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Sudarshana Chakra
Adhyay 4, Shlok 19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः

जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं। — VaniSagar

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TamilIND

யாருடைய முயற்சிகள் அனைத்தும் ஆசைகள் மற்றும் சுயநல நோக்கங்கள் அற்றவை, மற்றும் அவரது செயல்கள் அறிவின் நெருப்பால் எரிக்கப்பட்டன, ஞானிகள் அவரை ஞானி என்று அழைக்கிறார்கள்.

TeluguIND

ఎవరి పనులు కోరికలు మరియు స్వార్థ ప్రయోజనాలేవీ లేనివి, మరియు అతని చర్యలు జ్ఞాన అగ్నిచే కాల్చబడినవి, జ్ఞానులు అతన్ని జ్ఞాని అని పిలుస్తారు.

SindhiIND

جنهن جا سمورا ڪم خواهشن ۽ خود غرضيءَ کان خالي هجن ۽ جنهن جا عمل علم جي باهه ۾ سڙي ويا هجن، عقلمند ان کي بابا چوندا آهن.

BengaliIND

যাঁর সমস্ত কর্মকাণ্ডই কামনা-বাসনা ও স্বার্থপরতা বর্জিত এবং যাঁর কর্ম জ্ঞানের আগুনে পুড়ে যায়, জ্ঞানীরা তাঁকে ঋষি বলে।

GujaratiIND

જેનાં ઉપક્રમો બધાં જ ઈચ્છાઓ અને સ્વાર્થી હેતુઓથી રહિત હોય અને જેનાં કાર્યો જ્ઞાનના અગ્નિથી બળી ગયા હોય, જ્ઞાનીઓ તેને ઋષિ કહે છે.

MarathiIND

ज्याची सर्व कामे इच्छा आणि स्वार्थरहित आहेत आणि ज्याची कृती ज्ञानाच्या अग्नीने जळून गेली आहे, त्याला ज्ञानी ऋषी म्हणतात.

PunjabiIND

ਜਿਸ ਦੇ ਸਾਰੇ ਕਾਰਜ ਇਛਾਵਾਂ ਅਤੇ ਸੁਆਰਥੀ ਉਦੇਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹਨ ਅਤੇ ਜਿਸ ਦੇ ਕਰਮ ਗਿਆਨ ਦੀ ਅੱਗ ਨਾਲ ਸੜ ਗਏ ਹਨ, ਸਿਆਣੇ ਉਸ ਨੂੰ ਰਿਸ਼ੀ ਆਖਦੇ ਹਨ।

BhojpuriIND

जेकर उपक्रम सब काम-काम आ स्वार्थ से रहित होखे, आ जेकर कर्म ज्ञान के अग्नि से जरल बा, ओकरा के ज्ञानी लोग ऋषि कहेला।

AssameseIND

যাৰ উদ্যোগ সকলো কামনা আৰু স্বাৰ্থপৰ উদ্দেশ্যহীন, আৰু যাৰ কৰ্ম জ্ঞানৰ অগ্নিত জ্বলি গৈছে, তেওঁক জ্ঞানীসকলে ঋষি বুলি কয়।

MizoIND

A hnathawh zawng zawng duhna leh mahni hmasialna nei lo, a thiltih chu hriatna meiin a kang tawh chu mi fingte chuan mi fing an ti thin.

DogriIND

जिस दे उपक्रम सारे कामना ते स्वार्थ से रहित होन, ते जिस दे कर्म ज्ञान दी अग्ग नाल जली जांदे हन, उस नूं ज्ञानी ऋषि आखदे हन।

ManipuriIND

ꯃꯍꯥꯛꯀꯤ ꯊꯕꯛ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯖꯕꯥ ꯊꯤꯗꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯍꯥꯛꯀꯤ ꯊꯕꯛ ꯑꯗꯨ ꯖ꯭ꯅꯥꯅꯒꯤ ꯃꯩꯅꯥ ꯆꯥꯀꯄꯥ, ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯥ ꯃꯍꯥꯀꯄꯨ ꯔ꯭ꯏꯁꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯀꯧꯏ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः' विषयोंका बार-बार चिन्तन होनेसे, उनकी बार-बार याद आनेसे उन विषयोंमें 'ये विषय अच्छे हैं, काममें आनेवाले हैं, जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं'--ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना 'संकल्प' है और 'ये विषय-पदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं, हानिकारक हैं'--ऐसी बुद्धिका होना 'विकल्प' है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है, तब 'ये विषय-पदार्थ हमें मिलने चाहिये, ये हमारे होने चाहिये'--इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है, उसका नाम 'काम' (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना--दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं।संकल्प और कामना--ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। सिद्ध महापुरुषमें भी संकल्प और कामना न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उसके द्वारा लोकसंग्रहार्थ, कर्तव्यपरम्परासुरक्षार्थ सम्पूर्ण कर्म होते हुए भी वह उन कर्मोंसे स्वतः सर्वथा निर्लिप्त रहता है। भगवान्ने कहींपर संकल्पोंका (6। 4), कहींपर कामनाओंका (2। 55) और कहींपर संकल्प तथा कामना--दोनोंका (6। 24 25) त्याग बताया है। अतः जहाँ केवल संकल्पोंका त्याग बताया गया है, वहाँ कामनाओंका और जहाँ केवल कामनाओंका त्याग बताया गया है, वहाँ संकल्पोंका त्याग भी समझ लेना चाहिये; क्योंकि संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। तात्पर्य है कि साधकको सम्पूर्ण संकल्पों और कामनाओंका त्याग कर देना चाहिये।मोटरकी चार अवस्थाएँ होती हैं--

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनकी स्तुति करते हैं जिनका प्रारम्भ किया जाता है उनका नाम समारम्भ है इस व्युत्पत्तिसे सम्पूर्ण कर्मोंका नाम समारम्भ है। उपर्युक्त प्रकारसे कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाले जिस पुरुषके समस्त समारम्भ ( कर्म ) कामनासे और कामनाके कारणरूप संकल्पोंसे भी रहित हो जाते हैं अर्थात् जिसके द्वारा बिना ही किसी अपने प्रयोजनके यदि वह प्रवृत्तिमार्गवाला है तो लोकसंग्रहके लिये और निवृत्तिमार्गवाला है तो जीवनयात्रानिर्वाहके लिये केवल चेष्टामात्र ही क्रिया होती है तथा कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनरूप ज्ञानाग्निसे जिसके पुण्यपापरूप सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो गये हैं ऐसे ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पुरुषको ब्रह्मवेत्ताजन वास्तवमें पण्डित कहते हैं। जो कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला है वह यदि विवेक होनेसे पूर्व कर्मोंमें लगा हो तो भी कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मका ज्ञान हो जानेसे केवल जीवननिर्वाहमात्रके लिये चेष्टा करता हुआ कर्मरहित संन्यासी ही हो जाता है फिर उसकी कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती। अर्थात् जो पहले कर्म करनेवाला हो और पीछे जिसको आत्माका सम्यक् ज्ञान हुआ हो ऐसा पुरुष कर्मोंमें कोई प्रयोजन न देखकर साधनोंसहित कर्मोंका त्याग कर ही देता है। परंतु किसी कारणसे कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर कोई ऐसा पुरुष यदि कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिरहित होकर केवल लोकसंग्रहके लिये पहलेके सदृश कर्म करता रहता है तो भी निजका प्रयोजन न रहनेके कारण ( वास्तवमें ) वह कुछ भी नहीं करता।

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Sri Anandgiri

कर्मण्यकर्मदर्शनं पूर्वोक्तं स्तोतुमुत्तरश्लोकं प्रस्तौति तदेतदिति। यथोक्तदर्शित्वं पूर्वोक्तदर्शनसंपन्नत्वम्। समारम्भशब्दस्य कर्मविषयत्वं न रूढ्या किंतु व्युत्पत्त्येत्याह समारभ्यन्त इतीति। कामसंकल्पवर्जितत्वे कथं कर्मणामनुष्ठानमित्याशङ्क्याह मुधैवेति। उद्देशफलाभावे तेषामनुष्ठानं यादृच्छिकं स्यादित्याशङ्क्य प्रवृत्तेन निवृत्तेन वा तेषामनुष्ठानं यादृच्छिकं स्यादिति विकल्प्य क्रमेण निरस्यति प्रवृत्तेनेत्यादिना। ज्ञानाग्नीत्यादि विभजते कर्मादाविति यथोक्तज्ञानं योग्यमेव दहति नायोग्यमितिविवक्षितत्वात्तस्मिन्नग्निपदम्। यथोक्तविज्ञानविरहिणामपि वैशेषिकादीनां पण्डितत्वप्रसिद्धिमाशङ्क्य तेषां पण्डिताभासत्वं विवक्षित्वा विशिनष्टि परमार्थत इति।

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Sri Dhanpati

तदेतत्स्तौति यस्येति। यथोक्तदर्शिनः सर्वे समारभ्यन्त इति समारम्भाः कर्माणि कामैः फलतृष्णाभिः संकल्पैस्तत्रतत्र कर्तृत्वाभिनिवेशैस्तत्कारणीभूतैः यद्वा काम्यन्त इति कामाः फलानि तैः तत्कारणीभूतैस्तत्संकल्पैश्च वर्जिताः मुधैव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते। कर्मादावकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तदैवाग्निस्तेन दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तं परमार्थतः पण्डितं बुधाः तत्त्वदर्शिन आहुः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yasyawhose
sarveevery
samārambhāḥundertakings
kāmadesire for material pleasures
saṅkalparesolve
varjitāḥdevoid of
jñānadivine knowledge
agniin the fire
dagdhaburnt
karmāṇamactions
tamhim
āhuḥaddress
paṇḍitama sage
budhāḥthe wise
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Bhagavad Gita · 4.18
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्

जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 4.20
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 4Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 4, Shlok 19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः

जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 4 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Jnana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 19 translates to: "He whose undertakings are all devoid of desires and selfish purposes, and whose actions have been burned by the fire of knowledge, the wise call him a sage. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बु" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 4, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Jnana Yoga में संकलित है। जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ" mean in English?

"yasya sarve samārambhāḥ kāma-saṅkalpa-varjitāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 19. He whose undertakings are all devoid of desires and selfish purposes, and whose actions have been burned by the fire of knowledge, the wise call him a sage. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.