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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति

अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं। — VaniSagar

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TamilIND

சில யோகிகள் தெய்வங்களுக்கு மட்டும் யாகம் செய்கிறார்கள்; மற்றவர்கள், சுயத்தை உணர்ந்தவர்கள், பிரம்மத்தின் நெருப்பில் மட்டுமே சுயத்தை தியாகம் செய்கிறார்கள்.

MarathiIND

काही योगी केवळ देवांनाच यज्ञ करतात; तर इतर ज्यांना आत्मस्वरूपाचा साक्षात्कार झाला आहे, ते केवळ ब्रह्माच्या अग्नीत आत्मत्याग करतात.

TeluguIND

కొంతమంది యోగులు దేవతలకు మాత్రమే యాగం చేస్తారు; మరికొందరు, ఆత్మను గ్రహించినవారు, బ్రహ్మం యొక్క అగ్నిలో మాత్రమే ఆత్మను త్యాగం చేస్తారు.

KannadaIND

ಕೆಲವು ಯೋಗಿಗಳು ದೇವತೆಗಳಿಗೆ ಮಾತ್ರ ಯಜ್ಞವನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಾರೆ; ಇತರರು, ಆತ್ಮವನ್ನು ಅರಿತುಕೊಂಡವರು, ಬ್ರಹ್ಮನ ಅಗ್ನಿಯಲ್ಲಿ ಆತ್ಮವನ್ನು ತ್ಯಾಗವಾಗಿ ಅರ್ಪಿಸುತ್ತಾರೆ.

BengaliIND

কিছু যোগী একাই দেবতাদের উদ্দেশ্যে যজ্ঞ করেন; অন্যরা, যারা আত্মাকে উপলব্ধি করেছে, তারা ব্রহ্মের আগুনে আত্মাকে উৎসর্গ করে।

MalayalamIND

ചില യോഗികൾ ദേവന്മാർക്ക് മാത്രം യാഗം ചെയ്യുന്നു; ആത്മസാക്ഷാത്ക്കാരം നേടിയ മറ്റുചിലർ സ്വയം ബ്രഹ്മാഗ്നിയിൽ മാത്രം ബലിയർപ്പിക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਕੁਝ ਯੋਗੀ ਇਕੱਲੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ ਬਲੀਦਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ; ਜਦੋਂ ਕਿ ਦੂਸਰੇ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਨੁਭਵ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੀ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਬਲੀਦਾਨ ਵਜੋਂ ਭੇਟ ਕਰਦੇ ਹਨ।

GujaratiIND

કેટલાક યોગીઓ એકલા દેવતાઓને યજ્ઞ કરે છે; જ્યારે અન્યો, જેમણે આત્માનો સાક્ષાત્કાર કર્યો છે, તેઓ એકલા બ્રહ્મના અગ્નિમાં સ્વયંને બલિદાન તરીકે અર્પણ કરે છે.

SindhiIND

ڪي يوگي صرف ديوتائن کي قرباني ڏيندا آهن. جڏهن ته ٻيا، جن پاڻ کي محسوس ڪيو آهي، اهي پاڻ کي برهمڻ جي باهه ۾ قربان ڪري ڇڏيندا آهن.

NepaliIND

केही योगीहरूले देवताहरूलाई मात्र बलिदान गर्छन्; जबकि अन्य, जसले आत्मालाई प्राप्त गरेका छन्, ब्रह्मको अग्निमा एक्लै स्वयंलाई बलि चढाउँछन्।

OdiaIND

କେତେକ ଯୋଗୀ କେବଳ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ବଳିଦାନ କରନ୍ତି; ଅନ୍ୟମାନେ, ଯେଉଁମାନେ ଆତ୍ମକୁ ଅନୁଭବ କରିଛନ୍ତି, ସେମାନେ କେବଳ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଅଗ୍ନିରେ ବଳିଦାନ ଦିଅନ୍ତି |

MaithiliIND

किछु योगी केवल देवताक यज्ञ करैत छथि; जखन कि आन लोक जे आत्म-साक्षात्कार कएने छथि, ओ केवल ब्रह्मक अग्नि मे आत्म केँ यज्ञक रूप मे अर्पित करैत छथि |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते'-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सर्वत्र ब्रह्मदर्शनरूप यज्ञ करनेवाले साधकका वर्णन किया। यहाँ भगवान् 'अपरे' पदसे उससे भिन्न प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंका वर्णन करते हैं।यहाँ 'योगिनः' पद यज्ञार्थ कर्म करनेवाले निष्काम साधकोंके लिये आया है।सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना 'दैवयज्ञ' अर्थात् भगवदर्पणरूप यज्ञ है। भगवान् देवोंके भी देव हैं ,इसलिये सब कुछ उनके अर्पण कर देनेको ही यहाँ 'दैवयज्ञ' कहा गया है।किसी भी क्रिया और पदार्थमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति, ममता और कामना न रखकर उन्हें सर्वथा भगवान्का मानना ही दैवयज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करना है।'ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति'--इस श्लोकके पूर्वार्धमें बताये गये दैवयज्ञसे भिन्न दूसरे यज्ञका वर्णन करनेके लिये यहाँ 'अपरे' पद आया है।चेतनका जडसे तादात्म्य होनेके कारण ही उसे जीवात्मा कहते हैं। विवेक-विचारपूर्वक जडसे सर्वथा विमुख होकर परमात्मामें लीन हो जानेको यहाँ यज्ञ कहा गया है। लीन होनेका तात्पर्य है--परमात्मतत्त्वसे भिन्न अपनी स्वतन्त्र सत्ता किञ्चिन्मात्र न रखना।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त श्लोकमें यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करके अब उसकी स्तुति करनेके लिये दैवम् एव इत्यादि श्लोकोंसे दूसरेदूसरे यज्ञोंका भी उल्लेख किया जाता है जिस यज्ञके द्वारा देवोंका पूजन किया जाता है वह देवसम्बन्धी यज्ञ है अन्य ( कितने ही ) योगी अर्थात् कर्म करनेवाले लोग उस दैवयज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं। अन्य ( ब्रह्मवेत्ता पुरुष ) ब्रह्माग्निमें ( हवन करते हैं ) अर्थात् ब्रह्म सत्यज्ञानअनन्तस्वरूप है विज्ञान और आनन्द ही ब्रह्म है जो साक्षात् अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है वह ब्रह्म है जो सर्वान्तर आत्मा है वह ब्रह्म है इत्यादि वचनोंसे जिसका वर्णन किया गया है जो भूखप्यास आदि समस्त सांसारिक धर्मोंसे रहित है जो ऐसा नहीं ऐसा नहीं इस प्रकार वेदवाक्योंद्वारा सब विशेषणोंसे परे बतलाया गया है वह ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है। हवनका अधिकरण बतलानेके लिये उस ब्रह्मको ही यहाँ अग्नि कह दिया है। उस ब्रह्मरूप अग्निमें कितने ही ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी यज्ञद्वारा यज्ञको हवन करते हैं। आत्माके नामोंमें यज्ञ शब्दका पाठ होनेसे आत्माका नाम यज्ञ है जो कि वास्तवमें परब्रह्म ही है परंतु बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त हुआ उपाधियोंके धर्मोंको अपनेमें मान रहा है। उस आहुतिरूप आत्माको उपर्युक्त आत्माद्वारा ही हवन करते हैं। सारांश यह कि उपाधियुक्त आत्माको जो उपाधिरहित परब्रह्मरूपसे साक्षात् करना है वही उसका उसमें हवन करना है ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानमें स्थित हुए वे संन्यासी लोग ऐसा हवन किया करते हैं। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप इत्यादि श्लोकोंसे स्तुति करनेके लिये यह सम्यग्दर्शनरूप यज्ञ ब्रह्मार्पणम् इत्यादि श्लोकोंद्वारा दैवयज्ञ आदि यज्ञोंमें सम्मिलित किया जाता है।

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Sri Anandgiri

ज्ञानस्य यज्ञत्वं संपाद्य पूर्वश्लोके स्थिते सत्यधुना तस्यैव ज्ञानस्य स्तुत्यर्थं यज्ञान्तरनिर्देशार्थमुत्तरग्रन्थप्रवृत्तिरित्याह तत्रेति। सर्वस्य श्रेयःसाधनस्य मुख्यगौणवृत्तिभ्यां यज्ञत्वं दर्शयन्नादौ यज्ञद्वयमादर्शयति दैवमेवेत्यादिना। प्रतीकमादाय दैवयज्ञं व्याचष्टे देवा इति। सम्यग्ज्ञानाख्यं यज्ञं विभजते ब्रह्माग्नाविति। तत्र ब्रह्मशब्दार्थं श्रुत्यवष्टम्भेन स्पष्टयति सत्यमिति। यदजमनृतं विपरीतमपरिच्छिन्नं ब्रह्म तस्य परमानन्दत्वेन परमपुरुषार्थत्वमाह विज्ञानमिति। तस्य ज्ञानाधिकरणत्वेनज्ञानत्वमौपचारिकमित्याशङ्क्याह यत्साक्षादिति। जीवब्रह्मविभागे कथमपरिच्छिन्नत्वमित्याशङ्क्य विशिनष्टि य आत्मेति। परस्यैवात्मत्वं सर्वस्माद्देहादेरव्याकृतान्तादान्तरत्वेन साधयति सर्वान्तर इति। विधिमुखं सर्वमेवोपनिषद्वाक्यं ब्रह्मविषयमादिशब्दार्थः। निषेधमुखं ब्रह्मविषयमुपनिषद्वाक्यमशेषमेवार्थतो निबध्नाति अशनायेति। ब्रह्मण्यग्निशब्दप्रयोगे निमित्तमाह स होमेति। बुद्ध्यारूढतया सर्वस्य दाहकत्वाद्विलयस्य वा हेतुत्वादिति द्रष्टव्यम्। यज्ञशब्दस्यात्मनि त्वंपदार्थे प्रयोगे हेतुमाह आत्मनामस्विति। आधाराधेयभावेन वास्तवभेदं ब्रह्मात्मनोर्व्यावर्तयति परमार्थत इति। कथं तर्हि होमो नहि तस्यैव तत्र होमः संभवतीत्याशङ्क्याह बुद्ध्यादीति। उपाधिसंयोगफलं कथयति अध्यस्तेति। उपाध्यध्यासद्वारा तद्धर्माध्यासे प्राप्तमर्थं निर्दिशति आहुतीति। इत्थंभूतलक्षणां तृतीयामेव व्याकरोति उक्तेति। अशनायादिसर्वसंसारधर्मवर्जितेन निर्विशेषेण स्वरूपेणेति यावत्। आत्मनो ब्रह्मणि होममेव प्रकटयति सोपाधिकस्येति। अपर इत्यस्यार्थं स्फोरयति ब्रह्मेति। उक्तस्य ज्ञानयज्ञस्य दैवयज्ञादिषु ब्रह्मार्पणमित्यादिश्लोकैरुपक्षिप्यमाणत्वं दर्शयति सोऽयमिति। उपक्षेपप्रयोजनमाह श्रेयानिति।

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Sri Dhanpati

सभ्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं संपाद्य तत्स्तुत्यर्थमन्येऽपि यज्ञा उपक्षिप्यन्ते दैवमेवेत्यादिना। देवा एवेज्यन्तेऽनेनाग्निष्टोमादिनासौ दैवो यज्ञस्तमपरे कर्मयोगिनः पर्युपासते कुर्वन्ति ब्रह्माग्नौसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यादिश्रुत्युक्तमसंसारिस्वरुपं ब्रह्म तदेव होमाधिकरणविवक्षयाऽग्निः तस्मिन्नपरे ब्रह्मविदः। आत्मनाभसु यज्ञशब्दस्य पाठात्। यज्ञमात्मानं जीवमाहुतिरुपं यज्ञेन सत्यादिलक्षणेनोपजुह्वति सोपाधिकस्यात्मनो निरुपाधिकेन परब्रह्मरुपेणैव। यदवलोकनं स तस्मिन्होमस्तं कुर्वन्तीत्यर्थः। ब्रह्मरुपेऽग्नौ यज्ञेनैवोपायेन ब्रह्मार्पणमित्युक्तप्रकारेण यज्ञमुपजुह्वति। यज्ञादिसर्वकर्म प्रविलापयन्तीत्यर्थ इति वा। अस्मिन्पक्षे यज्ञं यज्ञेनेत्यनयोः स्वारस्यं श्रोत्रादीनीत्यादिनोक्तयज्ञानुगुण्यं चिन्त्यम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
daivamthe celestial gods
evaindeed
apareothers
yajñamsacrifice
yoginaḥspiritual practioners
paryupāsateworship
brahmaof the Supreme Truth
agnauin the fire
apareothers
yajñamsacrifice
yajñenaby sacrifice
evaindeed
upajuhvatioffer
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना

जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.26
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति

अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 25
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति

अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ: "अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 25?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 25 translates to: "Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 25 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate" mean in English?

"daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 25. Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.