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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। — VaniSagar

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MarathiIND

जेव्हा कासवाप्रमाणे सर्व अंगे सर्व बाजूंनी काढून घेतात, इंद्रिय-वस्तुंपासून इंद्रिये काढून घेतात, तेव्हा त्याची बुद्धी स्थिर होते.

TeluguIND

ఎప్పుడైతే, తాబేలు తన అవయవాలన్నింటినీ అన్ని వైపులా ఉపసంహరించుకుంటుంది, అతను ఇంద్రియ వస్తువుల నుండి తన ఇంద్రియాలను ఉపసంహరించుకుంటాడు, అప్పుడు అతని జ్ఞానం స్థిరంగా ఉంటుంది.

GujaratiIND

જ્યારે, કાચબાની જેમ, જે તેના તમામ અંગો ચારે બાજુથી પાછી ખેંચી લે છે, તે ઈન્દ્રિય-પદાર્થોમાંથી ઈન્દ્રિયોને પાછો ખેંચી લે છે, ત્યારે તેનું જ્ઞાન સ્થિર થઈ જાય છે.

BengaliIND

যখন, কচ্ছপের মতো, যে তার সমস্ত অঙ্গগুলি চারদিকে সরিয়ে নেয়, সে তার ইন্দ্রিয়গুলিকে ইন্দ্রিয়-বস্তু থেকে সরিয়ে নেয়, তখন তার জ্ঞান স্থির হয়।

KannadaIND

ಯಾವಾಗ, ಆಮೆಯು ತನ್ನ ಎಲ್ಲಾ ಅಂಗಗಳನ್ನು ಎಲ್ಲಾ ಕಡೆಯಿಂದ ಹಿಂತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತದೆಯೋ, ಅವನು ತನ್ನ ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ಇಂದ್ರಿಯ ವಸ್ತುಗಳಿಂದ ಹಿಂತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ, ಆಗ ಅವನ ಬುದ್ಧಿವಂತಿಕೆಯು ಸ್ಥಿರವಾಗುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

എല്ലാ വശത്തുനിന്നും എല്ലാ അവയവങ്ങളെയും പിൻവലിക്കുന്ന ആമയെപ്പോലെ, ഇന്ദ്രിയങ്ങളിൽ നിന്ന് ഇന്ദ്രിയങ്ങളെ പിൻവലിക്കുമ്പോൾ, അവൻ്റെ ജ്ഞാനം സ്ഥിരത കൈവരിക്കുന്നു.

NepaliIND

जब कछुवाले जसरी आफ्नो सबै अंगहरू चारै तिर फर्काएर इन्द्रिय-वस्तुहरूबाट इन्द्रियहरू हटाउँछ, तब उसको बुद्धि स्थिर हुन्छ।

SindhiIND

جڏهن، ڪڇي وانگر، جيڪو پنهنجي سڀني عضون کي هر طرف کان هٽائي ٿو، هو پنهنجي حواس کي حسي شين مان هٽائي ٿو، تڏهن هن جي عقل مستحڪم ٿي وڃي ٿي.

TamilIND

எல்லாப் பக்கங்களிலும் உள்ள தன் உறுப்புகளை எல்லாம் விலக்கிக் கொள்ளும் ஆமையைப் போல, புலன்களிலிருந்து புலன்களை விலக்கிக் கொள்ளும்போது, ​​அவனுடைய ஞானம் நிலையானதாகிறது.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਕੱਛੂ ਵਾਂਗ ਆਪਣੇ ਸਾਰੇ ਅੰਗ ਸਾਰੇ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਹਟਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਨੂੰ ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰਿਆਂ ਤੋਂ ਹਟਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਤਦ ਉਸ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਸਥਿਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

MizoIND

A ke lehlamah a ke zawng zawng la chhuaktu rulhut ang maiin hriatna thilte atanga a hriatna a lak chhuah chuan a finna chu a nghet ta a ni.

ManipuriIND

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Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.58।। व्याख्या-- 'यदा संहरते ৷৷. प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'-- यहाँ कछुएका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जैसे कछुआ चलता है तो उसके छः अङ्ग दीखते हैं--चार पैर, एक पूँछ और एक मस्तक। परन्तु जब वह अपने अङ्गोंको छिपा लेता है, तब केवल उसकी पीठ ही दिखायी देती है। ऐसे ही स्थितप्रज्ञ पाँच इन्द्रियाँ और एक मन--इन छहोंको अपने-अपने विषयसे हटा लेता है। अगर उसका इन्द्रियों आदिके साथ किञ्चिन्मात्र भी मानसिक सम्बन्ध बना रहता है, तो वह स्थितप्रज्ञ नहीं होता। यहाँ 'संहरते' क्रिया देनेका मतलब यह हुआ कि वह स्थितप्रज्ञ विषयोंसे इन्द्रियोंका उपसंहार कर लेता है अर्थात वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन नहीं करता। इस श्लोकमें 'यदा' पद तो दिया है, पर 'तदा' पद नहीं दिया है। यद्यपि 'यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः' के अनुसार जहाँ 'यदा' आता है, वहाँ 'तदा' का अध्याहार लिया जाता है अर्थात् 'यदा' पदके अन्तर्गत ही 'तदा' पद आ जाता है, तथापि यहाँ 'तदा' पदका प्रयोग न करनेका एक गहरा तात्पर्य है कि इन्द्रियोंके अपने-अपने विषयोंसे सर्वथा हट जानेसे स्वतःसिद्ध तत्त्वका जो अनुभव होता है, वह कालके अधीन, कालकी सीमामें नहीं है। कारण कि वह अनुभव किसी क्रिया अथवा त्यागका फल नहीं है। वह अनुभव उत्पन्न होनेवाली वस्तु नहीं है। अतः यहाँ कालवाचक 'तदा' पद देनेकी जरूरत नहीं है। इसकी जरूरत तो वहाँ होती है, जहाँ कोई वस्तु किसी वस्तुके अधीन होती है। जैसे आकाशमें सूर्य रहनेपर भी आँखें बंद कर लेनेसे सूर्य नहीं दीखता और आँखें खोलते ही सूर्य दीख जाता है, तो यहाँ सूर्य और आँखोंमें कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है अर्थात् आँखें खुलनेसे सूर्य पैदा नहीं हुआ है। सूर्य तो पहलसे ज्यों-का-त्यों ही है। आँखे बंद करनेसे पहले भी सूर्य वैसा ही है और आँखें बंद करनेपर भी सूर्य वैसा ही है। केवल आँखें बंद करनेसे हमें उसका अनुभव नहीं हुआ था। ऐसे ही यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेसे स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका जो अनुभव हुआ है, वह अनुभव मनसहित इन्द्रियोंका विषय नहीं है। तात्पर्य है कि वह स्वतः सिद्ध तत्त्व भोगों-(विषयों-) के साथ सम्बन्ध रखते हुए और भोगोंको भोगते हुए भी वैसा ही है। परन्तु भोगोंके साथ सम्बन्धरूप परदा रहनसे उसका अनुभव नहीं होता, और यह परदा हटते ही उसका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध-- केवल इन्द्रियोंका विषयोंसे हट जाना ही स्थितप्रज्ञका लक्षण नहीं है इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जब यह ज्ञाननिष्ठामें स्थित हुआ संन्यासी कछुएके अङ्गोंकी भाँति अर्थात् जैसे कछुआ भयके कारण सब ओरसे अपने अङ्गोंको संकुचित कर लेता है उसी तरह सम्पूर्ण विषयोंसे सब ओरसे इन्द्रियोंको खींच लेता है भलीभाँति रोक लेता है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित होती है। इस वाक्यका अर्थ पहले कहा हुआ है।

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Sri Anandgiri

जिज्ञासोरेव कर्तव्यान्तरं सूचयति किञ्चेति। इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्यस्य प्रज्ञास्थैर्ये कारणत्वादादौ जिज्ञासुना तदनुष्ठेयमित्याह यदेति। मुमुक्षुणा मोक्षहेतुं प्रज्ञां प्रार्थयमानेन सर्वेभ्यो विषयेभ्यः सर्वाणीन्द्रियाणि विमुखानि कर्तव्यानीति श्लोकव्याख्यानेन कथयति यदेत्यादिना। उपसंहारः स्ववशत्वापादनं तस्य च सम्यक्त्वमतिदृढत्वम्। अयमिति प्रकृतस्थितप्रज्ञग्रहणं व्यावर्तयति ज्ञाननिष्ठायामिति। इन्द्रियोपसंहारस्य प्रलयरूपत्वं व्यावर्त्य संकोचात्मकत्वं दृष्टान्तेन दर्शयति कूर्म इति। दृष्टान्तं व्याकरोति यथेति। दार्ष्टान्तिके योजयन्ज्ञाननिष्ठापदं तत्र प्रवर्तयति एवमिति। इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्यकरणं प्रज्ञास्थैर्यहेतुरित्युक्तमुपसंहरति तस्येति।

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Sri Dhanpati

विचारादिनेन्द्रियनिग्रहार्थं स्थितप्रज्ञस्योपवेशनमिति तृतीयप्रश्नस्योत्तरं वक्तुं जितेन्द्रियत्वम्। तस्य लक्षणमाह यदेति। यथा कूर्मः कमठो भयादङ्गन्युपसंहरति तथा यदा ज्ञाननिष्ठो यतिः शब्दादिविषयेभ्यः इन्द्रियाण्युपसंहरति तदा तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadāwhen
sanharatewithdraw
chaand
ayamthis
kūrmaḥtortoise
aṅgānilimbs
ivaas
sarvaśhaḥfully
indriyāṇisenses
indriyaarthebhyaḥ
tasyahis
prajñādivine wisdom
pratiṣhṭhitāfixed in
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.57
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उस-उस शुभ-अशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.59
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 58
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 58
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 58 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 58 का हिंदी अर्थ: "जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 58?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 58 translates to: "When, like the tortoise which withdraws all its limbs on all sides, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 58 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā sanharate chāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśhaḥ" mean in English?

"yadā sanharate chāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśhaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 58. When, like the tortoise which withdraws all its limbs on all sides, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.