Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 30
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

தங்கள் உணவை ஒழுங்குபடுத்தும் மற்றவர்கள் ஒவ்வொரு உயிர்-மூச்சிலும் உயிர்-மூச்சுகளை வழங்குகிறார்கள். இவர்கள் அனைவரும் தியாகத்தை அறிந்தவர்கள், அவர்களின் பாவங்கள் தியாகத்தால் அழிக்கப்படுகின்றன.

AssameseIND

আন কিছুমানে যিসকলে নিজৰ খাদ্যাভ্যাস নিয়ন্ত্ৰণ কৰে, তেওঁলোকে প্ৰতিটো জীৱন-শ্বাসতে জীৱন-শ্বাস আগবঢ়ায়। এই সকলো বলিদানৰ জ্ঞানী, যাৰ পাপ বলিদানৰ দ্বাৰা ধ্বংস হয়।

ManipuriIND

ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯗꯥꯏꯠ ꯑꯗꯨ ꯔꯤꯒꯨꯂꯦꯠ ꯇꯧꯔꯤꯕꯥ ꯑꯇꯩ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯥ ꯂꯥꯏꯐ-ꯕ꯭ꯔꯦꯊ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛꯇꯥ ꯂꯥꯏꯐ-ꯕ꯭ꯔꯦꯊꯁꯤꯡ ꯄꯤ꯫ ꯍꯥꯌꯔꯤꯕꯥ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯑꯁꯤ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯒꯤ ꯃꯔꯃꯗꯥ ꯈꯉꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯤ, ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯄꯥꯄꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯒꯤ ꯈꯨꯠꯊꯥꯡꯗꯥ ꯃꯥꯡꯍꯅꯕꯥ ꯉꯝꯃꯤ꯫

KonkaniIND

हेर लोक जे आपल्या आहाराचेर नियंत्रण दवरतात ते दर एका जिवीत-श्वासांत जिवीत-श्वास दितात. हे सगळे यज्ञ जाणकार, जांकां बलिदानांतल्यान पातकांचो नाश जाता.

DogriIND

दूए जेह्ड़े अपने आहार गी नियंत्रित करदे न ओह् हर जीवन-श्वास च जीवन-श्वास पेश करदे न । एह् सारे बलिदान दे जानकार न, जिंदे पाप बलिदान दे जरिए नष्ट होंदे न।

MizoIND

Mi dangte chuan an ei leh in tur tidanglamtu chuan nunna thaw tinrengah nunna thaw an pe thin. Heng zawng zawng hi inthawina hretu an ni a, an sualte chu inthawina hmanga tihboral vek an ni.

BhojpuriIND

बाकी लोग जे अपना आहार के नियंत्रित करेला, हर जीवन-श्वास में जीवन-सांस देवेला। ई सब बलिदान के जानकार हवें, जेकर पाप बलिदान के माध्यम से नाश हो जाला।

BengaliIND

অন্যরা যারা তাদের খাদ্য নিয়ন্ত্রণ করে তারা প্রতিটি জীবন-শ্বাসে জীবন-নিশ্বাস দেয়। এরা সকলেই ত্যাগের জ্ঞানী, যজ্ঞের মাধ্যমে যাদের পাপ বিনষ্ট হয়।

KannadaIND

ತಮ್ಮ ಆಹಾರವನ್ನು ನಿಯಂತ್ರಿಸುವ ಇತರರು ಪ್ರತಿ ಜೀವ-ಉಸಿರಾಟದಲ್ಲಿ ಜೀವ-ಉಸಿರಾಟವನ್ನು ನೀಡುತ್ತಾರೆ. ಇವರೆಲ್ಲರೂ ತ್ಯಾಗವನ್ನು ತಿಳಿದವರು, ಅವರ ಪಾಪಗಳು ತ್ಯಾಗದಿಂದ ನಾಶವಾಗುತ್ತವೆ.

TeluguIND

వారి ఆహారాన్ని నియంత్రించే ఇతరులు ప్రతి జీవ శ్వాసలో జీవ శ్వాసలను అందిస్తారు. వీరంతా త్యాగం తెలిసినవారు, వారి పాపాలు త్యాగం ద్వారా నశిస్తాయి.

NepaliIND

अरू जसले आफ्नो आहार विनियमित गर्दछ प्रत्येक जीवन-श्वासमा जीवन-सास प्रदान गर्दछ। यि सबै बलिदानका जानकार हुन्, जसका पाप यज्ञद्वारा नष्ट हुन्छन्।

SindhiIND

ٻيا جيڪي پنهنجي غذا کي منظم ڪن ٿا انهن جي زندگي جي هر سانس ۾ زندگي جي سانس پيش ڪن ٿا. اهي سڀ قربانيءَ جا ڄاڻو آهن، جن جا گناهه قربانيءَ سان ناس ٿين ٿا.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.30।। व्याख्या--'अपाने जुह्वति ৷৷. प्राणायामपरायणाः' --प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) है । श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना 'प्राण' का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना 'अपान' का कार्य है। योगीलोग पहले बाहरकी वायुको बायीं नासिका-(चन्द्रनाड़ी-) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको 'पूरक' कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु-- दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको 'कुम्भक' कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका-(सूर्यनाड़ी-) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछे-पीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको 'रेचक' कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक, सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है। इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक, फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बार-बार पूरक-कुम्भक-रेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । 'अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति'--नियमित आहार-विहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं। अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता 6। 16 17)।प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है--प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपने-अपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे 'स्तम्भवृत्ति प्राणायाम' भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापोंका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणोंको यानी वायुके भिन्नभिन्न भेदोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं। भाव यह है कि वे जिसजिस वायुको जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायुभेद उसमें विलीनसे हो जाते हैं। ये सभी पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले और यज्ञोंद्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञोंद्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं वे यज्ञक्षपितकल्मष कहलाते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्राणापानयोर्गती श्वासप्रश्वासौ निरुध्य किं कुर्वन्तीत्यपेक्षायामाह किञ्चेति। प्राणापानगतिनिरोधरूपं कुम्भकं कृत्वा पुनःपुनर्वायुजयं कुर्वन्तीत्यर्थः। आहारस्य परिमितत्वं हितत्वमेध्यत्वोपलक्षणार्थम्। प्राणानां प्राणेषु होममेव विभजते यस्येति। जितेषु वायुभेदेष्वजितानां तेषां होमप्रकारं प्रकटयति ते तत्रेति। प्रकृतान्यज्ञानुपसंहरति सर्वेऽपीति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

द्वादशयज्ञमाह अपर इति। नियतः परिमित आहारो येषां ते नियताहाराः सन्तः प्राणानजितान्वायुभेदान् प्राणेषु जितेषु वायुभेदेषु जुह्वति। तेऽजिता अपि तत्र प्रविष्टा जिता इव भवन्तीत्यर्थः। यत्तु अपरे त्वाहारसंकोचमभ्यसन्तः स्वयमेव जीर्यमाणेष्विन्द्रियेषु तत्तदिन्द्रियवृत्तिलयं होमं भावयन्तीत्यर्थः। यद्वाअपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे इत्यनेन पूरकरेचकयोरावर्तमानयोर्हंसः सोहमित्यनुलोमतः प्रतिलोमतश्चाभिव्यज्यमानाऽजपामन्त्रेण तत्त्वंपदार्थैक्यं व्यतिहारेण भावयन्तीत्यर्थः। प्राणापानगती इत्यनेन तु श्लोकेन प्राणायामयज्ञाः अपने कल्प्यन्ते तत्रायमर्थः द्वौ भागौ पूरयेदन्नैस्तोयेनैकं प्रपूरयेत्। मारुतस्य प्रचारार्थ चतुर्थमवशेष्येत्।। इत्येवमुक्तो नियतः आहारो येषां ते कुम्भकेन प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः सन्तः प्राणानिन्द्रियाणि प्राणेषु जुह्वति। कुम्भके सर्वे प्राणा एकीभवन्ति तत्रैव लीयमानेष्विन्द्रियेषु होमं भावयन्तीति भाष्यविरुद्धं व्याचख्युस्तदुपेक्ष्यम्। प्रसिद्धार्थपरित्यागबीजभूतानुपपत्त्याद्यनुपलब्ध्या श्रोत्रादीन्द्रिहोमस्य प्रत्याहाररुपेष्वग्निषूक्तत्वेन च पक्षान्तरे श्लोकोत्तरार्धस्य सत्यपि संभवे स्वपूर्वार्धेनान्वयं विहायापरपूर्वार्धेनान्वयस्यान्याय्यत्वेन पूरकरेचकयोरित्यादिग्रन्थस्याक्षरार्थत्वाभावेन च पूरकरेचककुम्भकरुपं प्राणायामं कुर्वन्तीति भाष्योक्तस्यैव सम्यक्त्वात्। एतेन प्राणानिन्द्रियाणीत्याद्यापि प्रत्युक्तम् लोकाप्रसिद्धार्थकल्पनापत्तेः। अतएव प्राणेषु बाह्याभ्यन्तरकुम्भकाभ्यासनिगृहीतेषु प्राणान् ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियरुपान् जुह्वति चतुष्कुम्भकाभ्यासेन विलापयन्तीत्यर्थ इत्यपास्तम्। इन्द्रियाणि जुह्वती युक्त्या इन्द्रियनिरोधयज्ञस्याप्युपलब्ध्या प्राणायामयज्ञमाह सार्धेनेति स्वोक्तिविरोधाच्च। यदपि नियताहारा वैराग्यादिमन्तः प्राणानत्र समनस्कानीन्द्रियाणि प्राणशब्देन गृह्यन्ते। द्वितीयान्तप्राणशब्देन श्रोत्रादीनि वागादीनि च गृह्यन्ते तान्प्राणान्प्राणेषु समनश्चित्ताहंकारेष्वन्तःकरणवृत्तिभेदेषु जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रियाणि संकल्पात्मके मनसि संहृत्य मनोऽपि स्मरणात्मके चित्ते संहृत्य तदप्यहंकारे संहरन्ति स चाभिमानरुपोऽहंकारोऽभिमन्तव्याभावात्स्वयमेव दग्धेन्धनानलवद्विलीयत इत्यन्ये। तदप्यसमञ्जसम्। लोकाप्रसिद्धार्थकल्पनादिदोषस्यात्रापि तुल्यत्वादितिदिक्। एते सर्वेऽपि यज्ञविदो यज्ञानां ज्ञातारः कर्तारश्च यज्ञैर्यथोक्तैः क्षपिता नाशिताः कल्मषाः पापानि येषां ते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
apareothers
niyatacontrolled
āhārāḥeating
prāṇānoutgoing air
prāṇeṣuin the outgoing air
sarveall
apialthough apparently different
eteall these
yajñavidaḥconversant with the purpose of performing
yajñasacrifices
kṣapitabeing cleansed of the result of such performances
kalmaṣāḥsinful reactions
juhvatisacrifices.
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.29
अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम

हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 30
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 30
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 30 का हिंदी अर्थ: "दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 30?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 30 translates to: "Others who regulate their diet offer life-breaths in each life-breath. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 30 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati" mean in English?

"apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 30. Others who regulate their diet offer life-breaths in each life-breath. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.