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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 59
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है। — VaniSagar

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MarathiIND

इंद्रियांच्या वस्तू, तळमळ मागे टाकून, संन्यासी पुरुषापासून दूर जातात; पण परमात्म्याला पाहून त्याची तळमळही दूर होते.

TeluguIND

ఇంద్రియాలకు సంబంధించిన వస్తువులు సంయమనం లేని వ్యక్తి నుండి దూరంగా ఉంటాయి, కోరికను వదిలివేస్తాయి; కానీ పరమాత్మని చూడగానే అతని కోరిక కూడా తీరిపోతుంది.

GujaratiIND

ઇન્દ્રિયોના પદાર્થો ત્યાગી માણસથી દૂર થઈ જાય છે, ઝંખનાને પાછળ છોડી દે છે; પણ તેની ઝંખના પણ પરમને જોઈને દૂર થઈ જાય છે.

BengaliIND

ইন্দ্রিয়ের বস্তুগুলি আকাঙ্ক্ষাকে পিছনে ফেলে নিরাসক্ত মানুষের থেকে দূরে সরে যায়; কিন্তু পরমেশ্বরের দেখা পেয়ে তার আকাঙ্ক্ষাও দূর হয়ে যায়।

MalayalamIND

ഇന്ദ്രിയങ്ങളുടെ വസ്തുക്കള് വാഞ്ഛ ഉപേക്ഷിച്ച്, വിട്ടുനിൽക്കുന്ന മനുഷ്യനിൽ നിന്ന് അകന്നുപോകുന്നു; എന്നാൽ പരമാത്മാവിനെ കാണുമ്പോൾ അവൻ്റെ ആഗ്രഹവും മാറിപ്പോകുന്നു.

TamilIND

புலன்களின் பொருள்கள் ஏக்கத்தை விட்டு விலகிய மனிதனிடமிருந்து விலகிச் செல்கின்றன; ஆனால் அவனுடைய ஏக்கமும் பரமாத்மாவைக் கண்டவுடன் விலகிவிடும்.

SindhiIND

حواس جون شيون پرهيزگار انسان کان ڦري وڃن ٿيون، خواهش کي پوئتي ڇڏي وڃي ٿي. پر هن جي آرزو به سپريم کي ڏسي ڪري ڦري ٿي.

KannadaIND

ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ವಸ್ತುಗಳು ಇಂದ್ರಿಯನಿಗ್ರಹ ಮನುಷ್ಯನಿಂದ ದೂರವಾಗುತ್ತವೆ, ಹಂಬಲವನ್ನು ಬಿಟ್ಟುಬಿಡುತ್ತವೆ; ಆದರೆ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ಕಂಡ ಮೇಲೆ ಅವನ ಹಂಬಲವೂ ದೂರವಾಗುತ್ತದೆ.

PunjabiIND

ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੀਆਂ ਵਸਤੂਆਂ ਪਰਹੇਜ਼ ਮਨੁੱਖ ਤੋਂ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਤਾਂਘ ਨੂੰ ਪਿੱਛੇ ਛੱਡਦੀਆਂ ਹਨ; ਪਰ ਉਸ ਦੀ ਤਾਂਘ ਵੀ ਪਰਮ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

NepaliIND

इन्द्रियका वस्तुहरू संयमित मानिसबाट टाढा हुन्छन्, लालसालाई पछाडि छोड्छन्; तर उसको चाहना पनि परमलाई देखेर हट्छ।

MaithiliIND

इन्द्रियक वस्तु तड़प छोड़ि संयमी पुरुष सँ मुँह घुमा लैत अछि; मुदा परमात्मा के दर्शन पर ओकर लालसा सेहो घुमि जाइत छैक |

ManipuriIND

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Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.59।। व्याख्या-- 'विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जम्'-- मनुष्य निराहार दो तरहसे होता है--(1) अपनी इच्छासे भोजनका त्याग कर देना अथवा बीमारी आनेसे भोजनका त्याग हो जाना और (2) सम्पूर्ण विषयोंका त्याग करके एकान्तमें बैठना अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेना। यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले साधकके लिये ही 'निराहारस्य' पद आया है। रोगीके मनमें यह रहता है कि क्या करूँ, शरीरमें पदार्थोंका सेवन करनेकी सामर्थ्य नहीं है, इसमें मेरी परवश्ता है; परन्तु जब मैं ठीक हो जाऊँगा, शरीरमें शक्ति आ जायगी, तब मैं पदार्थोंका सेवन करूँगा। इस तरह उसके भीतर रसबुद्धि रहती है। ऐसे ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेपर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर साधकके भीतर विषयोंमें जो रसबुद्धि, सुखबुद्धि है, वह जल्दी निवृत्त नहीं होती। जिनका स्वाभाविक ही विषयोंमें राग नहीं है और जो तीव्र वैराग्यवान् हैं, उन साधकोंकी रसबुद्धि साधनावस्थामें ही निवृत्त हो जाती है। परन्तु जो तीव्र वैराग्यके बिना ही विचारपूर्वक साधनमें लगे हुए हैं; उन्हीं साधकोंके लिये यह कहा गया है कि विषयोंका त्याग कर देनेपर भी उनकी रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती। 'रसोऽप्यस्य परं दृष्टा निवर्तते'-- इस स्थितप्रज्ञकी रसबुद्धि परमात्माका अनुभव हो जानेपर निवृत्त हो जाती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेसे वह स्थितप्रज्ञ हो ही जाता है-- यह नियम नहीं है। परन्तु स्थितप्रज्ञ होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती--यह नियम है। 'रसोऽप्यस्य' पदसे यह तात्पर्य निकलता है कि रसबुद्धि साधककी अहंतामें अर्थात् 'मैं' -पनमें रहती है। यही रसबुद्धि स्थूलरूपसे रागका रूप धारण कर लेती है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपनी अहंतासे ही रसको निकाल दे कि 'मैं तो निष्काम हूँ; राग करना, कामना करना मेरा काम नहीं है'। इस प्रकार निष्कामभाव आ जानसे अथवा निष्काम होनेका उद्देश्य होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे रसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

विषयोंका ग्रहण न करनेवाले रोगी मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ तो विषयोंसे हट जाती हैं यानी कछुएके अङ्गोंकी भाँति संकुचित हो जाती हैं परन्तु विषयसम्बन्धी राग ( आसक्ति ) नष्ट नहीं होता। उसका नाश कैसे होता है सो कहते हैं यद्यपि विषयोंको ग्रहण न करनेवाले कष्टकर तपमें स्थित देहाभिमानी अज्ञानी पुरुषकी भी विषयशब्दवाच्य इन्द्रियाँ अथवा केवल शब्दादि विषय तो निवृत्त हो जाते हैं परंतु उन विषयोंमें रहनेवाला जो रस अर्थात् आसक्ति है उसको छोड़कर निवृत्त होते हैं अर्थात् उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। रस शब्द राग ( आसक्ति ) का वाचक प्रसिद्ध है क्योंकि स्वरसेन प्रवृत्तो रसिको रसज्ञः इत्यादि वाक्य देखे जाते हैं। वह रागात्मक सूक्ष्म आसक्ति भी इस यतिकी परमार्थतत्त्वरूप ब्रह्मका प्रत्यक्ष दर्शन होनेपर निवृत्त हो जाती है अर्थात् मैं ही वह ब्रह्म हूँ इस प्रकारका भाव दृढ़ हो जानेपर उसका विषयविज्ञान निर्बीज हो जाता है। अभिप्राय यह कि यथार्थ ज्ञान हुए बिना रागका मूलोच्छेद नहीं होता अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धिकी स्थिरता कर लेनी चाहिये।

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Sri Anandgiri

इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्येऽपि तद्विषयरागानुवृत्तौ कथं प्रज्ञालाभः स्यादिति शङ्कते तत्रेति। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। विषयाननाहरतस्तदुपभोगविमुखस्येत्यर्थः। रागश्चेन्नोपसंह्रियते न तर्हि प्रज्ञालाभः संभवति रागस्य तत्परिपन्थित्वादिति मत्वाह स कथमिति। रागनिवृत्त्युपायमुपदिशन्नुत्तरमाह उच्यत इति। विषयोपभोगपराङ्मुखस्य कुतो विषयपरावृत्तिस्तत्परावृत्तिश्चाप्रस्तुतेत्याशङ्क्याह यद्यपीति। निराहारस्येत्यस्य व्याख्यानमनाह्रियमाणविषयस्येति। यो हि विषयप्रवणो न भवति तस्यात्यन्तिके तपसि क्लेशात्मके व्यवस्थितस्य विद्याहीनस्यापीन्द्रियाणि विषयेभ्यः सकाशाद्यद्यपि संह्रियन्ते तथापि रागोऽवशिष्यते स च तत्त्वज्ञानादुच्छिद्यत इत्यर्थः। रसशब्दस्य माधुर्यादिषड्विधरसविषयत्वं निषेधति रसशब्द इति। वृद्धप्रयोगमन्तरेण कथं प्रसिद्धिरित्याशङ्क्याह स्वरसेनेति। स्वेच्छयेति यावत्। रसिकः स्वेच्छावशवर्ती रसज्ञो विवक्षितापेक्षितज्ञातेत्यर्थः। कथं तर्हि तस्य निवृत्तिस्तत्राह सोऽपीति। दृष्टिमेवोपलब्धिपर्यायां स्पष्टयति अहमेवेति। रागापगमे सिद्धमर्थमाह निर्बीजमिति। ननु सम्यग्ज्ञानमन्तरेण रागो नापगच्छति चेत्तदपगमादृते रागवतः सम्यग्ज्ञानोदयायोगादितरेतराश्रयतेति नेत्याह नासतीति। इन्द्रियाणां विषयपारवश्ये विवेकद्वारा परिहृते स्थूलो रागो व्यावर्तते ततश्च सम्यग्ज्ञानोत्पत्त्या सूक्ष्मस्यापि रागस्य सर्वात्मना निवृत्त्युपपत्तेर्नेतरेतराश्रयतेत्यर्थः। प्रज्ञास्थैर्यस्य सफलत्वे स्थिते फलितमाह तस्मादिति।

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Sri Dhanpati

ननु निराहारस्य रोगिणो व्रतिनो वापि विषयेभ्य इन्द्रियाणि विनिवर्तन्तेऽत इदं लक्षणं मूढेष्वप्यागतमित्याशङ्क्य परिहरति विषया इति। विषया लक्षणयेन्द्रियाणि शब्दादयो वा रसवर्जं रसो रागस्तं वर्जयित्वा निराहारस्याहारविनिर्मुक्तस्यानाह्नियमाणविषयस्य कष्टेन तपसि स्थितस्य मूर्खस्यापि देहिनो देहवतो विनिवर्तन्ते। परं परमात्मानं दृष्ट्वाऽहं ब्रह्मास्मीति साक्षादुपलभ्य रसोऽपि रञ्जनात्मकः सूक्ष्मोऽप्यस्य यतेर्निवर्तते। निर्बीजं विषयज्ञानं संपद्यत इत्यर्थः। तस्माद्रसस्योच्छेदाय सभ्यग्दर्शनात्मिकायाः प्रज्ञायाः स्थैर्यं कर्तव्यमित्यभिप्रायः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
viṣhayāḥobjects for senses
vinivartanterestrain
nirāhārasyapracticing self restraint
dehinaḥfor the embodied
rasavarjam
rasaḥtaste
apihowever
asyaperson’s
paramthe Supreme
dṛiṣhṭvāon realization
nivartateceases to be
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः

हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 59
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 59
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 59 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 59 का हिंदी अर्थ: "निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 59?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 59 translates to: "The objects of the senses turn away from the abstinent man, leaving the longing behind; but his longing also turns away upon seeing the Supreme. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 59 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ" mean in English?

"viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 59. The objects of the senses turn away from the abstinent man, leaving the longing behind; but his longing also turns away upon seeing the Supreme. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.