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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 72
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति

हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar

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TeluguIND

ఓ పృథ పుత్రుడా, ఇది శాశ్వతమైన స్థితి, బ్రహ్మాసనం. దీనిని సాధించుట వలన భ్రాంతి కలుగదు. దానిలో స్థిరపడి, జీవితాంతం కూడా బ్రహ్మతో ఏకత్వాన్ని పొందుతాడు.

MarathiIND

हे पृथाच्या पुत्रा, ही शाश्वत अवस्था, ब्रह्म आसन आहे. हे प्राप्त करून, एखाद्याचा भ्रम होत नाही. त्यात प्रस्थापित होऊन जीवनाच्या शेवटीही ब्रह्माशी एकरूपता प्राप्त होते.

GujaratiIND

હે પૃથા પુત્ર, આ શાશ્વત સ્થિતિ છે, બ્રહ્મ આસન છે. આ પ્રાપ્ત કરવાથી, વ્યક્તિ ભ્રમિત થતો નથી. તેમાં સ્થાપિત થવાથી વ્યક્તિ જીવનના અંતે પણ બ્રહ્મ સાથે એકતા પ્રાપ્ત કરે છે.

BengaliIND

হে পৃথার পুত্র, ইনি চিরস্থায়ী, ব্রহ্ম আসন। এটি অর্জন করে, কেউ বিভ্রান্ত হয় না। ইহাতে স্থাপিত হইলে জীবনের শেষ সময়েও ব্রহ্মের সহিত একত্ব লাভ হয়।

KannadaIND

ಓ ಪೃಥ ಪುತ್ರನೇ, ಇದು ಶಾಶ್ವತ ಸ್ಥಿತಿ, ಬ್ರಹ್ಮಾಸನ. ಇದನ್ನು ಸಾಧಿಸಿದರೆ, ಒಬ್ಬನು ಭ್ರಮೆಗೊಳಗಾಗುವುದಿಲ್ಲ. ಅದರಲ್ಲಿ ಸ್ಥಾಪಿತವಾಗಿ, ಜೀವನದ ಅಂತ್ಯದಲ್ಲಿಯೂ ಬ್ರಹ್ಮನೊಂದಿಗೆ ಏಕತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

PunjabiIND

ਹੇ ਪ੍ਰਿਥ ਦੇ ਪੁੱਤਰ, ਇਹ ਅਨਾਦਿ ਅਵਸਥਾ ਹੈ, ਬ੍ਰਹਮ ਸੀਟ ਹੈ। ਇਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਨਾਲ, ਮਨੁੱਖ ਕੁਰਾਹੇ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ। ਇਸ ਵਿਚ ਸਥਾਪਿਤ ਹੋ ਕੇ ਮਨੁੱਖ ਜੀਵਨ ਦੇ ਅੰਤ ਵਿਚ ਵੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਨਾਲ ਏਕਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।

NepaliIND

हे पृथक पुत्र, यो शाश्वत अवस्था हो, ब्रह्म आसन हो। यो प्राप्त गर्न, कोही भ्रमित हुँदैन। त्यसमा स्थापित भएर जीवनको अन्त्यमा पनि ब्रह्मसँग एकता प्राप्त हुन्छ।

MalayalamIND

ഹേ പൃഥപുത്രാ, ഇത് ശാശ്വതാവസ്ഥയാണ്, ബ്രഹ്മാസനമാണ്. ഇത് നേടിയാൽ ഒരാൾ വഞ്ചിക്കപ്പെടുന്നില്ല. അതിൽ സ്ഥാപിതനായ ഒരാൾ ജീവിതാവസാനത്തിലും ബ്രഹ്മവുമായി ഏകത്വം പ്രാപിക്കുന്നു.

TamilIND

ஓ பிருதையின் மகனே, இது நித்திய நிலை, பிரம்ம இருக்கை. இதை அடைவதால், ஒருவன் ஏமாற்றப்படுவதில்லை. அதில் நிலைபெற்று, வாழ்வின் இறுதியிலும் ஒருவன் பிரம்மத்துடன் ஐக்கியம் அடைகிறான்.

SindhiIND

اي پرٿ جا پٽ، هي ابدي حالت آهي، برهمڻ سيٽ. ان کي حاصل ڪرڻ سان، ڪو به گمراهه نه ٿيندو آهي. ان ۾ قائم ٿيڻ سان، انسان زندگيءَ جي آخر ۾ به برهمڻ سان هڪجهڙائي حاصل ڪري ٿو.

MaithiliIND

हे पृथ्वी पुत्र, यही नित्य अवस्था, ब्राह्मण पीठ | एकरा प्राप्त कए कोनो भ्रम नहि होइत अछि । ओहि मे स्थापित भेला सँ जीवनक अंत मे सेहो ब्रह्म सँ एकता प्राप्त होइत अछि |

ManipuriIND

ꯍꯦ ꯄ꯭ꯔ꯭ꯏꯊꯥꯒꯤ ꯃꯆꯥꯅꯨꯄꯥ, ꯃꯁꯤꯅꯤ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ ꯐꯤꯚꯝ, ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯒꯤ ꯁꯤꯠ꯫ ꯃꯁꯤ ꯐꯪꯕꯗꯥ ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯂꯥꯟꯅꯥ ꯂꯃꯖꯤꯡꯗꯦ꯫ ꯃꯁꯤꯗꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯂꯩꯇꯅꯥ ꯄꯨꯟꯁꯤꯒꯤ ꯑꯔꯣꯏꯕꯗꯁꯨ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯃꯒꯥ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯐꯪꯏ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या-- 'एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ'-- यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है, तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती। अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ 'एषा' पद पूर्वश्लोकमें आये 'विहाय कामान्' 'निःस्पृहः निर्ममः' और 'निरहङ्कारः' पदोंका लक्ष्य करता है। भगवान्के मुखसे 'तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा'--ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी? इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करानेके लिये ही यहाँ 'पार्थ' सम्बोधन दिया गया है। 'नैनां प्राप्य विमुह्यति'-- जबतक शरीरमें अहंकार रहता है, तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है, तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती। सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है, तब असत्से उसका सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता 4। 35)। 'स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति'-- यह मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये भगवान् यह मौका देते हैं कि साधारण-से-साधारण और पापी-से-पापी व्यक्ति ही क्यों न हो, अगर वह अन्तकालमें भी अपनी स्थिति परमात्मामें कर ले अर्थात् जडतासे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर ले, तो उसे भी निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी, वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जायगा। ऐसी ही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कही है कि 'अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ एक भगवान् ही हैं--ऐसा प्रयाणकालमें भी मेरेको जो जान लेते हैं, वे मेरेको यथार्थरूपसे जान लेते हैं अर्थात् मेरेको प्राप्त हो जाते हैं।' आठवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा कि 'अन्तकालमें मेरा स्मरण करता हुआ कोई प्राण छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।'दूसरी बात, उपर्युक्त पदोंसे भगवान् उस ब्राह्मी स्थितिकी महिमाका वर्णन करते हैं कि इसमें यदि अन्तकालमें भी कोई स्थित हो जाय, तो वह शान्त ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जैसे समबुद्धिके विषयमें भगवान्ने कहा था कि इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है (2। 40) ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि अन्तकालमें भी ब्राह्मी स्थिति हो जाय, जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय, तो निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस स्थितिका अनुभव होनेमें जडताका राग ही बाधक है। यह राग अन्तकालमें भी कोई छोड़ देता है तो उसको अपनी स्वतःसिद्ध वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है।यहाँ यह शंका हो सकती है कि जो अनुभव उम्रभरमें नहीं हुआ, वह अन्तकालमें कैसे होगा? अर्थात् स्वस्थ अवस्थामें तो साधककी बुद्धि स्वस्थ होगी, विचार-शक्ति होगी, सावधानी होगी तो वह ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर लेगा; परन्तु अन्तकालमें प्राण छूटते समय बुद्धि विकल हो जाती है, सावधानी नहीं रहती--ऐसी अवस्थामें ब्राह्मी स्थितिका अनूभव कैसे होगा? इसका समाधान यह है कि मृत्युके समयमें जब प्राण छूटते हैं, तब शरीर आदिसे स्वतः ही सम्बन्ध-विच्छेद होता है। यदि उस समय उस स्वतःसिद्ध तत्त्वकी तरफ लक्ष्य हो जाय, तो उसका अनुभव सुगमतासे हो जाता है। कारण कि निर्विकल्प अवस्थाकी प्राप्तिमें तो बुद्धि, विवेक आदिकी आवश्यकता है, पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्तिमें केवल लक्ष्यकी आवश्यकता है । वह लक्ष्य चाहे पहलेके अभ्याससे हो जाय, चाहे किसी शुभ संस्कारसे हो जाय, चाहे भगवान् या सन्तकी अहैतुकी कृपासे हो जाय लक्ष्य होनेपर उसकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है।यहाँ 'अपि' पदका तात्पर्य है कि अन्तकालसे पहले अर्थात् जीवित-अवस्थामें यह स्थिति प्राप्ति कर ले तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है; परन्तु अगर अन्तकालमें भी यह स्थिति हो जाय अर्थात् निर्मम-निरहंकार हो जाय तो वह भी मुक्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह स्थिति तत्काल हो जाती है। स्थितिके लिये अभ्यास करने, ध्यान करने, समाधि लगानेकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है।भगवान्ने यहाँ कर्मयोगके प्रकरणमें 'ब्रह्मनिर्वाणम्' पद दिया है। इसका तात्पर्य है कि जैसे सांख्ययोगीको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है (गीता 5। 2426) ऐसे ही कर्मयोगीको भी निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इसी बातको पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा है कि सांख्ययोगी द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, वही स्थान कर्मयोगीद्वारा भी प्राप्त किया जाता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

( अब ) उस उपर्युक्त ज्ञाननिष्ठाकी स्तुति की जाती है यह उपर्युक्त अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्ममें होनेवाली स्थिति है अर्थात् सर्व कर्मोंका संन्यास करके केवल ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाना है। हे पार्थ इस स्थितिको पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता अर्थात् मोहको प्राप्त नहीं होता। अन्तकालमें अन्तके वयमें भी इस उपर्युक्त ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर मनुष्य ब्रह्ममें लीनतारूप मोक्षको लाभ करता है। फिर जो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करके जीवनपर्यन्त ब्रह्ममें स्थित रहता है वह ब्रह्मनिर्वाणको प्राप्त होता है इसमें तो कहना ही क्या है।

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Sri Anandgiri

तत्र तत्र संक्षेपविस्तराभ्यां प्रदर्शितां ज्ञाननिष्ठामधिकारिप्रवृत्त्यर्थत्वेन स्तोतुमुत्तरश्लोकमवतारयति सैषेति। गृहस्थः संन्यासीत्युभावपि चेन्मुक्तिभोगिनौ किं तर्हि कष्टेन सर्वथैव संन्यासेनेत्याशङ्क्य संन्यासिव्यतिरिक्तानामन्तरायसंभवादपेक्षितः संन्यासो मुमुक्षोरित्याह एषेति। स्थितिमेव व्याचष्टे सर्वमिति। न विमुह्यतीति पुनर्नञोऽनुकर्षणमन्वयार्थं संन्यासिनो विमोहाभावेऽपि गृहस्थो धनहान्यादिनिमित्तं प्रायेण विमुह्यति। विक्षिप्तः सन्परमार्थविवेकरहितो भवतीत्यर्थः। यथोक्ता ब्राह्मी स्थितिः सर्वकर्मसंन्यासपूर्विका ब्रह्मनिष्ठा तस्यां स्थित्वा तामिमामायुषश्चतुर्थेऽपि भागे कृत्वेत्यर्थः। अपिशब्दसूचितं कैमुतिकन्यायमाह किमु वक्तव्यमिति। तदेवं तत्त्वंपदार्थौ तदैक्यं वाक्यार्थस्तज्ज्ञानादेकाकिनो मुक्तिस्तदुपायश्चेत्येतेषामेकैकत्रश्लोके प्राधान्येन प्रदर्शितमिति निष्ठाद्वयमुपायोपेयभूतमध्यायेन सिद्धम्।इति परमहंस श्रीमदानन्दगिरिकृतटीकायां द्वितीयोऽध्यायः

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Sri Dhanpati

ज्ञाननिष्ठां स्तुवन्नुपसंहरति एषेति। एषा यथोक्ता ब्रह्मणि भवा स्थितिः। सर्वं परित्यज्य ब्रह्मरुपेणैवावस्थानमिति यावत्।ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति इति श्रुत्या ब्रह्मशब्देनात्र ब्रह्मविद्गृह्यत इति व्याख्यानं त्वाचार्यैर्न कृतं मुख्यार्थेन वाक्यार्थनिर्वाहेऽमुख्यार्थस्यानौचित्यात्। एनां स्थितिं लब्ध्वा न विमुह्यति मोहं न प्राप्नोति। अस्यां ब्राहृयां स्थितावन्तकाले वृद्धावस्थायामपि स्थित्वा ब्रह्मणि निर्वृतिं मोक्षमृच्छति गच्छति किं वक्तव्यं प्रथमावस्थात् आस्भ्य ब्रह्मण्येव योऽवतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणमृच्छतीति। अन्तकाले मृत्युसमये इत्यर्थस्तु न तस्मिन्काले एतादृशस्थित्यसंभवात्। नतु तदा विवशस्य स्मरणोद्यमः संभवतीति। यंयं वापीति श्लोकस्थस्वोक्तिविरोधाच्च ब्रह्मणि निर्वाणमिति भाष्यस्योपलक्षणत्वेन ब्रह्मरुपं निर्वाणमित्यर्थोऽप्यविरुद्धः। निर्गतं वानं गमनं यस्मिन्नित्यर्थोऽपि तवाप्ययं शोकमोहाभिभूतत्वरुपः स्वभावो नोचितः किंतु जीवन्मुक्तस्वभाव एवेति सूचयन्नाह पार्थेति। यद्वा मत्संबन्धिनस्तव मयि ब्रह्मण्येवावस्थानं युक्तमिति सूचयन्नाह पार्थेति। तदनेन द्वितीयाध्यायेन तत्पदलक्ष्यं परमात्मानमेव त्वंपदलक्ष्यत्वेन प्रतिपादयता साक्षाच्छोकमोहनिवृत्तिहेतुभूतां ज्ञाननिष्ठां लक्षणसहितां प्राधान्येन तदुपायभूतां योगनिष्ठां च गुणभावेन प्रदर्शयता उपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रकाशितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां गीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां द्वितीयोऽध्यायः

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
eṣhāsuch
brāhmī sthitiḥstate of God
pārthaArjun, the son of Pritha
nanever
enāmthis
prāpyahaving attained
vimuhyatiis deluded
sthitvābeing established
asyāmin this
antakāle
apieven
brahmanirvāṇam
ṛichchhatiattains
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एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति

हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 72 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 72 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 72?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 72 translates to: "O son of Pritha, this is the eternal state, the Brahmic seat. Attaining this, one is not deluded. Being established in it, one attains oneness with Brahman even at the end of life. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्र" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 72 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "eṣhā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati" mean in English?

"eṣhā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 72. O son of Pritha, this is the eternal state, the Brahmic seat. Attaining this, one is not deluded. Being established in it, one attains oneness with Brahman even at the end of life. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.