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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 71
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति

जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

కోరికలన్నింటినీ విడిచిపెట్టి, కోరికలు లేకుండా, యాజమాన్య భావం లేకుండా మరియు అహంభావం లేకుండా తిరిగే వ్యక్తి శాంతిని పొందుతాడు.

MarathiIND

जी व्यक्ती सर्व इच्छांचा त्याग करून, तळमळ न ठेवता, मालकीची भावना न ठेवता आणि अहंभावाशिवाय फिरते, त्याला शांती मिळते.

GujaratiIND

તે વ્યક્તિ શાંતિ પ્રાપ્ત કરે છે જે બધી ઇચ્છાઓનો ત્યાગ કરીને, ઝંખના વિના, માલિકીની ભાવના વિના અને અહંકાર વિના ફરે છે.

MalayalamIND

എല്ലാ ആഗ്രഹങ്ങളും ഉപേക്ഷിച്ച്, ആഗ്രഹമില്ലാതെ, ഉടമസ്ഥതയില്ലാതെ, അഹംഭാവമില്ലാതെ സഞ്ചരിക്കുന്ന ആ വ്യക്തിക്ക് സമാധാനം ലഭിക്കുന്നു.

KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ಆಸೆಗಳನ್ನು ತೊರೆದು, ಹಂಬಲವಿಲ್ಲದೆ, ಮಾಲೀಕತ್ವದ ಭಾವನೆಯಿಲ್ಲದೆ ಮತ್ತು ಅಹಂಕಾರವಿಲ್ಲದೆ ಚಲಿಸುವ ವ್ಯಕ್ತಿಯು ಶಾಂತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

PunjabiIND

ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ ਜੋ ਸਾਰੀਆਂ ਇੱਛਾਵਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਬਿਨਾਂ ਤਾਂਘ, ਮਾਲਕੀ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਅਤੇ ਹਉਮੈ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਤੁਰਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

اُهو ماڻهو سڪون حاصل ڪري ٿو، جيڪو سڀني خواهشن کي ڇڏي، بغير ڪنهن خواهش جي، مالڪيءَ جي احساس کان سواءِ ۽ انا پرستيءَ کان سواءِ هليو وڃي ٿو.

NepaliIND

त्यो व्यक्तिले शान्ति प्राप्त गर्छ, जो सबै इच्छाहरू त्यागेर, बिना लालसा, स्वामित्वको भावना र अहंकार बिना हिँड्छ।

AssameseIND

সেই ব্যক্তিজনে শান্তি লাভ কৰে যি সকলো কামনা পৰিত্যাগ কৰি আকাংক্ষা নোহোৱাকৈ, মালিকীস্বত্ববোধ নোহোৱাকৈ আৰু অহংকাৰ নোহোৱাকৈ ঘূৰি ফুৰে।

BhojpuriIND

ऊ व्यक्ति शांति के प्राप्ति करेला जे सभ इच्छा के त्याग के बिना लालसा के, बिना मालिकाना हक के, आ बिना अहंकार के घूमेला।

TamilIND

எல்லா ஆசைகளையும் விட்டுவிட்டு, ஏக்கமின்றி, உரிமை உணர்வு இல்லாமல், அகங்காரமின்றி நடமாடும் அந்த நபர் அமைதியை அடைகிறார்.

OdiaIND

ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ଶାନ୍ତି ପ୍ରାପ୍ତ କରେ, ଯିଏ ସମସ୍ତ ଇଚ୍ଛାକୁ ତ୍ୟାଗ କରି, ଲାଳସା ବିନା, ମାଲିକାନା ଭାବନା ବିନା ଏବଂ ଅହଂକାରରେ ଗତି କରେ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.71।। व्याख्या-- 'विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः'-- अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम 'कामना' है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है। कामनाओंका त्याग कर देने पर भी शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका नाम स्पृहा है। स्थितप्रज्ञ पुरुष इस 'स्पृहाका' भी त्याग कर देता है। कारण कि जिसके लिये शरीर मिला था और जिसकी आवश्यकता थी, उस तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी, वह आवश्यकता पूरी हो गयी। अब शरीर रहे चाहे न रहे, शरीरनिर्वाह हो चाहे न हो--इस तरफ वह बेपरवाह रहता है। यही उसका निःस्पृह होना है। निःस्पृह होनेका अर्थ यह नहीं है कि वह निर्वाहकी वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका सेवन भी करता है, पथ्य-कुपथ्यका भी ध्यान रखता है अर्थात् पहले साधनावस्थामें शरीर आदिके साथ जैसा व्यवहार करता था, वैसा ही व्यवहार अब भी करता है; परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है, जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ मिलती रहें तो अच्छा है--ऐसी उसके भीतर कोई परवाह नहीं होती। इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें 'प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्' पदोंसे कामना-त्यागकी जो बात कही थी, वही बात यहाँ 'विहाय कामान्यः सर्वान्' पदोंसे कही है। इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। 'निर्ममः'-- स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है, वे वास्तवमें अपनी नहीं हैं प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर स्थितप्रज्ञ वस्तु व्यक्ति पदार्थ शरीर इन्द्रियाँ आदिमें ममतारहित हो जाता है। 'निरहङ्कारः'-- यह शरीर मैं ही हूँ इस तरह शरीरसे तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं रहता। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि सभी किसी प्रकाशमें दीखते हैं और जो मैंपन है उसका भी किसी प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि अहंता ( मैंपन) ये सभी दृश्य हैं। द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है यह नियम है। ऐसा अनुभव हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है। 'स शान्तिमधिगच्छति'-- स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त होता है। कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर शान्ति आकर प्राप्त होती है--ऐसी बात नही है, प्रत्युत शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे, उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब संसारकी कामना, स्पृहा, ममता और अहंता सर्वथा छूट जाती है तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है। इस श्लोकमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंता --इन चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि 'मैं'-पन ही नहीं रहेगा, तो फिर 'मेरा'-पन कैसे रहेगा और कामना भी कौन करेगा और किसलिये करेगा? जब 'निरहङ्कारः' कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग उसके अन्तर्गत आ जाता था, तो फिर कामना आदिके त्यागका वर्णन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि कामना, स्पृहा, ममता और अहंता--इन चारोंमें कामना स्थूल है। कामनासे सूक्ष्म स्पृहा, स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे सूक्ष्म अहंता है। इसलिये संसारसे सम्बन्ध छोड़नेमें सबसे पहले कामनाका त्याग कर दिया जाय, तो अन्य तीनका त्याग करना सुगम हो जाता है। कामना करनेसे कोई वस्तु नहीं मिलती। वस्तु तो जो मिलनेवाली है, वही मिलेगी। अतः कामनाका त्याग कर देना चाहिये। कामनाका त्याग करनेके बाद भी स्पृहा रहती है। स्पृहा (शरीर-निर्वाहकी आवश्यकता) पूरी हो जाय यह भी हमारे हाथकी बात नहीं है अर्थात् स्पृहाकी पूर्तिमें भी हम स्वतन्त्र नहीं है। जो होना है वह तो होगा ही, फिर स्पृहा रखनेसे क्या लाभ? अतः शरीरके लिये अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आशा छोड़नेसे स्पृहा छूट जाती है। अहंताममतासे रहित होनेका उपाय

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Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि ऐसा है इसलिये जो संन्यासी पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको और भोगोंको अशेषतः त्यागकर अर्थात् केवल जीवनमात्रके निमित्त ही चेष्टा करनेवाला होकर विचरता है। तथा जो स्पृहासे रहित हुआ है अर्थात् शरीरजीवनमात्रमें भी जिसकी लालसा नहीं है। ममतासे रहित है अर्थात् शरीरजीवनमात्रके लिये आवश्यक पदार्थोंके संग्रहमें भी यह मेरा है ऐसे भावसे रहित है। तथा अहंकारसे रहित है अर्थात् विद्वत्ता आदिके सम्बन्धसे होनेवाले आत्माभिमानसे भी रहित है। वह ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी संसारके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिरूप मोक्ष नामक परम शान्तिको पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप हो जाता है।

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Sri Anandgiri

यदि गृहस्थेनापि मनसा समस्ताभिमानं हित्वा कूटस्थं ब्रह्मात्मानं परिभावयता ब्रह्मनिर्वाणमाप्यते प्राप्तं तर्हि मौढ्यादिविडम्बनमेवेत्याशङ्क्याह यस्मादिति। शब्दादिविषयप्रवणस्य तत्तदिच्छाभेदमानिनो न मुक्तिरिति व्यतिरेकस्य सिद्धत्वात् पूर्वोक्तमन्वयं निगमयितुमनन्तरं वाक्यमित्यर्थः। अशेषविषयत्यागे जीवनमपि कथमित्याशङ्क्याह जीवनेति। संभवद्रागद्वेषादिके देशे निवासव्यावृत्त्यर्थं चरतीत्येतद्व्याचष्टे पर्यटतीति। विहाय कामानित्यनेन पुनरुक्तिं परिहरति शरीरेति। निःस्पृहत्वमुक्त्वा निर्ममत्वं पुनर्वदन् कथं पुनरुक्तिमार्थिकीं न पश्यसीत्याशङ्क्याह शरीरजीवनेति। सत्यहंकारे ममकारस्यावश्यकत्वान्निरहंकारत्वं व्याकरोति विद्यावत्त्वादीति। स शान्तिमाप्नोतीत्युक्तमुपसंहरति स एवंभूत इति। संन्यासिनो मोक्षमपेक्षमाणस्य सर्वकामपरित्यागादीनि श्लोकोक्तानि विशेषणानि यत्नसाध्यानि तत्संमतिफलं तु कैवल्यमित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

चतुर्थप्रश्रस्योत्तरमुपसंहरति विहायेति। यस्मादेवं तस्माद्विहाय कामान्सर्वान्यः स्थितप्रज्ञः शरीरजीवनमात्रेऽपि निःस्पृहः अतएव शरीरजीवमात्राक्षिप्तपरिग्रहेऽपि ममेदमित्यभिनिवेशरहितः निरहंकारः विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसंभावनावर्जितः। ननु देहाभिमानरहित इत्याचार्यैः कुतो न व्याख्यातमिति चेदुक्ताहंभावेऽस्यान्तर्भावविवक्षयेत्यदोषः। चरति पर्यटति स शान्तिमविद्यातत्कार्योपरमरुपां निर्वाणाभिधामधिगच्छति प्राप्नोति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vihāyagiving up
kāmānmaterial desires
yaḥwho
sarvānall
pumāna person
charatilives
niḥspṛihaḥfree from hankering
nirmamaḥwithout a sense of proprietorship
nirahankāraḥwithout egoism
saḥthat person
śhāntimperfect peace
adhigachchhatiattains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.70
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी

जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.72
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति

हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 71
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 71
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति

जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 71 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 71 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 71?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 71 translates to: "That person attains peace who, abandoning all desires, moves about without longing, without the sense of ownership, and without egoism. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 71 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ" mean in English?

"vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 71. That person attains peace who, abandoning all desires, moves about without longing, without the sense of ownership, and without egoism. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.