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Adhyay 3, Shlok 13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं। — VaniSagar

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BengaliIND

ধার্মিক যারা বলির অবশিষ্টাংশ খায় তারা সমস্ত পাপ থেকে মুক্তি পায়; কিন্তু যারা পাপী যারা শুধুমাত্র নিজেদের স্বার্থে খাবার রান্না করে তারা প্রকৃতপক্ষে পাপ গ্রাস করে।

KannadaIND

ಯಜ್ಞದ ಅವಶೇಷಗಳನ್ನು ತಿನ್ನುವ ನೀತಿವಂತರು ಎಲ್ಲಾ ಪಾಪಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತರಾಗುತ್ತಾರೆ; ಆದರೆ ಪಾಪಿಗಳು ತಮ್ಮ ಸಲುವಾಗಿ ಮಾತ್ರ ಆಹಾರವನ್ನು ಬೇಯಿಸುತ್ತಾರೆ, ಅವರು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಪಾಪವನ್ನು ಸೇವಿಸುತ್ತಾರೆ.

MarathiIND

त्यागाचे अवशेष खाणारे नीतिमान सर्व पापांपासून मुक्त होतात; परंतु जे पापी लोक केवळ स्वतःच्या फायद्यासाठी अन्न शिजवतात ते खरोखरच पाप भस्म करतात.

MaithiliIND

जे धर्मी बलिदानक अवशेष खाइत छथि, ओ सभ पाप सँ मुक्त भ' जाइत छथि; मुदा जे पापी मात्र अपनहि लेल भोजन पकाबैत छथि से सत्ते पापक सेवन करैत छथि।

GujaratiIND

જેઓ બલિદાનના અવશેષો ખાય છે તેઓ બધા પાપોમાંથી મુક્ત થાય છે; પરંતુ જે પાપી લોકો માત્ર પોતાના ખાતર જ ભોજન રાંધે છે તે ખરેખર પાપનું સેવન કરે છે.

PunjabiIND

ਬਲੀਦਾਨ ਦੇ ਬਚੇ ਹੋਏ ਭੋਜਨ ਖਾਣ ਵਾਲੇ ਧਰਮੀ ਸਾਰੇ ਪਾਪਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ; ਪਰ ਉਹ ਪਾਪੀ ਜੋ ਸਿਰਫ਼ ਆਪਣੇ ਲਈ ਭੋਜਨ ਪਕਾਉਂਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਸੱਚਮੁੱਚ ਪਾਪ ਦਾ ਸੇਵਨ ਕਰਦੇ ਹਨ।

TeluguIND

త్యాగం యొక్క అవశేషాలను భుజించే నీతిమంతులు అన్ని పాపాల నుండి విముక్తి పొందుతారు; కానీ తమ స్వార్థం కోసం మాత్రమే ఆహారం వండుకునే పాపాత్ములు నిజంగా పాపాన్ని తింటారు.

MalayalamIND

യാഗത്തിൻ്റെ അവശിഷ്ടങ്ങൾ ഭക്ഷിക്കുന്ന നീതിമാൻ എല്ലാ പാപങ്ങളിൽനിന്നും മോചിതരാകുന്നു; എന്നാൽ സ്വന്തം കാര്യത്തിനായി മാത്രം ഭക്ഷണം പാകം ചെയ്യുന്ന പാപികൾ തീർച്ചയായും പാപം തിന്നുന്നു.

NepaliIND

बलिदानका अवशेषहरू खाने धर्मीहरू सबै पापहरूबाट मुक्त हुन्छन्; तर ती पापीहरू जसले आफ्नो लागि मात्र खाना पकाउँछन्, वास्तवमा पाप उपभोग गर्छन्।

TamilIND

பலியின் எச்சத்தை உண்ணும் நீதிமான்கள் எல்லா பாவங்களிலிருந்தும் விடுபடுகிறார்கள்; ஆனால், பாவம் செய்பவர்கள், தங்கள் சொந்த நலனுக்காக மட்டுமே உணவைச் சமைப்பார்கள்.

SindhiIND

نيڪ ماڻهو جيڪي قربانيءَ جا باقي بچيل کائيندا آهن، سي سڀ گناهن کان آزاد ٿي ويندا آهن. پر اُھي گنھگار جيڪي رڳو پنھنجي لاءِ ماني پچائن ٿا، سي حقيقت ۾ گناھ کائيندا آھن.

DogriIND

जेड़े धर्मी बलिदान दे अवशेष खांदे न, सारे पापें कोला मुक्त होंदे न; पर जेके पापी सिर्फ अपने आस् ते गै खाना पकांदे न, ओह़ सच् चाई च पाप दा सेवन करदे ह़न।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.13।। व्याख्या--'यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः'--कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावसे विधिपूर्वक पालन करनेपर (यज्ञशेषके रूपमें) योग अथवा समता ही शेष रहती है। कर्मयोगमें यह खास बात है कि संसारसे प्राप्त सामग्रीके द्वारा ही कर्म होता है। अतः संसारकी सेवामें लगा देनेपर ही वह कर्म 'यज्ञ' सिद्ध होता है। यज्ञकी सिद्धिके बाद स्वतः अवशिष्ट रहनेवाला 'योग' अपने लिये होता है। यह योग (समता) ही यज्ञशेष है, जिसको भगवान्ने चौथे अध्यायमें 'अमृत' कहा है 'यज्ञशिष्टामृतभुजः' (4। 31)। 'मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः'-- यहाँ 'किल्बिषैः' पद बहुवचनान्त है, जिसका अर्थ है--सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् बन्धनोंसे। परन्तु भगवान्ने इस पदके साथ 'सर्व' पद भी दिया है ,जिसका विशेष तात्पर्य यह हो जाता है कि यज्ञशेषका अनुभव करनेपर मनुष्यमें किसी भी प्रकारका बन्धन नहीं रहता। उसके सम्पूर्ण (सञ्चित, प्रारब्ध और क्रियमाण) कर्म विलीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)। सम्पूर्ण कर्मोंके विलीन हो जानेपर उसे सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 4। 31)। इसी अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने यज्ञार्थ कर्मसे अन्यत्र कर्मको बन्धनकारक बताया और चौथे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें यज्ञार्थ कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन होनेकी बात कही। इन दोनों श्लोकों (3। 9 तथा 4। 23) में जो बात आयी है, वही बात यहाँ 'सर्वकिल्बिषैः' पदसे कही गयी है। तात्पर्य है कि यज्ञशेषका अनुभव करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण बन्धनरूप कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं। पाप-कर्म तो बन्धनकारक होते ही हैं, सकामभावसे किये गये पुण्यकर्म भी (फलजनक होनेसे) बन्धनकारक होते हैं। यज्ञशेष-(समता-) का अनुभव करनेपर पाप और पुण्य--दोनों ही नहीं रहते--'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते' (गीता 2। 50)। अब विचार करें कि बन्धनका वास्तविक कारण क्या है? ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये--इस कामनासे ही बन्धन होता है। यह कामना सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है (गीता 3। 37)। अतः कामनाका त्याग करना अत्यन्त आवश्यक है।वास्तवमें कामनाकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। कामना अभावसे उत्पन्न होती है और 'स्वयं' (सत्स्वरूप) में किसी प्रकारका अभाव है ही नहीं और हो सकता भी नहीं। इसलिये 'स्वयं' में कामना है ही नहीं। केवल भूलसे शरीरादि असत् पदार्थोंके साथ अपनी एकता मानकर मनुष्य असत् पदार्थोंके अभावसे अपनेमें अभाव मानने लगता है और उस अभावकी पूर्तिके लिये असत् पदार्थोंकी कामना करने लगता है। साधकको इस बातकी तरफ खयाल करना चाहिये कि आरम्भ और समाप्त होनेवाली क्रियाओंसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ ही तो मिलेंगे। ऐसे उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंसे मनुष्यके अभावकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। जब इन पदार्थोंसे अभावकी पूर्ति होनेका प्रश्न ही नहीं है, तो फिर इन पदार्थोंकी कामना करना भी भूल ही है। ऐसा ठीक-ठीक विचार करनेसे कामनाकी निवृत्ति सहज हो सकती है।हाँ, अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थोंको कभी भी अपना तथा अपने लिये न मानकर दूसरोंकी सेवामें लगानेसे इन पदार्थोंसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जिससे तत्काल अपने सत्स्वरूपका बोध हो जाता है। फिर कोई अभाव शेष नहीं रहता। जिसके मनमें किसी प्रकारके अभावकी मान्यता (कामना) नहीं रहती, वह मनुष्य जीते-जी ही संसारसे मुक्त है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं अर्थात् देवयज्ञादि करके उससे बचे हुए अमृत नामक अन्नको भक्षण करना जिनका स्वभाव है वे सब पापोंसे अर्थात् गृहस्थमें होनेवाले चक्की चूल्हे आदिके पाँच पापोंसे और प्रमादसे होनेवाले हिंसादिजनित अन्य पापोंसे भी छूट जाते हैं। तथा जो उदरपरायण लोग केवल अपने लिये ही अन्न पकाते हैं वै स्वयं पापी हैं और पाप ही खाते हैं।

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Sri Anandgiri

देवादिभ्यः संविभागमकृत्वा भुञ्जानानां प्रत्यवायित्वमुक्त्वा तदन्येषां सर्वदोषराहित्यं दर्शयति ये पुनरिति। यज्ञशिष्टाशिनो ये पुनस्ते तादृशाः सन्तः सर्वकिल्बिषैर्मुच्यन्त इति योजना। तैर्दत्तानित्यादिनोक्तं निगमयति भुञ्जत इति। देवयज्ञादीनित्यादिशब्देन पितृयज्ञो मनुष्ययज्ञो भूतयज्ञो ब्रह्मयज्ञश्चेति चत्वारो यज्ञा गृह्यन्ते चुल्लीशब्देन पिठरधारणाद्यर्थक्रियां कुर्वन्तो विन्यासविशेषवन्तस्त्रयो ग्रावाणो विवक्ष्यन्ते। आदिशब्देन कण्डनी पेषणी मार्जन्युदककुम्भश्चेत्येते हिंसाहेतवो गृहीतास्तान्येतानि पञ्च प्राणिनां सूनास्थानानि हिंसाकारणानि तत्प्रयुक्तैः सर्वैरपि बुद्ध्यबुद्धिपूर्वकैर्दुरितैर्मुच्यन्त इति संबन्धः। प्रमादो विचारव्यतिरेकेणाबुद्धिपूर्वकमुपनतं पादपातादिकर्म तेन प्राणिनां हिंसा संभाव्यते। आदिशब्देनाशुचिसंस्पर्शादि गृहीतं तदुत्थैश्च पापैर्महायज्ञकारिणो मुच्यन्ते। उक्तंहिकण्डनं पेषणं चुल्ली उदकुम्भश्च मार्जनी। पञ्च सूना गृहस्थस्य पञ्चयज्ञात्प्रणश्यति इति।पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्यवस्करः। कण्डनी चैव कुम्भश्च बध्यन्ते यांस्तु वाहयन् इति च। अस्यायमर्थः या यथोक्ताः पञ्चसंख्याका गृहस्थस्य सूनास्ता यो वाहयन्नापादयन् वर्तते तेन प्राणिनो बुद्धिपूर्वकमबुद्धिपूर्वकं च बध्यन्ते तत्प्रयुक्तं सर्वमपि पापं महायज्ञानुष्ठानात्प्रणश्यतीति महायज्ञानुष्ठानस्तुत्यर्थम्। तदनुष्ठानविमुखान्निन्दति ये त्विति। आत्मंभरित्वमेव स्फोरयति ये पचन्तीति। स्वदेहेन्द्रियपोषणार्थमेव पाकं कुर्वतां देवयज्ञादिपराङ्मुखानां पापभूयस्त्वं दर्शयति भुञ्जत इति। पाठक्रमस्त्वर्थक्रमादपबाधनीयः।

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Sri Dhanpati

ये पुनर्यज्ञान्ब्रह्मयज्ञो देवयज्ञः पितृयज्ञस्तथैवच। भूतयज्ञो नृयज्ञश्च पञ्चयज्ञाः प्रकीर्तिताः।। अध्यापनमध्ययनं चाद्यः होमो द्वितीयः तर्पणं श्राद्धं च तृतीयः भूतेभ्यो बलिप्रदानं चतुर्थः अतिथिपूजनं पञ्चमः इत्युक्तान्कृत्वा तच्छिष्टममृतमशितुं शीलं येषां ते सन्तः सर्वपापैःकण्डणी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्चसूना गृहस्थस्य वर्तन्तेऽहरहः सदा इतिस्मृत्युक्तैः पञ्चसूनाकृतैरन्यैश्च मुच्यन्ते। ये त्वन्ये आत्मकारणात्स्वोदरपूरर्णार्थे नतु वैश्वदेवाद्यर्थं पाकं कुर्वन्ति ते तु पापं भुञ्जते। तुशब्दः पूर्वेभ्यो वैलक्षण्यार्थः। अवधारणां तुसर्वं वाक्यं सावधारणम् इति न्यायलब्धम्। एतेन तुशब्दोऽवधारण इत्याचार्यविरुद्धोक्तिः प्रत्युक्ता।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yajñaśhiṣhṭa
aśhinaḥeaters
santaḥsaintly persons
muchyanteare released
sarvaall kinds of
kilbiṣhaiḥfrom sins
bhuñjateenjoy
tethey
tubut
aghamsins
pāpāḥsinners
yewho
pachanticook (food)
ātmakāraṇāt
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.14
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 13
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ: "यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 13?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 13 translates to: "The righteous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins; but those sinful ones who cook food solely for their own sake indeed consume sin. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 13 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ" mean in English?

"yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 13. The righteous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins; but those sinful ones who cook food solely for their own sake indeed consume sin. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.