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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम

हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा? — VaniSagar

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TamilIND

அமிர்தம் போன்ற யாகத்தின் எச்சத்தை உண்பவர்கள் நித்தியமான பிரம்மத்தை நோக்கி செல்கின்றனர். யாகம் செய்யாதவனுக்கு இந்த உலகம் இல்லை; பிறகு எப்படி அவர்கள் மற்றொன்றைப் பெற முடியும், ஓ அர்ஜுனா?

GujaratiIND

જેઓ યજ્ઞના અવશેષો ખાય છે, જે અમૃત સમાન છે, તેઓ શાશ્વત બ્રહ્મ પાસે જાય છે. જે યજ્ઞ નથી કરતો તેના માટે આ સંસાર નથી; તો પછી હે અર્જુન, તેમની પાસે બીજી કઈ રીતે હોઈ શકે?

PunjabiIND

ਜੋ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਲੀ ਦੇ ਬਚੇ ਹੋਏ ਅੰਸ਼ ਖਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਸਦੀਵੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਕੋਲ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਸੰਸਾਰ ਉਸ ਲਈ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜੋ ਕੁਰਬਾਨੀ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ; ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਫਿਰ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਹੋਰ ਕਿਵੇਂ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ?

BengaliIND

যারা যজ্ঞের অবশিষ্টাংশ খায়, যা অমৃতের মতো, তারা চিরন্তন ব্রহ্মের কাছে যায়। যে ত্যাগ স্বীকার করে না তার জন্য এই পৃথিবী নয়; তাহলে হে অর্জুন, তারা কীভাবে অন্যকে পাবে?

TeluguIND

అమృతం వంటి యాగం యొక్క శేషాలను భుజించిన వారు శాశ్వతమైన బ్రహ్మం వద్దకు వెళతారు. ఈ ప్రపంచం యాగం చేయని వాడికి కాదు; అలాంటప్పుడు వారికి మరొకటి ఎలా ఉంటుంది, ఓ అర్జునా?

KannadaIND

ಅಮೃತದಂತಿರುವ ಯಜ್ಞದ ಶೇಷವನ್ನು ಯಾರು ಸೇವಿಸುತ್ತಾರೋ ಅವರು ಶಾಶ್ವತವಾದ ಬ್ರಹ್ಮನ ಬಳಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತಾರೆ. ಯಜ್ಞವನ್ನು ಮಾಡದವನಿಗೆ ಈ ಪ್ರಪಂಚವಿಲ್ಲ; ಹೀಗಿರುವಾಗ ಅವರು ಇನ್ನೊಂದನ್ನು ಹೇಗೆ ಹೊಂದುತ್ತಾರೆ, ಓ ಅರ್ಜುನ?

MalayalamIND

അമൃത് പോലെയുള്ള യാഗത്തിൻ്റെ അവശിഷ്ടങ്ങൾ ഭക്ഷിക്കുന്നവർ നിത്യമായ ബ്രഹ്മത്തിലേക്ക് പോകുന്നു. ഈ ലോകം യാഗം ചെയ്യാത്തവനുള്ളതല്ല; അർജ്ജുനാ, പിന്നെ എങ്ങനെ അവർക്ക് മറ്റൊന്ന് ലഭിക്കും?

NepaliIND

अमृतसमान यज्ञको अवशेष खानेहरू नित्य ब्रह्ममा जान्छन्। यो संसार यज्ञ नगर्नेको लागि होइन; त्यसोभए, हे अर्जुन, तिनीहरूले अर्को कसरी पाउन सक्छन्?

MarathiIND

जे यज्ञाचे अवशेष खातात, जे अमृतसारखे असतात, ते अनादि ब्रह्माकडे जातात. हे जग त्याग करणाऱ्याचे नाही; मग हे अर्जुना, त्यांना दुसरा कसा असेल?

SindhiIND

جيڪي قربانيءَ جي باقيات کي کائين ٿا، جيڪي امرت وانگر آهن، سي ابدي برهمڻ وٽ وڃن ٿا. هيءَ دنيا ان لاءِ ناهي، جيڪو قرباني نٿو ڪري. ته پوءِ اهي ٻئي ڪيئن هوندا، اي ارجن؟

KonkaniIND

अमृतासारक्या यज्ञाचे अवशेश जेवतात ते शाश्वत ब्रह्माकडेन वतात. हो संसार यज्ञ करिनाशिल्ल्या खातीर न्हय; मागीर तांकां दुसरो कसो मेळटलो अर्जुन?

AssameseIND

যিসকলে অমৃতৰ দৰে যজ্ঞৰ অৱশিষ্ট খায়, তেওঁলোকে চিৰন্তন ব্ৰহ্মৰ ওচৰলৈ যায়। এই জগত যজ্ঞ নকৰাজনৰ বাবে নহয়; তেন্তে তেওঁলোকৰ আনটো কেনেকৈ হ’ব, হে অৰ্জুন?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.31।। व्याख्या--'यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्'--यज्ञ करनेसे अर्थात् निष्कामभावपूर्वक दूसरोंको सुख पहुँचानेसे समताका अनुभव हो जाना ही 'यज्ञशिष्ट अमृत' का अनुभव करना है। अमृत अर्थात् अमरताका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं ( गीता 3। 13)।स्वरूपसे मनुष्य अमर है। मरनेवाली वस्तुओंके सङ्गसे ही मनुष्यको मृत्युका अनुभव होता है। इन वस्तुओंको संसारके हितमें लगानेसे जब मनुष्य असङ्ग हो जाता है, तब उसे स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है। कर्तव्यमात्र केवल कर्तव्य समझकर किया जाय, तो वह यज्ञ हो जाता है। केवल दूसरोंके हितके लिये किया जानेवाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है वह कर्तव्य नहीं होता, प्रत्युत कर्ममात्र होता है, जिससे मनुष्य बँधता है। इसलिये यज्ञमें देना-ही-देना होता है, लेना केवल निर्वाहमात्रके लिये होता है (गीता 4। 21)। शरीर यज्ञ करनेके लिये समर्थ रहे--इस दृष्टिसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये वस्तुओंका उपयोग करना भी यज्ञके अन्तर्गत है। मनुष्य-शरीर यज्ञके लिये ही है। उसे मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिमें लगाना बन्धनकारक है। केवल यज्ञके लिये कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनरहित (मुक्त) हो जाता है और उसे सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञोंका सम्पादन करके यज्ञोंके शेषका नाम यज्ञशिष्ट है वही अमृत है उसको जो भोगते हैं वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं। उपर्युक्त यज्ञोंको करके उससे बचे हुए समयद्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्नको भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्दकी शक्तिसे यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रमकी अपेक्षासे ( मरनेके बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोकमें रहकर फिर प्रलयके समय ) ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे एक भी यज्ञ नहीं करता उस यज्ञरहित पुरुषको सब प्राणियोंके लिये जो साधारण है ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता फिर विशेष साधनोंद्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

यथोक्तयज्ञनिर्वर्तनानन्तरं क्षीणे कल्मषे किं स्यादित्याशङ्क्याह एवमिति। यथोक्तानां यज्ञानां मध्ये केनचिदपि यज्ञेनाविशेषितस्य पुरुषस्य प्रत्यवायं दर्शयति नायमिति। कथं यथोक्तयज्ञानुष्ठायिनामवशिष्टेन कालेन विहितान्नभुजां ब्रह्मप्राप्तिरित्याशङ्क्य मुमुक्षुत्वे सति चित्तशुद्धिद्वारेत्याह मुमुक्षवश्चेदिति। तत्किमिदानीं साक्षादेव मोक्षो विवक्षितः तथाच गतिश्रुतिविरोधः स्यादित्याशङ्क्य गतिनिर्देशसामर्थ्यात्क्रममुक्तिरत्राभिप्रेतेत्याह कालातीति। तृतीयं पादं व्याचष्टे नायमिति। विवक्षितं कैमुतिकन्यायमाह कुत इति। साधारणलोकाभावे पुनरसाधारणलोकप्राप्तिर्दूरनिरस्तेत्यर्थः। यथोक्तेऽर्थे बुद्धिसमाधानं कुरुकुलप्रधानस्यार्जुनस्यानायासलभ्यमिति वक्तुं कुरुसत्तमेत्युक्तम्।

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Sri Dhanpati

एवं यथोक्तान्यज्ञान्निर्वर्त्य तच्छिष्टेन कालेन यथाविधिचोदितमन्नं अमृताख्यं भूञ्जत इति यज्ञशिष्टामृतभुजः। यत्त्वन्ये सर्वेषामप्येतेषां मध्येऽन्यतममप्यनुष्ठातुमशक्यं प्रति प्राह यञ्जेति। यज्ञाः पञ्चमहायज्ञास्तेभ्यः शिष्टमवशिष्टमन्नममृताख्यं ये भुञ्जत इत्यादि तच्चिन्त्यम्। श्रुतहानेरश्रुतकल्पनायाश्चान्याय्यत्वात्। पञ्चयज्ञानामपि दैवादिश्रौतस्मार्तयज्ञेष्वन्तर्भावाच्च। ब्रह्म सनातनं मोक्षाख्यं यान्ति। यथोक्तानां यज्ञानामेकोऽपि यज्ञो यस्य नास्ति सोऽयज्ञः तस्यायं लोकः सर्वप्राणिसाधारणोऽपि नास्ति। शुद्धचितेन श्रवणादिविशिष्टसाधनलभ्योऽन्यः सर्वलोकातीत आत्मस्वरुपस्तस्य कुतः। कुरुसत्तमेति संबोधयन् कुरवोऽपि यज्ञविद आसन् त्वं तु तेषु सत्तमः श्रेष्ठोऽतः त्वया यज्ञवित्त्वमवश्यं संपादनीयमिति सूचयति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yajñaśhiṣhṭa amṛita
yāntigo
brahmathe Absolute Truth
sanātanameternal
nanever
ayamthis
lokaḥplanet
astiis
ayajñasyafor one who performs no sacrifice
kutaḥhow
anyaḥother (world)
kurusat
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.30
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.32
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे

इस प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सब यज्ञोंको तू कर्मजन्य जान। इस प्रकार जानकर यज्ञ करनेसे तू (कर्मबन्धनसे) मुक्त हो जायगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम

हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31 translates to: "Those who eat the remnants of the sacrifice, which are like nectar, go to the eternal Brahman. This world is not for the one who does not perform sacrifice; how then can they have the other, O Arjuna? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुस" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam" mean in English?

"yajña-śhiṣhṭāmṛita-bhujo yānti brahma sanātanam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31. Those who eat the remnants of the sacrifice, which are like nectar, go to the eternal Brahman. This world is not for the one who does not perform sacrifice; how then can they have the other, O Arjuna? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.