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Sudarshana Chakra
Adhyay 3, Shlok 12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ಯಜ್ಞದಿಂದ ಪೋಷಿಸಲ್ಪಟ್ಟ ದೇವತೆಗಳು ನಿಮಗೆ ಬೇಕಾದ ವಸ್ತುಗಳನ್ನು ಕೊಡುತ್ತಾರೆ. ಹಾಗಾಗಿ ದೇವರು ಕೊಟ್ಟ ವಸ್ತುವನ್ನು ಪ್ರತಿಯಾಗಿ ಏನನ್ನೂ ನೀಡದೆ ಆನಂದಿಸುವವನು ಕಳ್ಳ.

TamilIND

யாகத்தால் போஷிக்கப்பட்ட தேவர்கள், விரும்பிய பொருட்களைத் தருவார்கள். எனவே, தெய்வங்கள் கொடுத்த பொருட்களைப் பிரதிபலனாக எதையும் கொடுக்காமல் அனுபவிப்பவன் உண்மையில் திருடன்தான்.

AssameseIND

যজ্ঞৰ দ্বাৰা পুষ্টি লাভ কৰা দেৱতাসকলে আপোনাক আকাংক্ষিত বস্তু দিব। গতিকে, যিজনে বিনিময়ত একো অৰ্পণ নকৰাকৈ দেৱতাই দিয়া বস্তুবোৰ উপভোগ কৰে, তেওঁ সঁচাকৈয়ে চোৰ।

BhojpuriIND

यज्ञ से पोषित देवता लोग मनचाहा वस्तु दे दिहे। त जे देवता लोग के दिहल वस्तु के बिना बदला में कुछ चढ़वले भोग करेला ऊ वाकई चोर होला.

TeluguIND

యజ్ఞం ద్వారా పోషణ పొందిన దేవతలు మీకు కావలసిన వస్తువులను ఇస్తారు. కాబట్టి, దేవతలు ఇచ్చిన వస్తువులను తిరిగి ఏమీ ఇవ్వకుండా ఆనందించేవాడు నిజంగా దొంగ.

NepaliIND

यज्ञद्वारा पोषित देवताहरूले इच्छित वस्तुहरू दिनुहुनेछ। तसर्थ, जसले देवताले दिएको वस्तुको उपभोग बिना केही नदिई उपभोग गर्छ, त्यो वास्तवमा चोर हो।

MalayalamIND

യാഗത്താൽ പോഷിപ്പിക്കപ്പെട്ട ദേവന്മാർ നിങ്ങൾക്ക് ആവശ്യമുള്ള വസ്തുക്കൾ നൽകും. അതിനാൽ, ദൈവങ്ങൾ നൽകുന്ന വസ്തുക്കളെ തിരിച്ചൊന്നും നൽകാതെ ആസ്വദിക്കുന്നവൻ തീർച്ചയായും കള്ളൻ തന്നെ.

BengaliIND

যজ্ঞের দ্বারা পুষ্ট দেবতারা আপনাকে কাঙ্খিত বস্তু দান করবেন। সুতরাং, যে ব্যক্তি দেবতাদের দেওয়া বস্তুর বিনিময়ে কিছু না দিয়ে ভোগ করে সে প্রকৃতপক্ষে চোর।

GujaratiIND

બલિદાન દ્વારા પોષિત દેવતાઓ તમને ઇચ્છિત વસ્તુઓ આપશે. તેથી, જે બદલામાં કંઈપણ આપ્યા વિના દેવતાઓ દ્વારા આપવામાં આવેલી વસ્તુઓનો આનંદ લે છે તે ખરેખર ચોર છે.

PunjabiIND

ਬਲਿਦਾਨ ਦੁਆਰਾ ਪਾਲਿਆ ਹੋਇਆ ਦੇਵਤੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਮਨਚਾਹੀ ਵਸਤੂਆਂ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਨਗੇ। ਇਸ ਲਈ, ਜੋ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੁਆਰਾ ਦਿੱਤੀਆਂ ਵਸਤੂਆਂ ਨੂੰ ਬਦਲੇ ਵਿਚ ਬਿਨਾਂ ਕੁਝ ਭੇਟ ਕੀਤੇ ਭੋਗਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਅਸਲ ਵਿਚ ਚੋਰ ਹੈ।

MarathiIND

त्यागाने पोषण झालेले देव तुम्हाला इच्छित वस्तू देतील. तर, देवांनी दिलेल्या वस्तूंचा उपभोग जो बदल्यात काहीही न देता घेतो तो खरोखरच चोर आहे.

SindhiIND

ديوتا، قرباني سان پاليا ويندا، توهان کي گهربل شيون ڏيندو. تنهن ڪري، جيڪو ديوتائن جي ڏنل شين مان لطف اندوز ٿئي ٿو، ان جي بدلي ۾ ڪجهه به نه ڏيڻ، حقيقت ۾ چور آهي.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

3.12।। व्याख्या--'इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः'--यहाँ भी 'इष्टभोग' शब्दका अर्थ इच्छित पदार्थ नहीं हो सकता। कारण कि पीछेके (ग्यारहवें) श्लोकमें परम कल्याणको प्राप्त होनेकी बात आयी है और उसके हेतुके लिये वह (बारहवाँ) श्लोक है। भोगोंकी इच्छा रहते परम कल्याण कभी हो ही नहीं सकता। अतः यहाँ 'इष्ट' शब्द यज् धातुसे निष्पन्न होनेसे तथा 'भोग' शब्दका अर्थ आवश्यक सामग्री होनेसे उपर्युक्त पदोंका अर्थ होगा वे देवता तुमलोगोंको यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे।यहाँ 'यज्ञभाविताः देवाः' पदोंका तात्पर्य है कि देवता तो अपना अधिकार समझकर मनुष्योंको आवश्यक सामग्री प्रदान करते ही हैं केवल मनुष्योंको ही अपना कर्तव्य निभाना है।'तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते' ब्रह्माजीने देवताओंके लिये 'ते देवाः' पदोंका प्रयोग किया है क्योंकि उनके सामने मनुष्य थे देवता नहीं। परन्तु यहाँ 'एभ्यः'पद (जो इदम् शब्दसे बनता है) का प्रयोग हुआ है जो समीपताका द्योतक है। भगवान्के लिये सभी समीप ही हैं (गीता 7। 26)। इससे सिद्ध होता है कि अब यहाँसे भगवान्के वचन आरम्भ होते हैं। यहाँ 'भुङ्क्ते' पदका तात्पर्य केवल भोजन करनेसे ही नहीं है प्रत्युत शरीरनिर्वाहकी समस्त आवश्यक सामग्री (भोजन, वस्त्र, धन, मकान आदि) को अपने सुख के लिये काममें लानेसे है।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

दूसरी बात यह भी है कि यज्ञद्वारा बढ़ाये हुए संतुष्ट किये हुए देवता लोग तुमलोगोंको स्त्री पशु पुत्र आदि इच्छित भोग देंगे। उन देवोंद्वारा दिये हुए भोगोंको उन्हें न देकर अर्थात् उनका ऋण न चुकाकर जो खाता है केवल अपने शरीर और इन्द्रियोंको ही तृप्त करता है वह देवताओंके स्वत्वको हरण करनेवाला चोर ही है।

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Sri Anandgiri

इतश्चाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। कथमस्माभिर्भाविताः सन्तो देवा भावयिष्यन्त्यस्मानिति तदाह इष्टानिति। यज्ञानुष्ठानेन पूर्वोक्तरीत्या स्वर्गापवर्गयोर्भावेऽपि कथं स्त्रीपशुपुत्रादिसिद्धिरित्याशङ्क्य पूर्वार्धं व्याकरोति इष्टानभिप्रेतानिति। पश्वादिभिश्च यज्ञानुष्ठानद्वारा भोगो निवर्तनीयोऽन्यथा प्रत्यवायप्रसङ्गादित्युत्तरार्धं व्याचष्टे तैरिति। आनृण्यमकृत्वेत्यर्थः। अथमर्थः देवानामृषीणां पितृ़णां च यज्ञेन ब्रह्मचर्येण प्रजया च संतोषमनापाद्य स्वकीयं कार्यकरणसंघातमेव पोष्टुं भुञ्जानस्तस्करो भवतीति।

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Sri Dhanpati

किंच ते देवा यज्ञैर्वर्धिता वो युष्मभ्यं इष्टान् भोगान् स्त्रीपुत्रपशुस्वर्णादीन् वितरिष्यन्ति। यस्तु तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा स्वदेहादीन्येव तर्पयति स तस्कर एव देवादिस्वापहारी।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
iṣhṭāndesired
bhogānnecessities of life
hicertainly
vaḥunto you
devāḥthe celestial gods
dāsyantewill grant
yajñabhāvitāḥ
taiḥby them
dattānthings granted
apradāyawithout offering
ebhyaḥto them
yaḥwho
bhuṅkteenjoys
stenaḥthieves
evaverily
saḥthey
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 3.11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ

प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 3.13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्

यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 3Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 3, Shlok 12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः

यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 3 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Karma Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 12 translates to: "The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering anything in return is indeed a thief. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 3, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Karma Yoga में संकलित है। यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ" mean in English?

"iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 12. The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering anything in return is indeed a thief. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.