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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है। — VaniSagar

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BengaliIND

যে এইভাবে স্থাপিত চাকাকে অনুসরণ করে না, যিনি পাপময় জীবনের অধিকারী, ইন্দ্রিয়ে আনন্দিত, হে অর্জুন, তিনি বৃথা জীবনযাপন করেন।

MarathiIND

हे अर्जुना, जो अशा प्रकारे चाललेल्या चक्राचे अनुसरण करीत नाही, जो पापमय जीवनाचा आहे, इंद्रियांमध्ये आनंदित आहे, तो व्यर्थ जीवन जगतो.

KannadaIND

ಹೀಗೆ ಚಲಿಸುವ ಚಕ್ರವನ್ನು ಅನುಸರಿಸದ, ಪಾಪದ ಜೀವನ, ಇಂದ್ರಿಯಗಳಲ್ಲಿ ಸಂತೋಷಪಡುವವನು, ಓ ಅರ್ಜುನ, ವ್ಯರ್ಥವಾಗಿ ಬದುಕುತ್ತಾನೆ.

GujaratiIND

હે અર્જુન, જે આ રીતે ચાલતા ચક્રને અનુસરતો નથી, જે પાપી જીવનનો છે, ઇન્દ્રિયોમાં આનંદિત છે, તે વ્યર્થ જીવે છે.

NepaliIND

जसले यसरी चलाएको चक्रको अनुसरण गर्दैन, जो पापमय जीवनको छ, इन्द्रियहरूमा आनन्दित छ, त्यो व्यर्थको जीवन बिताउँछ, हे अर्जुन।

SindhiIND

اُهو جيڪو اُن چريءَ جي پيروي نه ٿو ڪري، جيڪو اهڙيءَ طرح حرڪت ۾ اچي ٿو، جيڪو گناهن واري زندگي جو آهي، هوش ۾ خوش رهي، اي ارجن، بيڪار زندگي گذاري ٿو.

MalayalamIND

ഇപ്രകാരം ചലിക്കുന്ന ചക്രത്തെ പിന്തുടരാത്തവനും, പാപജീവിതമുള്ളവനും, ഇന്ദ്രിയങ്ങളിൽ ആനന്ദിക്കുന്നവനും, ഹേ അർജുനാ, വ്യർത്ഥമായി ജീവിക്കുന്നു.

OdiaIND

ଯିଏ ଚକକୁ ଅନୁସରଣ କରେ ନାହିଁ ସେ ଏହିପରି ଗତି କରେ, ଯିଏ ପାପପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନ, ​​ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡିକରେ ଆନନ୍ଦ କରେ, ହେ ଅର୍ଜୁନ ବୃଥା ଜୀବନଯାପନ କରେ |

TeluguIND

ఈ విధముగా నడపబడిన చక్రమును అనుసరించనివాడు, పాపాత్ముడైనవాడు, ఇంద్రియములలో సంతోషించువాడు, ఓ అర్జునా, వ్యర్థముగా జీవిస్తాడు.

AssameseIND

যি এইদৰে গতি কৰা চকা অনুসৰণ নকৰে, যি পাপ জীৱনৰ, ইন্দ্ৰিয়ত আনন্দ কৰি, তেওঁ অসাৰ জীৱন যাপন কৰে, হে অৰ্জুন।

ManipuriIND

ꯑꯁꯨꯝꯅꯥ ꯆꯠꯊꯔꯀꯄꯥ ꯆꯀꯥ ꯑꯗꯨ ꯇꯨꯡ ꯏꯟꯗꯕꯥ, ꯄꯥꯄꯀꯤ ꯄꯨꯟꯁꯤꯒꯤ ꯑꯣꯏꯕꯥ, ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤꯁꯤꯡꯗꯥ ꯍꯔꯥꯑꯣꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯑꯔꯥꯌꯕꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯍꯤꯡꯏ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ |

PunjabiIND

ਜੋ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਚਲਦੇ ਚੱਕਰ ਦਾ ਪਾਲਣ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਜੋ ਪਾਪੀ ਜੀਵਨ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਇੰਦਰੀਆਂ ਵਿੱਚ ਅਨੰਦ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਵਿਅਰਥ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'पार्थ'--नवें श्लोकमें प्रारम्भ किये हुए प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् यहाँ अर्जुनके लिये पार्थ सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि तुम उसी पृथा(कुन्ती) के पुत्र हो जिसने आजीवन कष्ट सहकर भी अपने कर्तव्यका पालन किया था। अतः तुम्हारेसे भी अपने कर्तव्यकी अवहेलना नहीं होनी चाहिये। जिस युद्धको तू घोर कर्म कह रहा है वह तेरे लिये घोर कर्म नहीं प्रत्युत यज्ञ (कर्तव्य) है। इसका पालन करना ही सृष्टिचक्रके अनुसार बरतना है और इसका पालन न करना सृष्टिचक्रके अनुसार न बरतना है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस लोकमें जो मनुष्य कर्माधिकारी होकर इस प्रकार ईश्वरद्वारा वेद और यत्नपूर्वक चलाये हुए इस जगत्चक्रके अनुसार ( वेदाध्ययनयज्ञादि ) कर्म नहीं करता हे पार्थ वह पापायु अर्थात् पापमय जीवनवाला और इन्द्रियारामी अर्थात् इन्द्रियोंद्वारा विषयोंमें रमण करनेवाला व्यर्थ ही जीता है उस पापीका जीना व्यर्थ ही है। इसलिये इस प्रकरणका अर्थ यह हुआ कि अज्ञानी अधिकारीको कर्म अवश्य करना चाहिये। अनात्मज्ञ अधिकारी पुरुषको आत्मज्ञानकी योग्यता प्राप्त होनेके पहले ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये यह न कर्मणामनारम्भात् यहाँसे लेकर शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः इस श्लोकतकके वर्णनसे प्रतिपादन करके यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र से लेकर मोघं पार्थ स जीवति तकके ग्रन्थसे भी आत्मज्ञानसे रहित कर्माधिकारीके लिये कर्मोंके अनुष्ठान करनेमें बहुतसे प्रसङ्गानुकूल कारण कहे गये तथा उन कर्मोंके न करनेमें बहुतसे दोष भी बतलाये गये। यदि ऐसा है तो क्या इस प्रकार चलाये हुए इस सृष्टिचक्रके अनुसार सभीको चलना चाहिये अथवा पूर्वोक्त कर्मयोगानुष्ठानरूप उपायसे प्राप्त होनेवाली और आत्मज्ञानी सांख्ययोगियोंद्वारा सेवन किये जाने योग्य ज्ञानयोगसे ही सिद्ध होनेवाली निष्ठाको न प्राप्त हुए अनात्मज्ञको ही इसके अनुसार बर्तना चाहिये ( या तो ) इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नकी आशङ्का करके ( भगवान् बोले )

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अधिकृतेनाध्ययनादिद्वारा जगच्चक्रमनुवर्तनीयमन्यथेश्वराज्ञातिलङ्घिनस्तस्य प्रत्यवायः स्यादित्याह एवमिति।न कर्मणामनारम्भात् इत्यादिनोक्तमुपसंहरति तस्मादिति। जगच्चक्रस्य प्रागुक्तप्रकारेणानुवर्तने वृथा जीवनमघसाधनं यस्मात्तस्माज्जीवता नियतं कर्म कर्तव्यमित्यर्थः। यद्यधिकृतेन कर्तव्यमेव कर्म तर्हि किमित्यज्ञेनेति विशिष्यते ज्ञाननिष्ठेनापि तत्कर्तव्यमेवाधिकृतत्वाविशेषादित्याशङ्क्य पूर्वोक्तमनुवदति प्रागिति। नहि ज्ञानकर्मणोर्विरोधाज्ज्ञाननिष्ठेन कर्म कर्तुं शक्यते तथा चानात्मज्ञेनैव चित्तशुद्ध्यादिपरंपरया ज्ञानार्थं कर्मानुष्ठेयमिति प्रतिपादितमित्यर्थः। तर्हि यज्ञार्थादित्यादि। किमर्थं नहि तत्र ज्ञाननिष्ठा प्रतिपाद्यते कर्मनिष्ठा तु पूर्वमेवोक्तत्वान्नात्र वक्तव्येत्याशङ्क्य वृत्तमर्थान्तरमनुवदति प्रतिपाद्येति। प्रासङ्गिकमज्ञस्य कर्मकर्तव्यतोक्तिप्रसङ्गागतमिति यावद् बहुकारणमीश्वरप्रसादो देवताप्रीतिश्चेत्यादि दोषसंकीर्तनंतैर्दत्तानप्रदाय इत्यादि।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

फलितमाह। एवमीश्वरेण वेदयज्ञपूर्वकं जगच्चकं प्रवर्तितं य इहलोके कर्माधिकृतो नानुवर्तयति नानुतिष्ठति स अधायुरघं पापमायुर्जीवनं यस्य स इन्द्रियैरारमणं विषयसेवनं यस्य सः व्यर्थं जीवति। त्वया तु जगच्चक्रप्रवर्तकस्य ममानुसरणमवश्यं कर्तव्यमिति द्योतयन्नाह पार्थेति। तस्मादज्ञेनाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमेवेति प्रकरणार्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
evamthus
pravartitamset into motion
chakramcycle
nanot
anuvartayatifollow
ihain this life
yaḥwho
aghaāyuḥ
indriyaārāmaḥ
moghamvainly
pārthaArjun, the son of Pritha
saḥthey
jīvatilive
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.17
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते

जो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला और अपने-आपमें ही तृप्त तथा अपने-आपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 16 translates to: "He who does not follow the wheel thus set in motion, who is of sinful life, rejoicing in the senses, lives in vain, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "evaṁ pravartitaṁ chakraṁ nānuvartayatīha yaḥ" mean in English?

"evaṁ pravartitaṁ chakraṁ nānuvartayatīha yaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 16. He who does not follow the wheel thus set in motion, who is of sinful life, rejoicing in the senses, lives in vain, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.