
“जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है। — VaniSagar”
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பிரம்மம் என்பது பிரசாதம்; பிரம்மன் என்பது உருகிய வெண்ணெய் (நெய்); பிரம்மன் மூலம் பிரம்மனின் நெருப்பில் ஊற்றப்படும் பிரசாதம்; எப்பொழுதும் பிரம்மத்தை செயலில் பார்ப்பவர் உண்மையில் பிரம்மத்தை அடைவார்.
ബ്രഹ്മം വഴിപാടാണ്; ബ്രഹ്മം ഉരുകിയ വെണ്ണയാണ് (നെയ്യ്); ബ്രഹ്മത്താൽ ബ്രാഹ്മണൻ്റെ അഗ്നിയിൽ ഒഴിക്കുന്ന വഴിപാടാണ്; എപ്പോഴും ബ്രഹ്മത്തെ പ്രവർത്തനത്തിൽ കാണുന്ന ഒരാൾക്ക് തീർച്ചയായും ബ്രഹ്മം ലഭിക്കും.
બ્રહ્મ અર્પણ છે; બ્રાહ્મણ એ ઓગળેલું માખણ (ઘી) છે; બ્રાહ્મણ દ્વારા બ્રાહ્મણની અગ્નિમાં રેડવામાં આવતું અર્પણ છે; જે હંમેશા બ્રહ્મને ક્રિયામાં જુએ છે તેને ખરેખર બ્રહ્મ પ્રાપ્ત થશે.
ব্রহ্ম হল উৎসর্গ; ব্রাহ্মণ হল গলিত মাখন (ঘি); ব্রাহ্মণ দ্বারা ব্রাহ্মণের আগুনে ঢেলে দেওয়া অর্ঘ্য; যিনি সর্বদা ব্রহ্মকে কর্মে দেখেন তিনিই প্রকৃতপক্ষে ব্রহ্ম লাভ করবেন।
ब्राह्मण अर्पण हो; ब्राह्मण पग्लिएको मक्खन (घ्यू) हो; ब्राह्मणद्वारा ब्राह्मणको आगोमा खन्याइएको अर्पण हो। ब्रह्मलाई सधैं कर्ममा देख्नेले नै ब्रह्म प्राप्त गर्छ।
బ్రహ్మం అర్పణ; బ్రహ్మం కరిగిన వెన్న (నెయ్యి); బ్రాహ్మణునిచే బ్రాహ్మణుని అగ్నిలో పోసిన నైవేద్యము; ఎల్లప్పుడూ బ్రహ్మాన్ని కార్యరూపంలో చూసే వ్యక్తి నిజంగా బ్రహ్మను పొందగలడు.
ಬ್ರಹ್ಮವು ನೈವೇದ್ಯ; ಬ್ರಹ್ಮನು ಕರಗಿದ ಬೆಣ್ಣೆ (ತುಪ್ಪ); ಬ್ರಹ್ಮನಿಂದ ಬ್ರಹ್ಮನ ಅಗ್ನಿಗೆ ಸುರಿದ ನೈವೇದ್ಯ; ಯಾವಾಗಲೂ ಬ್ರಹ್ಮವನ್ನು ಕ್ರಿಯೆಯಲ್ಲಿ ನೋಡುವವನಿಗೆ ಬ್ರಹ್ಮವು ಪ್ರಾಪ್ತಿಯಾಗುತ್ತದೆ.
ब्रह्म हे अर्पण आहे; ब्रह्म म्हणजे वितळलेले लोणी (तूप); ब्राह्मणाने ब्राह्मणाच्या अग्नीत ओतलेले अर्पण आहे; जो ब्रह्म नेहमी कृतीत पाहतो त्यालाच ब्रह्म प्राप्त होते.
ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਭੇਟਾ ਹੈ; ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਪਿਘਲੇ ਹੋਏ ਮੱਖਣ (ਘਿਉ) ਹੈ; ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੁਆਰਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੀ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਡੋਲ੍ਹਿਆ ਬਲੀਦਾਨ ਹੈ; ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਉਸ ਨੂੰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜੋ ਹਮੇਸ਼ਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨੂੰ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਵੇਖਦਾ ਹੈ।
برهمڻ اوطاق آهي. برهمڻ آهي پگھريل مکڻ (گهي)؛ برهمڻ طرفان برهمڻ جي باھ ۾ ھاريو ويندو آھي. برهمڻ حقيقت ۾ ان کي حاصل ٿيندو، جيڪو هميشه برهمڻ کي عمل ۾ ڏسندو آهي.
ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ ꯑꯁꯤ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯥ ꯑꯗꯨꯅꯤ; ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯟ ꯍꯥꯌꯕꯁꯤ ꯇꯔꯨ ꯇꯅꯥꯅꯕꯥ ꯃꯩꯁꯥ (ꯘꯤ); ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯅꯥ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯒꯤ ꯃꯩꯗꯥ ꯊꯥꯗꯣꯀꯈꯤꯕꯥ ꯀꯠꯊꯣꯀꯄꯥ ꯑꯗꯨꯅꯤ; ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ ꯑꯁꯤ ꯇꯁꯦꯡꯅꯃꯛ ꯃꯇꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯕꯨ ꯊꯕꯛꯇꯥ ꯎꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯐꯪꯒꯅꯤ |
ब्रह्म हवि थिक; ब्रह्म पिघलल मक्खन (घृत) थिक; ब्रह्म द्वारा ब्रह्म के अग्नि में ढारल गेल हवि; ब्रह्म वास्तव मे प्राप्त होयत जे ब्रह्म केँ सदिखन कर्म मे देखैत अछि।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या--[यज्ञमें आहुति मुख्य होती है। वह आहुति तब पूर्ण होती है, जब वह अग्निरूप ही हो जाय अर्थात् हव्य पदार्थकी अग्निसे अलग सत्ता ही न रहे। इसी प्रकार जितने भी साधन हैं, सब साध्यरूप हो जायँ, तभी वे यज्ञ होते हैं।जितने भी यज्ञ हैं, उनमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करना भावना नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है। भावना तोपदार्थोंकी है। इस चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन किया गया है, वे सब 'कर्मयोग' के अन्तर्गत हैं। कारण कि भगवान्ने इस प्रकरणके उपक्रममें भी 'तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्' (4। 16) ऐसा कहा है; और उपसंहारमें भी 'कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे' (4। 32)--ऐसा कहा है तथा बीचमें भी कहा है--'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' (4। 23)। मुख्य बात यह है कि यज्ञकर्ताके सभी कर्म 'अकर्म' हो जायँ। यज्ञ केवल यज्ञ-परम्पराकी रक्षाके लिये किये जायँ तो सब-के-सब कर्म अकर्म हो जाते हैं। अतः इन सब यज्ञोंमें 'कर्ममें अकर्म' का ही वर्णन है।]'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः'-- जिस पात्रसे अग्निमें आहुति दी जाती है, उस स्रुक्, स्रुवा आदिको यहाँ 'अर्पणम्' पदसे कहा गया है--'अर्प्यते अनेन इति अर्पणम्।' उस अर्पणको ब्रह्म ही माने।तिल, जौ, घी आदि जिन पदार्थोंका हवन किया जाता है, उन हव्य पदार्थोंको भी ब्रह्म ही माने। 'ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्'-- आहुति देनेवाला भी ब्रह्म ही है (गीता 13। 2), जिसमें आहुति दी जा रही है, वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म ही है--ऐसा माने।
Sri Harikrishnadas Goenka
किये जानेवाले कर्म अपना कार्य आरम्भ किये बिना ही ( कुछ फल दिये बिना ही ) किस कारणसे फलसहित विलीन हो जाते हैं इसपर कहते हैं ब्रह्मवेत्ता पुरुष जिस साधनद्वारा अग्निमें हवि अर्पण करता है उस साधनको ब्रह्मरूप ही देखा करता है अर्थात् आत्माके सिवा उसका अभाव देखता है। जैसे ( सीपको जाननेवाला ) सीपमें चाँदीका अभाव देखता है ब्रह्म ही अर्पण है इस पदसे भी वही बात कही जाती है। अर्थात् जैसे यह समझता है कि जो चाँदीके रूपमें दीख रही है वह सीप ही है। ( वैसे ही ब्रह्मवेत्ता भी समझता है कि जो अर्पण दीखता है वह ब्रह्म ही है ) ब्रह्म और अर्पण यह दोनों पद अलगअलग हैं। अभिप्राय यह कि संसारमें जो अर्पण माने जाते हैं वे स्रुक् स्रुव आदि सब पदार्थ उस ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें ब्रह्म ही हैं। वैसे ही जो वस्तु हविरूपसे मानी जाती है वह भी उसकी दृष्टिमें ब्रह्म ही होता है। ब्रह्माग्नौ यह पद समासयुक्त है। इसलिये यह अर्थ हुआ कि ब्रह्मरूप कर्ताद्वारा जिसमें हवन किया जाता है वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और वह कर्ता भी ब्रह्म ही है और जो उसके द्वारा हवनरूप क्रिया की जाती है वह भी ब्रह्म ही है। उस ब्रह्मकर्ममें स्थित हुए पुरुषद्वारा प्राप्त करनेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है। अर्थात् ब्रह्मरूप कर्ममें जिसके चित्तका समाधान हो चुका है उस पुरुषद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार लोकसंग्रह करना चाहनेवाले पुरुषद्वारा किये हुए कर्म भी ब्रह्मबुद्धिसे बाधित होनेके कारण अर्थात् फल उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित कर दिये जानेके कारण वास्तवमें अकर्म ही हैं। ऐसा अर्थ मान लेनेपर कर्मोंको छोड़ देनेवाले कर्म संन्यासीके ज्ञानको भी यथार्थ ज्ञानकी स्तुतिके लिये यज्ञरूप समझना भली प्रकार बन सकता है अधियज्ञमें जो स्रुवादि वस्तुएँ प्रसिद्ध हैं वे सब इस यथार्थ ज्ञानी संन्यासीके ( सम्यक्ज्ञानरूप ) अध्यात्मयज्ञमें ब्रह्म ही हैं। उपर्युक्त अर्थ नहीं माननेसे वास्तवमें सब ही ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल स्रुव आदिको ही विशेषतासे ब्रह्मरूप बतलाना व्यर्थ होगा। सुतरां यह सब कुछ ब्रह्म ही है इस प्रकार समझनेवाले ज्ञानीके लिये वास्तवमें सब कर्मोंका अभाव ही हो जाता है। तथा उसके अन्तःकरणमें ( क्रिया फल आदि ) कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिका अभाव होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है क्योंकि कोई भी यज्ञ नामक कर्म कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिसे रहित नहीं देखा गया। अभिप्राय यह है कि अग्निहोत्रादि सभी कर्म ( इन्द्राय वरुणाय आदि ) शब्दोंद्वारा हवि आदि द्रव्य जिनके अर्पण किये जाते हैं उन देवताविशेषरूप सम्प्रदान आदि कारकबुद्धिवाले तथा कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे युक्त देखे गये हैं। जिसमेंसे क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी हो तथा जो कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे रहित हो ऐसा यज्ञ नहीं देखा गया। परंतु यह उपर्युक्त कर्म तो ऐसा है कि जिसमें सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण अर्पणादि कारक क्रिया और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है। इसलिये यह अकर्म ही है। यही बात कर्मण्यकर्म यः पश्येत् कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः गुणा गुणेषु वर्तन्ते नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इत्यादि श्लोकोंद्वारा भी दिखलायी गयी है। और इसी प्रकार दिखलाते हुए भगवान् जगहजगह क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धिका निषेध कर रहे हैं। देखा भी गया है कि सकाम अग्निहोत्रादिमें कामना न रहनेपर वे सकाम अग्निहोत्रादि नहीं रहते। ( उनकी सकामता नष्ट हो जाती है। ) तथा यह भी देखा गया है कि जानबूझकर किये हुए और अनजानमें किये हुए कर्म भिन्नभिन्न कार्योंके आरम्भक होते हैं अर्थात् उनका फल अलगअलग होता है। वैसे ही यहाँ भी जिस पुरुषकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेसे ( स्रुव हवि आदिमें ) क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है उस ज्ञानी पुरुषके बाह्य चेष्टामात्रसे होनेवाले कर्म भी अकर्म हो जाते हैं। इसलिये कहा है कि उसके फलसहित कर्म विलीन हो जाते हैं। इस विषयमें कोईकोई टीकाकार कहते हैं कि जो ब्रह्म है वही स्रुव आदि है अर्थात् ब्रह्म ही स्रुव आदि पाँच प्रकारके कारकोंके रूपमें स्थित है और वही कर्म किया करता है ( उनके सिद्धान्तानुसार ) उपर्युक्त यज्ञमें स्रुव आदि बुद्धि निवृत्त नहीं की जाती किंतु स्रुव आदिमें ब्रह्मबुद्धि स्थापित की जाती है जैसे कि मूर्ति आदिमें विष्णु आदि देवबुद्धि या नाम आदिमें ब्रह्मबुद्धि की जाती है। ठीक है यदि यह प्रकरण ज्ञानयज्ञकी स्तुतिके लिये न होता तो यह अर्थ भी हो सकता था। परंतु इस प्रकरणमें तो यज्ञ नामसे कहे जानेवाले अलगअलग बहुतसे क्रियाभेदोंको कहकर फिर द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ कल्याणकर है इस कथनद्वारा ज्ञानयज्ञ शब्दसे कथित सम्यक् दर्शनकी स्तुति करते हैं। तथा इस प्रकरणमें जो ब्रह्मार्पणम् इत्यादि वचन है यह ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करनेमें समर्थ भी है नहीं तो वास्तवमें सब कुछ ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल अर्पण ( स्रुव ) आदिको ही अलग करके ब्रह्मरूपसे विधान करना व्यर्थ होगा। जो ऐसा कहते हैं कि यहाँ मूर्तिमें विष्णु आदिकी दृष्टिके सदृश या नामादिमें ब्रह्मबुद्धिकी भाँति अर्पण ( स्रुव ) आदि यज्ञकी सामग्रीमें ब्रह्मबुद्धि स्थापन करायी गयी है उनकी दृष्टिसे सम्भवतः इस प्रकरणमें ब्रह्मविद्या नहीं कही गयी है क्योंकि ( उनके मतानुसार ) ज्ञानका विषय स्रुव आदि यज्ञकी सामग्री ही है ब्रह्म नहीं। इस प्रकार केवल ब्रह्मदृष्टि सम्पादनरूप ज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं मिल सकता और यहाँ ( स्पष्ट ही ) यह कहा है कि उसके द्वारा प्राप्त किया जानेवाला फल ब्रह्म ही है फिर बिना यथार्थ ज्ञानके मोक्षरूप फल मिलता है यह कहना सर्वथा विपरीत है। इसके सिवा ( ऐसा मान लेनेसे ) प्रकरणमें भी विरोध आता है। अभिप्राय यह है कि जो कर्ममें अकर्म देखता है इस प्रकार यहाँ आरम्भमें सम्यक् ज्ञानका ही प्रकरण है तथा उसीमें उपसंहार होनेके कारण अन्तमें भी यथार्थ ज्ञानका ही प्रकरण है। क्योंकि द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है ज्ञानको पाकर परम शान्तिको तुरंत ही प्राप्त हो जाता है इत्यादि वचनोंसे यथार्थ ज्ञानकी स्तुति करते हुए ही यह अध्याय समाप्त हुआ है। फिर बिना प्रकरण अकस्मात् मूर्तिमें विष्णुदृष्टिकी भाँति स्रुव आदिमें ब्रह्मदृष्टिका विधान बतलाना उपयुक्त नहीं। सुतरां जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है इस श्लोकका अर्थ वैसा ही है।
Sri Anandgiri
नाभुक्तं क्षीयते कर्म इति स्मृतिमाश्रित्य शङ्कते कस्मादिति। समस्तस्य क्रियाकारकफलात्मकस्य द्वैतस्य ब्रह्ममात्रत्वेन बाधितत्वाद्ब्रह्मविदा ब्रह्ममात्रस्य कर्म प्रविलीयते सर्वमिति युक्तमित्याह उच्यत इति। ब्रह्मविदो ब्रह्मैव सर्वक्रियाकारकफलजातं द्वैतमित्यत्र हेतुत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति यत इति। अर्पणशब्दस्य करणाविषयत्वं दर्शयन्नर्पणं ब्रह्मेति पदद्वयपक्षे सामानाधिकरण्यं साधयति येनेति। यद्रजतं सा शुक्तिरितिवद्बाधायामिदं सामानाधिकरण्यमित्याह तस्येति। तत्र दृष्टान्तमाह यथेति। उक्तेऽर्थे पदद्वयमवतारयति तद्वदुच्यत इति। उक्तमेवार्थं स्पष्टयति यथा यदिति। समाससंख्यां व्यावर्तयति ब्रह्मेति। पदद्वयपक्षे विवक्षितमर्थं कथयति यदर्पणेति। ब्रह्महविरिति पदद्वयमवतार्य व्याचष्टे ब्रह्मेत्यादिना। यदर्पणबुद्ध्या गृह्यते तद्ब्रह्मविदो ब्रह्मैवेति यथोक्तं तथेहापीत्याह तथेति। अस्येति षष्ठी ब्रह्मविदमधिकरोति। पर्ववदसमासमाशङ्क्य व्यावर्तयन्पदान्तरमवतार्य व्याकरोति तथेति। प्रागुक्तासमासवदिति व्यतिरेकः। तत्र विवक्षितमर्थमाह अग्निरपीति। ब्रह्मणेति पदस्याभिमतमर्थमाह ब्रह्मणेति। कर्त्रा हूयत इति संबन्धः। कर्ता ब्रह्मणः सकाशाद्व्यतिरिक्तो नास्तीत्येतदभिमतमित्याह ब्रह्मैवेति। हुतमित्यस्य विवक्षितमर्थमाह यत्तेनेति। ब्रह्मैव तेनेत्यादि भागं विभजते ब्रह्मैवेत्यादिना। ब्रह्म कर्मेत्याद्यवतार्य व्याकरोति ब्रह्मेति। कर्मत्वं ब्रह्मणो ज्ञेयत्वात्प्राप्यत्वाच्च प्रतिपत्तव्यम्। एवं ब्रह्मार्पणमन्त्रस्याक्षरार्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमाह एवमिति। निवृत्तकर्माणं संन्यासिनं प्रति कथमस्य मन्त्रस्य प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह निवृत्तेति। यथा बाह्ययज्ञानुष्ठानासमर्थस्याज्ञस्य संकल्पात्मकयज्ञो दृष्टस्तथा ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनं स्तुत्यर्थं सुतरामुपपद्यते तेन स्तुतिलाभात्कल्पनायाः स्वाधीनत्वाद्वेत्यर्थः।ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनमभिनयति यदर्पणादीति। केन प्रमाणेनात्र यज्ञत्वसंपादनमवगतमित्याशङ्क्य अर्पणादीनां विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानानुपपत्त्येत्याह अन्यथेति। ज्ञानस्य यज्ञत्वे संपादिते फलितमाह तस्मादिति। आत्मैवेदं सर्वमित्यात्मव्यतिरेकेण सर्वस्यावस्तुत्वं प्रतिपाद्यमानस्य कर्माभावे हेत्वन्तरमाह कारकेति। कारकबुद्धेस्तेष्वभिमानस्याभावेऽपि किमिति कर्म न स्यादित्याशङ्क्याह नहीति। उक्तमेवान्वयव्यतिरेकाभ्यां द्रढयति सर्वमेवेति। इन्द्रायेत्यादिना शब्देन समर्पितो देवताविशेषः संप्रदानं कारकम् आदिशब्दाद् व्रीह्यादिकरणकारकं तद्विषयबुद्धिमत्कर्तास्मीत्यभिमानपूर्वकं मोक्षफलमस्येति फलाभिसंधिमच्च कर्म दृष्टमिति योजना। अन्वयमुक्त्वा व्यतिरेकमाह नेत्यादिना। उपमृदिता क्रियादिभेदविषया बुद्धिर्यस्य तत्कर्म तथा कर्तृत्वाभिमानपूर्वको मोक्षे फलमस्येति योऽभिसंधिस्तेन रहितं च न कर्म दृष्टमित्यन्वयः। तथापि ब्रह्मविदो भासमानकर्माभावे किमायातमित्याशङ्क्याह इदमिति। यदिदं ब्रह्मविदो दृश्यमानं कर्म तदहमस्मि ब्रह्मेति बुद्ध्या निराकृतकारकादिभेदविषयबुद्धिमदतश्च कर्मैव न भवति तत्त्वज्ञाने सति व्यापकं कारकादिव्यावर्तमानं व्याप्यं कर्मापि व्यावर्तयति तत्त्वविदः शरीरादिचेष्टाकर्माभावः कर्म व्यापकरहितत्वात्सुषुप्तचेष्टावदित्यर्थः। ज्ञानवतो दृश्यमानं कर्माकर्मैवेत्यत्र भगवदनुमतिमाह तथाचेति। ब्रह्मविदो दृष्टं कर्म नास्तीत्युक्तेऽपि तत्कारणानुपमर्दात्पुनर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह तथाच दर्शयन्निति। अविद्वानिव विद्वानपि कर्मणि प्रवर्तमानो दृश्यते तथापि तस्य कर्माकर्मैवेत्यत्र दृष्टान्तमाह दृष्टा चेति। विद्वत्कर्मापि कर्मत्वाविशेषादितरकर्मवत्फलारम्भकमित्यपि शङ्का न युक्तेत्याह तथेति। इदं कर्मैव कर्तव्यमस्य च फलं भोक्तव्यमिति मतिस्तत्पूर्वकाण्यतत्पूर्वकाणि च कर्माणि तेषामवान्तरभेदसंग्रहार्थमादिपदम्। दार्ष्टान्तिकमाह तथेति। सप्तम्या विद्वत्प्रकरणं परामृष्टम्। षष्ठ्यौ समानाधिकरणे। उक्तेऽर्थे पूर्ववाक्यमनुकूलयति अत इति। ब्रह्मार्पणमन्त्रस्य स्वव्याख्यानमुक्त्वा स्वयूथ्यव्याख्यानमनुवदति अत्रेति। प्रसिद्धोद्देशेनाप्रसिद्धविधानस्य न्याय्यत्वादप्रसिद्धोद्देशेन प्रसिद्धविधानं कथमित्याशङ्क्याह ब्रह्मैवेति। किलेत्यस्मिन्व्याख्याने सिद्धान्तिनोऽसंप्रतिपत्तिं सूचयति। कर्तृकर्मकरणसंप्रदानाधिकरणरूपेण पञ्चविधेन ब्रह्मैव व्यवस्थितं कर्म करोतीत्यङ्गीकारात्तदप्रसिद्ध्यभावात्तदनुवादेनार्पणादिष्वविरुद्धस्तद्दृष्टिविधिरित्यर्थः। दृष्टिविधिपक्षे सिद्धान्ताद्विशेषं दर्शयति तत्रेति। अर्पणादिषु कर्तव्यां ब्रह्मबुद्धिं दृष्टान्ताभ्यां स्पष्टयति यथेत्यादिना। दृष्टिविधाने विधेयदृष्टेर्मानसक्रियात्वेन सम्यग्ज्ञानत्वाभावात्प्रकरणभङ्गः स्यादित्यभिप्रेत्य परिहरति सत्यमेवमिति। विधित्सितदृष्टिस्तुतिपरमेव प्रकरणं न ज्ञानस्तुतिपरमित्याशङ्क्य प्रकरणपर्यालोचनया ज्ञानस्तुतिरेवात्र प्रतिभातीति प्रतिपादयति अत्र त्विति। किञ्च ब्रह्मार्पणमन्त्रस्यापि सम्यग्ज्ञानस्तुतौ सामर्थ्यं प्रतिभातीत्याह अत्र चेति। नन्वर्पणादिषु ब्रह्मदृष्टिं कुर्वतामपि ब्रह्मविद्यैवात्र विवक्षितेति पक्षभेदासिद्धिरिति चेत्तत्राह येत्विति। यथा ब्रह्मदृष्ट्या नामादिकमुपास्यं तथार्पणादिषु ब्रह्मदृष्टिकरणे सत्यर्पणादिकमेव प्राधान्येन ज्ञेयमिति ब्रह्मविद्या यथोक्तेन वाक्येन विवक्षिता न स्यादित्यर्थः। किञ्च ब्रह्मैव तेन गन्तव्यमिति ब्रह्मप्राप्तिफलाभिधानादपि दृष्टिविधानमश्लिष्टमित्याह नचेति। नचार्पणाद्यालम्बना दृष्टिर्ब्रह्म प्रापयत्यप्रतीकालम्बनान्नयतीति न्यायविरोधादिति भावः। दृष्टिविधानेऽपि नियोगबलादेव स्वर्गवददृष्टो मोक्षो भविष्यतीत्याशङ्क्याह विरुद्धं चेति। ज्ञानादेव कैवल्यमुक्त्वा मार्गान्तरापवादिन्या श्रुत्या विरुद्धं मोक्षस्याविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य दृष्टस्य नैयोगिकत्ववचनमित्यर्थः। दृष्टिनियोगान्मोक्षो भवतीत्येतत्प्रकरणविरुद्धं चेत्याह प्रकृतेति। तदेव प्रपञ्चयति सम्यग्दर्शनं चेति। अन्ते च सम्यग्दर्शनं प्रकृतमिति संबन्धः। तत्र हेतुः तस्यैवेति। सम्यग्ज्ञानेनोपक्रम्य तेनैवोपसंहारेऽपि मध्ये किंचिदन्यदुक्तमिति प्रकरणस्यातद्विषयत्वमित्याशङ्क्याह श्रेयानिति। प्रकरणे सम्यग्ज्ञानविषये सत्यनुपपन्नो दर्शनविधिरिति फलितमाह फलितमाह तत्रेति। ब्रह्मार्पणमन्त्रे परकीयव्याख्यानासंभवे स्वकीयव्याख्यानं व्यवस्थितमित्युपसंहरति तस्मादिति।
Sri Dhanpati
ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् इत्यादिवचनेभ्यः कर्मफलस्यावश्यंभावित्वकथनात्। कस्मात्पुनः कारणात्क्रियमाणं कर्म स्वकार्यारम्भं बन्धनमकुर्वत्समग्रं प्रविलीयत इत्याशङ्क्य सर्वक्रियाकारकफलजातं द्वैतं ब्रह्मैव ब्रह्मविद इति हेतोस्तस्य समग्रं कर्म विनश्यतीत्याह। ब्रह्म अर्पणमित्यसमस्ते पदे। अर्प्यतेऽनेन हस्तादिना करणेनेत्यर्पणम्। करणं कारकम्। अर्प्यतेऽस्मिन्नित्यर्पणमधिकरणं देशकालादि। अर्प्यतेऽस्मै इत संप्रदानं देवतारुपं। भाष्यस्योपलक्षणार्थतयाऽविरोधः। तद्ब्रह्मैवेति बाधायां सामानाधिकरण्यं यश्चोरः स स्थाणुरितिवत्। एवमग्रेऽपि यद्धविर्बुद्य्धा गृह्यमाणं घृतादिकं त्यागप्रक्षेपक्रिययोः साक्षात्कर्मकारकं तदपि ब्रह्मैव तत्त्वविदः तथा ब्रह्माग्नाविति समस्तं पदम्। एतेन ब्रह्मणीति पदमध्याहर्तव्यमित्यपास्तम्। यस्मिन्हूयते सोऽग्निरधिकरणकारकमपि ब्रह्मैव। तथा येन यजमानेनाध्वर्युणा च त्यज्यते क्षिप्यते च तदुभयमपि कर्तृ कारकं ब्रह्मैवेत्यर्थः। यत्तेन हुतं हवनक्रियापि ब्रह्मैव। अत्रत्य एवकारः सर्वत्र संबध्यते। ब्रह्मपदं च काकाक्षिगोलकन्यायेनोभयत्र ब्रह्मैव कर्म तत्र समाधिर्यस्य सः। तेन गन्तव्यं फलमपि ब्रह्मैव। एवं लोकसंग्रहचिकीर्षुणापि क्रियमाणं कर्म परमार्थतोऽकर्म ब्रह्मबुद्य्धुपमर्दितत्वात् निवृत्तकर्मणोऽपि यतेः सभ्यग्दर्शिनः सम्यग्दर्शननस्तुत्यर्थं ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनं सुतरामुपपद्यते। यदर्पणादि यज्ञे प्रसिद्धं तदस्याध्यात्मं ब्रह्मैव अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वेऽर्पणादीनामेव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानमनर्थकं स्यात्। यत्तु यद्ब्रह्म तदर्पणादीति ब्रह्मैव खल्वर्पणादिना पञ्चविधेनकारकात्मनावस्थितं सत् तदेव कर्म करोति नात्रार्पणादिबुद्धिर्निवर्त्यते किंत्वर्पणादिषु प्रतिमादौ विष्णुबुद्धिरिव ब्रह्मबुद्धिराधीयत इति तदसत्। ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थत्वादस्य प्रकरणस्य। अत्र सम्यग्दर्शनं ज्ञानयज्ञशब्दप्रतिपादितम्। अनेकान्क्रियाविशेषान्यज्ञशब्दितानुपन्यस्यश्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः इति ज्ञानं स्तौतीति भाष्ये विस्तरः। एतेनकर्मण्यकर्म यः पश्येदि त्यारभ्यारुरुक्षुपरत्वेन दृश्यमानमपरेषां व्याख्यानमसंगतमिति ध्येयम्। यत्तु अथवार्प्यतेऽस्मै फलायेति व्युत्पत्त्यार्पणपदेन स्वर्गादिफलमपि ग्राह्यम्। तथाच ब्रह्मैवेत्याद्युत्तरार्धं ज्ञानफलकथनायैवेति समञ्जसम्। अस्मिन्पक्षे ब्रह्मकर्मसमाधिनेत्येकं वा पदम्। पूर्वं ब्रह्मपदं हुतमित्यनेन संबध्यते गन्तव्यमित्यनेनेति भिन्नं वा पदम्। एवंच नानुषङ्गद्वयक्लेश इति तच्चिन्त्यम्। श्रुतं गन्तव्यपदं विहाय क्लिष्टव्युत्पत्त्या तदानयनस्यान्याय्यत्वात्। ज्ञानप्रभावमुक्त्वाज्ञान लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छती ति ज्ञानयज्ञफलस्य वक्ष्यमाणत्वात्। भाष्ये तु ब्रह्मकयंसमाधिना ब्रह्मैव गन्तव्यमिति तेन गन्तव्यं फलमपि ब्रह्मैवेत्यस्यानुवादो ब्रह्मेत्यादिपदस्यान्वयप्रदर्शनार्थः नतु ब्रह्मैव गन्तव्यमिति पदद्वयानुषङ्गेण ज्ञानफलप्रदर्शनम्। एतेन पूर्वमित्यादि परास्तम्। काकाक्षिगोलकन्यायस्य पदर्शितत्वादिति दिक्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| brahma | Brahman |
| arpaṇam | the ladle and other offerings |
| brahma | Brahman |
| haviḥ | the oblation |
| brahma | Brahman |
| agnau | in the sacrificial fire |
| brahmaṇā | by that person |
| hutam | offered |
| brahma | Brahman |
| eva | certainly |
| tena | by that |
| gantavyam | to be attained |
| brahma | Brahman |
| karma | offering |
| samādhinā | those completely absorbed in God |
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जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। — VaniSagar
अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं। — VaniSagar
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“जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 24?
Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 24 translates to: "Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman indeed shall be attained by one who always sees Brahman in action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam" mean in English?
"brahmārpaṇaṁ brahma havir brahmāgnau brahmaṇā hutam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 24. Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman indeed shall be attained by one who always sees Brahman in action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.