यासकर्मयोगशब्देन प्रस्तुत्य सांख्ययोगयोः फलैकत्वं कथम् इह अप्रकृतं ब्रवीति नैष दोषः यद्यपि अर्जुनेनसंन्यासं कर्मयोगं च केवलम् अभिप्रेत्य प्रश्नः कृतः भगवांस्तु तदपरित्यागेनैव स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य शब्दान्तरवाच्यतया प्रतिवचनं ददौ सांख्ययोगौ इति। तौ एव संन्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसमबुद्धित्वादिसंयुक्तौ सांख्ययोगशब्दवाच्यौ इति भगवतो मतम्। अतः न अप्रकृतप्रक्रियेति।।एकस्यापि सम्यगनुष्ठानात् कथम् उभयोः फलं विन्दते इति उच्यते

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

ज्ञानयोगकर्मयोगौ फलभेदात् पृथग्भूतौ ये प्रवदन्ति ते बालाः अनिष्पन्नज्ञानाः न पण्डिताः न तु कृत्स्नविदः। कर्मयोगो ज्ञानयोगम् एव साधयति ज्ञानयोगस्तु एक आत्मावलोकनं साधयति इति तयोः फलभेदेन पृथक्त्वं वदन्तो न पण्डिता इत्यर्थः।उभयोः आत्मावलोकनैकफलयोः एकफलत्वेन एकम् अपि आस्थितः तद् एव फलं लभते।एतद् एव विवृणोति

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

सन्न्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तःन तस्य तत्त्वग्रहणाय भाग.5।11।3 इत्यादौ। अतः कथं सोऽवम् इत्यत आह साङ्खयोगाविति। उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः। अग्निमुग्धो ह वै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रत्यभिजानाति।मा वः पदव्यः पितरस्मदास्थिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम् इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः। ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

किसी भी सामान्य कर्म को ईश्वर का पूजा में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं। एक है सभी कर्मों में कर्तृत्व के अभिमान का त्याग और दूसरा है फलासक्ति के कारण उत्पन्न होने वाली चिंताओं का त्याग जिसे दूसरे शब्दों में कहेंगे भोक्तृत्व के अभिमान का त्याग। प्रथम उपाय को कहते हैं सांख्य तथा दूसरे को योग।सांख्य मार्ग का अनुसरण सबके लिए संभव नहीं होता है। अत्यन्त मेधावी पुरुष ही संपूर्ण विश्व में हो रहे कर्मों का अवलोकन कर इस कर्तृत्त्व के अभिमान को त्याग सकता है। जीवन में प्राप्त उपलब्धियों के लिए जगत् में कितने ही व्यक्तियों एवं नियमों की अपेक्षा होती है। इसे समझ कर ही हम अपने व्यक्तिगत योगदान की क्षुद्रता समझ सकते हैं और तभी हम अपने मिथ्या कर्तृत्त्व की धारणा को भी त्याग सकते हैं।केवल बालक अर्थात् अपरिपक्व विचार के लोग ही सांख्य और योग में विरोध देखते हैं जबकि बुद्धिमान पुरुष जो किसी एक मार्ग का अवलंबन दृढ़ता से करते हैं दोनों मार्गों के समान प्रभाव को जानते हैं। यदि साधक के रूप में हम कर्तृत्व अभिमान अथवा फलासक्ति को त्यागते हैं तो हमें एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है।एक के ही सम्यक ् अनुष्ठान से दोनों के फल की प्राप्ति कैसे होगी उत्तर में कहते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

5.4 सांख्ययोगौ Sankhya (knowledge) and Yoga (Yoga of action or performance of action)? पृथक् distinct? बालाः children? प्रवदन्ति speak? न not? पण्डिताः the wise? एकम् one? अपि even? आस्थितः established in? सम्यक् truly? उभयोः of both? विन्दते obtains? फलम् fruit.Commentary Children the ignorant people who have no knowledge of the Self? and who have only a theoretical knowledge of the scriptures.Children or ignorant people only say that knowledge and the performance of action are different and produce distinct and opposite results. But the wise who have the knowledge of the Self say that they produce the same result only? viz.? Moksha or liberation. He who is duly established in,one? he who truly lives in one? Sankhya or Yoga? obtains the fruits of both. Therefore there is no diversity in the result or the fruit. This is the gist of this verse. (Cf.VI.2)

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः'--इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे 'संन्यास' और 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ 'सांख्य' नामसे कहते हैं। भगवान् शरीर-शरीरीके भेदविचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको 'सांख्य' कहते हैं। भगवान्के मतमें 'संन्यास' और 'सांख्य' पर्यायवाची हैं, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।अर्जुन जिसे 'कर्मसंन्यास' नामसे कह रहे हैं, वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे 'सांख्य' का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीर-शरीरीके भेदका ही विचार करता है।'बालाः' पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले मानते हैं, वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।जिन महापुरुषोंने सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको ठीक-ठीक समझा है, वे ही पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् हैं। वे लोग दोनोंको अलग-अलग फलवाले नहीं कहते; क्योंकि वे दोनों साधनोंकी प्रणालियोंको न देखकर उन दोनोंके वास्तविक परिणामको देखते हैं.साधन-प्रणालीको देखते हुए स्वयं भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्ययोग और कर्मयोगको दो प्रकारका साधन स्वीकार किया है। दोनोंकी साधन-प्रणाली तो अलग-अलग है, पर साध्य अलग-अलग नहीं है।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य परस्परविरुद्ध कर्मसंन्यास और कर्मयोगके फलमें भी विरोध होना चाहिये दोनोंका कल्याणरूप एक ही फल कहना ठीक नहीं इस शङ्काके प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है बालबुद्धिवाले ही सांख्य और योगइन दोनोंको अलगअलग विरुद्ध फलदायक बतलाते हैं पण्डित नहीं। ज्ञानी पण्डितजन तो दोनोंका अविरुद्ध और एक ही फल मानते हैं। क्योंकि सांख्य और योगइन दोनोंमेंसे एकका भी भलीभाँति अनुष्ठान कर लेनेवाला पुरुष दोनोंका फल पा लेता है। कारण दोनोंका वही ( एक ) कल्याणरूप ( परमपद ) फल है इसलिये फलमें विरोध नहीं है। पू0 संन्यास और कर्मयोग इन शब्दोंसे प्रकरण उठाकर फिर यहाँ प्रकरणविरुद्ध सांख्य और योगके फलकी एकता कैसे कहते हैं उ0 यह दोष नहीं है। यद्यपि अर्जुनने केवल संन्यास और कर्मयोगको पूछनेके अभिप्रायसे ही प्रश्न कियाथा परंतु भगवान्ने उसके अभिप्रायको न छोड़कर ही अपना विशेष अभिप्राय जोड़ते हुए सांख्य और योग ऐसे इन दूसरे शब्दोंसे उनका वर्णन करके उत्तर दिया है। क्योंकि वे संन्यास और कर्मयोग ही ( क्रमानुसार ) ज्ञानसे और उसके उपायरूप समबुद्धि आदि भावोंसे युक्त हो जानेपर सांख्य और योगके नामसे कहे जाते हैं यह भगवान्का मत है अतः यह वर्णन प्रकरणविरुद्ध नहीं है।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

यदुक्तं संन्यासकर्मयोगयोर्निःश्रेयसकरत्वं तदाक्षिपति संन्यासेति। तत्रोत्तरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति इति प्राप्त इति। विवेकिनस्तर्हि कथं वदन्तीत्याकाङ्क्षायामाह एकमिति। संख्यामात्मसमीक्षामर्हतीतिसांख्यं संन्यासो योगस्तु कर्मयोगस्तावुभावपि पृथगित्यस्यार्थमाह विरुद्धेति। शास्त्रार्थविवेकशून्यत्वं बालत्वम्। उत्तरार्धमवतारयितुं भूमिकां करोति पण्डितास्त्विति। ज्ञानिनो योगिनश्चेति शेषः। द्वयोरविरुद्धफलत्वमेव प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। एकं साधनमनुष्ठितवतो द्वयोरपि फलं भवतीति विरुद्धमित्याशङ्क्याह उभयोरिति। सांख्ययोगयोः संन्यासकर्मानुष्ठानयोस्तत्त्वज्ञानद्वारा निःश्रेयसफलत्वान्न विरुद्धफलत्वशङ्केत्यर्थः। सांख्ययोगयोरेकफलत्ववचनं प्रकरणाननुगुणमिति शङ्कते नन्विति। अप्रकृतत्वमसिद्धमिति परिहरति नैष दोष इति। संन्यासं कर्मणामित्यादिना संन्यासं कर्मयोगं चाङ्गीकृत्य प्रश्ने संन्यासः कर्मयोगश्चेत्यादिना तथैव प्रतिवचने च कथं सांख्ययोगयोरेकफलत्वमप्रकृतं न भवतीत्युच्यते तत्राह यद्यपीति। प्रतिवचनमपि तदनुरूपमेव भगवता निरूपितमिति विशेषानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह भगवांस्त्विति। तदपरित्यागेनेत्यत्र तत्पदेन प्रष्ट्रा प्रतिनिर्दिष्टौ कर्मसंन्यासकर्मयोगावुच्येते। सांख्ययोगाविति शब्दान्तरवाच्यतया तयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरत्यागेन स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य भगवान्प्रतिवचनं ददाविति योजना। यदुक्तं स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्येति तदेतद्व्यक्तीकरोति तावेवेति। समबुद्धित्वादीत्यादिशब्देन ज्ञानोपायभूतं शमादिरादीयते प्रकृतयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरुपादाने फलितमाह अत इति। सांख्ययोगावित्यादिश्लोकव्याख्यानसमाप्तिरितिशब्दार्थः।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

ननूभयोर्निःश्रेयसकरत्वमेकफलकत्वं न युक्तं भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः स्वरुपतोऽपि विरुद्धयोः फलतोऽपि विरोधस्योचितत्वात्। तस्मात्तयोर्यदेकं निःश्रेयसकरं तन्मे ब्रूहीत्यर्जुनाशङ्कामालक्ष्याह सांख्येति। यत्त्वेकत्र पाताशङ्का एकत्र कर्मश्रमस्तदनयोः पथोः कतरः श्रेयानित्याशङ्क्य द्वयोरपि फलतः साभ्यमित्याहेति तच्चिन्त्यम्। उभयोरप्यश्रेष्ठतां मन्यमानस्य कतरः श्रेयानिति प्रश्रस्यानुपपत्तेः। संख्या सभ्यगात्मबुद्धिस्तां वहतीति ज्ञानान्तरङ्गसाधनतया सांख्यः संन्यासः। एवं सांख्यशचब्दावाच्यः शमदमादिभिर्ज्ञानेन च संयुक्तः संन्यासोऽत्र विवक्षितः प्रस्तुतः। तथा प्रस्तुत एव कर्मयोगः ज्ञानोपायसमबुद्धित्वादिसंयुक्तः योगशब्दावाच्यः। तावेव संन्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसमबुद्धित्वादियुक्तौ सांख्ययोगशब्दवाच्याविति भाष्यात्। एतेन सांख्यशब्देन ज्ञाननिष्ठावाचिना तदङ्ग संन्यासं लक्षयतीति लक्षणा परास्ता। बाला अविवेकिनः तौ पृथक् भिन्नफलौ प्रवदन्ति न तु पण्डिताः शास्त्रज्ञा विवेकिनः। तेतु एकमपि कर्मयोगं संन्यासं वा सभ्यक् चित्तशुद्धिसंपादकं शमदमादियुक्तं वाऽऽस्थितोऽनुष्ठितवानुभयोः फलं निःश्रेयसं मोक्षं परम्परया साक्षाद्वा विन्दते लभत इति प्रवदन्तीत्यर्थः। यत्तुसमित्येकीभाव इति यास्कः। एकीभावेनात्मानन्यत्वेन ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुस्वरुपमनयेति संख्या स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चस्य निर्विकल्पे प्रत्यगात्मनि प्रविलापनेनोदिता चेतोवृत्तिस्तत्साधनभूतो यः सांख्यः संन्यासः सच दारादिबुद्य्धन्तानां पदार्थानामात्मन्येकीभावेन न्यसनं त्यागः प्रविलापनम् तथा योगोऽप्यग्निहोत्रसंध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तमनुष्ठानं तत्र मुख्ययोगस्य लक्षणयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति। वृत्तयश्चप्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। इति पञ्च। तावेतौ फलभूतौ सांख्ययोयौ उत साधनभूतौ संन्यासकर्मयोगाख्यौ। तत्रान्त्ययोः साम्यंज्ञेयः स नित्यसंन्यासी इत्यनेन सूचितमाद्ययोस्त्वैक्यमत्रोच्यते। आस्थितोऽनुतिष्ठन् फलं निर्विकल्पात्मनाऽवस्थितिरुपमित्यन्ये व्याचख्युस्तदर्जुनप्रश्नाननुगुणत्वेनोपेक्ष्यम्। संन्यासकर्मयोग्योः किं श्रेयस्करमिति तेनपृष्टत्वात्। अतएव भाष्यकृद्भिस्तत्रतत्र योगशब्दार्थः कर्मयोग इत्येव प्रदर्शितः। एतेन वृत्तेः पञ्चधात्ववर्णनमप्यप्रासङ्गिकत्वादपास्तम्।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

नन्वेकत्र पाताशङ्का एकत्र कर्मश्रमस्तदनयोः पथोः कतरः श्रेयानित्याशङ्क्य द्वयोरपि फलतः साम्यमित्याह सांख्ययोगाविति। सांख्यंसमित्येकीभावे इति यास्कः। एकीभावेनात्मानन्यत्वेन ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुस्वरूपमनयेति संख्या स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चस्य निर्विकल्पे प्रत्यगात्मनि प्रविलापनेनोदिता चेतोवृत्तिस्तत्साधनभूतो यः सांख्यः संन्यासः सच दारादिबुद्ध्यन्तानां पदार्थानामात्मन्येकीभावेन न्यसनं त्यागः प्रविलापनं तथा योगोऽप्यग्निहोत्रसंध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तमनुष्ठानं तत्र मुख्यस्य योगस्य लक्षणंयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति। वृत्तयश्चप्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः इति पञ्च। तत्र प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि तेषु प्रत्यक्षमिन्द्रियं तज्जा वृत्तिः शुक्त्यादिविषयं याथार्थ्येन ज्ञानम्। विपर्ययस्तु तत्रैव रजतादिविषयं भ्रान्तिरूपं ज्ञानम्। संशयोऽपि इयं शुक्तिर्वा रजतं वेत्यनिर्धारितान्यतरकोटिकं ज्ञानम्। स च विपर्यय एवान्तर्भवति। विकल्पस्तु शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः यथा पुरुषस्य चैतन्यं वन्ध्यापुत्र इति। नहि पुरुषचैतन्यतत्संबन्धानां पृथक्त्वमस्ति किंतु चैतन्यमेव हि शब्दत्रयेणोच्यते। नापि वन्ध्यासुतस्य स्वरूपमस्त्यथापि शब्देनाभिलप्यते। सोऽयं विकल्पः शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः एकस्मिन्ननेकबुद्धिरसति स सद्बुद्धिरिति। निद्रास्मृति लोकप्रसिद्धे। एतासां निरोधेऽपि निर्विकल्पः प्रत्यगात्मैवावशिष्यते। तावेतौ फलभूतौ सांख्ययोगौ। साधनभूतौ तावेव संन्यासकर्मयोगाख्यौ। तत्रान्त्ययोः साम्यंज्ञेयः स नित्यसंन्यासी इत्यनेन सूचितम्। आद्ययोस्त्वैक्यमत्रोच्यते। आस्थितोऽनुतिष्ठन्। फलं निर्विकल्पात्मनावस्थितिरूपम्।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

यस्मादेवमङ्गप्रधानत्वेनोभयोरवस्थाभेदेन क्रमसमुच्चयः। अतो विकल्पमङ्गीकृत्योभयोः कः श्रेष्ठ इति प्रश्नोऽज्ञानिनामेवोचितो न विवेकिनामित्याह सांख्ययोगाविति। सांख्यशब्देन ज्ञाननिष्ठावाचिना तदङ्गं संन्यासं लक्षयति। संन्यासकर्मयोगावेकफलौ सन्तौ पृथक्स्वतन्त्राविति बाला अज्ञा एव प्रवदन्ति नतु पण्डिताः। तत्र हेतुः अनयोरेकमपि सम्यगास्थित आश्रितः सन्नुभयोरपि फलं प्राप्नोति। तथाहि कर्मयोगं सम्यगनुतिष्ठन् शुद्धचित्तः सन् ज्ञानद्वारा यदुभयोः फलं कैवल्यं विन्दति। संन्यासं सम्यगास्थितोऽपि पूर्वमनुष्ठितस्य कर्मयोगस्यापि परम्परया ज्ञानद्वारा यदुभयोः फलं कैवल्यं तद्विन्दतीति न पृथक्फलत्वमनयोरित्यर्थः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

निश्श्रेयसकरावुभौ 5।2 इत्यभिप्रेतं विवृणोतीत्यभिप्रायेणाह ज्ञानयोगकर्मयोगयोरिति। अत्र साङ्ख्योगशब्दौ न कापिलहैरण्यगर्भसिद्धान्तविषयौ तयोरप्रस्तुतत्वात् महाप्रकरणासङ्गतत्वात्तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते 5।2सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः 5।6 इत्यादिपूर्वोत्तरविरोधात्। शारीरकसूत्रेषु चरचनानुपपत्तेश्च नानुमानं प्रवृत्तेश्च ब्र.सू.2।2।12एतेन योगः प्रत्युक्तः ब्र.सू.2।1।3 इत्यादिभिः सूत्रैस्तयोरपि सिद्धान्तयोः महर्षिणैवापाकरणात्बहवः पुरुषा राजन् (लोके) साङ्ख्ययोगविचा(रणे)रिणः। नैत (दि) इच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह।।समा(सतस्तु)सेन तु त(य)द्व्यासः पुरुषै(कत्व) कात्म्यमुक्तवान् इति मोक्षधर्मे म.भा.12।350।27तयोर्विरुद्धांशवचंनाच्च। अतः सङ्ख्यया बुद्ध्याऽवधारणीयमात्मतत्त्वं साङ्ख्यम् तदवधारणरूपं साङ्ख्यम् योगश्चात्र कर्मयोग इत्यभिप्रायेण ज्ञानयोगकर्मयोगशब्दोपादानम्।पृथग्बालाः प्रवदन्ति इति न स्वरूपपृथक्त्वं निषिध्यते तस्य प्रामाणिकत्वात्। न च तत्समुच्चयविधानपरमिदम्एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते 5।5सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः इत्यादिभिः पृथगनुष्ठानस्यैव सिद्धत्वात्। अतः फलैक्यस्यएकमप्यास्थितः इत्यादिना विधानात् अत्र फलभेदकृतभेदनिषेधे तात्पर्यमित्याहफलभेदात्पृथग्भूताविति। अस्य वाक्यस्य पृथक्फलवादिनां निन्दारूपत्वात्ये प्रवदन्ति ते बाला इति बालत्वस्योपादेयतया वचनव्यक्तिर्दर्शिता। उत्तरश्लोकेऽप्येकफलत्ववादिप्रशंसायांयः पश्यति इत्यनूद्यस पश्यति 5।5 इति हि विधीयते। बालशब्दस्यात्र मुख्यायोगादुपचरितमाह अनिष्पन्नज्ञाना इति। अपक्वयौक्तिकज्ञानेष्वपक्वपर्यायशब्दोपचारः बालसाम्याद्वा बालाः।न पण्डिताः इत्यत्र अशास्त्रीयानुष्ठानपर्यन्ताज्ञानव्युदासायोक्तंअकृत्स्नविद इति। तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बृ.उ.3।5।1 इत्यादिप्रसिद्धं सदाचार्यप्रसादैकसमधिगम्यार्थविषयं ज्ञानमिह पाण्डित्यम् अतोबालाः इत्युक्तेऽपि तदभावोक्तिर्न पुनरुच्यत इति भावः। फलादिभेदभ्रमप्रकारंन पण्डिताः इत्यस्यापिबालाः इतिवद्विधिविषयत्वं च दर्शयति कर्मयोग इति।ज्ञानयोगमेवेति न तु कस्मिन्नप्यधिकारिणि साक्षादात्मावलोकनमित्यर्थः। ये तुये बालास्त एवं वदन्ति ये पण्डितास्ते तु न इति वचनव्यक्तिमाहुः तेषामप्ययमेवार्थः फलतोऽङ्गीकार्यः। उभयोः फलमेकेन कथं लभ्यं इत्यत्राह उभयोरिति। निर्धारणे षष्ठी एकशब्दश्चान्यतरपर्यायः द्वयोरपि तुल्यफलत्वादन्यतरास्थानेऽपि तत्फलं सिद्ध्यतीत्यर्थः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

साँख्ययोगाविति। यत्सांख्यैरिति। इदं सांख्यं (S सांख्यज्ञानम्) अयं च योगः इति न भेदः। एतौ हि नित्यसंबद्धौ। ज्ञानं न योगेन विना योगोऽपि न तेन विनेति। अत एकत्वमनयोः।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

सन्न्यासं गृहीत्वा योगं त्यक्ष्यामीत्याशयेन द्वयोः श्रेयसि पृष्टे द्वावपि निश्श्रेयसकरौ तत्रापि सन्न्यासाद्योगो विशिष्टोऽतो न युद्धं त्वया त्याज्यमिति परिहारो जातः किमर्थमिदानीं साङ्ख्ययोगावित्युच्यतेइत्यत आह सन्न्यासो हीति। हिशब्दो हेतौ। ज्ञानान्तरङ्गत्वेन ज्ञानोत्पत्तावत्यावश्यकत्वेन।न तस्य इत्यत्र विषयवैराग्याभावे ज्ञानानुत्पत्तिवचनेन तत एव तदुत्पत्तिरिति लभ्यते। एवं कर्मयोगस्तु ज्ञानविरोधित्वेनोक्तः।अग्निमुग्धः इत्यादावित्यपि ग्राह्यम्। अवमो योगात्। अनेन योगस्य निश्श्रेयसकरत्वमप्याक्षिप्तम्। ननु साङ्ख्यं ज्ञानं योगः कर्म तयोः कथमत्र पृथक्त्वाभाव उच्यते कथं चानेनोक्ताक्षेपपरिहारः इत्यत आह उभयोरपीति। न केवलं सन्न्यासस्य किन्तु योगस्यापीत्युभयोरपि ज्ञानान्तरङ्गत्वान्नोक्तो विरोध इत्यर्थः। अनेन साङ्ख्ययोगौ पृथक्साध्यसाधनभावहीनाविति न पण्डिता मन्यन्त इत्येवं व्याख्यातं भवति। ननु श्रुतिपुराणाभ्यां कर्मणो ज्ञानविरोधित्वमुच्यत इत्युक्तम् अतः कथमेवमभिधीयते इत्यत आह अग्नीति। अग्न्युपलक्षिते कर्मणि मुग्धः श्रेयस्करमिति भ्रान्तः। धूमतान्तो होमधूमेन तान्तो ग्लानः। धूमता धूमादित्वमेवान्तःपर्यवसानमस्येति वा। स्वं लोकं स्वीयमाश्रयं परमात्मानम्। यज्ञशालासनेन धूमोपलक्षितमार्गवतां वः पदव्योऽस्मदाश्रिता नेत्यर्थः। नन्वकाम्यमपि नित्यं नैमित्तिकं च कर्म प्रत्यवायपरिहारार्थमेव न ज्ञानान्तरङ्गमिति विद्वांस एव मन्यन्त इत्यत आह ये त्विति। बाला अविवेकिनः।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

ननु यः कर्मणि प्रवृत्तः स कथं संन्यासीति ज्ञातव्यः कर्मतत्त्यागयोः स्वरूपविरोधात्। फलैक्यात्तथेति चेत् न स्वरूपतो विरुद्धयोः फलेऽपि विरोधस्यौचित्यात्। तथाच निःश्रेयसकरावुभावित्यनुपपन्नमित्याशङ्क्याह संख्या सम्यगात्मबुद्धिस्तां वहतीति ज्ञानान्तरङ्गसाधनतया सांख्यः संन्यासः। योगः पूर्वोक्तः कर्मयोगः। तौ पृथग्विरुद्धफलौ बालाः शास्त्रार्थज्ञानविवेकशून्याः प्रवदन्ति न पण्डिताः। किं तर्हि पण्डितानां मतम्। उच्यते एकमपि संन्यासकर्मणोर्मध्ये सम्यगास्थितः स्वाधिकारानुरूपेण सम्यग्यथाशास्त्रं कृतवान्सन्नुभयोर्विन्दते फलं ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण निःश्रेयसमेकमेव।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

उभयोर्हेयोपादेयज्ञानिनो मत्स्वरूपाद्भिन्नज्ञानिनश्च मूर्खा इत्याह साङ्ख्ययोगाविति। साङ्ख्ययोगौ पृथक् भिन्नतयाऽनुष्ठेयाननुष्ठेयत्वेन मताविति बाला मूर्खाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ज्ञानिन इत्यर्थः। अयं भावः साङ्ख्ययोगौ मत्कुण्डलात्मकौ तत्र हेयोपादेयज्ञानं मत्कुण्डलयोर्मदात्मकत्वात् भिन्नज्ञानं च ज्ञानमेवेति भावः। यतस्तथा ज्ञानमज्ञानमतः सम्यगास्थितो मत्स्वरूपपरो मदाज्ञया कुर्वन्नुभयोरप्येकं फलं मत्प्रसादरूपं विन्दते प्राप्नोतीत्यर्थः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

ननु साङ्ख्ययोगयोरेक एवार्थः कथमुत्पाद्यते शास्त्रभेदात् इत्याशङ्क्य एकफलविषयत्वेनाभेदमुख्यैकार्थ्यमुपदिशति साङ्ख्येति। साङ्ख्ये हि कर्मणां सन्न्यासः योगे चोपादानमिति भेदेऽपि स्वकर्मणि द्वन्द्वसन्न्यासपूर्वकं करणमर्थमेकमप्यास्थित उभयोः फलं विन्दतीति। यद्वा उभयोर्मध्ये एकमप्यास्थितः सम्यक् फलं विन्दतीति स्वातन्त्र्येण मीमांसितयोः परमपुरुषार्थसाधकत्वमुक्तम्। ऐकार्थ्येनोपादाने तथेति भगवन्मतम्। तदग्रे स्पष्टीभविष्यति।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

5.4 Balah, the fools; na panditah, not the learned ones; pravadanti, speak of; sankhya-yogau, Sankhya [Sankhya, i.e. monasticism, is that which is suited for sankhya, Self-iniry.] (the Path of Knowledge) and (Karma-)yoga; as prthak, different, having opposite and different results. The learned ones, the wise, however, admit one, unconflicting result. How? Any one who samyak, properly; asthitah, resorts to, i.e. follows; ekam api, even one, between the Path of Knowledge and (Karma-) yoga; vindate, gets; phalam, the result; ubhayoh, of both. For, the result of both is that Liberation itself. Therefore there is no conflict with regard to the result. Objection: After beginning the topic with the words, 'renunciation' and '(Karma-) yoga', how is it that the Lord speaks of the identity of the results of the path of Knowledge and (Karma-) yoga, which is beside the point? Reply: This defect does not arise. Although the estion was put by Arjuna merely with regard to renunciation and Karma-yoga, yet the Lord, without actually avoiding them, and by adding something special which was intended by Him, gave the answer by expressing them through other words, 'Sankhya' and '(Karma-) yoga'. Those very 'renunciation and 'Karma-yoga', when they are (respectively) associated with Knowledge and such of Its means as eanimity etc., are meant by the words 'Sankhya' and 'yoga'. This is the Lord's veiw. Therefore there is no discussion out of the context. How can the result of both be attained by the proper performance of only one? The answer is:

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

5.4 Those who say that Karma Yoga and Jnana Yoga are distinct because of the difference in results, are children, i.e., are persons with incomplete knowledge; they do not know the entire truth. The meaning is that they do not possess true knowledge, who say that Karma Yoga results in Jnana Yoga only and that Jnana Yoga alone results in the vision of the self and that the two are thus distinct because of the difference in their fruits. But on the contrary as both have only the vision of the self as the fruit, a person who is firmly set in one of them, wins that one fruit common to both. Sri Krsna further expounds the same:

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 5.4?

सांख्ययोगौ पृथक् विरुद्धभिन्नफलौ बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। पण्डितास्तु ज्ञानिन एकं फलम् अविरुद्धम् इच्छन्ति। कथम् एकमपि सांख्ययोगयोः सम्यक् आस्थितः सम्यगनुष्ठितवान् इत्यर्थः उभयोः विन्दते फलम्। उभयोः तदेव हि निःश्रेयसं फलम् अतः न फले विरोधः अस्ति।।ननु संन्यासकर्मयोगशब्देन प्रस्तुत्य सांख्ययोगयोः फलैकत्वं कथम् इह अप्रकृतं ब्रवीति नैष दोषः यद्यपि अर्जुनेनसंन्यासं कर्मयोगं च केवलम् अभिप्रेत्य प्रश्

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 5.4, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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