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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 37
श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्

श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

, "এটি ইচ্ছা এবং এটি ক্রোধ, উভয়ই রজসের গুণ, সর্বগ্রাসী এবং সর্ব-পাপী; এই পৃথিবীতে এই শত্রু হিসাবে জান।

TamilIND

, "அது ஆசை மற்றும் கோபம், இரண்டும் ரஜஸ் குணம், அனைத்தையும் விழுங்கும் மற்றும் அனைத்து பாவம்; இதை இந்த உலகில் எதிரியாக அறிந்து கொள்ளுங்கள்.

NepaliIND

, " यो कामना हो र यो क्रोध हो , राजसको गुण हो , सर्वभक्षक , सर्व पापी , यसैलाई यो संसारमा शत्रु भनेर जान ।

GujaratiIND

, "તે ઇચ્છા છે અને તે ક્રોધ છે, રાજસના ગુણો, સર્વ-ભક્ષક અને સર્વ-પાપી; આ જગતમાં તેને શત્રુ તરીકે જાણો.

PunjabiIND

, "ਇਹ ਇੱਛਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹ ਕ੍ਰੋਧ ਹੈ, ਰਾਜਾਂ ਦੇ ਦੋਵੇਂ ਗੁਣ, ਸਰਬ-ਭੱਖਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਸਰਬ-ਪਾਪੀ, ਇਸ ਨੂੰ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਦੁਸ਼ਮਣ ਵਜੋਂ ਜਾਣੋ।

MarathiIND

, "ही इच्छा आहे आणि तो क्रोध आहे, हे दोन्ही राजांचे गुण, सर्व भक्षण करणारे आणि सर्व पापी; या जगात याला शत्रू म्हणून जाण.

SindhiIND

”اها خواهش آهي ۽ اها ڪاوڙ آهي، راجس جي ٻنهي ڪيفيت، سڀ کائيندڙ ۽ سڀ گناهه، هن دنيا ۾ هن کي دشمن ڄاڻو.

KannadaIND

, "ಇದು ಬಯಕೆ ಮತ್ತು ಇದು ಕೋಪ, ಎರಡೂ ರಜಸ್ನ ಗುಣ, ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ತಿನ್ನುವ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ-ಪಾಪಿಗಳು; ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಇದನ್ನು ಶತ್ರು ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.

MalayalamIND

, "ഇത് ആഗ്രഹമാണ്, അത് കോപമാണ്, രജസ്സിൻ്റെ ഗുണം, എല്ലാം വിഴുങ്ങുന്നതും സർവപാപവുമാണ്; ഇത് ഈ ലോകത്തിലെ ശത്രുവായി അറിയുക.

TeluguIND

, "ఇది కోరిక మరియు ఇది కోపం, రెండూ రజస్ యొక్క గుణము, సర్వాన్ని మ్రింగివేసేవి మరియు సర్వపాపమైనవి; ఈ ప్రపంచంలో ఇక్కడ శత్రువుగా తెలుసుకోండి.

MaithiliIND

, "ई कामना छै आरो ई क्रोध छै, राजस के गुण के दोनों, सर्वभक्षक आरू सर्वपाप; एकरा एतय एहि संसार में शत्रु के रूप में जानू।"

KonkaniIND

, "इच्छा आनी तो राग, रजस गुणाचो, सर्वभक्षक आनी सर्वपापी; हांगा ह्या संसारांत दुस्मान म्हणून हें जाणून घेयात."

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.37।। व्याख्या--'रजोगुणसमुद्भवः'-- आगे चौदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि तृष्णा (कामना) और आसक्तिसे रजोगुण उत्पन्न होता है और यहाँ यह कहते हैं कि रजोगुणसे काम उत्पन्न होता है। इससे यह समझना चाहिये कि रागसे काम उत्पन्न होता है और कामसे राग बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक पदार्थोंको सुखदायी माननेसे राग उत्पन्न होता है, जिससे अन्तःकरणमें उनका महत्त्व दृढ़ हो जाता है। फिर उन्हीं पदार्थोंका संग्रह करने और उनसे सुख लेनेकी कामना उत्पन्न होती है। पुनः कामनासे पदार्थोंमें राग बढ़ता है। यह क्रम जबतक चलता है, तबतक पाप-कर्मसे सर्वथा निवृत्ति नहीं होती। 'काम एष क्रोध एषः'-- मेरी मनचाही हो-- यही काम है । उत्पत्ति-विनाशशील जड-पदार्थोंके संग्रहकी इच्छा, संयोगजन्य सुखकी इच्छा, सुखकी आसक्ति--ये सब कामके ही रूप हैं। पाप-कर्म कहीं तो 'काम' के वशीभूत होकर और कहीं 'क्रोध' के वशीभूत होकर किया गया दीखता है। दोनोंसे अलग-अलग पाप होते हैं। इसलिये दोनों पद दिये। वास्तवमें काम अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना, प्रियता, आकर्षण ही समस्त पापोंका मूल है । कामनामें बाधा लगनेपर काम ही क्रोधमें परिणत हो जाता है। इसलिये भगवान्ने एक कामनाको ही पापोंका मूल बतानेके लिये उपर्युक्त पदोंमें एकवचनका प्रयोग किया है। कामनाकी पूर्ति होनेपर 'लोभ' उत्पन्न होता होता है और कामनामें बाधा पहुँचानेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर)क्रोध उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला अपनेसे अधिक बलवान् हो तो 'क्रोध' उत्पन्न न होकर 'भय' उत्पन्न होता है। इसलिये गीतामें कहीं-कहीं कामना और क्रोधके साथ-साथ भय की भी बात आयी है; जैसे-- 'वीतरागभयक्रोधाः' (4। 10) और 'विगतेच्छाभयक्रोधः' (5। 28)।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है वहीं यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है इसलिये क्रोध भी यही है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है। तथा रजोगुणके कार्य सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है इत्यादि। तथा यह काम बहुत खानेवाला है। इसलिये महापापी भी है क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है। इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान।

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Sri Anandgiri

संप्रति प्रतिवचनं प्रस्तौति शृण्विति। तस्य वैरित्वं स्फोरयति सर्वेति। अप्रस्तुतं किमिति प्रस्तूयते तत्राह यं त्वमिति। भगवच्छब्दार्थं निर्धारयितुं पौराणिकं वचनमुदाहरति ऐश्वर्यस्येति। समग्रस्येत्येतत्प्रत्येकं विशेषणैः संबध्यते अथशब्दस्तथाशब्दपर्यायः समुच्चयार्थः। मोक्षशब्देन तदुपायो ज्ञानं विवक्ष्यते। उदाहृतवचसस्तात्पर्यमाह ऐश्वर्यादीति। स वाच्यो भगवानिति संबन्धः। तत्रैव पौराणिकं वाक्यान्तरं पठति उत्पत्तिमिति। भूतानामिति प्रत्येकमुत्पत्त्यादिभिः संबध्यते। कारणार्थौ चोत्पतिप्रलयशब्दौ क्रियामात्रस्य पुरुषान्तरगोचरत्वसंभवात्। आगतिर्गतिश्चेत्यागामिन्यौ संपदापदौ सूच्येते। वाक्यान्तरस्यापि तात्पर्यमाह उत्पत्त्यादीति। वेत्तीत्युक्तः साक्षात्कारो विज्ञानमित्युच्यते समग्रैश्वर्यादिसंपत्तिसमुच्चयार्थश्चकारः। उक्तलक्षणो भगवान्किमुक्तवानिति तदाह काम इति। कामस्य सर्वलोकशत्रुत्वं विशदयति यन्निमित्तेति। तथापि कथं तस्यैव क्रोधत्वं तदाह स एष इति। कामक्रोधयोरेव हेयत्वद्योतनार्थं कारणं कथयति रजोगुणेति। कारणद्वारा कामादेरेव हेयत्वमुक्त्वा कार्यद्वारापि तस्य हेयत्वं सूचयति रजोगुणस्येति। कामस्य पुरुषप्रवर्तकत्वमेव न रजोगुणजनकत्वमित्याशङ्क्याह कामो हीति। तत्रैवानुभवानुसारिणीं लोकप्रसिद्धिं प्रमाणयति तृष्णया हीति। तस्य योग्यायोग्यविभागमन्तरेण बहुविषयत्वं दर्शयति महाशन इति। बहुविषयत्वप्रयुक्तं कर्म निर्दिशति अत इति। सर्वविषयत्वेऽपि कुतोऽस्य पापत्वमित्याशङ्क्याह कामेनेति। कामस्योक्तविशेषणवत्त्वे फलितमाह अत इति।

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Sri Dhanpati

एवं पृष्टः श्रीभगवान्ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा इत्युक्तं समग्रमैश्वर्यादिषट्कं नित्यमप्रतिबन्धेन यस्मिन्वासुदेवे वर्ततेउत्पत्तिं निधनं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति। इत्युत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवो भगवानितिशब्दवाच्य उवाचोत्तरमुक्तवान् काम इति। यस्त्वया वैरी पृष्टः एष कामः शत्रुर्यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिर्लोकस्य। ननु क्रोधोऽप्यनर्थहेतुर्लोके दृश्यते इत्यत आह। स एव कामः कुतश्चिन्निमित्तात्प्रतिहितः क्रोधत्वेन परिणमतेऽहः क्रोधोऽप्येष एव शत्रोः पुत्रत्वादप्ययं शत्रुरित्याह। रजोगुणः समुद्भवो यस्य सः। यद्वा कथं शत्रुतां करोतीत्यह आह। रजोगुणस्य समुद्भवः कारणं कामो रजः प्रवर्तयन्पुरुषं प्रवर्तयति। ननु विषयभोगेन तृप्तिं नीतः शत्रुत्वं जिहास्यतीति चेत् तत्राह। महदशनमस्य सः। तदुक्तम् न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाभ्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।।यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् इति। ननु लोके यथा स्वेनापराधिनः कश्चिच्छत्रुत्वं भजति तथायमप्यतोऽपराधं तस्य न करिष्यामीतिचेत्तत्राह। महाशनत्वान्महापाप्माऽत्युग्रो विनैवापराधं स्वेनोपकृतश्च नाशयतीत्यर्थः। अतः काममेव परमं वैरिणं विद्धि। ज्ञात्वा च तत्परिहाराय यतस्वेति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhribhagavān uvācha
kāmaḥdesire
eṣhaḥthis
krodhaḥwrath
eṣhaḥthis
rajaḥguṇa
samudbhavaḥborn of
mahāaśhanaḥ
mahāpāpmā
viddhiknow
enamthis
ihain the material world
vairiṇamthe enemy
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.36
अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः

हे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च। यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्

जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ( विवेक) ढका हुआ है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 37
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 37
श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्

श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 37 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 37 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 37?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 37 translates to: ", "It is desire and it is anger, both of the quality of Rajas, all-devouring and all-sinful; know this as the foe here in this world. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 37 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 37. , "It is desire and it is anger, both of the quality of Rajas, all-devouring and all-sinful; know this as the foe here in this world. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.