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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 24
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः

हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

আমি কর্ম না করলে এই জগৎ ধ্বংস হয়ে যাবে; জাতপাতের বিভ্রান্তি এবং এই প্রাণীদের ধ্বংসের লেখক আমি হব।

KannadaIND

ನಾನು ಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಮಾಡದಿದ್ದರೆ ಈ ಲೋಕಗಳು ನಾಶವಾಗುತ್ತವೆ; ಜಾತಿಗಳ ಗೊಂದಲ ಮತ್ತು ಈ ಜೀವಿಗಳ ನಾಶದ ಲೇಖಕ ನಾನು.

MarathiIND

मी कृती केली नाही तर हे जग नष्ट होईल; मी जातींच्या गोंधळाचा आणि या प्राण्यांचा नाश करणारा लेखक असेन.

MalayalamIND

ഞാൻ കർമ്മം ചെയ്തില്ലെങ്കിൽ ഈ ലോകങ്ങൾ നശിക്കും; ജാതികളുടെ ആശയക്കുഴപ്പത്തിൻ്റെയും ഈ ജീവികളുടെ നാശത്തിൻ്റെയും രചയിതാവ് ഞാനായിരിക്കും.

TeluguIND

నేను క్రియ చేయకుంటే ఈ లోకాలు నశిస్తాయి; కులాల గందరగోళానికి మరియు ఈ జీవుల నాశనానికి నేను రచయితను.

PunjabiIND

ਜੇ ਮੈਂ ਕਰਮ ਨਾ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਇਹ ਸੰਸਾਰ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਣਗੇ; ਮੈਂ ਜਾਤਾਂ ਦੇ ਉਲਝਣ ਅਤੇ ਇਹਨਾਂ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਦਾ ਲੇਖਕ ਹੋਵਾਂਗਾ।

TamilIND

நான் செயலைச் செய்யாவிட்டால் இந்த உலகங்கள் அழியும்; சாதிகளின் குழப்பம் மற்றும் இந்த உயிரினங்களின் அழிவுக்கு நான் ஆசிரியராக இருப்பேன்.

MaithiliIND

जँ हम कर्म नहि करितहुँ तँ ई लोक सभ नष्ट भ' जाइत; जाति-भ्रम आ एहि जीव सभक विनाशक लेखक हम रहितहुँ ।

BhojpuriIND

ई लोक नाश हो जाईत अगर हम कर्म ना करीं; जाति के भ्रम आ एह जीव के नाश के लेखक हम होखब।

KonkaniIND

हांवें कर्म केलें ना जाल्यार हे लोक नाश जातले; जातींचो गोंदळ आनी ह्या प्राण्यांचो नाश करपाचो लेखक हांव आसतलो.

MizoIND

Thiltih ka tih loh chuan heng khawvelte hi an boral vek ang; Caste tihbuai leh heng thilsiamte tihchhiatna siamtu hi keimah hi ka ni ang.

DogriIND

इह लोक नाश हो जांदे जेकर मैं कर्म नहीं करदा; जाति दे उलझन ते इन्हां जीवां दे विनाश दा लेखक मैं होंदा।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.24।। व्याख्या-- [बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वय-रीतिसे कर्तव्य-पालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेक-रीतिसे कर्तव्य-पालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।]यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पूर्वश्लोकमें आये 'वर्त एव च कर्मणि' पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ 'हि'पद आया है।भगवान् कहते हैं कि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ--ऐसा हो ही नहीं सकता; परन्तु यदि ऐसा मान लें' कि मैं कर्म न करूँ-- इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ 'यदि जातु' पदोंका प्रयोग किया है।'अतन्द्रितः' पदका तात्पर्य यह है कि कर्तव्य-कर्म करनेमें आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये, अपितु उन्हें बहुत सावधानी और तत्परतासे करना चाहिये। सावधानी-पूर्वक कर्तव्य-कर्म न करनेसे मनुष्य आलस्य और प्रमादके वशमें होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देता है।कर्मोंमें शिथिलता (आलस्य-प्रमाद) न लाकर उन्हें सावधानी एवं तत्परतापूर्वक करनेसे ही कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। जैसे वृक्षकी कड़ी टहनी जल्दी टूट जाती है, पर जो अधूरी टूटनेके कारण लटक रही है, ऐसी शिथिल (ढीली) टहनी जल्दी नहीं टूटती, ऐसे ही सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, पर आलस्य-प्रमादपूर्वक (शिथिलतापूर्वक) कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। इसीलिये भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें 'समाचर' पदका तथा इस श्लोकमें'अतन्द्रितः' पदका प्रयोग किया है।अगर किसी कर्मकी बार-बार याद आती है, तो यही समझना चाहिये कि कर्म करनेमें कोई त्रुटि (कामना, आसक्ति, अपूर्णता, आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा आदि) हुई है, जिसके कारण उस कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ है। कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद न होनेके कारण ही किये गये कर्मकी याद आती है।'मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः' इन पदोंसे भगवान् मानो यह कहते हैं कि मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले ही वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। जो मुझे आदर्श न मानकर आलस्य-प्रमादवश कर्तव्य-कर्म नहीं करते और अधिकार चाहते हैं, वे आकृतिसे मनुष्य होनेपर भी वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं।इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि श्रेष्ठ पुरुषके आचरण और प्रमाणके अनुसार सब मनुष्य उनका अनुसरण करते हैं और इस श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुसरण करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठ पुरुष तो एक ही लोक-(मनुष्यलोक-) में आदर्श पुरुष हैं पर मैं तीनों ही लोकोंमें आदर्श पुरुष हूँ।मनुष्यको संसारमें कैसे रहना चाहिये-- यह बतानेके लिये भगवान् मनुष्यलोकमें अवतरित होते हैं। संसारमें अपने लिये रहना ही नहीं है--यही संसारमें रहनेकी विद्या है। संसार वस्तुतः एक विद्यालय है, जहाँ हमें कामना, ममता, स्वार्थ आदिके त्यागपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करना सीखना है और उसके अनुसार कर्म करके अपना उद्धार करना है। संसारके सभी सम्बन्धी एकदूसरेकी सेवा (हित) करनेके लिये ही हैं।इसीलिये पिता पुत्र पति पत्नी भाई बहन आदि सबको चाहिये कि वे एकदूसरेके अधिकारकी रक्षा करते हुए अपनेअपने कर्तव्य पालन करें और एक-दूसरेके कल्याणकी चेष्टा करें।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा होनेसे क्या दोष हो जायगा सो कहते हैं यदि मैं कर्म न करूँ तो लोकस्थितिके लिये किये जानेवाले कर्मोंका अभाव हो जानेसे यह सब लोक नष्ट हो जायँगे और मैं वर्णसंकरका कर्ता होऊँगा इसलिये इस प्रजाका नाश भी करूँगा अर्थात् प्रजापर अनुग्रह करनेमें लगा हुआ मैं इनका हनन करनेवाला बूनँगा। यह सब मुझ ईश्वरके अनुरूप नहीं होगा।

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Sri Anandgiri

श्रेष्ठस्य तव मार्गानुवर्तित्वं मनुष्याणामुचितमेवेत्याशङ्क्य दूषयति तथाचेत्यादिना। ईश्वरस्य कर्मण्यप्रवृत्तौ तदनुवर्तिनामपि कर्मानुपपत्तेरिति हेतुमाह लोकस्थितीति। इतश्चेश्वरेण कर्म कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। यदि कर्म न कुर्यामिति शेषः। संकरकरणस्य कार्यं कथयति तेनेति। प्रजोपहतिः परिप्राप्यते चेत् किं तया तव स्यादिति तत्राह प्रजानामिति। त्वामनाचरन्तमनुवर्ततां सर्वेषां को दोषः स्यादित्यपेक्षायामीश्वरस्य कृतार्थतया कर्मानुष्ठानाभावे तदनुवर्तिनामपि तदभावादेव स्थितिहेत्वभावात्पृथिव्यादिभूतानां विनाशप्रसङ्गाद्वर्णाश्रमधर्मव्यवस्थानुपपत्तेश्चाधिकृतानां प्राणभृतां पापोपहतत्वप्रसङ्गात्परानुग्रहार्थं प्रवृत्तिरीश्वरस्येत्युक्तं संप्रति लोकसंग्रहाय कर्म कुर्वाणस्य कर्तृत्वाभिमानेन ज्ञानाभिभवे प्राप्ते प्रत्याह यदि पुनरिति। कृतार्थबुद्धित्वे हेतुमाह आत्मविदिति। यथावदात्मानमवगच्छत्कर्तृत्वाद्यभिमानाभावात्कृतार्थो भवत्येवेत्यर्थः। अर्जुनादन्यत्रापि ज्ञानवति कृतार्थबुद्धित्वं कर्तव्यत्वाद्यभिमानहीने तुल्यमित्याह अन्यो वेति। तस्य तर्हि कर्मानुष्ठानमफलत्वादनवकाशमित्याशङ्क्याह तस्यापीति। कर्तव्य इत्यात्मविदापि परानुग्रहाय कर्तव्यमेव कर्मेत्याहेति शेषः।

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Sri Dhanpati

तथाच को दोष इत्यत आह उत्सीदेयुरिति। अहं चेत्कर्म न कुर्यां तर्हि इमें लोकाः उत्सीदेयुर्नश्येयुः लोकानुच्छित्तिनिमित्तकर्मणोऽभावात्। संकरस्य च कर्ता स्यां तेनेमाः प्रजाः उपहन्यामतः प्रजानामनुग्रहाय प्रवृत्तस्य ममेदं नानुरुपमित्यर्थः। युत्तु यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना न केवलं लोकसंग्रहं पश्यन्कर्तुमर्हस्यपि तु श्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह यद्यदिति। तथाच मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयो न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थत्यादिभिस्त्रिभिस्तत्प्रदर्शनमिति केषांचिद्य्वाख्यानं तद्भाष्यानुगुण्येन योजनीयम्। यद्वा लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसीति पूर्वोक्तानुरोधेन लोकसंग्रहं कः कर्तुमिच्छति कथंचेत्युच्यते। यद्यदित्यस्य भाष्योक्तोत्थापनविरुद्धं न केवलमित्याद्युपेक्ष्यम्। कर्मणैवेत्यादिना शिष्टाचारस्योक्तत्वात् सक्ता इत्यादिना विदुषो लोकसंग्रहाय कर्मणि प्रवृत्तिं दर्शयता यदि त्वमात्मानं विद्वांसं मन्यसे तर्हि लोकसंग्रहं संप्रति पश्यन्कर्मकर्तुमर्हसीत्येवं दृढीकृतं तस्मान्मध्येऽपि स्वस्य श्रेष्ठस्य कर्मणि प्रवृत्तिं प्रत्यक्षसिद्धां दर्शयंस्तदेव द्रढयति। योजनान्तरानीतार्थस्त्वर्थात्संबोधनाद्वापि सिध्यतीति न तदर्था भाष्यविरुद्दा क्लिष्टयोजना प्रदर्शनीयेति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
utsīdeyuḥwould perish
imeall these
lokāḥworlds
nanot
kuryāmI perform
karmaprescribed duties
chetif
ahamI
sankarasyaof uncultured population
chaand
kartāresponsible
syāmwould be
upahanyāmwould destroy
imāḥall these
prajāḥliving entities
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः

हे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.25
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्िचकीर्षुर्लोकसंग्रहम्

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 24
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 24
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः

हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 24?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 24 translates to: "These worlds would perish if I did not perform action; I would be the author of confusion of castes and destruction of these beings. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्र" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham" mean in English?

"utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 24. These worlds would perish if I did not perform action; I would be the author of confusion of castes and destruction of these beings. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.