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Sudarshana Chakra
Adhyay 5, Shlok 11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये

कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ಯೋಗಿಗಳು, ಮೋಹವನ್ನು ತೊರೆದು, ಆತ್ಮ ಶುದ್ಧಿಗಾಗಿ ದೇಹ, ಮನಸ್ಸು, ಬುದ್ಧಿ ಮತ್ತು ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಮೂಲಕ ಮಾತ್ರ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಾರೆ.

TamilIND

யோகிகள், பற்றுதலை விட்டுவிட்டு, உடல், மனம், புத்தி மற்றும் புலன்கள் மூலம் மட்டுமே சுயத்தின் தூய்மைக்காக செயல்களைச் செய்கிறார்கள்.

MalayalamIND

യോഗികൾ, ആസക്തി ഉപേക്ഷിച്ച്, ആത്മാവിൻ്റെ ശുദ്ധീകരണത്തിനായി ശരീരം, മനസ്സ്, ബുദ്ധി, ഇന്ദ്രിയങ്ങൾ എന്നിവയിലൂടെ മാത്രം കർമ്മങ്ങൾ ചെയ്യുന്നു.

SindhiIND

يوگي، وابستگي کي ڇڏي، نفس جي پاڪائيءَ لاءِ، صرف جسم، دماغ، عقل ۽ حتي حواس ذريعي عمل ڪن ٿا.

TeluguIND

యోగులు, అనుబంధాన్ని విడిచిపెట్టి, ఆత్మ శుద్ధి కోసం శరీరం, మనస్సు, బుద్ధి మరియు ఇంద్రియాల ద్వారా మాత్రమే క్రియలు చేస్తారు.

PunjabiIND

ਯੋਗੀ, ਮੋਹ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਦੀ ਸ਼ੁੱਧੀ ਲਈ ਸਰੀਰ, ਮਨ, ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਇੰਦਰੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਵੀ ਕਰਮ ਕਰਦੇ ਹਨ।

MarathiIND

योगी, आसक्तीचा त्याग करून, आत्मशुद्धीसाठी शरीर, मन, बुद्धी आणि इंद्रियांद्वारेच क्रिया करतात.

GujaratiIND

યોગીઓ, આસક્તિનો ત્યાગ કરીને, આત્મશુદ્ધિ માટે શરીર, મન, બુદ્ધિ અને ઇન્દ્રિયો દ્વારા જ ક્રિયાઓ કરે છે.

NepaliIND

योगीहरूले आसक्ति त्यागेर आत्मशुद्धिको लागि शरीर, मन, बुद्धि र इन्द्रियद्वारा मात्र कर्म गर्छन्।

BengaliIND

যোগীগণ, আসক্তি ত্যাগ করে, আত্মশুদ্ধির জন্য দেহ, মন, বুদ্ধি এমনকি ইন্দ্রিয়ের মাধ্যমে কর্ম সম্পাদন করেন।

MaithiliIND

योगी आसक्ति के त्याग कए केवल शरीर, मन, बुद्धि, आ इन्द्रिय तक के माध्यम स आत्म शुद्धि के लेल कर्म करैत छथि |

KonkaniIND

योगी आसक्ति सोडून फकत शरीर, मन, बुध्दी आनी इंद्रियांवरवीं लेगीत आत्म्याच्या शुध्दीखातीर कर्म करतात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

5.11।। व्याख्या--'योगिनः' यहाँ 'योगिनः'--पद कर्मयोगीके लिये आया है। जो योगी भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करते हैं, वे भक्तियोगी कहलाते हैं। परन्तु जो योगी केवल संसारकी सेवा के लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करते हैं, वे कर्मयोगी कहलाते हैं। कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे कर्म करते हुए भी उन्हें अपना नहीं मानता, प्रत्युत संसारका ही मानता है। कारण कि शरीरादिकी संसारके साथ एकता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उसके कर्मोंका फल तो केवल अन्तःकरणकी शुद्धिमात्र ही होता है क्योंकि योगी लोग केवल यानी मैं सब कर्म ईश्वरके लिये ही करता हूँ अपने फलके लिये नहीं। इस भावसे जिनमें ममत्वबुद्धि नहीं रही है ऐसे शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियोंसे फलविषयक आसक्तिको छोड़कर आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। सभी क्रियाओंमें ममताका निषेध करनेके लिये केवल शब्दका काया आदि सभी शब्दोंके साथ सम्बन्ध है। तेरा भी उसीमें अधिकार है इसलिये तू भी कर्म ही कर।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अविदुषस्तर्हि कृतेन कर्मणा किं स्यादित्याशङ्क्याह केवलमिति। अज्ञस्येश्वरार्पणबुद्ध्यानुष्ठितं कर्म बुद्धिशुद्धिफलमित्यत्रैव हेतुमाह यस्मादिति। केवलशब्दस्य प्रत्येकं संबन्धे प्रयोजनमाह सर्वव्यापारेष्विति। कर्मणश्चित्तशुद्धिफलत्वे तादर्थ्येन कर्मानुष्ठानमेव तव कर्तव्यमिति यस्मादित्यस्यापेक्षितं वदन्फलितमाह तस्मादिति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

यस्मात्कायेन केवलेनाहंभावममभाविवर्जितेन तथा केवलेन मनसा केवलया बुद्य्धा केवलैरिन्द्रियैरपि कर्मयोगिनः कर्म कुर्वन्ति। केवलैरितिपदं मनसेत्यनेन वचनस्य कायेन बुद्य्धेत्याभ्यां लिङ्गवचनयोर्व्यत्ययेन योजनीयम्। अत्रापरे केवलपदव्यावर्त्यं धनादि वर्णयन्ति। तथाहि केवलवाचालब्धधनादिलाभानपेक्षितता ततश्च केवलेन कायेन स्त्रानशौचद्विजोच्छिष्टमार्जनादीनि कर्माणि योगिनः कुर्वन्ति नतु तेषामतीतकालता नापि कदाचिद्धनापेक्षेति भावः। तथा केवलेन मनसा जगदीशध्यानं यथाशक्ति परोपकारसंकल्पनादीनि च कर्णाभ्यामुत्तमश्लेकजन्मकर्माकर्णनादीनि रसनया तीर्थनैवेद्यास्वादनादीनि घ्राणेन तदुपभुक्तमाल्यामोदग्रहणादीनि त्वचा पुण्यतीर्थोदकस्पर्शादीनि पद्य्भां तीर्थाटनादीनि हस्ताभ्यां परेशपूजादीनि वाचा स्तुत्यादीनि च कुर्वन्ति सङ्गं धनादिफलासङ्गं त्यक्त्वेति तैर्मानसादिकर्माणि धनाद्यपेक्षाऽप्रसक्तेस्तत्रापि स्वेन संबन्धितस्य केवलपदस्य वैयर्थ्य परिहर्तव्यम्। तस्मात्सर्वव्यापारेषु ममतावर्जिता योगिनः कर्म कुर्वन्ति। सङ्गं त्यक्त्वा फलविषयमात्मशुद्धये सत्त्वशुद्धय इत्यर्थ इति भाष्यमेव रमणीयम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kāyenawith the body
manasāwith the mind
buddhyāwith the intellect
kevalaiḥonly
indriyaiḥwith the senses
apieven
yoginaḥthe yogis
karmaactions
kurvantiperform
saṅgamattachment
tyaktvāgiving up
ātmaof the self
śhuddhayefor the purification
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Bhagavad Gita · 5.10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा

जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 5.12
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते

कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 5Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 5, Shlok 11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये

कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 5 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 11 translates to: "Yogis, having abandoned attachment, perform actions only through the body, mind, intellect, and even the senses, for the purification of the self. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 5, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Karma-Vairagya Yoga में संकलित है। कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api" mean in English?

"kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 11. Yogis, having abandoned attachment, perform actions only through the body, mind, intellect, and even the senses, for the purification of the self. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.