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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

জেনে রেখো কর্ম ব্রহ্মার থেকে, আর ব্রহ্মা আসে অবিনশ্বর থেকে। অতএব, সর্বব্যাপী ব্রহ্মা সর্বদা যজ্ঞে বিশ্রাম নেন।

KannadaIND

ಕ್ರಿಯೆಯು ಬ್ರಹ್ಮದಿಂದ ಬರುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಬ್ರಹ್ಮವು ಅವಿನಾಶಿಯಿಂದ ಬರುತ್ತದೆ ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ. ಆದ್ದರಿಂದ, ಸರ್ವವ್ಯಾಪಿಯಾದ ಬ್ರಹ್ಮವು ತ್ಯಾಗದಲ್ಲಿ ಯಾವಾಗಲೂ ವಿಶ್ರಾಂತಿ ಪಡೆಯುತ್ತದೆ.

TeluguIND

కార్యము బ్రహ్మము నుండి వచ్చుననియు, బ్రహ్మము నాశనము నుండి వచ్చుననియు తెలిసికొనుము. కావున సర్వవ్యాపకమైన బ్రహ్మ యజ్ఞముననే నిలిచియుండును.

MarathiIND

कृती ब्रह्मापासून येते आणि ब्रह्म अविनाशी पासून येते हे जाणून घ्या. म्हणून, सर्वव्यापी ब्रह्मा सदैव त्यागात विसावतो.

TamilIND

செயல் பிரம்மத்திலிருந்து வருகிறது, பிரம்மம் அழியாததிலிருந்து வருகிறது என்பதை அறிந்து கொள்ளுங்கள். எனவே, எங்கும் நிறைந்திருக்கும் பிரம்மம் எப்போதும் யாகத்தில் தங்கியிருக்கிறது.

PunjabiIND

ਜਾਣੋ ਕਿ ਕਰਮ ਬ੍ਰਹਮਾ ਤੋਂ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਤੋਂ ਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਸਰਬ ਵਿਆਪਕ ਬ੍ਰਹਮਾ ਸਦਾ ਬਲੀਦਾਨ ਵਿੱਚ ਟਿਕਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

જાણો કે ક્રિયા બ્રહ્માથી આવે છે, અને બ્રહ્મા અવિનાશીમાંથી આવે છે. તેથી, સર્વવ્યાપી બ્રહ્મા હંમેશા યજ્ઞમાં વિશ્રામ કરે છે.

MalayalamIND

കർമ്മം ബ്രഹ്മത്തിൽ നിന്നാണെന്നും ബ്രഹ്മം നശ്വരത്തിൽ നിന്നാണെന്നും അറിയുക. അതിനാൽ, സർവവ്യാപിയായ ബ്രഹ്മാവ് എന്നും യാഗത്തിൽ വിശ്രമിക്കുന്നു.

MaithiliIND

जानिए कि कर्म ब्रह्मा से होता है, और ब्रह्मा अविनाशी से होता है | अतः सर्वव्यापी ब्रह्म नित्य यज्ञ मे विश्राम करैत छथि |

AssameseIND

জানি লোৱা যে কৰ্ম ব্ৰহ্মাৰ পৰা আহে, আৰু ব্ৰহ্মা অক্ষয়ৰ পৰা আহে। সেয়ে সৰ্বব্যাপী ব্ৰহ্মই কেতিয়াও যজ্ঞত বিশ্ৰাম লয়।

SindhiIND

ڄاڻو ته عمل برهما کان اچي ٿو، ۽ برهما غير فاني مان اچي ٿو. تنهن ڪري، تمام وسيع برهما هميشه قرباني ۾ آرام ڪري ٿو.

NepaliIND

कर्म ब्रह्माबाट आउँछ र ब्रह्मा अविनाशीबाट आउँछ भनेर जान। तसर्थ, सर्वव्यापी ब्रह्मा सधैं यज्ञमा वास गर्नुहुन्छ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.15।। व्याख्या--'अन्नाद्भवन्ति भूतानि'--प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है, वह 'अन्न' कहलाता है। जिस प्राणीका जो खाद्य है, जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति, भरण और पुष्टि होती है, उसे ही यहाँ 'अन्न' नामसे कहा गया है; जैसे--मिट्टीका कीड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन्न है।जरायुज (मनुष्य, पशु आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि), अण्डज (पक्षी सर्प चींटी आदि) और स्वेदज (जूँ आदि)--ये चारों प्रकारके प्राणी अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्नसे ही जीवित रहते हैं ।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

और उस क्रियारूप कर्मको तू वेदरूप ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ जान अर्थात् कर्मकी उत्पत्तिका कारण वेद है ऐसे जान और वेदरूप ब्रह्म अक्षरसे उत्पन्न हुआ है अर्थात् अविनाशी परब्रह्म परमात्मा वेदकी उत्पत्तिका कारण है। वेदरूप ब्रह्म साक्षात् परमात्मा नामक अक्षरसे पुरुषके निःश्वासकी भाँति उत्पन्न हुआ है इसलिये वह सब अर्थोंको प्रकाशित करनेवाला होनेके कारण सर्वगत है। तथा यज्ञविधिमें वेदकी प्रधानता होनेके कारण वह सर्वगत होता हुआ ही सदा यज्ञमें प्रतिष्ठित है।

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Sri Anandgiri

यदपूर्वहेतुत्वेन कर्मोक्तं तत्किं चैत्यवन्दनादि किं वाग्निहोत्रादीति संदिहानं प्रत्याह कर्मेति। किमिति कर्मणो ब्रह्मोद्भवत्वमुच्यते सर्वस्य तदुद्भवत्वाविशेषादित्याशङ्क्याह ब्रह्म वेद इति। ब्रह्म तर्हि वेदाख्यमनादिनिधनमिति तत्राह ब्रह्म पुनरिति। अक्षरात्मनो वेदस्य पुनरक्षरेभ्यः सकाशादेव समुद्भवो न संभवतीत्याशङ्क्याह अक्षरमिति। ब्रह्मेत्यक्षरमेवोक्तं तत्कथं तस्मादेवोद्भवतीत्याशङ्क्य ब्रह्मशब्दार्थमुक्तमेव स्मारयति ब्रह्म वेद इति। ननु ब्रह्मशब्दितस्य वेदस्यापि पौरुषेयत्वात्प्रामाण्यसंदेहात्कथं त्वदुक्तमग्निहोत्रादिकं कर्म निर्धारयितुं शक्यते तत्राह यस्मादिति। कथं तर्हि तस्य यज्ञे प्रतिष्ठितत्वं सर्वगतत्वे विशेषायोगादित्याशङ्क्याह सर्वगतमपीति।

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Sri Dhanpati

कर्म ब्रह्म वेद उद्भवः कारणं यस्य तज्जानीहि ब्रह्म वेदाख्यमक्षरः परमात्मा समुद्भवः कारणं यस्य तत्अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङिगिरसः इत्यादिश्रुतेः। यस्मादेवं तस्मात्सर्वार्थप्रकाशकत्वात् सर्वगतमपि सद्वेदाख्यं ब्रह्म नित्यं सदा यज्ञविधिप्रधानत्वात् यज्ञे प्रतिष्ठितम्। यत्त्वक्षरं ब्रह्म सर्वदा यज्ञे प्रतिष्ठितं यज्ञेनोपायभूतेन प्राप्यत इत्यपरेषां व्याख्यानं तदरुचिग्रस्तम्। अरुचिबीजं तु पूर्वार्धस्थब्रह्मपदद्वयस्य वेदपरत्वेनात्रान्यपरत्वेवेदो वा प्रायदर्शनात् इतिन्यायविरोधादि।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
karmaduties
brahmain the Vedas
udbhavammanifested
viddhiyou should know
brahmaThe Vedas
akṣharafrom the Imperishable (God)
samudbhavamdirectly manifested
tasmāttherefore
sarvagatam
brahmaThe Lord
nityameternally
yajñein sacrifice
pratiṣhṭhitamestablished
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.14
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 15 translates to: "Know that action comes from Brahma, and Brahma comes from the Imperishable. Therefore, the all-pervasive Brahma ever rests in sacrifice. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam" mean in English?

"karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 15. Know that action comes from Brahma, and Brahma comes from the Imperishable. Therefore, the all-pervasive Brahma ever rests in sacrifice. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.