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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्

पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

माझ्या इंद्रियांना जाळून टाकणारे हे दु:ख दूर होईल असे मला दिसत नाही, जरी मला पृथ्वीवर समृद्ध आणि अतुलनीय वर्चस्व किंवा देवांवर प्रभुत्व मिळवायचे असेल.

TeluguIND

నేను భూమిపై సుసంపన్నమైన మరియు అసమానమైన ఆధిపత్యాన్ని లేదా దేవతలపై ప్రభువును పొందినప్పటికీ, నా ఇంద్రియాలను దహించే ఈ దుఃఖం తొలగిపోతుందని నేను చూడలేదు.

GujaratiIND

હું જોતો નથી કે મારી ઇન્દ્રિયોને બાળી નાખતું આ દુ:ખ દૂર થશે, ભલે હું પૃથ્વી પર સમૃદ્ધ અને અજોડ આધિપત્ય અથવા દેવતાઓ પર પ્રભુત્વ પ્રાપ્ત કરું.

NepaliIND

म देख्दिनँ कि मेरो इन्द्रियहरूलाई जलाउने यो शोक हट्नेछ, यदि मैले पृथ्वीमा समृद्ध र अतुलनीय प्रभुत्व वा देवताहरूमाथि प्रभुत्व प्राप्त गरे पनि।

TamilIND

நான் பூமியில் செழிப்பான மற்றும் நிகரற்ற ஆதிக்கத்தை அடைந்தாலும் அல்லது தெய்வங்களின் மீது ஆதிக்கத்தை அடைந்தாலும், என் புலன்களை எரிக்கும் இந்த துக்கம் நீங்கும் என்று நான் காணவில்லை.

SindhiIND

مون کي ڏسڻ ۾ نه ٿو اچي ته اهو غم جيڪو منهنجي حواس کي ساڙي ٿو، اهو دور ٿي ويندو، جيتوڻيڪ مون کي زمين تي خوشحال ۽ بي مثال حڪمراني حاصل ڪرڻ يا ديوتائن جي بادشاهي حاصل ڪرڻ لاء.

MalayalamIND

ഭൂമിയിൽ ഐശ്വര്യവും സമാനതകളില്ലാത്തതുമായ ആധിപത്യം നേടിയാലും ദേവന്മാരുടെ മേൽ ആധിപത്യം നേടിയാലും എൻ്റെ ഇന്ദ്രിയങ്ങളെ ദഹിപ്പിക്കുന്ന ഈ ദുഃഖം നീങ്ങിപ്പോകുമെന്ന് ഞാൻ കാണുന്നില്ല.

BengaliIND

আমি দেখছি না যে এই দুঃখ যা আমার ইন্দ্রিয়গুলিকে পুড়িয়ে দেয় তা দূর হবে, এমনকি যদি আমি পৃথিবীতে সমৃদ্ধ এবং অপ্রতিদ্বন্দ্বী আধিপত্য অর্জন করতে পারি বা দেবতাদের উপর প্রভুত্ব করতে পারি।

KannadaIND

ನಾನು ಭೂಮಿಯ ಮೇಲೆ ಸಮೃದ್ಧ ಮತ್ತು ಅಪ್ರತಿಮ ಪ್ರಭುತ್ವವನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದರೂ ಅಥವಾ ದೇವತೆಗಳ ಮೇಲೆ ಅಧಿಪತ್ಯವನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದರೂ, ನನ್ನ ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ಸುಡುವ ಈ ದುಃಖವು ದೂರವಾಗುವುದನ್ನು ನಾನು ನೋಡುವುದಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਮੈਂ ਇਹ ਨਹੀਂ ਦੇਖਦਾ ਕਿ ਇਹ ਦੁੱਖ ਜੋ ਮੇਰੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਨੂੰ ਸਾੜਦਾ ਹੈ, ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ, ਭਾਵੇਂ ਮੈਂ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਖੁਸ਼ਹਾਲ ਅਤੇ ਬੇਮਿਸਾਲ ਰਾਜ ਜਾਂ ਦੇਵਤਿਆਂ ਉੱਤੇ ਪ੍ਰਭੂਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲਵਾਂ।

MizoIND

Leia thuneihna hlawhtling leh tluk loh nei emaw, pathiante chunga lalna emaw ka neih pawhin, he ka hriatna tichhe thei lungngaihna hi a bo vek dawn tih ka hmu lo.

KonkaniIND

धर्तरेचेर समृध्द आनी अप्रतिम प्रभुत्व वा देवांचेर प्रभुत्व मेळयलें तरी म्हज्या इंद्रियांक जळोवपी हें दुख्ख पयस जातलें अशें म्हाका दिसना.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.8।। व्याख्या-- [अर्जुन सोचते हैं कि भगवान् ऐसा समझते होंगे कि अर्जुन युद्ध करेगा तो उसकी विजय होगी, और विजय होनेपर उसको राज्य मिल जायगा, जिससे उसके चिन्ता-शोक मिट जायँगे और संतोष हो जायगा। परन्तु शोकके कारण मेरी ऐसी दशा हो गयी है कि विजय होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय--ऐसी बात मैं नहीं देखता।] 'अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यम्'-- अगर मेरेको धनधान्यसे सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय अर्थात् जिस राज्यमें प्रजा खूब सुखी हो, प्रजाके पास खूब धन-धान्य हो, किसी चीजकी कमी न हो और राज्यमें कोई वैरी भी न हो--ऐसा राज्य मिल जाय, तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

No such translation is available. Translation starts from 2.10

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

कुतो निःश्रेयसमेवेच्छसि तत्राह नहीति। यस्मान्न प्रपश्यामि। किं न पश्यसि। ममापनुद्यादपनयेद् यच्छोकमुच्छोषणं प्रतपनमिन्द्रियाणां तन्न पश्यामि। ननु शत्रून्निहत्य राज्ये प्राप्ते शोकनिवृत्तिस्ते भविष्यति नेत्याह अवाप्येति। अविद्यमानः सपत्नः शत्रुर्यस्य तद् दृढं राज्यं राज्ञः कर्म प्रजारक्षणप्रशासनादि तदिदमस्यां भूमाववाप्यापि शोकापनयकारणं न पश्यामीत्यर्थ। तर्हि देवेन्द्रत्वादिप्राप्त्या शोकापनयस्ते भविष्यति नेत्याह सुराणामपीति। तेषामाधिपत्यमधिपतित्वं स्वाम्यमिन्द्रत्वं ब्रह्मत्वं वा तदवाप्यापि मम शोको नापगच्छेदित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

ननु विजयिनो लब्धभूमिराज्यस्य हतस्य स्वधर्मबलादिन्द्रपुत्रत्वाद्वा प्राप्तदेवाधिपत्यस्य वा तवाज्ञाननि बन्धनशोकापनोदकोऽपि यः कश्चित्सुलभो भविष्यतीति चेतत्राह नहीति। यदित्यव्ययम्। भूमौ राज्यमसपत्नं न विद्यते सपन्नः शत्रुर्यस्य तत्। निष्कण्टकमित्यर्थः। ऋद्धं सस्यादिसंपन्नं सुराणामाधिपत्यं वा प्राप्यामि तन्नहि प्रपश्यामि यः शोकमिन्द्रियाणामुच्छोषण्मत्यन्तशोषकरं ममापनुद्यादपनयेदित्यन्वयः। अतस्त्वमेवेदानीमेव शोकमपाकुर्वित्यभिप्रायः। कुतो निःश्रेयसमेवेच्छसीति तत्राह नहीति। यस्मान्ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां तन्न पश्यामि। ननु शत्रून्निहत्य राज्ये प्राप्ते शोकनिवृत्तिस्ते भविष्यति नेत्याह अवाप्येति। अविद्यमानः सपन्नः शत्रुर्यस्य तदृद्धं राज्यं राज्ञः कर्म प्रजारक्षणशासनादि तदिदमस्यां भूमाववाप्यापि शोकापनयनकारणं न पश्यामीत्यर्थः। तर्हि देवेन्द्रत्वादिप्राप्त्या शोकापनयस्ते भविष्यति नेत्याह सुराणामपीति। तेषामाधिपत्यमधिपतित्वं स्वाम्यमिन्द्रत्वं ब्रह्मत्वं वा तदवाप्यापि मम शोको नापगच्छतीत्यर्थ इत्येके।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
hicertainly
prapaśhyāmiI see
mamamy
apanudyātdrive away
yatwhich
śhokamanguish
uchchhoṣhaṇamis drying up
indriyāṇāmof the senses
avāpyaafter achieving
bhūmauon the earth
asapatnamunrivalled
ṛiddhamprosperous
rājyamkingdom
surāṇāmlike the celestial gods
apieven
chaalso
ādhipatyamsovereignty
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.7
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

कायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.9
सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह

हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र! ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा साफ-साफ कहकर चुप हो गये। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्

पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 8 translates to: "I do not see that this sorrow that burns up my senses would be removed, even if I were to attain prosperous and unrivaled dominion on earth or lordship over the gods. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na hi prapaśhyāmi mamāpanudyād" mean in English?

"na hi prapaśhyāmi mamāpanudyād" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 8. I do not see that this sorrow that burns up my senses would be removed, even if I were to attain prosperous and unrivaled dominion on earth or lordship over the gods. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.