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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्

जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

மனரீதியாக எல்லாச் செயல்களையும் துறந்து, தன்னடக்கத்துடன் இருப்பவர், ஒன்பது வாயில்கள் கொண்ட நகரத்தில் மகிழ்ச்சியுடன் ஓய்வெடுக்கிறார், மற்றவர்களை (உடல் மற்றும் புலன்கள்) செயல்படவோ அல்லது செயல்படவோ செய்யாது.

KannadaIND

ಮಾನಸಿಕವಾಗಿ ಎಲ್ಲಾ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಿ ಮತ್ತು ಸ್ವಯಂ-ನಿಯಂತ್ರಿತನಾಗಿ, ಸಾಕಾರಗೊಂಡವನು ಒಂಬತ್ತು-ದ್ವಾರಗಳ ನಗರದಲ್ಲಿ ಸಂತೋಷದಿಂದ ವಿಶ್ರಾಂತಿ ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ, ಇತರರನ್ನು (ದೇಹ ಮತ್ತು ಇಂದ್ರಿಯಗಳು) ಕಾರ್ಯನಿರ್ವಹಿಸುವಂತೆ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ.

MalayalamIND

മാനസികമായി എല്ലാ കർമ്മങ്ങളും ത്യജിച്ച് ആത്മനിയന്ത്രണമുള്ളവനായി, മൂർത്തീഭാവമുള്ളവൻ ഒമ്പത് ഗേറ്റുകളുള്ള നഗരത്തിൽ സന്തോഷത്തോടെ വിശ്രമിക്കുന്നു, പ്രവർത്തിക്കുകയോ മറ്റുള്ളവരെ (ശരീരവും ഇന്ദ്രിയങ്ങളും) പ്രവർത്തിക്കാൻ പ്രേരിപ്പിക്കുകയോ ചെയ്യില്ല.

NepaliIND

मानसिक रूपमा सबै कर्म त्यागेर आत्म-नियन्त्रित भएर, अवतारित व्यक्तिले न त काम नै गर्छ, न अरूलाई (शरीर र इन्द्रिय) कर्म गराउने गरी नौ-द्वारको सहरमा आनन्दपूर्वक विश्राम गर्दछ।

MarathiIND

मानसिकरित्या सर्व कृतींचा त्याग करून आणि आत्म-नियंत्रित राहून, मूर्त स्वरूप नऊ द्वार असलेल्या नगरात आनंदाने विसावतो, ते काम करत नाही किंवा इतरांना (शरीर आणि इंद्रियांना) कृती करण्यास प्रवृत्त करत नाही.

SindhiIND

ذهني طور تي سڀني عملن کي ڇڏي ڏيڻ ۽ پاڻ تي ضابطو رکڻ، مجسم هڪ خوشيء سان نون دروازن واري شهر ۾ آرام ڪري ٿو، نه ڪم ڪري ٿو ۽ نه ئي ٻين (جسم ۽ حواس) کي عمل ڪرڻ جو سبب بڻائيندو آهي.

TeluguIND

మానసికంగా అన్ని చర్యలను త్యజించి, స్వీయ-నియంత్రణతో, మూర్తీభవించిన వ్యక్తి సంతోషంగా తొమ్మిది-గృహాల నగరంలో విశ్రాంతి తీసుకుంటాడు, ఇతరులను (శరీరం మరియు ఇంద్రియాలు) పని చేయనివ్వడు.

BengaliIND

মানসিকভাবে সমস্ত ক্রিয়া ত্যাগ করে এবং স্ব-নিয়ন্ত্রিত হয়ে, মূর্ত ব্যক্তি সুখের সাথে নয়টি-দ্বারযুক্ত নগরে বিশ্রাম নেয়, কাজ করে না বা অন্যদের (শরীর এবং ইন্দ্রিয়) কাজ করতে দেয় না।

PunjabiIND

ਮਾਨਸਿਕ ਤੌਰ 'ਤੇ ਸਾਰੀਆਂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਅਤੇ ਸਵੈ-ਨਿਯੰਤ੍ਰਿਤ ਹੋ ਕੇ, ਸਰੂਪ ਵਾਲਾ ਨੌ-ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਵਾਲੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾਲ ਆਰਾਮ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਤਾਂ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਦੂਜਿਆਂ (ਸਰੀਰ ਅਤੇ ਇੰਦਰੀਆਂ) ਨੂੰ ਕੰਮ ਕਰਨ ਲਈ ਕਰਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

માનસિક રીતે બધી ક્રિયાઓનો ત્યાગ કરીને અને સ્વ-નિયંત્રિત થઈને, મૂર્ત સ્વરૂપ નવ-દ્વારવાળા શહેરમાં આનંદથી આરામ કરે છે, ન તો અભિનય કરે છે અને ન તો અન્ય (શરીર અને ઇન્દ્રિયો) ને કાર્ય કરવા માટે કારણભૂત હોય છે.

DogriIND

मानसिक तौर उप्पर सारे कम्में दा त्याग करदे होई ते आत्मसंयम च रौंह्दे होई मूर्त रूप कन्नै नौ गेट आह्ले शैह् र च खुशी-खुशी आराम करदा ऐ, न ते न ते कम्म करदा ऐ ते न गै दुए (शरीर ते इंद्रियें) गी कम्म करने दा कारण बनदा ऐ।

MaithiliIND

मानसिक रूप सँ सब कर्म के त्याग करैत आ आत्मसंयमशील भ' क' मूर्त व्यक्ति नौ गेट वाला नगर मे सुखपूर्वक विश्राम करैत अछि, ने अभिनय करैत अछि आ ने दोसर (शरीर आ इन्द्रिय) के काज करैत अछि ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.13।। व्याख्या--'वशी देही'--इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-आसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार जमाते हैं। ममता-आसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-आसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये यहाँ उसे 'वशी' कहा गया है। जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर, इन्द्रियों आदि) के साथ किञ्चिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता है, तबतक वह प्रकृतिके 'अवश' अर्थात् वशीभूत रहता है--'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (गीता 3। 5)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण--तीनों शरीरोंसे ममता-आसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता। यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही दीखता है। इसलिये उसे 'देही'कहा गया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो यथार्थ ज्ञानी है वह ( वशी जितेन्द्रिय पुरुष ) समस्त कर्मोंको मनसे छोड़कर अर्थात् नित्य नैमित्तिक काम्य और निषिद्ध इन सब कर्मोंको कर्मादिमें अकर्मदर्शनरूप विवेकबुद्धिके द्वारा त्यागकर सुखपूर्वक स्थित हो जाता है। मन वाणी और शरीरकी चेष्टाको छोड़कर परिश्रमरहित प्रसन्नचित्त और आत्मासे अतिरिक्त अन्य सब बाह्य प्रयोजनोंसे निवृत्त हुआ ( वह ) सुखपूर्वक स्थित होता है ऐसे कहा जाता है। वशी जितेन्द्रिय पुरुष कहाँ और कैसे रहता है सो कहते हैं नौ द्वारवाले पुरमें रहता है। अभिप्राय यह कि दो कान दो नेत्र दो नासिका और एक मुख शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करनेके ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं और मलमूत्रका त्याग करनेके लिये दो नीचेके अङ्गमें हैं इन नौ द्वारोंवाला शरीर पुर कहलाता है। शरीर भी एक पुरकी भाँति पुर है जिसका स्वामी आत्मा है उस आत्माके लिये ही जिनके सब प्रयोजन हैं एवं जो अनेक फल और विज्ञानके उत्पादक हैं उन इन्द्रिय मन बुद्धि और विषयरूप पुरवासियोंसे जो युक्त है उस नौ द्वारवाले पुरमें देही सब कर्मोंको छोड़कर रहता है। पू0 इस विशेषणसे क्या सिद्ध हुआ संन्यासी हो चाहे असंन्यासी सभी जीव शरीरमें ही रहते हैं। इस स्थलमें विशेषण देना व्यर्थ है। उ0 जो अज्ञानी जीव शरीर और इन्द्रियोंके संघातमात्रको आत्मा माननेवाले हैं। वे सब घरमें भूमिपर या आसनपर बैठता हूँ ऐसे ही माना करते हैं क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धियुक्त अज्ञानियोंको घरकी भाँति शरीरमें रहता हूँ यह ज्ञान होना सम्भव नहीं। परंतु देहादिसंघातसे आत्मा भिन्न है ऐसा जाननेवाले विवेकीको मैं शरीरमें रहता हूँ यह प्रतीति हो सकती है। तथा निर्लेप आत्मामें अविद्यासे आरोपित जो परकीय ( देहइन्द्रियादिके ) कर्म हैं उनका विवेकविज्ञानरूप विद्याद्वारा मनसे संन्यास होना भी सम्भव है। जिससे विवेकविज्ञान उत्पन्न हो गया है ऐसे सर्वकर्मसंन्यासीका भी घरमें रहनेकी भाँति नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें रहना प्रारब्धकर्मोंके अवशिष्ट संस्कारोंकी अनुवृत्तिसे बन सकता है क्योंकि शरीरमें ही प्रारब्धफलभोगका विशेष ज्ञान होना सम्भव है। अतः ज्ञानी और अज्ञानीकी प्रतीतिके भेदकी अपेक्षासे देहे एव आस्ते इस विशेषणका फल अवश्य ही है। यद्यपि कार्य करण और कर्म जो अविद्यासे आत्मामें आरोपित हैं उन्हें छोड़कर रहता है ऐसा कहा है तथापि आत्मासे नित्य सम्बन्ध रखनेवाले कर्तापन और करानेकी प्रेरकता ये दोनों भाव तो उस ( आत्मा ) में रहेंगे ही। इस शङ्कापर कहते हैं स्वयं न करता हुआ और शरीरइन्द्रियादिसे न करवाता हुआ अर्थात् उनको कर्मोंमें प्रवृत्त न करता हुआ ( रहता है )। पू0 जैसे गमन करनेवालेकी गति गमनरूप व्यापारका त्याग करनेसे नहीं रहती वैसे ही आत्मामें जो कर्तृत्व और कारयितृत्व हैं वह क्या आत्माके नित्य सम्बन्धी होते हुए ही संन्याससे नहीं रहते अथवा स्वभावसे ही आत्मामें नहीं हैं उ0 आत्मामें कर्तृत्व और कारयितृत्व स्वभावसे ही नहीं हैं क्योंकि यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। हे कौन्तेय यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। ऐसा कह चुके हैं एवं ध्यान करता हुआसा क्रिया करता हुआसा। इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।

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Sri Anandgiri

तर्हि फले सक्तिं त्यक्त्वा सर्वैरपि कर्तव्यमिति कर्मसंन्यासस्य निरवकाशत्वमित्याशङ्क्याऽविदुषः सकाशाद्विदुषो विशेषं दर्शयति यस्त्विति। सर्वकर्मपरित्यागे प्राप्तं मरणं व्यावर्तयति आस्त इति। वृत्तिं लभमानोऽपि शरीरतापेनाध्यात्मिकादिना तप्यमानस्तिष्ठतीति चेन्नेत्याह सुखमिति। कार्यकरणसंघातपारवश्यं पर्युदस्यति वशीति। आसनस्यापेक्षितमधिकरणं निर्दिशति नवेति। देहसंबन्धाभिमानाभासवत्त्वमाह देहीति। मनसा सर्वकर्मसंन्यासेऽपि लोकसंग्रहार्थं बहिः सर्वं कर्म कर्तव्यमिति प्राप्तं प्रत्याह नैवेति। तान्येव सर्वाणि कर्माणि परित्याज्यानि विशिनष्टि नित्यमिति। तेषां परित्यागे हेतुमाह तानीति। यदुक्तं सुखमास्त इति तदुपपादयति त्यक्तेति। जितेन्द्रियत्वं कायवशीकारस्याप्युपलक्षणम् द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके वागेकेति सप्त शीर्षण्यानि शिरोगतानि शब्दाद्युपलब्धिद्वाराणि। अथापि कथं नवद्वारत्वमधोगताभ्यां पायूपस्थाभ्यां सहेत्याह अर्वागिति। शरीरस्य पुरसाम्यं स्वामिना पौरैश्चाधिष्ठितत्वेन दर्शयति आमेत्यादिना। यद्यपि देहे जीवनत्वाद्देहसंबन्धाभिमानाभासवानवतिष्ठते तथापि प्रवासीव परगेहे तत्पूजापरिभवादिभिरप्रहृष्यन्नविषीदन्व्यामोहादिरहितश्च तिष्ठतीति मत्वाह तस्मिन्निति। विशेषणमाक्षिपति किमिति। तदनुपपत्तिमेव दर्शयति सर्वो हीति। सर्वसाधारणे देहावस्थाने संन्यस्य देहे तिष्ठति विद्वानिति विशेषणमकिंचित्करमिति फलितमाह तत्रेति। विशेषणफलं दर्शयन्नुत्तरमाह उच्यत इति। किमविवेकिनं प्रति विशेषणानर्थक्यं चोद्यते किं वा विवेकिनं प्रतीति विकल्प्याद्यमङ्गीकरोति यस्त्विति। अज्ञत्वं देहित्वेहेतुः। तदेव देहित्वं स्फुटयति देहेति। संघातात्मदर्शिनोऽपि देहे स्थितिप्रतिभासः स्यादिति चेन्नेत्याह नहीति। द्वितीयं दूषयति देहादीति। गृहादिषु देहस्यावस्थानेनात्मावस्थानभ्रमव्यावृत्त्यर्थं देहे विद्वानास्त इति विशेषणमुपपद्यते विवेकवतो देहेऽवस्थानप्रतिभाससंभवादित्यर्थः। ननु विवेकिनो देहावस्थानप्रतिभानेऽपि वाङ्मनोदेहव्यापारात्मनां कर्मणां तस्मिन्प्रसङ्गाभावात्तत्त्यागेन कुतस्तस्य देहेऽवस्थानमुच्यते तत्राह परकर्मणां चेति। ननु विवेकिनो दिगाद्यनवच्छिन्नबाह्याभ्यन्तराविक्रियब्रह्मात्मतां मन्यमानस्य कुतो देहेऽवस्थानमास्थातुं शक्यते तत्राह उत्पन्नेति। तत्र हेतुमाह प्रारब्धेति। यदि प्रारब्धफलं धर्माधर्मात्मकं कर्म तस्योपभुक्तस्य शेषादनुपभुक्ताद्देहादिसंस्कारोऽनुवर्तते तदनुवृत्त्या च तत्रैव देहे विशेषविज्ञानमवस्थानविषयमुपपद्यतेऽतो विवेकवतः संन्यासिनो देहेऽवस्थानव्यपदेशः संभवतीत्यर्थः। अविद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणासंभवेऽपि विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरति देह एवेति। देहे स्वावस्थानविषयो विद्वत्प्रत्ययस्तदविषयश्चाविद्वत्प्रत्ययस्तयोरेवं भेदे विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरन्नेव हेतुं विशदयति विद्वदिति। आरोपितकर्तृत्वाद्यभावेऽपि स्वगतकर्तृत्वादि दुर्वारमित्याशङ्कामनूद्य दूषयति यद्यपीत्यादिना। क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति पूर्वेण संबन्धः। पूर्वस्यापि शतुरेवमेव संबन्धः। कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नेत्यत्र विचारयति किमिति। यत्कर्तृत्वं कारयितृत्वं च तत्किं देहिनः स्वात्मसमवायि सदेव संन्यासान्न भवतीत्युच्यते यथा गच्छतो देवदत्तस्य स्वगतैव गतिस्तत्स्थित्या त्यागान्न भवत्यथ वा स्वारस्येन कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नास्तीति वक्तव्यमाद्ये सक्रियत्वं द्वितीये कूटस्थत्वमित्यर्थः। द्वितीयं पक्षमाश्रित्योत्तरमाह अत्रेति। उक्तेऽर्थे वाक्योपक्रममनुकूलयति उक्तं हीति। तत्रैव वाक्यशेषमपि संवादयति शरीरस्थोऽपीति। स्मृत्युक्तेऽर्थे श्रुतिमपि दर्शयति ध्यायतीवेति। उपाधिगतैव सर्वा विक्रिया नात्मनि स्वतोऽस्तीत्यर्थः।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवमशुद्धचित्तस्याविदुषः संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यत इत्युपपादितम्। शुद्धचित्तः परमार्थदर्शी कथमास्त इत्यपेक्षायामाह सर्वेति। सर्वाणि नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं चेति तानि कर्माणि मनसा विवेकबुद्य्धा कर्मादावकर्मदर्शनेन संत्यज्य सुखमास्ते दुःखहेतुसर्वव्यापारोपरभात्। यतः वशी जितेन्द्रियः। क्व आस्त इत्यत आह। नवद्वारे पुरे। द्वे श्रोत्रे नेत्रे नासिके मुखं चेति सप्त शिरसि अवाक् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे। एवं नवद्वारयुक्ते पुरे नगरस्थानीये आत्मेकस्वामिके इन्द्रियाणि परिचारकाः बुद्धिरमात्योऽहंकारो युवराजो मनःशिल्पीत्येवंरुपैरिन्द्रियादिभिः पौरेरधिष्ठिते आस्ते। यतो देही देहाद्य्वतिरिक्तात्मदर्शी। यस्त्वज्ञः सतु देहात्मदर्शी गेहादावास्तेऽतो युक्तं विशेषणम्। यद्यप्येवं तथाप्यात्मसमवायित्वेन कर्तृत्वकारयितृत्वे तस्य स्यातामित्यत आह। नैव कुर्वन्स्वयं न च कारयन् कार्यकरणानि क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति संबन्धः। यत्तु वशी विवेकवैराग्यसंपन्नो नवद्वारे पुरे मानुषे शरीरे सुखमास्त इति संबन्धः। यद्यपि नवद्वारं श्वमार्जारादिशरीरमपि भवति तथापि वशिशब्दसंयोगान्मानुषमिति लभ्यते। सुखमिति क्रियाविशेषणम्। अनेनान्तःकरणस्य हर्षशोकादयः परिणामा निराकृताः। वशीत्यत्र वैराग्योक्त्या रागाद्यपरपर्यायकामतदवस्थाविशेषक्रोधरूपावन्तःकरणपरिणामौ वारितौ। विवेकोक्त्या चाहंकारतन्निबन्धनममकाराध्यासौ चिन्तनात्मकचित्तपरिणामं च निराकृत्य विशुद्धचिदाकारतया बुद्धेरवस्थानमुक्तम्। ततश्च विशुद्धचिदाकारबुद्धिपरिणाम एव निष्कृष्टो वशिशब्देनोक्तः। किं कृत्वेत्यत आह। मनसा सह सर्वकर्माणि संन्यस्य त्यागेन ज्ञानमप्युपलक्ष्यते। ततश्च संन्यस्यात्मानं ज्ञात्वा सुखमास्त इति ज्ञेयम्। वशिनं विशिनष्टि अदेहीति। देहो लिङ्गशरीरं तद्रहितः। अयमाशयः षोडशकलात्मा हि पुरुषः। तत्र भूतेन्द्रियप्राणाः प्रवर्त्याः। प्रवर्तकमन्तःकरणम्। तच्च बुद्धिसंकल्पकतया। सर्वो हि बुद्य्धा निश्चित्य मनसा संकल्प्य प्रवर्तते। तत्र मनस्त्यागेन विज्ञानकर्मत्यागः संभवतीति क्वेदानीं लिङ्गदेहः। नहि शिरसि च्छिन्ने कबन्धो देहतां प्रतिपद्यते इति मनसेत्युक्तम्। बुद्धिस्तु सर्वाकारपरित्यागेन चिन्मात्र उपसंक्रान्ताहंकारदीनां तु कथापि विवेकेनोमन्मूलितेतीतरे व्याचख्युः। तत्रेदं वक्तव्यम् वशिशब्दयोगं विनापि सर्वकर्माणीत्यादेर्योगात् प्रकरणाच्च मानुषशरीरमेवोपलभ्यते। सर्वकर्माणि संन्यस्येत्यनेन निषिद्धादिमननरुपमानसकर्मत्यागे मनस्त्यागसिद्य्धा त्यागकरणस्यापेक्षितत्वेन च सहशब्दध्याहृत्य पृथङ्यनस्त्यागवर्तनमसंगतम्। किंच विवेकयुक्तमेव मनस्त्यागोऽतो विवेकयुक्तेन मनसा सर्वकर्माणि संन्यस्येत्येव युक्तम्। एतेन वशिशब्देन विवेकवैराग्ययुक्तत्ववर्णनं प्रत्युक्तम्। वशिशब्दस्य स्वतन्त्रवाचि त्वेन जितेन्द्रियत्वप्रतीत्या इतरोक्तार्थस्यार्थिकार्थत्वात्। यदप्यदेही लिङ्गशरीररहित इति तदपि न। भेदबोधकेनिप्रत्येन देहादितरात्मदर्शीति वर्णनस्यैव नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य योगेन स्वारसिकत्वेन प्रश्लेषेण क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। इमामेवारुचिं मनसि निधाय पक्षान्तरस्यैतद्य्वाख्यानकर्तृभिर्दर्शितत्वाच्चेति दिक्। यदप्यन्ते वशी जितचित्तः। समाधिस्थो योगी नवद्वारे नवैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि षष्ठः प्राणस्तेनैव तत्प्रवर्त्यानां कर्मेन्द्रियाणां संग्रहः। बुद्य्धहंकारचित्तानीति नवैतानि द्वाराणीव पुरपतेर्जीवस्य भोगार्थं विषयप्रवेशस्थानानि यस्मिन्नवद्वारे पुरे शरीराख्ये विचित्रवासनाकल्पितानन्तविषयवति अनेकैः कर्मसचिवैरधिष्ठिते सुखदुःखादिनानापण्यवति मनसा सर्वद्वारेद्धाटनकुञ्चिकया सह सर्वाणि कर्माणि पुरपतिरिव राज्यकार्याणि संन्यस्य सुखं निर्विकल्पसंविन्मात्ररुपेणास्ते इति तदपि असङ्गतमेव। चित्तस्य वृत्तिनिरोधरुपजयापेक्षया वस्त्रादित्यागवदितरत्यागाप्रसिद्य्धा मनसा सहेति सहशब्दाध्याहारेण वर्णनस्य पुनरुक्तिग्रस्तत्वात्। मृतशरीरस्य पुरस्य सत्त्वेऽपि परोक्तद्वाराणामभावेन नवद्वाराणि यस्मिन्नित्युक्तेरनुचितत्वात्। निर्विकल्पसमाधिस्थस्य भोगप्राप्तिद्वाराणां लयादहं देहाद्भिन्न इत्येतावन्मात्रभानस्याप्यभावात्। नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य वैयर्थ्यापत्तेश्चेतिदिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvaall
karmāṇiactivities
manasāby the mind
sannyasyahaving renounced
āsteremains
sukhamhappily
vaśhīthe self
navadvāre
purein the city
dehīthe embodied being
nanever
evacertainly
kurvandoing anything
nanot
kārayancausing to be done
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Bhagavad Gita · 5.12
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कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.14
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परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 13
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्

जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ: "जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 13?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 13 translates to: "Mentally renouncing all actions and being self-controlled, the embodied one happily rests in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 13 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṁ vaśhī" mean in English?

"sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṁ vaśhī" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 13. Mentally renouncing all actions and being self-controlled, the embodied one happily rests in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.