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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

செயலின் பலன் மீதான பற்றுதலைக் கைவிட்டு, எப்பொழுதும் திருப்தியுடன், எதையும் சார்ந்து, செயலில் ஈடுபட்டாலும் எதையும் செய்வதில்லை.

GujaratiIND

કર્મના ફળ પ્રત્યેની આસક્તિનો ત્યાગ કરીને, સદા સંતોષી, કશા પર નિર્ભર રહીને, પ્રવૃત્તિમાં વ્યસ્ત હોવા છતાં પણ તે કંઈ કરતો નથી.

SindhiIND

عمل جي ميوي سان وابستگي کي ڇڏي، ڪڏهن به مطمئن، ڪنهن به شيءِ تي ڀروسو نه ڪري، ڪم ۾ مشغول رهڻ باوجود به ڪجهه نه ٿو ڪري.

PunjabiIND

ਕਰਮ ਦੇ ਫਲ ਨਾਲ ਮੋਹ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਸਦਾ ਹੀ ਸੰਤੋਖ, ਕਿਸੇ ਚੀਜ਼ 'ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਰਹਿ ਕੇ, ਕਰਮ ਵਿਚ ਰੁੱਝੇ ਹੋਏ ਭੀ ਉਹ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ।

NepaliIND

कर्मफलको आसक्ति त्यागेर, सदा सन्तुष्ट भएर, कुनै कुरामा भर परेर, कर्ममा लागेर पनि केही गर्दैन।

BengaliIND

কর্মের ফলের প্রতি আসক্তি পরিত্যাগ করে, সর্বদা তৃপ্ত, কোন কিছুর উপর নির্ভর না করে, কর্মে নিয়োজিত থাকা সত্ত্বেও তিনি কিছু করেন না।

MarathiIND

कर्माच्या फळाची आसक्ती सोडून, ​​सदैव समाधानी, कशावरही अवलंबून न राहता, कार्यात मग्न असतानाही तो काहीही करत नाही.

KannadaIND

ಕ್ರಿಯೆಯ ಫಲಗಳ ಮೇಲಿನ ಬಾಂಧವ್ಯವನ್ನು ತೊರೆದು, ಸದಾ ತೃಪ್ತನಾಗಿ, ಯಾವುದನ್ನೂ ಅವಲಂಬಿಸಿಲ್ಲ, ಅವನು ಚಟುವಟಿಕೆಯಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವಾಗಲೂ ಏನನ್ನೂ ಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ.

MalayalamIND

കർമ്മഫലങ്ങളോടുള്ള ആസക്തി ഉപേക്ഷിച്ച്, സദാ സംതൃപ്തനായി, ഒന്നിനെയും ആശ്രയിക്കാതെ, പ്രവർത്തനത്തിൽ ഏർപ്പെട്ടിരിക്കുമ്പോഴും അവൻ ഒന്നും ചെയ്യുന്നില്ല.

BhojpuriIND

कर्म के फल से आसक्ति छोड़ के, कबो संतुष्ट, कुछुओ पर निर्भर ना होके, ऊ क्रियाकलाप में लागल रहला पर भी कुछ ना करेला।

AssameseIND

কৰ্মৰ ফলৰ প্ৰতি মোহ পৰিত্যাগ কৰি, সদায় সন্তুষ্ট হৈ, একোৰ ওপৰত নিৰ্ভৰ নকৰাকৈ, কৰ্মত নিয়োজিত হৈও তেওঁ একো নকৰে।

TeluguIND

క్రియ ఫలాల పట్ల అనుబంధాన్ని విడిచిపెట్టి, ఎప్పుడూ తృప్తి చెంది, దేనిపై ఆధారపడకుండా, కార్యకలాపంలో నిమగ్నమై ఉన్నప్పటికీ అతను ఏమీ చేయడు.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

4.20।। व्याख्या--'त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्'--जब कर्म करते समय कर्ताका यह भाव रहता है कि शरीरादि कर्मसामग्री मेरी है, मैं कर्म करता हूँ, कर्म मेरा और मेरे लिये है तथा इसका मेरेको अमुक फल मिलेगा, तब वह कर्मफलका हेतु बन जाता है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषको प्राकृत पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदका अनुभव हो जाता है, इसलिये कर्म करनेकी सामग्रीमें, कर्ममें तथा कर्मफलमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेके कारण वह कर्मफलका हेतु नहीं बनता।सेना विजयकी इच्छासे युद्ध करती है। विजय होनेपर विजय सेनाकी नहीं, प्रत्युत राजाकी मानी जाती है; क्योंकि राजाने ही सेनाके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध किया है; उसे युद्ध करनेकी सामग्री दी है और उसे युद्ध करनेकी प्रेरणा की है और सेना भी राजाके लिये ही युद्ध करती है। इसी प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कर्म-सामग्रीके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही जीव उनके द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भागी होता है।कर्म-सामग्रीके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध न होनेके कारण महापुरुषका कर्मफलके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता।वास्तवमें कर्मफलके साथ स्वरूपका सम्बन्ध है ही नहीं। कारण कि स्वरूप चेतन, अविनाशी और निर्विकार है; परन्तु कर्म और कर्मफल--दोनों जड तथा विकारी हैं और उनका आरम्भ तथा अन्त होता है। सदा स्वरूपके साथ न तो कोई कर्म रहता है तथा न कोई फल ही रहता है। इस तरह यद्यपि कर्म और फलसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है तथापि जीवने भूलसे उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनका कारण है। अगर यह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाय, तो कर्म और फलसे उसकी स्वतःसिद्ध निर्लिप्तताका बोध हो जाता है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्मीभूत हो जानेके कारण उसके कर्म अकर्म ही हो जाते हैं। इसी आशयको दिखानेकी इच्छासे भगवान् कहते हैं उपर्युक्त ज्ञानके प्रभावसे कर्मोंमें अभिमान और फलासक्तिका त्याग करके जो नित्यतृप्त है अर्थात् विषयकामनासे रहित हो गया है तथा आश्रयसे रहित है। जिस फलका आश्रय लेकर मनुष्य पुरुषार्थ सिद्ध करनेकी इच्छा किया करता है उसका नाम आश्रय है ऐसे इस लोक और परलोकके इष्टफलसाधनरूप आश्रयसे जो रहित है उस ज्ञानीद्वारा किये हुए कर्म वास्तवमें अकर्म ही हैं क्योंकि वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न है। अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण ऐसे पुरुषको साधनोंसहित कर्मोंका परित्याग कर ही देना चाहिये ऐसी कर्तव्यता प्राप्त होनेपर भी उन कर्मोंसे निवृत्त होना असम्भव होनेके कारण लोकसंग्रहकी इच्छासे या श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा की जानेवाली निन्दाको दूर करनेकी इच्छासे यदि ( कोई ज्ञानी ) पहलेकी तरह कर्मोंमें प्रवृत्त है तो भी वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। परंतु जो उससे विपरीत है अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाला नहीं है कर्मोंका आरम्भ करनेसे पहले ( गृहस्थी न बनकर ब्रह्मचर्य आश्रममें ) ही जिसका सबके अंदर व्यापक अन्तरात्मारूप निष्क्रिय ब्रह्ममें आत्मभाव प्रत्यक्ष हो गया है

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Sri Anandgiri

विवेकात्पूर्वं कर्मणि प्रवृत्तावपि सति विवेके तत्र न प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याङ्गीकरोति यस्त्विति। विवेकात्पूर्वमभिनिवेशेन प्रवृत्तस्य विवेकानन्तरमभिनिवेशाभावात्प्रवृत्त्यसंभवेऽपि जीवनमात्रमुद्दिश्य प्रवृत्त्याभ्यासः संभवतीत्यर्थः। सत्यपि विवेके तत्तत्साक्षात्कारानुदयात्कर्मणि प्रवृत्तस्य कथं तत्त्यागः स्यादित्याशङ्क्याह यस्तु प्रारब्धेति। त्यक्तेत्यादि समनन्तरश्लोकमवतारयितुं भूमिकां कृत्वा तदवतारणप्रकारं दर्शयति स कुतश्चिदिति। लोकसंग्रहादिनिमित्तं विवक्षितं कर्म परित्यागासंभवे सति तस्मिन्प्रवृत्तोऽपि नैव करोति किंचिदिति संबन्धः। कर्मणि प्रवृत्तो न करोति कर्मेति कथमुच्यते तत्राह स्वप्रयोजनाभावादिति। कथं तर्हि कर्मणि प्रवर्तते तत्राह लोकेति। प्रवृत्तेरर्थक्रियाकारित्वाभावंपश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायेन व्यावर्तयति पूर्ववदिति। कथं तर्हि विवेकिनामविवेकिनां च विशेषः स्यादित्याशङ्क्य कर्मादौ सङ्गासङ्गाभ्यामित्याह कर्मणीति। उक्तेऽर्थे समनन्तरश्लोकमवतारयति ज्ञानाग्नीति। एतमर्थं दर्शयिष्यन्निमं श्लोकमाहेति योजना। यथोक्तं ज्ञानं कूटस्थात्मदर्शनं तेन स्वरूपभूतं सुखं साक्षादनुभूय कर्मणि तत्फले च सङ्गमपास्य विषयेषु निरपेक्षश्चेष्टते विद्वानित्याह त्यक्त्वेत्यादिना। इष्टसाधनसापेक्षस्य कुतो निरपेक्षत्वमित्याशङ्क्य विशिनष्टि निराश्रय इति। यदाश्रित्येति यच्छब्देन फलसाधनमुच्यते। आश्रयरहितमित्यस्यार्थं स्पष्टयति दृष्टेति। तेन ज्ञानवता पुरुषेणैवंभूतेन। त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गमित्यादिना विशेषितेनेत्यर्थः। ततः ससाधनात्कर्मणः सकाशादिति यावत्। निर्गमासंभवे हेतुमाह लोकेत्यादिना। पूर्ववज्ज्ञानोदयात्प्रागवस्थायामिवेत्यर्थः। अभिप्रवृत्तोऽपि लोकदृष्ट्येति शेषः। नैव करोति किंचिदिति स्वदृष्ट्येति द्रष्टव्यम्।

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Sri Dhanpati

ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात्तदीयं ज्ञानोत्तरं क्रियमाणामपि कर्माकर्मैव संपद्यत इत्येतमर्थं दर्शयन्नाह त्यक्त्वेत्यादिना। यत्तु भवतु ज्ञानाग्निना प्राक्तनानामप्रारब्धकर्मणा दाहः। आगामिनां चानुत्पत्तिः। ज्ञानोत्पत्तिकाले क्रियमाणं तु पूर्वोत्तरयोरनन्तर्भावात् फलाय भवेदिति भवेत्कस्यचिदाशङ्का तामपनुदतीति तच्चिन्त्यम्। मूलात्तद्भाष्यादेवंभूतो जीवन्मुक्तो व्युत्थानदशायां कर्मणि वैदिके लौकिके प्रवृत्तोऽपीत्यादिस्वग्रन्थाच्च ज्ञानोत्तरक्रियमाणकर्माश्लेषस्य प्रतीतेः स्फुटत्वेनैवमुत्थानानौचित्यात्। ज्ञानोत्पत्तिकाल इत्यस्य किं ज्ञानोत्पत्तिक्षण इत्यर्थ उत ज्ञानसाधनानामनुष्ठानकाल इति। आद्ये पापादेरसंभवः। द्वितीये तत्कर्मणः पूर्वकर्मण्यन्तर्भाव इति शङ्काया अप्यनुत्थानाच्च। अतएव तस्य नाशो वा विश्लेषो वा व्यासेन पृथक् न सूत्रितः। कर्मस्वभिमानं फलासक्तिं च त्यक्त्वा यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तः। विषयेषु निराकाङ्क्षः। अतएव दृष्टादृष्टेष्टफलसाधनाश्रयरहतिः। योगक्षेमार्थाश्रयणीयरहित इति व्याख्या तु भाष्यान्तर्भूता। यत्त्वाश्रयो देहेन्द्रियादिरद्वैतदर्शनेन निर्गतो यस्मात्स निराश्रयः देहेन्द्रियाद्यभिमानशून्यः। फलकामनायाः कर्तृत्वाभिनिवेशस्य च निवृत्तौ क्रमेण विशेषणद्वयमिति व्याख्यानं तदपि दृष्टादृष्टेष्टफलसाधनानि देहेन्द्रियादीनि तदेवाश्रयस्तद्रहितः देहाद्यभिमानशून्य इति भाष्यं व्याख्याय तदविरोधेनादेयं तेनैवंभूतेन प्रयोजनाभावात्समग्रं कर्म यद्यपि त्याज्यं तथापि प्रारब्धप्राबल्यात् लोकसंग्रहार्थं लोकदृष्ट्या पूर्ववत्कर्मण्यभितः साङ्गोपाङ्गानुष्ठानाय प्रवृत्तोऽपि निष्क्रियात्मदर्शनसंपन्नत्वात्स्वदृष्ट्या नैव किंचित्करोति सः। तत्त्वविदः क्रियमाणकर्मसंबन्धो न भवतीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tyaktvāhaving given up
karmaphala
nityaalways
tṛiptaḥsatisfied
nirāśhrayaḥwithout dependence
karmaṇiin activities
abhipravṛittaḥengaged
apidespite
nanot
evacertainly
kiñchitanything
karotido
saḥthat person
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 4.19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः

जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.21
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 20 translates to: "Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ" mean in English?

"tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 20. Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.