Bhagavad Gita 4.1 — Commentary
19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्
śhrī bhagavān uvācha imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt
", "I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he then told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku."
Scholar Commentaries (19)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
इमम् अध्यायद्वयेनोक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परिपालयितृ़णां क्षत्रियाणां बलाधानाय तेन योगबलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम्। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते जगत् परिपालयितुमलम्। अव्ययम् अव्ययफलत्वात्। न ह्यस्य योगस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति। स च विवस्वान् मनवे प्राह। मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत्।।
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
श्री भगवानुवाच यः अयं तव उदितो योगः स केवलं युद्धप्रोत्साहनाय इदानीम् उदित इति न मन्तव्यम्। मन्वन्तरादौ एव निखिलजगदुद्धरणाय परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया इमं योगम् अहम् एव विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् च मनवे मनुः इक्ष्वाकवे इति एवं सम्प्रदायपरम्परया प्राप्तम् इमं योगं पूर्वे राजर्षयो विदुः। स महता कालेन तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्याद् विनष्टप्रायः अभूत्।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह इममिति।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
जैसा कि इस अध्याय की प्रस्तावना में कहा गया है भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि अब तक उनके द्वारा दिया गया उपदेश नवीन न होकर सनातन वेदों में प्रतिपादित ज्ञान की ही पुर्नव्याख्या है। स्वस्वरूप की स्मृति से स्फूर्त होकर भगवान् घोषणा करते हैं कि उन्होंने ही सृष्टि के प्रारम्भ में इस ज्ञान का उपदेश सूर्य देवता (विवस्वान्) को दिया था। विवस्वान् ने अपने पुत्र मनु जो भारत के प्राचीन स्मृतिकार हुए को यह ज्ञान सिखाया। मनु ने इसका उपदेश राजा इक्ष्वाकु को दिया जो सूर्यवंश के पूर्वज थे। इस वंश के राजाओं ने दीर्घकाल तक अयोध्या पर शासन किया।वेद शब्द संस्कृत के विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। अत वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा ज्ञान का साधन (प्रमाण)। वेदों का प्रतिपाद्य विषय है जीव के शुद्ध ज्ञान स्वरूप तथा उसकी अभिव्यक्ति के साधनों का बोध।जैसे हम विद्युत् को नित्य कह सकते हैं क्योंकि उसके प्रथम बार आविष्कृत होने के पूर्व भी वह थी और यदि हमें उसका विस्मरण भी हो जाता है तब भी विद्युत् शक्ति का अस्तित्व बना रहेगा इसी प्रकार हमारे नहीं जानने से दिव्य चैतन्य स्वरूप आत्मा का नाश नहीं होता। इस अविनाशी आत्मा का ज्ञान वास्तव में अव्यय है।आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि विश्व का निर्माण सूर्य के साथ प्रारम्भ होना चाहिये। शक्ति के स्रोत के रूप में सर्वप्रथम सूर्य की उत्पत्ति हुई और उसकी उत्पत्ति के साथ ही यह महान् आत्मज्ञान विश्व को दिया गया।वेदों का विषय आत्मानुभूति होने के कारण वाणी उसका वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ है। कोई भी गम्भीर अनुभव शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। अत स्वयं की बुद्धि से ही शास्त्रों का अध्ययन करने से उनका सम्यक् ज्ञान तो दूर रहा विपरीत ज्ञान होने की ही सम्भावना अधिक रहती है। इसलिये भारत में यह प्राचीन परम्परा रही है कि अध्यात्म ज्ञान के उपदेश को आत्मानुभव में स्थित गुरु के मुख से ही श्रवण किया जाता है। गुरुशिष्य परम्परा से यह ज्ञान दिया जाता रहा है। यहाँ इस ब्रह्मविद्या के पूर्वकाल के विद्यार्थियों का परिचय कराया गया है।
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
4.1 इमम् this? विवस्वते to Vivasvan? योगम् Yoga? प्रोक्तवान् taught? अहम् I? अव्ययम् imperishable? विवस्वान् Vivasvan? मनवे to Manu? प्राह taught? मनुः Manu? इक्ष्वाकवे to Ikshvaku? अब्रवीत् taught.Commentary Vivasvan means the sun. Ikshvaku was the son of Manu. Ikshvaku was the reputed ancestor of the solar dynasty of Kshatriyas.This Yoga is said to be imperishable because the result or fruit? i.e.? Moksha? that can be attained through it is imperishable.If the rulers of dominions possess a knowledge of the Yoga taught by Me in the preceding two discourses? they can protect the Brahmanas and rule their kingdom with justice. So I taught this Yoga to the Sungod in the beginning of evolution.
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या-- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्'--भगवान्ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी; अतः यहाँके 'इमम् अव्ययम्, योगम्' पदोंका तात्पर्य पूर्वप्रकरणके अनुसार तथा राजपरम्पराके अनुसार 'कर्मयोग' लेना ही उचित प्रतीत होता है।यद्यपि पुराणोंमें और उपनिषदोंमें भी कर्मयोगका वर्णन आता है, तथापि वह गीतामें वर्णित कर्मयोगके समान साङ्गोपाङ्ग और विस्तृत नहीं है। गीतामें भगवान्ने विविध युक्तियोंसे कर्मयोगका सरल और साङ्गोपाङ्ग विवेचन किया है। कर्मयोगका इतना विशद वर्णन पुराणों और उपनिषदोंमें देखनेमें नहीं आता। भगवान् नित्य हैं और उनका अंश जीवात्मा भी नित्य है तथा भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध भी नित्य है। अतः भगवत्प्राप्तिके सब मार्ग (योगमार्ग, ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग आदि) भी नित्य हैं । यहाँ 'अव्ययम्' पदसे भगवान् कर्मयोगकी नित्यताका प्रतिपादन करते हैं।परमात्माके साथ जीवका स्वतःसिद्ध सम्बन्ध (नित्य-योग) है। जैसे पतिव्रता स्त्रीको पतिकी होनेके लिये करना कुछ नहीं पड़ता; क्योंकि वह पतिकी तो है ही, ऐसे ही साधकको परमात्माका होनेके लिये करना कुछ नहीं है, वह तो परमात्माका है ही; परन्तु अनित्य क्रिया, पदार्थ, घटना आदिके साथ जब वह अपनी सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे 'नित्ययोग' अर्थात् परमात्माके साथ अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव नहीं होता। अतः उस अनित्यके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटानेके लिये कर्मयोगी शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि मिली हुई समस्त वस्तुओंको संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें लगा देता है। वह मानता है कि जैसे धूलका छोटा-से-छोटा कण भी विशाल पृथ्वीका ही एक अंश है ,ऐसे ही यह शरीर भी विशाल ब्रह्माण्डका ही एक अंश है। ऐसा माननेसे 'कर्म' तो संसारके लिये होंगे पर 'योग' (नित्ययोग) अपने लिये होगा अर्थात् नित्ययोगका अनुभव हो जायगा। भगवान् 'विवस्वते प्रोक्तवान्' पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता 3। 19) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए-- 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात बता रहा हूँ, वह कोई आजकी नयी बात नहीं है। जो योग सृष्टिके आदिसे अर्थात् सदासे है, उसी योगकी बात मैं तुम्हें बता रहा हूँ। प्रश्न-- भगवान्ने सृष्टिके आदिकालमें सूर्यको कर्म-योगका उपदेश क्यों दिया उत्तर-- (1) सृष्टिके आरम्भमें भगवान्ने सूर्यको ही कर्मयोगका वास्तविक अधिकारी जानकर उन्हें सर्वप्रथम इस योगका उपदेश दिया। (2) सृष्टिमें जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है, उसे ही उपदेश दिया जाता है; जैसे-- ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिमें प्रजाओँको उपदेश दिया (गीता 3। 10)। उपदेश देनेका तात्पर्य है-- कर्तव्यका ज्ञान कराना। सृष्टिमें सर्वप्रथम सूर्यकी उत्पत्ति हुई, फिर सूर्यसे समस्त लोक उत्पन्न हुए। सबको उत्पन्न करनेवाले सूर्यको सर्वप्रथम कर्मयोगका उपदेश देनेका अभिप्राय उनसे उत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टिको परम्परासे कर्मयोग सुलभ करा देना था। (3) सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। उनसे ही सबको ज्ञान प्राप्त होता है एवं उनके उदित होनेपर प्रायः समस्त प्राणी जाग्रत् हो जाते हैं और अपने-अपने कर्मोंमें लग जाते हैं। सूर्यसे ही मनुष्योंमें कर्तव्य-परायणता आती है। सूर्यको सम्पूर्ण जगत्की आत्मा भी कहा गया है-- 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' । अतः सूर्यको जो उपदेश प्राप्त होगा, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको भी स्वतः प्राप्त हो जायगा। इसलिये भगवान्ने सर्वप्रथम सूर्यको ही उपदेश दिया।वास्तवमें नारायणके रूपमें उपदेश देना और सूर्यके रूपमें उपदेश ग्रहण करना जगन्नाट्यसूत्रधार भगवान्की एक लीला ही समझनी चाहिये, जो संसारके हितके लिये बहुत आवश्यक थी। जिस प्रकार अर्जुन महान् ज्ञानी नर-ऋषिके अवतार थे; परन्तु लोकसंग्रहके लिये उन्हें भी उपदेश लेनेकी आवश्यकता हुई, ठीक उसी प्रकार भगवान्ने स्वयं ज्ञानस्वरूप सूर्यको उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप संसारका महान् उपकार हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें ( दूसरे और तीसरेमें ) कहा गया है जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है आगे सारी गीतामें भी भगावन्को योग शब्दसे यही ( ज्ञानयोग ) विवक्षित है इसलिये वेदके अर्थको ( ज्ञानयोगमें ) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस ( ज्ञाननिष्ठारूप योग ) की स्तुति करते हैं श्रीभगवान् बोले जगत्प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था ( क्योंकि ) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं। इस योगका फल अविनाशी है इसलिये यह अव्यय है क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता। उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
पूर्वाभ्यामध्यायाभ्यां निष्ठाद्वयात्मनो योगस्य गीतत्वाद् वेदार्थस्य च समाप्तत्वाद् वक्तव्यशेषाभावाद् उक्तयोगस्य कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्तये वंशकथनपूर्विका स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह श्रीभगवानिति। तदेतद्भगवद्वचनं वृत्तानुवादद्वारेण प्रस्तौति योऽयमिति। उक्तमेव योगं विभज्यानुवदति ज्ञानेति। संन्यासेनेतिकर्तव्यतया सहितस्य ज्ञानात्मनो योगस्य कर्माख्यो योगो हेतुरतश्चोपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रतिष्ठापितमित्यर्थः। उक्ते योगद्वये प्रमाणमुपन्यस्यति यस्मिन्निति। अथवा ज्ञानयोगस्य कर्मयोगोपायत्वमेव स्फुटयति यस्मिन्निति। प्रवृत्त्या लक्ष्यते ज्ञायते कर्मयोगो निवृत्त्या च लक्ष्यते ज्ञानयोग इति विभागः। यद्यपि पूर्वस्मिन्नध्यायद्वये यथोक्तनिष्ठाद्वयं व्याख्यातं तथापि वक्ष्यमाणाध्यायेषु वक्तव्यान्तरमस्तीत्याशङ्क्याह गीतासु चेति। कथं तर्हि समनन्तराध्यायस्य प्रवृत्तिरत आह अत इति। वंशकथनं संप्रदायोपन्यासः संप्रदायोपदेशश्च कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्त्या योगस्तुतौ पर्यवस्यति। गुरुशिष्यपरंपरोपन्यासमेवानुक्रामति इममिति। इममित्यस्य संनिहितं विषयं दर्शयति अध्यायेति। योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मयोगोपायलभ्यमित्यर्थः। स्वयमकृतार्थानां प्रयोजनव्यग्राणां परार्थप्रवृत्त्यसंभवाद्भगवतस्तथाविधप्रवृत्तिदर्शनात्कृतार्थता कल्पनीयेत्याह विवस्वत इति। अव्ययवेदमूलत्वादव्ययत्वं योगस्य गमयितव्यं किमिति भगवता कृतार्थेनापि योगप्रवचनं कृतमिति तदाह जगदिति। कथं यथोक्तेन योगेन क्षत्रियाणां बलाधानं तदाह तेनेति। युक्ताः क्षत्रिया इति शेषः। ब्रह्मशब्देन ब्राह्मणत्वजातिरुच्यते। यद्यपि योगप्रवचनेन क्षत्रं रक्षितं तेन च ब्राह्मणत्वं तथापि कथं रक्षणीयं जगदशेषं रक्षितमित्याशङ्क्याह ब्रह्मेति। ताभ्यां हि कर्मफलभूतं जगदनुष्ठानद्वारा रक्षितुं शक्यमित्यर्थः। योगस्याव्ययत्वे हेत्वन्तरमाह अव्ययफलत्वादिति। ननु कर्मफलवदुक्तयोगफलस्यापि साध्यत्वेन क्षयिष्णुत्वमनुमीयते नेत्याह नहीति। अपुनरावृत्तिश्रुतिप्रतिहतमनुमानं न प्रमाणीभवतीति भावः। भगवता विवस्वते प्रोक्तो योगस्तत्रैव पर्यवस्यतीत्याशङ्क्याह स चेति। स्वपुत्रायेत्युभयत्र संबध्यते। आदिराजायेतीक्ष्वाकोः सूर्यवंशप्रवर्तकत्वेन वैशिष्ट्यमुच्यते।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
एवमध्यायद्वयेनोक्तस्य निष्ठाद्वयात्मकस्य वेदार्थस्य समाप्तिं मन्यमानः संप्रदायप्रदर्शनेन तं स्तुवन श्रीभगवानुवाच। इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं सांख्ययोगं कर्मयोगरुपोपायसहितं ससंन्यासं इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणं राज्ञामेव योग्यमित्यन्येषां व्याख्याने तु द्वितीयाध्यायार्थस्येदंशब्देनाग्रहणप्रसङ्गः। नचेष्टापत्तिः। अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेऽप्रामाण्यशङ्का माभूदिति। विद्यावंशसंप्रदायं दर्शयति इममित्यादिनेति स्वोक्तिविरोधात्। एतेन राज्ञामेव योग्यमित्यपि प्रत्युक्तम्। अध्यायद्वयेन प्रतिपादिते वेदार्थेऽग्रे विस्तरेण वक्ष्यमाणे ब्राह्मणादियोग्यताभावप्रसङ्गात्। सर्गादौ विवस्वते सूर्यायाहं श्रीकृष्णः प्रोक्तवान्। ब्रह्मपरिपालनसमर्थबलाधानाय। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते सर्वं जगद्रक्षितं भवति। अव्ययमव्ययफलत्वादिदं भाष्यमुपलक्षणं अव्ययवेदमूलत्वात्। न व्येति स्वफलादित्यव्ययं अव्यभिचारिफलमित्यस्यापि। यत्त्वव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायमिति तत्तु स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतपेति वाक्यशेषविरोधादुपेक्ष्यम्। सच विवस्वान्मनवे श्राद्धदेवाय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेप्रामाण्यशङ्का माभूदिति विद्यावंशसंप्रदायमात्मनश्च भ्रमविप्रलम्भकत्वादिनिरासायेश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं च दर्शयति इममित्यादिना। इमं सांख्ययोगं कर्मयोगरूपोपायसहितं ससंन्यासमिति भाष्यं। इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणां राज्ञामेव योग्यं विवस्वते सूर्याय मण्डलाभिमानिने सर्वेषां क्षत्रियाणामादिभूतायाहमादित्यान्तर्यमीय एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धः प्रोक्तवान् पुरा। अव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायम्। तेनानादित्वमपि। मनवे स्वपुत्राय विवस्वान्प्राह। इक्ष्वाकवे मनुः स्वपुत्रायाब्रवीत्।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
आविर्भावतिरोभावावाविष्कर्तुं स्वयं हरिः। तत्त्वंपदविवेकार्थं कर्मयोगं प्रशंसतिएवंतावदध्यायद्वयेन कर्मयोगोपायो ज्ञानयोगोपायश्च मोक्षसाधनत्वेनोक्तः तमेव ब्रह्मार्पणादिगुणविधानेन त्वंपदार्थविवेकादिना च प्रपञ्चयिष्यन्प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन्श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययं इमं योगं पुराहं विवस्वते आदित्याय कथितवान् स च स्वपुत्राय मनवे श्राद्धदेवाय प्राह स च मनुः स्वपुत्रायेक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
अथ चतुर्थसङ्गतिं वक्तुं तृतीयाध्यायार्थं सङ्ग्रहेणोद्गृह्णाति तृतीयेऽध्याय इति।सहेतुकमिति ज्ञानयोगकर्मयोगयोः सप्रमादत्वनिष्प्रमादत्वादिहेतुपूर्वकमित्यर्थः। एतेनअसक्त्या लोकरक्षायै गुणेष्वारोप्य कर्तृताम्। सर्वेश्वरे वा न्यस्योक्ता तृतीये कर्मकार्यता गी.सं.7 इति सङ्ग्रहश्लोकोऽपि व्याख्यातः। अशक्तस्य शक्तत्वेऽप्यप्रसिद्धस्य च स्वार्थनिपुणस्य कर्मयोग एव कार्यः प्रसिद्धस्य त्वशक्तस्य शक्तस्य वा स्वार्थं लोकरक्षार्थं च स एव कार्य इति तृतीयाध्यायेनाधिकारिचिन्तनं कर्मयोगस्य ज्ञानयोगाद्वैषम्यचिन्तनं च कृतमिति भावः। अथाधिकर्तव्यतयोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रामाणिकत्वं ज्ञानमिश्रत्वं स्वरूपं तद्वैविध्यं ज्ञानांशप्राधान्यं प्रासङ्गिको भगवदवतार इति षडर्था इहोच्यन्त इत्याह चतुर्थेनेति। ननुप्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः कर्मणोऽकर्मताऽस्य च। भेदा ज्ञानस्य माहात्म्यं चतुर्थाध्याय उच्यते गी.सं.8 इति चत्वारोऽर्थाः सङ्गृहीताः तत्कथमत्र षडर्थानुकीर्तनम् उच्यते प्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः इत्यत्र। सङ्गः प्रामाणिकत्वप्रसङ्गः।अस्य च भेदाः इत्यत्र स्वरूपमन्तरेण तद्भेदस्य दुर्ज्ञानत्वात्स्वरूपमपि विवक्षितम् चकारेण वा तत्समुच्चय इति सङ्ग्रहेऽपि षडर्था एव विवक्षिताः। स्वस्वभावोक्तिः स्वस्याकर्मवश्यावतारत्वादिस्वभावोक्तिः। कर्मणोऽकर्मता कर्मयोगस्यान्तर्गतज्ञानतया ज्ञानयोगाकारता ज्ञानस्य माहात्म्यं कर्मयोगान्तर्गतज्ञानांशस्य प्राधान्यम् एवं चतुर्थेन इत्यादिभाष्येणायमपि श्लोको व्याख्यातः। कर्तव्यता हि तृतीयाध्याये प्रोक्ता अतस्तद्दार्ढ्यभात्रमत्र पुरावृत्ताख्यानेन क्रियत इति कर्तव्यतां द्रढयित्वेत्यस्य भावः। साक्षादध्यायार्थानां सङ्गतिं प्रदर्श्य प्रासङ्गिकं पुनराह प्रसङ्गाच्चेति।इमं इति निर्देशपूर्वकमुपदेशपरम्पराकथनस्य तात्पर्यमाह योऽयमित्यादिना मन्तव्यमित्यन्तेन। योगोऽत्र कर्मयोगः। अत्र ज्ञानयोगपरत्वेन परव्याख्यानं प्रकृतासङ्गतम्कुरु कर्म 4।15 इत्यादिवक्ष्यमाणविरुद्धं चेति भावः। मनोरपि जनयित्रे तदुपदेष्ट्रे च विवस्वते प्रोक्तत्वादर्जुनेन चादावित्यनुवदिष्यमाणत्वात्फलितमुक्तंमन्वन्तरादाविति।निखिलजगदुद्धरणायेति न केवलं युद्धप्रोत्साहनार्थमर्जुनमात्रार्थं वा किन्तु समस्ताधिकारिवर्गापवर्गदानायेत्यर्थः। मन्वन्तरादावुपदेशात्तस्य निखिलजगत्साधारण्यं सूचितम्। नित्यसर्वज्ञे भगवति स्थितत्वादव्ययत्वम्। अथवा अव्ययत्वमिह फलद्वारा।इमं इति निर्देश्च पूर्वोक्तमोक्षसाधनत्वमप्यभिप्रैतीति ज्ञापनाय परमेत्याद्युक्तम्। प्रागपि न फलान्तरार्थमुक्तमिति भावः।अहं प्रोक्तवान् इत्यनेन मन्वन्तरादौ महाकल्पारम्भे भारतसमरारम्भे वा मदन्यः कश्चिदस्य यथावज्ज्ञाता वक्ता च दुर्लभ इत्यभिप्रेतम्। प्रसङ्गादवश्यं ज्ञातव्यं स्वावतारयाथात्म्यं वक्तुं स्वस्य मन्वादिकालविरोधरूपशङ्कोत्थापनं च कृतमिति व्यञ्जनायअहमेवेत्युक्तम्।विवस्वते प्रोक्तवानिति नह्ययमसुरादिभ्यो मयोपदिष्टो बुद्धाद्यागमार्थः किन्तु सर्ववेदात्मने विवस्वत इति भावः।विवस्वांश्च मनवे मनुरिक्ष्वाकव इति यद्वै किञ्च मनुरवदत्तद्भेषजं तै.सं.2।2।62 इति सकलजगद्भेषजभूतवचनतया प्रसिद्धमर्यादाप्रवर्तनविशदाधिकृतकोटिनिविष्टपित्रादिक्रमेण ह्युपदेशपरम्परा प्राप्ता न तु सम्भवद्विप्रलम्भकुहकपाषण्ड्यादिसंसर्गप्रवृत्तेति भावः। एतत्सर्वंएवं सम्प्रदायपरम्परयेत्यनेन व्यक्तम्। परम्पराशब्देनेक्ष्वाकोरर्वाचीनानामपि ग्रहणात्कृतादियुगे सम्प्रदायाविच्छेदो विवक्षित इति चाभिप्रायः। इदानीं नाशस्याभिधानादत्रपूर्वे राजर्षय इत्युक्तम्।राजर्षयो विदुः राजानो हि विस्तीर्णागाधमनसः तत्रापि ऋषित्वादतीन्द्रियार्थदर्शनक्षमाः ते च बहवः ते चाश्वपतिजनकाम्बरीषप्रभृतयः सर्वेऽप्यविगानेनेमं कर्मयोगमनुष्ठितवन्त इति भावः। कालदैघ्र्यस्य विच्छेदहेतुत्वप्रकारमिहशब्दसूचितमाह तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्यादिति। इह विचित्राधिकारिपूर्णे जगति कृतत्रेतादिषु युगेषु कालक्रमेण बुद्धिशक्त्यनुष्ठानादयोऽपचीयमाना दृष्टाः श्रुताश्चेति भावः।नष्टः इत्यत्रात्यन्तविच्छेदो नाभिमतः व्यासभीष्माक्रूरादेरिदानीमपि विद्यमानत्वादित्यभिप्रायेणोक्तंविनष्टप्रायोऽभूदिति।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
यद्यपि पूर्वमुपेयत्वेन ज्ञानयोगस्तदुपायत्वेन च कर्मयोग इति द्वौ योगौ कथितौ तथाप्येकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यतीत्यनया दिशा साध्यसाधनयोः फलैक्यादैक्यमुपचर्य साधनभूतं कर्मयोगं साध्यभूतं च ज्ञानयोगमनेकविधगुणविधानाय स्तौति वंशकथनेन भगवान् इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मनिष्ठोपायलभ्यं विवस्वते सर्वक्षत्रियवंशबीजभूतायादित्याय प्रोक्तवान् प्रकर्षेण सर्वसंदेहोच्छेदादिरूपेणोक्तवानहं भगवान् वासुदेवः सर्वजगत्परिपालकः। सर्गादिकाले राज्ञां बलाधानेन तदधीनं सर्व जगत्पालयितुम्। कथमनेन। बलाधानमिति विशेषणेन दर्शयति। अव्ययमव्ययवेदमूलत्वादव्ययमोक्षफलत्वाच्च न व्येति स्वफलादित्यव्ययमव्यभिचारिफलम्। तथाचैतादृशेन बलाधानं शक्यमिति भावः। सच मम शिष्यो विवस्वान् मनवे वैवस्वताय स्वपुत्राय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्। यद्यपि प्रतिमन्वन्तरं स्वायंभुवमन्वादिसाधारणोऽयं भगवदुपदेशस्तथापि सांप्रतिकवैवस्वतमन्वन्तराभिप्रायेणादित्यमारभ्य संप्रदायो गणितः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
श्रीकृष्णाय नमः।कर्मसन्न्यासयोगस्य स्वस्मिन् योगो यथा भवेत्।तदर्थं कृपया कृष्णः कौन्तेयं प्रत्युवाच हकर्मसन्न्यासनिरूपणप्रश्नोद्गमार्थं पूर्वानुवादमाह इममिति त्रयेण। अहमिमं योगं पूर्वोक्तं अव्ययं सफलं मत्सम्बन्धजनकत्वात् विवस्वते प्रोक्तवान्। लोकानुग्रहार्थं सोऽपि लोक एतत्प्राकट्यार्थं मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परायोगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुःइक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यतेब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुतेएवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
4.1 In the beginning of creation, with a veiw to infusing vigour into the Ksatriyas who are the protectors of the world, aham, I; proktavan, imparted; imam, this; avyayam, imperishable; yogam, Yoga, presented in the (preceding) two chapters; vivasvate, to Vivasvan, the Sun. Being endowed with this power of Yoga, they would be able to protect the Brahmana caste. The protection of the world becomes ensured when the Brahmanas and the Ksatriyas are protected. It (this Yoga) is avyayam, imperishable, because its result is undecaying. For, the result-called Liberation-of this (Yoga), which is characterized by steadfastness in perfect Illumination, does not decay. And he, Vivasvan, praha, taught (this); manave, to Manu. Manu abravit, transmitted (this); iksvakave, to Iksvaku, his own son who was the first king. [First king of the Iksvaku dynasty, otherwise known as the Solar dynasty.]
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
4.1 - 4.2 The Lord said This Karma Yoga declared to you should not be considered as having been taught now merely, for creating encouragement in you for war. I Myself had taught this Yoga to Vivasvan at the commencement of Manu's age as a means for all beings to attain release, which is man's supreme end. Vivasvan taught it to Manu, and Manu to Iksvaku. The royal sages of old knew this Yoga transmitted by tradition. Because of long lapse of time and because of the dullness of the intellect of those who heard it, it has been almost lost.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 4.1?
इमम् अध्यायद्वयेनोक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परिपालयितृ़णां क्षत्रियाणां बलाधानाय तेन योगबलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम्। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते जगत् परिपालयितुमलम्। अव्ययम् अव्ययफलत्वात्। न ह्यस्य योगस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति। स च विवस्वान् मनवे प्राह। मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत्।।
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 4.1, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.