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Bhagavad Gita · BG 2.42

Bhagavad Gita 2.42 — Commentary

18 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः

yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ kāmātmānaḥ swarga-parā janma-karma-phala-pradām kriyā-viśheṣha-bahulāṁ bhogaiśhwarya-gatiṁ prati

"The unwise, taking pleasure in the eulogizing words of the Vedas, utter flowery speech, saying, "There is nothing else," O Arjuna."

Scholar Commentaries (18)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

याम् इमां वक्ष्यमाणां पुष्पितां पुष्पित इव वृक्षः शोभमानां श्रूयमाणरमणीयां वाचं वाक्यलक्षणां प्रवदन्ति । के अविपश्चितः अमेधसः अविवेकिन इत्यर्थः। वेदवादरताः बह्वर्थवादफलसाधनप्रकाशकेषु वेदवाक्येषु रताः हे पार्थ न अन्यत् स्वर्गपश्वादिफलसाधनेभ्यः कर्मभ्यः अस्ति इति एवं वादिनः वदनशीलाः।।ते च

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

याम् इमां पुष्पितां पुष्पमात्रफलाम् आपातरमणीयां वाचम् अविपश्चितः अल्पज्ञा भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानां प्रवदन्ति वेदवादरताः वेदेषु ये स्वर्गादिफलवादाः तेषु सक्ताः न अन्यद् अस्ति इति वादिनः तत्सङ्गातिरेकेण स्वर्गा देः अधिकं फलं न अन्यद् अस्ति इति वदन्तः। कामात्मानः कामप्रवणमनसः स्वर्गपराः स्वर्गपरायणाः स्वर्गादिफलावसाने पुन र्जन्मकर्मा ख्य फलप्रदां क्रियाविशेषबहुलां तत्त्वज्ञानरहिततया क्रियाविशेषप्रचुरां तेषां भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानां याम् इमां वाचं ये प्रवदन्ति इति सम्बन्धः।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि न तु वैदिकानि। तेऽपि हि केचित्कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाहुरित्यत आह यामिमामिति। यामाहुस्तयेत्यन्वयः। मोक्षफलमपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति। वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः। वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः। नान्यदस्तीतिवादिनःपरोक्षविषया वेदाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ऐ.उ.1।14बृ.उ.4।2।2मां विधत्तेऽभिधत्ते माम् भाग.11।21।43 इत्यादिभिः पारोक्ष्येण प्रायो भगवन्तं वदन्ति।

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

2.42 याम which? इमाम् this? पुष्पिताम् flowery? वाचम् speech? प्रवदन्ति utter? अविपश्चितः the unwise? वेदवादरताः takign pleasure in the eulogising words of the Vedas? पार्थ O Partha? न not? अन्यत् other? अस्ति is? इति thus? वादिनः saying.Commentary Unwise people who are lacking in discrimination lay great stress upon the Karma Kanda or the ritualistic portion of the Vedas? which lays down specific rules for specific actions for,the attainment of specific fruits and ectol these actions and rewards unduly. They are highly enamoured of such Vedic passages which prescribe ways for the attainment of heavenly enjoyments. They say that there is nothing else beyond the sensual enjoyments in Svarga (heaven) which can be obtained by performing the rites of the Karma Kanda of the Vedas.There are two main divisions of the Vedas -- Karma Kanda (the section dealing with action) and Jnana Kanda (the section dealing with knowledge). The Karma Kanda comprises the Brahmanas and the Samhitas. This is the authority for the Purvamimamsa school founded by Jaimini. The followers of this school deal with rituals and prescribe many of them for attaining enjoyments and power here and happiness in heaven. They regard this as the ultimate object of human existence. Ordinary people are attracted by their panegyrics. The Jnana Kanda comprises the Aranyakas and the Upanishads which deal with the nature of Brahman or the Supreme Self.Life in heaven is also transitory. After the fruits of the good actions are exhausted? one has to come back to this earthplane. Liberatio or Moksha can only be attained by knowledge of the Self but not by performing a thousand and one sacrifices.Lord Krishna assigns a comparatively inferior position to the doctrine of the Mimamsakas of performing Vedic sacrifices for obtaining heaven? power and lordship in this world as they cannot give us final liberation.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या-- 'कामात्मानः'-- वे कामनाओंमें इतने रचे-पचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता, कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता, कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है ,उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष 'कामात्मानः' हैं। स्वयं तो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती, पर कामना आती-जाती रहती है और घटती-बढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना--ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं। परन्तु कामनामें रचे-पचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता। 'स्वर्गपराः'-- स्वर्गमें बढ़िया-से-बढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं, इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रात-दिन लगे रहते हैं। यहाँ 'स्वर्गपराः' पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है, जो वेदोंमें, शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः'-- वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं ,इसलिये वे 'वेदवादरताः' हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है। 'यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः'-- जिनमें सत्-असत्, नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशीका, विवेक नहीं है, ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है, उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं। यहाँ 'पुष्पिताम्' कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूल-पत्ती ही है, फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है, फूल-पत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल--स्वर्गादिका भोग है, वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है, उसमें स्थायीपना नहीं है। 'जन्मकर्मफलप्रदाम्'-- वह पुष्पित वाणी जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है; क्योंकि उसमें सांसारिक भोगोंको ही महत्व दिया गया है। उन भोगोंका राग ही आगे जन्म होनेमें कारण है (गीता 13। 21)। 'क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति'-- वह पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जिन सकाम अनुष्ठानोंका वर्णन करती है, उनमें क्रियाओंकी बहुलता रहती है अर्थात् उन अनुष्ठानोंमें अनेक तरहकी विधियाँ होती हैं, अनेक तरहकी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं, अनेक तरहके पदार्थोंकी जरूरत पड़ती है एवं शरीर आदिमें परिश्रम भी अधिक होता है (गीता 18। 24)।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

जिनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है वे इस आगे कही जानेवाली पुष्पित वृक्षोंजैसी शोभित सुननेमें ही रमणीय जिस वाणीको कहा करते हैँ। कौन कहा करते हैं अज्ञानी अर्थात् अल्पबुद्धिवाले अविवेकी जो कि बहुत अर्थवाद और फलसाधनोंको प्रकाश करनेवाले वेदवाक्योंमें रत हैं। तथा हे पार्थ जो ऐसे भी कहनेवाले हैं कि स्वर्गप्राप्ति आदि फलके साधनरूप कर्मोंसे अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

यदि सांख्ययोगरूपैकैव प्रमाणभूता बुद्धिस्तर्हि सैव सर्वेषां चित्ते किमिति स्थिरा न भवति तत्राह येषामिति। ते यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति तयापहृतचेतसां कामिनाम्। कामवशान्निश्चयात्मिका बुद्धिर्न प्रायः स्थिरा भवतीत्याह ते। यामिति। इमामित्यध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धत्वं कर्मकाण्डरूपाया वाचो विवक्ष्यते। वक्ष्यमाणत्वं क्रियाविशेषबहुलामित्यादौ द्रष्टव्यम्। किंशुको हि पुष्पशाली शोभमानोऽनुभूयते न पुरुषभोग्यफलभागी लक्ष्यते तथेयमपि कर्मकाण्डात्मिका श्रूयमाणदशायां रमणीया वागुपलभ्यते साध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्न त्वेषा निरतिशयफलभागिनी भवति कर्मानुष्ठानफलस्यानित्यत्वादिति मत्वाह पुष्पितामिति। वाक्यत्वेन लक्ष्यतेऽर्थवत्त्वप्रतिभानाद्वस्तुतस्तु न वाक्यमर्थाभासत्वादित्याह वाक्यलक्षणामिति। प्रवक्तृ़णां वेदवाक्यतात्पर्यपरिज्ञानाभावं सूचयति अविपश्चित इति। वेदवादा वेदवाक्यानि तानि च बहूनामर्थवादानां फलानां साधनानां च विधिशेषाणां प्रकाशकानि तेषु रतिरासक्तिस्तन्निष्ठत्वं तद्वत्त्वमपि तेषां विशेषणमित्याह वेदवादेति। कर्मकाण्डनिष्ठत्वं फलं कथयति नान्यदिति। ईश्वरो वा मोक्षो वा नास्तीत्येवं वदन्तो नास्तिकाः सन्तः सम्यग्ज्ञानवन्तो न भवन्तीत्यर्थः।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

अव्यवसायिनां तु व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवति प्रतिबन्धबाहुल्यादित्याशयेनाह यामिति त्रिभिः। यामिमां वक्ष्यमाणां पुष्पितां फलाप्रदपुष्पितवृक्षवच्छोभमानां श्रवणमात्ररमणीयांअपाम सोमभमृता अभूम इत्यादिरुपां वाचं प्रवदन्ति अविपश्चितो बुद्धिरहिता वेदस्य वादेऽर्थवादेअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवंरुपे रताः प्रीतिमन्तोऽतएव नान्यन्मोक्षादिकं स्वर्गादन्यदस्तीति वादिनः। त्वया तु मम मतमेवाभ्युपेयमिति सूचयन्नाह हे पार्थेति।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

उत्तरार्धमेव विवृणोति यामिमामित्यादिना। यां पुष्पितां पुष्पितद्रुमवद्दूरतो रमणीयां वाचम्अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवतिअपाम सोमममृता अभूम इत्येवंरूपां प्रवदन्ति। अविपश्चितः अव्यवसायिनो मूढाः। यतो वेदवादरताः वेदान्तर्गतेषु अर्थवादेषुयस्य पर्णमयी जुहूर्भवतिन पापँ् श्लोकँ् शृणोति इत्येवमादिषु रताः बद्धश्रद्धाः अतएव कर्मणोऽन्यत् आत्मज्ञानं तत्फलं मोक्षश्च नास्तीति वादिनो वदनशीलाः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

ननु कामिनोऽपिकष्टान्कामान्विहाय व्यवसायात्मिकामेव बुद्धिं किं न कुर्वन्ति तत्राह यामिति। पुष्पितां विषलतावदापातरमणीयां प्रकृष्टां परमार्थफलपरामेव वदन्ति वाचं स्वर्गादिफलश्रुतिं ये तेषां तया वाचापहृतचेतसां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयत इति तृतीयेनान्वयः। किमिति तथा वदन्ति। यतोऽविपश्चितो मूढाः। तत्र हेतुः। वेदे ये वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवतिअपाम सोमममृता अभूम इत्याद्यास्तेष्वेव रताः प्रीताः। अतएव अतः परमन्यदीश्वरतत्त्वं प्राप्यं नास्तीति वचनशीलाः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

2.42 इत्यादिना चानन्तरमेवोच्यते। अविदुषां धूमादिमार्गेण स्वर्गारोहणादिकं चोपनिषत्सु जोघुष्यते अतो विध्यभावादेवारादुपकारकत्वमपि निरस्तम्। तदेतदखिलमुक्तम् अविरोधाच्चेति। शास्त्रादिविरोधाभावादित्यर्थः। पक्षान्तरे च शास्त्रविरोधः स्यादिति भावः।मोक्षाधिकारे तु निखिलमिदमन्यथा। तथाहि यथावस्थितस्वरूपप्राप्तिरेव हि मोक्षपुरुषार्थः। स कथमनिश्चीयमान इष्येत कथं च तज्ज्ञानं तदिच्छामप्यन्तरेण तत्साधनमनुष्ठीयेत स्वरूपयाथात्म्यज्ञानस्य च विहिततया साधनानुप्रवेश इति कथं तद्व्यतिरेकेण साधनं पुष्कलमनुष्ठितं स्यात् कथं च स्वरूपाविर्भावलक्षणफलानुभवः स्वनिश्चयशून्यस्य स्यात् इति युक्तिविरोधः। चोदयन्ति च शास्त्राणि मोक्षस्य सर्वविधोपकारकतया आत्मतत्त्वज्ञानम्। अतस्तदभावे शास्त्रविरोधः स्यादिति। ननु व्यवसायात्मिकाया बुद्धेः किमिदमेकत्वम् न तावद्व्यक्त्यैक्यं तथाविधबुद्धिसन्तानासम्भवात्। नापि विषयैक्यादेकरूपतवम् अङ्गप्रधानाद्यवान्तरविषयभेदेन तदयोगात्। नापि समुदायगोचरत्वात्तद्योगः काम्यकर्मस्वपि तत्साम्यादित्यत उक्तंएकफलसाधनविषयतयेति। तदेवोपपादयति एकस्मा इति।सर्वाणीति नित्यनैमित्तिककाम्यानां सर्वेषां कर्मणां मुमुक्षुणाऽनुष्ठितानां साक्षात्परम्परया वा मोक्षसाधनोपकारित्वेन मोक्ष एक एव प्रधानं फलम्। सर्वमायुरेति छां.उ.4।11।2 इत्याद्यवान्तरफलाभिधानमपि तदुपयोगित्वमात्रादिति भावः।अस्तु सर्वेषामेकफलसाधनत्वम् तथापि क्रमभाविकर्मस्वरूपनानात्वे कथं तद्बुद्धेरैक्यं इत्यत्राह अत इति। एकफलसाधनतया सर्वेषां कर्मणामेकविधिगृहीतत्वेन एकशास्त्रार्थत्वात्तद्गोचरबुद्धिरवान्तरकर्मभेदसद्भावेऽप्येकशास्त्रार्थगोचरत्वादेकेत्युच्यत इत्यर्थः। पृथग्विधिसिद्धानां पृथग्वाक्यसिद्धेतिकर्तव्यताकानां कथमेकशास्त्रार्थत्वं इत्यत्रोक्तप्रकारेणैकत्वे दृष्टान्तमाह यथेति। आग्नेयादयो हि सेतिकर्तव्यताकाः ष़ड्यागा उत्पत्तिवाक्यैः पृथगुत्पन्नाः समुदायानुवादिवाक्यद्वयेन समुदायद्वयत्वमापन्नाः कामाधिकारे पुनरेकफलसाधनत्ववेषेणैकतया विधीयन्ते। तथा चैकशास्त्रार्थगोचरतया तद्बुद्धिरप्येकैव तद्वदित्यर्थः।अव्यवसायिनाम् इति हेतुपरमित्याह स्वर्गपुत्रेत्यादिना।फलानन्त्यादनन्ता इति। फलबाहुल्यात् स्वर्गाद्यनन्तफलभेदेन तत्साधनानामपि कर्मणां भिन्नशास्त्रार्थत्वात्तद्विष बुद्धयोऽपि यावत्फलभेदं भेदिन्य इत्यर्थः। अनन्तबहुशाखशब्दयोः प्रधानाप्रधानस्वरूपभेदप्रकारभेदविषयतया पौनरुक्त्यं परिहरन् कर्मभेदापादकत्वाभावेऽपि वैषम्यान्तरपरं बहुशाखशब्दं व्याचष्टे तत्रापीति। एकैकस्यैव बहुशाखत्वमुपपादयति एकस्मा इति। एकैकमपि हि काम्यकर्म प्रधानफलावच्छिन्नवेषेण एकपादपस्थानीयं विरोधिगुणफलाद्यवच्छिन्नं तत्तदंशभेदेन बहुशाखं भवति। मोक्षशास्त्रे तु सर्वायुःप्राप्त्यादिकमपि साधनानुष्ठानाद्यर्थत्वेन मोक्षोपयोगितया तदेकफलान्तर्भूतमित्युक्तम्।वैषम्यद्वयोपपत्तिस्थैर्याभिप्रायेण निगमयति अत इति। प्रधानावान्तरफलभेदादित्यर्थः। आकाङ्क्षाक्रमेणान्वयप्रदर्शनायानन्ता बहुशाखा इति व्युत्क्रमेण व्याख्यातम्। ननु कथं भिन्नप्रधानावान्तरफलसाधनतयैव विहितानां नित्यनैमित्तिककाम्यकर्मणामेकमेव फलं स्यात् कथन्तरामेकशास्त्रार्थत्वम् काम्यानां च कर्मणां निष्कामेन कथमनुष्ठानम्। यदि च तत्तत्काम्यफलाभावेऽपि तत्तत्कर्मानुष्ठानं तर्हि तत्तदधिकाराभावेऽपि ब्राह्मणादेः क्षत्ित्रयादिधर्मानुष्ठानप्रसङ्गः सर्वकाम्योपसंहारः फलादिविरोधाद्व्याहतो दुष्करश्च।कतिपयोपसंहारे तु किं कियदनुष्ठेयमित्यत्र किं नियामकं इत्यादिशङ्कापरिहाराय बुद्ध्येकत्वबहुत्वोक्तेः फलमाह एतदुक्तमिति। नित्यनैमित्तिकयोः प्रधानफलान्यवान्तरफलानि च प्राजापत्यलोकादिप्राप्त्युपात्तदुरितक्षयाकरणनिमित्तप्रत्यवायपरिहारादिरूपाणि। संवलितनित्यनैमित्तिकयोरप्यत्र नित्यनैमित्तिकशब्देन सङ्ग्रहः। काम्यशब्दः केवलकाम्यपरः। ननु तानि सर्वाणि परित्यज्येत्ययुक्तम् मुमुक्षोरप्युपात्तदुरितक्षयादेरवश्यापेक्षितत्वादित्यत उक्तंमोक्षैकफलतयेति। दुरितक्षयादेरप्यन्तःकरणशुद्धिद्वारेणोपकारकत्वान्न पृथक्फलत्वमिति भावः।एकशास्त्रार्थतयाऽनुष्ठेयानीति। विनियोगभेदादन्यत्र भिन्नफलत्वं भिन्नशास्त्रार्थत्वं च। अत्र तु सर्वेषामप्येकत्र विनियुक्तानां फलैक्यं शास्त्रार्थैक्यं च युज्यते। सिद्धं च नित्यकाम्यज्योतिष्टोमादावपि विनियोग पृथक्त्वमिति भावः।स्ववर्णाश्रमोचितानीति। कस्य चिद्धि कि़ञ्चित्फलमुद्दिश्य कानिचित्कर्माणि विधीयन्ते। तेषामेव कर्मणां फलान्तरार्थतया विनियोगेऽपि स एवाधिकारी भवितुमर्हतिक्लृप्तकल्प्यविरोधे तु युक्तः क्लृप्तपरिग्रहः इति न्यायादधिकार्यन्तरकल्पने प्रमाणाभावात्। यथा नित्यकाम्यज्योतिष्टोमादौ यथा चाध्ययनस्य जपादाविति भावः। निष्कामस्य काम्यकर्मानुष्ठानोपपादनायोक्तम् तत्फलानि परित्यज्य मोक्षसाधनतयेति।नित्यनैमित्तिकैरेकीकृत्येति एकफलसाधनतयैकशास्त्रार्थीकृत्येत्यर्थः।यथाबलमिति। शक्त्यनुरोधेन हि शास्ति शास्त्रम्। आह च मनुः तद्धि कुर्वन्यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् 11।34क्षे.3 इति। एवं नित्यनैमित्तिकयोरिव काम्येष्वपि मुमुक्षोः कतिपयाङ्गवैकल्येऽपि न दोष इत्युक्तं भवति। एतेन विच्छेदे प्रत्यवायाभावकथनमपि न ज्योतिष्टोमाद्येकैकान्तर्विच्छेदपरम् अपित्वामोक्षादनुष्ठेयैकशास्त्रार्थभूतकर्मकलापे प्रयाजादिवदितिकर्तव्यतास्थानीयैकैकर्मानुष्ठानेऽपि देशादिवैगुण्यकृतोत्तराननुष्ठानपरमिति च दर्शितम्।एवं काम्यकर्मविषयबुद्धितो मोक्षसाधनभूतकर्मविषयाया बुद्धेः वैलक्षण्यमुपपाद्य अनन्तरं मोक्षसाधने प्रवृत्तिशैघ्र्यार्थमितरफलवैतृष्ण्यजननाय तत्फलसाधनकर्माधिकृतान् निन्दतीत्युपरितनश्लोकत्रयमवतारयति अथेति।काम्यकर्माधिकृतानिति काम्यकर्मसु स्वर्गादिस्वाभिलषितसाधनत्वस्वार्थताबुद्धियुक्तानित्यर्थः।पुष्पिताम् इत्येतत्फलव्यवच्छेदमुखेनासुखोदर्कत्वपरमित्यभिप्रायेणाह आपातरमणीयामिति।अल्पज्ञा इति। विविधं पश्यच्चित्त्वं हि विपश्चित्त्वम्।पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् अष्टा.6।3।409 पश्यच्छब्दावयवस्य यच्छब्दस्य लोपः। तच्च बहुज्ञत्वम्। तद्व्यतिरेकश्चात्रोपनिषत्साध्यस्थिरास्थिरादिविवेकाभावादल्पज्ञत्वमिति भावः।जन्मकर्म इत्यादेः गतिविशेषणत्वभ्रमव्युदासाय गतिं प्रतीत्यस्यापेक्षितपूरणाय च क्रममुल्लङ्घ्य प्रागेवोक्तम्।भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानामिति। एतेनवाचं इत्यस्य काम्यविधिभागपरत्वमुक्तं भवति।सामान्येन वैदिकनिन्दाभ्रममपाकरोति स्वर्गादिफलवादा इति। वेदशब्दोऽत्रवेदेषु वेदान्तेषु च गीयते इत्यादाविव कर्मभागपरः। तत्रापि विधिभागफलार्थवादभागविषयतया पुरुषवाक्यवेदवाक्यविषयतया वा वाचंवेदवाद इत्यनयोरपौनरुक्त्यमिति भावः।नान्यदस्ति इतिवादे पूर्वोत्तरपदानामर्थं हेतुतया उपादत्ते तत्सङ्गातिरेकेणेति। अपवर्गस्वरूपनिषेधोऽशक्य इत्यभिप्रायेणोक्तम् अधिकं फलमिति।वादिनः इत्यनेन तथावदनशीलत्वविवक्षाव्यञ्जनाय वदन्त इति वर्तमानप्रत्ययान्तेन व्याख्यातम्।कामप्रवणमनस इति कामेष्वात्मा मनो येषां ते कामात्मान इति व्यधिकरणबहुव्रीहिरिति भावः।स्वर्गपरायणा इति स्वर्गः परः परायणं परमप्राप्यं येषां ते स्वर्गपराः मोक्षविमुखा इति भावः।कामात्मनः स्वर्गपराः इतिपदद्वयस्य सामान्यविशेषविषयतया दृष्टादृष्टविषयतया वा हेतुसाध्यविषयतया वा कामोन्मुख्यान्यवैमुख्यपरतया वा पुनरुक्तिपरिहारः।स्वर्गादिफलभोगमध्ये जन्मादिभ्रमं व्युदस्यति स्वर्गादिफलावसान इति। यावत्सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते छां.उ.5।10।5 प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम्। तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे बृ.उ.4।4।6आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन 8।16स्वर्गेऽपि पातभीतस्य क्षयिष्णोर्नास्ति निर्वृतिः वि.पु.6।5।50 इत्यादिश्रुतिस्मृतय इह द्रष्टव्याः। जन्मवत्कर्मणोऽप्यनुशयाख्यकर्मशेषफलत्वख्यापनाय समानाधिकरणसमासतां दर्शयति जन्मकर्माख्यफलप्रदामिति। कर्मशेषेण पुनरुत्कृष्टापकृष्टजन्मप्राप्तौ श्रुतिस्तावत् प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यू ते पुनरेवापि यन्ति मुं.उ.1।2।7 तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्ित्रययोनिं वा वैश्ययोनिं वा अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा छां.उ.5।10।7 इत्यादिः। जन्मकर्मादेः सर्वस्य कर्मशेषमूलत्वे स्मृतयश्च वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य स्वकर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुश्श्रुतवित्तवृत्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते। विष्वञ्चो विपरीता नश्यन्ति गौ.ध.2।11।10।11 इति। तथा ततः परिवृत्तौ कर्मफलशेषेण जातिं रूपं वर्णं बलं मेधां प्रज्ञां द्रव्याणि धर्मानुष्ठानमिति प्रतिपद्यते। तच्चक्रवदुभयोर्लोकदयोः सुख एव वर्तते आ.स्तं.ध.2।1।2।3 इत्यादयः। वैराग्यपादे चायमर्थो व्यक्तमनुसन्धेयः। अत्र जन्माख्यकर्मफलप्रदामिति केषुचित्कोशेषु पाठः। ननु ज्योतिष्टोमादिक्रियाविशेषस्वरूपमात्रं कामिनो ज्ञानिनश्च समानम् तत्कथंक्रियाविशेषबहुलाम् इति कामिनो विशिष्याभिधीयते तत्रोक्तम् तत्त्वज्ञानरहिततयेति। ज्ञानिनां हि सर्वं कर्म क्रियमाणमपि ज्ञानप्रचुरमेव। तच्चैकफलसाधनतया एकशास्त्रार्थरूपम्। न च मोक्षानुपयुक्ताः सर्वे क्रियाविशेषास्तेन क्रियन्ते। अतः प्रयासबहुलं परिमितनश्वरफलं चामुमुक्षोः कर्मेति भावः। अन्येषां वाचा अन्येषामपहृतचित्तत्वभ्रमं निरस्यन् षष्ठ्यन्तपदयोरदृष्टविशेष्ययोः प्रस्तुतविशेष्यविषयत्वं चाह तेषामिति।तयेति। यद्वृत्तप्रतिनिर्वेशरूपव्याख्येयोपादानम् तत्परामृष्टं प्रकृतं चेतोपहरणहेतुमाह भोगैश्वर्यविषययेति।अपहृतचेतसाम् इत्यस्य पूर्वपदेनार्थपौनरुक्त्यपरिहाराय तदर्थस्य प्रकृतव्यवसायात्मकबुद्ध्यभावहेतुत्वाय चोक्तम् अपहृतात्मज्ञानानामिति।यथोदितेति प्रागुक्तप्रकारेत्यर्थः। न विधीयते केनचिद्धेतुना न क्रियत इत्यर्थः। ततः फलितमुच्यते नोत्पद्यत इति। समाधिशब्दस्य बुद्धिविशेषविवक्षायामत्रानन्वयान्मनोविषयत्वे व्युत्पत्तिमाह समाधीयतेऽस्मिन्निति निधीयतेऽस्मिन्निति निधिवत्। यथोदितेत्याद्युक्तं प्रकारं विवृणोति तेषां मनसीत्यादिना। विधीयत इति वर्तमाननिर्देशतात्पर्यसिद्धमुक्तंकदाचिदपीति। एषां निन्दा किमर्थमित्यत आहअत इति व्यवसायात्मकबुद्धिविरोधादित्यर्थः।मुमुक्षुणा न सङ्गः कर्तव्य इति निस्सङ्गेन काम्यानामपि करणमनुमन्यते स्वरूपमात्रस्य मोक्षविरोधित्वाभावात्। मोक्षेच्छाऽस्ति चेद्बन्धकेच्छा न कार्येत्युक्तं भवति।अथैवं काम्यकर्मसु तदधिकृतेषु च निन्दितेषु हिततमोपदेशिनः शास्त्रस्येदृशकर्मविधानं अनुपपन्नम् विहितस्य चात्र त्याज्यतयोपदेशो व्याहतः कर्मविधिशास्त्राणामप्रामाण्यं वा तत्प्रामाण्ये वा तन्निषेधोपदेशस्याप्रामाण्यं प्रसज्यत इति शङ्कामुत्तरश्लोकद्वयेन परिहरतीत्याह एवमत्यन्ताल्पेत्यादिना। पुनर्जन्म येषां प्रसवभूतं तानि पुनर्जन्मप्रसवानि। संसारविपिनवानस्पत्यानां हि कर्मणां परिणिनंसोः फलस्य नियतपूर्वकत्वसूचकत्वादिभिर्देहविशेषपरिग्रहः प्रसूनस्थानीयः। प्रियहितोपदेशितया मातापित्रोरुपादानम्। सर्वजन्मानुवृत्तिसूचनाय सहस्रशब्दः। सर्वात्मसाधारणचतुर्विधपुरुषार्थसकलापुरुषार्थनिवृत्तितत्साधनाभिधायितया कदाचिदप्यनुपरमादिना च वत्सलतरत्वोक्तिः। अतिशयहेतुत्रयंआत्मोज्जीवने प्रवृत्ता इति त्रिभिः सूचितम्। न हि देहादेरारोग्यादिमात्रे कदाचिदेव व्यापृता इति क्रमात्त्रयाणां भावः।किमर्थं वदन्तीति न तावत्प्रतारणार्थं हितोपदेशित्वात्। नापि हितान्तरपर्यवसितोपच्छन्दनार्थं प्रतिकरणं तत्फलमात्रपर्यवसितत्वात्। अतोऽनाधेयातिशयपरमकारुणिकपुरुषोत्तमाज्ञारूपाणां वेदानामामूलपर्यवसानमपरिमितदुःखदुर्दिनानुबन्धिसुखकणखद्योतसाधनोपदेशो विषसंपृक्तमधुभोजनोपदेशवदयुक्तः निषेध एव तु कर्तव्यः। यद्वा न सोऽपि प्रत्यक्षादेस्तत्प्रसञ्जकत्वाभावात् स्वयं प्रसज्य प्रतिषेधे जम्बालमज्जनक्षालनसमत्वादित्यभिप्रायः।कथं वेति वेदविरुद्धं हि त्याज्यतयोपदेश्यं न तु वेदविहितमिति भावः।त्रयो गुणास्त्रैगुण्यमिति। अत्रार्थान्तरासम्भवात्चातुर्वर्ण्यादीनां स्वार्थे इत्युपसङ्ख्यानात्स्वार्थिकप्रत्ययः। गुणशब्दस्य प्रयोगप्राचुर्यात्सङ्ख्याविशेषान्वयबलाद्वक्ष्यमाणपर्यालोचनाच्च सिद्धमर्थविशेषं निर्दिशति सत्त्वरजस्तमांसीति। स्वर्गादिफलकरणेतिकर्तव्यताधिकारिविशेषादिविषया हि वेदाः। न पुनः सत्त्वरजस्तमोविषया दृश्यन्त इत्यत्राह सत्त्वरजस्तमःप्रचुरा इति। तत्तद्गुणप्राचुर्यात्पुरुषास्तत्तच्छब्देनोपचर्यन्ते। भाष्यान्तरोक्ता तु फललक्षणा मन्दा अधिकारव्यवस्थापनं त्वत्रोपयुक्ततममिति भावः। अस्त्वेवं गुणत्रयप्रचुरपुरुषविषया वेदाः चोद्यस्य किमायातमित्यत्राह तम इति। एकस्मिन्नेवाधिकारिणि गुणत्रयप्राचुर्यभ्रमनिरासेन तत्तद्विधिनिषेधविषयाधिकारिवैचित्र्याभिव्यक्त्यर्थंतमःप्रचुराणामित्यादिपृथङ्निर्देशः। तामसाद्यधिकारिबाहुल्याल्पत्वाल्पतरत्वप्रकाशनाय सत्त्वरजस्तमसामग्र व्युत्क्रमपाठः। ततश्च क्रमादैहिकामुष्मिकापवर्गाभिलाषिण उपलक्ष्यन्ते।सत्त्वप्रचुराणामिति दृष्टान्ताभिप्रायः। अत एव ह्युपपादकग्रन्थेयद्येषामित्यादिना रजस्तमःप्रचुराणामेव ग्रहणम्।स्वगुणानुगुण्येनेति यथा वातपित्तकफोपात्तशुद्धसमसङ्कीर्णप्रकृतीन् पुरुषानालोच्य हितोपदेशिनो वैद्यास्तत्प्रकृत्यनुकूलभोजनभैषजादि विदधति अपथ्यादीनि च निषेधन्ति तदभावे च यथा दुरुपदेशादिमूढचेतसः प्राणिनोऽपथ्यगरलादिसेवया प्रणश्यन्ति यथा च ताम्बूलाद्यर्थिनः पुत्राः पित्रादिभिस्तत्प्रदानाभावे चौर्यादिना प्रणश्यन्ति तथाऽत्रापीति भावः।स्वर्गादिसाधनमेवेति न हि पिपासादिपीडितानां तदानीं रसायनादिकं विधेयमिति भावः। मोक्षवैमुख्यं स्वापेक्षितफलसाधनाज्ञानं च तमःकृत्यम्। कामप्रावण्यादिकं तु यथांशं रजस्तमःकृत्यम् कामप्रावण्यविवशाः काम्यफलाभिसन्धिबलेनात्मानं नियन्तुमशक्ताः।अनुपादेयेष्वित्यादि यथा बौद्धादय इति भाव्यम्।प्रणष्टा भवेयुरिति दुष्कर्मविपाकेन स्थावरादिभावमप्याश्रित्याचित्कल्पतया पुरुषार्थयोग्यतागन्धरहिता भवेयुरित्यर्थः।अत इति उक्तप्रकारेण काम्योपदेशस्य हिततमत्वादित्यर्थः।त्वं त्विति तुशब्देनाधिकारिवैषम्यं द्योतयति। किमस्याधिकारिणो वैषम्यं कथं च संसारिणस्त्रैगुण्यनिषेधः तथा सतिनित्यसत्त्वस्थः इत्यनेन विरोधश्च स्यादित्यत्राह इदानीं सत्त्वप्रचुर इति।शिष्यस्तेऽहम् 2।7 इत्यादिवचनपरामर्शादिदमुक्तम्। अर्जुनशब्दसम्बुद्धितात्पर्यलब्धो विशेषोऽस्य सत्त्वप्राचुर्यम्। अर्जुनशब्दस्यावदातपर्यायत्वात् सत्त्वस्यापि शुक्लशब्दव्यपदेशादधिकारिवैषम्यस्य चापेक्षितत्वात्तथा प्रसिद्ध्यादिबलाच्चेदमेवात्र तात्पर्यम्।तदेव वर्धयेति न तु सिद्धं सत्त्वप्राचुर्यं परित्यज्य विहिताकरणनिषिद्धकरणादिना रजस्तमसी वर्धयेत्यर्थः।निस्त्रैगुण्यो भव इति निषेधे गुणत्रयसाधारणे सति कथं सत्त्वं वर्धयेत्युच्यते इत्यत्राह नान्योऽन्येति। सत्यं गुणत्रयसाधारणो निषेधः स तु सङ्कीर्णविषयः अन्यथानित्यसत्वस्थः इति वक्ष्यमाणानुपपत्तेरिति भावः।निस्त्रैगुण्यो भव इत्येतत्अरोगो भव इत्यादिवत्पुरुषव्यापारासाध्यत्वेन प्रेषणानुपपत्तेः आशीरूपामिव दृश्यत इत्यत्राह न तदिति। रजस्तमःप्राचुर्यहेतुभूताहारादिकं परित्यजेत्युक्तं भवति।निर्गतेत्यादि। द्वन्द्वशब्दः पुण्यपापमूलसांसारिकस्वभाववर्गद्वयपर इति भावः। एतेन फलस्वरूपं वा साधनानुष्ठानदशासमकालीनस्वास्थ्यं वा द्वन्द्वतिक्षारूपेतिकर्तव्यता वा विवक्षिता।गुणद्वयरहितेति। नित्यसत्त्वस्थपदमब्भक्षादिवदवधारणगर्भमिति भावः। यद्वा नित्यपदेन कदाचिदपि गुणान्तरानभिभूतत्वमिहाभिप्रेतम्। अत एव च प्रवृद्धत्वम्। गुणान्तराभिभवे हि नित्यप्रवृद्धिर्न स्यादिति भावः। सत्त्वसम्बन्धमात्रस्य सर्वक्षेत्रज्ञसाधारणत्वान्नित्यप्रवृद्धेत्युक्तम्। ननु रजस्तमःप्राचुर्यं न वर्धयेति निषेधः सत्त्वप्राचुर्यं वर्धयेति विधिश्च नोपपद्यते न ह्यसौएतद्रजः इदं तमः इदमहं वर्धयामि इति बुद्ध्या प्रवर्तते यतो निषिद्ध्येत यतश्च सिद्धे रजस्तमसी शमयेत् न चासौ सत्त्वतदुपायौ जानाति येन तत्र प्रवर्तेत अतः किमसौ कथं कुर्यात् इत्यभिप्रायेण शङ्कते कथमिति चेदिति। तत्र निषेधस्य विधेश्चोपपादकतयानिर्योगक्षेम आत्मवान् इति पदद्वयं क्रमाद्व्याचष्टे आत्मस्वरूपेत्यादिना।निर्योगक्षेमः इति सामान्येन निषेधो मुमुक्षोर्विहितव्यतिरिक्तविषय इति ज्ञापनाय बहिर्भूतानामित्यन्तमुक्तम्।आत्मवान् भव इत्यत्र मत्वर्थानुपपत्तिमाशङ्क्याह आत्मस्वरूपान्वेषणपर इति। स्वस्यैवाप्रमत्ततागर्भस्वबुद्धिविशेषतः प्राप्त्यपेक्षया सम्बन्धविषयः प्रत्ययः। यद्वा स्वरूपान्वेषणादेव ह्ययमात्मानं लभते अन्यथा आत्महानिरेव स्यादिति भावः। एवं निषेधस्य विधेश्चानुष्ठानाय विषय उक्तः। अतः किमित्यत्र तदुभयाधीनं फलद्वयमाह एवमिति। न साक्षाद्गुणान्विषयीकृत्य तव किञ्चित्कर्तव्यम् तेषां तु निर्योगक्षेमत्वात्मवत्त्वाभ्यां असात्त्विकाहारादित्यागहेतुभ्यां स्वयमेव यथार्हं नाशोन्मेषौ स्यातामिति भावः। अथ सनिदर्शनमधिकारिभेदं प्रतिपादयन्तंयावानर्थः इत्यादिश्लोकं व्याचष्टे न चेति। वर्णाश्रमप्रवर चरणादिभेदेन प्रतिनियताधिकारिविषया हि वेदोदिता धर्मा इति भावः।सर्वार्थपरिकल्पित इति तत्तत्प्रयोजनाभिलाषिसर्वाधिकार्यर्थं परिकल्पिते। यद्वा सर्वशब्दः प्रयोजनकात्स्न्र्यपरः स्नानपानादिनानाप्रयोजनार्थं परिकल्पिते। एतच्चसर्वतस्सम्प्लुतोदके इत्यनेनार्थसिद्धमुक्तम्। उदपानं कूपतटाकादि।पिपासोरिति दार्ष्टान्तिकप्रस्थानानुरोधेनाध्याहारः। नन्वत्र दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः का सङ्गतिः न हि पिपासोरुदपाने यावत्प्रयोजनं तावदेव विजानतः सर्वेषु वेदेष्वित्याशङ्कां परिहर्तुं वाक्यपूरणायाध्याहृत्योक्तम् तावदेव तेनोपादीयत इत्यादि। सर्वेषु चेति चशब्द उपादेयानुपादेयांशसङ्कलनद्योतनार्थः। ननुब्राह्मणस्य इत्येतत्प्रकरणासङ्गतम् क्षत्ित्रयायैव ह्युपदिश्यते। कश्चात्र ब्राह्मणस्य विशेषः ब्रह्मविद्याया अपि त्रैवर्णिकसाधारणत्वात्।विजानतः इति चायुक्तम् विजानन्नेव हि कामनाधिकारादिष्वपि प्रवर्तते। ब्राह्मणशब्दश्चात्र नतदधीते अष्टा.4।2।59 इत्याद्यर्थान्तरपरःब्राह्मोऽजातौ अष्टा.6।4।171 इति निपातनेन जातिव्यतिरिक्तार्थे ब्राह्म इत्येव वक्तव्यत्वात्। तत्राह वैदिकस्य मुमुक्षोरिति। ब्रह्म अणतीति निरुक्त्या ब्राह्मणःशकन्ध्वादिषु पररूपं वक्तव्यम् अष्टा.1।1।64 इति पररूपे कृते प्रज्ञादित्वादण्प्रत्यये च ब्राह्मण इति रूपं भवति। ब्रह्म चात्र वेदः वेदेष्वित्यत्रैव प्रसक्तत्वात्। अतोऽत्र ब्राह्मणशब्दो वैदिकमात्रपर इति न क्षत्ित्रयार्थोपदेशाद्यनुपपत्तिः। ब्राह्मणशब्दस्यात्र सन्न्यासिपरत्वेनशङ्करव्याख्या त्वतिमन्दा। अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः बृ.उ.3।5।1 इति श्रुतिस्तु योगिनः प्रकृष्टतरान्तरसत्त्वं अवस्थाविशेषमाह।विजानतः इति च विशिष्टज्ञानवत्त्वमुच्यते। विशिष्टत्वं च हेयोपादेयविषयतया। तथाविधज्ञानवांश्च मुमुक्षुरेव स्यादिति। तावानित्यस्य व्यवच्छेद्यमाह नान्यदिति। वेदोदितमपि न मोक्षसाधनव्यतिरिक्तमुपादेयम् अनधिकृतत्वात्। न ह्यन्यवर्णाश्रमान्यफलकामुकादिधर्मोऽन्यस्योपादेय इति भावः।एवं तर्हि मोक्षसाधनेतरसकलपरित्यागे नित्यनैमित्तिकनिषेधशास्त्रातिलङ्घनेन कामचारदोषः स्यात् तावानिति च कियानुच्यते इति शङ्कायामुत्तरश्लोकमवतारयति अत इति। न कामचारदोषः एतावत उपादेयत्वात् नाप्यन्येच्छोरन्योपायप्रवृत्तिदोषः तत्तत्फलपरित्यागेन साधारणस्वरूपमात्रस्योपादेयत्वादिति भावःकर्मणि इति सामान्यशब्दस्य योग्यान्विशेषानाह नित्य इत्यादिना।केनचित् इत्यादिकं नित्यनैमित्तिककाम्यरूपे राशित्रयेऽपि सम्बध्यते। तेन नित्यनैमित्तिकयोरपूर्वमात्रार्थतामिच्छतां कुदृष्टीनां दृष्टिपरता। कर्मान्तराधिकारोपात्तदुरितक्षयाकरणनिमित्तप्रत्यवायपरिहारप्राजापत्यादिलोकपशुपुत्रादि यथासम्भवं नित्यादेः फलम्।फलविशेषेणेति। यथोत्पत्तिवाक्ये स्वरूपेणैवोत्पन्नानां कर्मणां कामाधिकारे स्वर्गादिफलविशेषेण सम्बन्धितया श्रुतत्वात् स्वर्गादिकं फलमिष्यते एवं मोक्षाधिकारेऽपि मोक्षाख्यफलविशेषेण सम्बन्धितया श्रुतत्वात् सोऽपि फलमिति भावः।ते इतिशब्दस्य प्रकृतान्वितं तात्पर्यमाह नित्यसत्त्वस्थस्य मुमुक्षोरिति। मोक्षतत्साधनादिफलव्यवच्छेदायतत्सम्बन्धितयाऽवगतेष्वित्युक्तं स्वर्गपश्वादिष्विति शेषः। मेति न निषेधविधिः किन्त्वभावमात्रबोधक इतिन कदाचिदित्युक्तम्। फलयोग्यतानिषेधात् तत्सङ्गनिषेधोऽपि फलितः। कर्ममात्राधिकारे फलानधिकारे च बुद्धिस्थक्रमेण हेतुद्वयमाह सफलस्येति। न हि मोक्षमिच्छतो बन्धरूपफलाभिलाष उपपन्नः न च तद्धेतुपरित्याग उचित इति भावः।केवलस्येत्येतन्न फलराहित्यमात्रपरंफलरहितस्येत्युक्तत्वात्। अपि तर्हि स्वरूपत एव प्रयोजनत्वपरम्। तत्र हेतुः मदाराधनरूपस्येति।कर्मफलयोरिति। पुनरुक्तिप्रसञ्जकषष्ठीसमासादपि उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्व एवोचितः। वक्ष्यमाणाकर्तृत्वानुसन्धानसङ्ग्रहश्चात्र युक्त इति भावः।कर्मण्येवाधिकारस्ते ৷৷. मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि इति पूर्वोत्तरवचनाभ्यामयं कर्महेतुत्वनिषेधो व्याहन्येतेत्यत्राह त्वयेति। नात्र वस्तुतो हेतुत्वं निषिध्यते अपितु हेतुत्वानुसन्धानमित्यर्थः। ननु फलहेतुत्वनिषेधः पुनरुक्तःमा फलेषु कदाचन इत्युक्तत्वात् यदि तु भोजनादिसाध्यक्षुन्निवृत्त्यादिफलनिषेधः तदा तदुपायरागस्यापि निवृत्तेः शरीरधारणादेरप्यभावप्रसङ्गेन उपायानुष्ठानस्यैव लोपः स्यादित्यत्राह फलस्यापीति।क्षुन्निवृत्त्यादेरित्यनेन पौनरुक्त्यं परिहृतम्।न त्वं हेतुरित्यनुसन्धेयमिति। नात्र क्षुन्निवृत्त्यादिस्वरूपं निषिध्यते। अपित्वात्मनस्तद्धेतुत्वानुसन्धानमिति भावः। ननु कथं कर्मफलयोर्हेतुः सन्नहेतुरित्यनुसन्धीयेत। एवं च चार्वाकादिवत् अनयोर्निर्हेतुकत्वमनुसन्धेयं स्यात् ततश्चोपायानुष्ठानमेव हीयेत। अहेतुकतया बुध्यमाने प्रयासायोगादित्यत्राह तदुभयमिति। उभयं कर्महेतुत्वं फलहेतुत्वं च।उत्तरत्रेति। अयमेव तृतीयाध्यायप्रधानार्थः। तथा हि सङ्ग्रहः असक्त्या लोकरक्षायै गुणेष्वारोप्य कर्तृताम्। सर्वेश्वरे वा न्यस्योक्ता तृतीये कर्मकार्यता गी.सं.7 इति। एवमहेतुकत्वचोद्यं तावत्परिहृतम्। तथाप्यात्महेतुकत्वानुसन्धाननिषेधेन अननुष्ठानप्रसङ्गस्तदवस्थ इति चेत् मैवं नह्यत्रानुष्ठानस्याननुष्ठानतया भ्रान्तिरुच्यते नाप्यनुष्ठातृत्वस्य सतोऽप्यप्रतिपत्तिर्विधीयते येन विरोधः स्यात् किन्त्वनेकहेतुके कस्मिंश्चिदेकस्यैव हेतुत्वं त्रैगुण्याद्युपाधिके स्वरूपप्रयुक्तत्वं च भ्रान्तिसिद्धमिति तदुभयं निषिद्ध्यते। वक्ष्यते हिशरीरवाङ्मनोभिः 18।15 इत्यादौ तृतीयाध्याये च। किञ्च साक्षात्कर्तृत्वाननुसन्धानविधावपि नाकर्तृत्वानुसन्धानकर्तृत्वप्रतिपत्तिनिषेधयोरप्यननुष्ठानप्रसङ्गः। स हि कुर्वन्नेव स्वकृतोपकारनिगूहनवदाहार्यबोधेन तथा प्रतिपद्यते। अन्यत्र वा कर्मणि क्रियमाण इति न कश्चिद्दोषः।सर्वेश्वरे इति निर्देशस्तस्मिन् कर्तृत्वाद्ध्यवसायौचित्यार्थः। जीवस्यापि हि कर्तृत्वं तत्त्वतः परमात्मायत्तमितिपरात्तु तच्छ्रुतेः ब्र.सू.2।3।45 इत्यधिकरणे स्थापितम्।पूर्वोत्तरवाक्याद्यविरोधाय कर्मस्वरूपपरित्यागं परिहरति एवमिति। गुणेश्वराधीनत्वबुद्धावपि किं मे परित्यक्तफलेन दुःखस्वरूपेण भोजनादिकर्मणा इति त्वया नोदासितव्यमिति भावः।अननुष्ठान इति।अकर्मणीत्यत्र कर्मशब्दः क्रियावाची नञत्र तदभावपर इति भावः। अननुष्ठानस्य प्रतिषेधार्थं प्रसङ्गं स्मारयति न योत्स्यामीति। अकर्मसङ्गनिषेधफलितमन्यत्र सङ्गमाह उक्तेनेति। अनन्तरग्रन्थं सङ्गमयति एतदेवेति। अवधारणेनार्थान्तरपरत्वव्युदासः।स्फुटीकरोतीति पौनरुक्त्यपरिहारः।राज्यबन्धुप्रभृतिष्विति राज्यप्रभृतिषु सङ्गः फलद्वारा बाधकः बन्धुप्रभृतिषु सङ्गस्तु युद्धाद्यननुष्ठानद्वारेति तदुभयमपि त्याज्यत्वादत्र सङ्गशब्देन सङ्गृहीतमिति भावः।युद्धादीनीति प्रकृतविशेषप्रदर्शनम्। आनुषङ्गिकत्वसूचनायोक्तंतदन्तर्भूतेति।लाभालाभौ जयाजयौ 2।38 इति पूर्वोक्तानुसन्धानेनाह विजयादीति।योगस्थः ৷৷. सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा इत्यनयोरेकवाक्यत्वे पौनरुक्त्याद्भिन्नवाक्यत्वे तु तादृशश्रुतिवाक्यविशेषोपबृंहणौपयिकयोगशब्दार्थव्याख्यानरूपत्वेन पौनरुक्त्याच्च कुर्वितीदगावर्तितम्।विद्याविनयसम्पन्ने 5।18 इत्यादिप्रदेशान्तरोक्तसमत्वान्तरव्यावर्तनायोक्तंतदिदं सिद्ध्यसिद्ध्योरिति। सार्वत्रिकयोगशब्दप्रयोगविषयव्यावृत्त्यर्थमुक्तंयोगस्थ इत्यत्रेति। योगशब्दस्य सिद्ध्यसिद्धिसाम्ये क्वचिदपि प्रयोगो न दृश्यत इत्यत्राह योग इति। चित्तसमाधाने प्रयोगस्तावद्योगानुशासनादिसिद्धः। इदमपि समत्वं तद्रूपमिति योगशब्दार्थ इत्याकूतम्।अभ्यासरूपतात्पर्यलिङ्गविवक्षामभिप्रयन् पौनरुक्त्यशङ्काद्वारेणोत्तरश्लोकमवतारयति किमर्थमिति। इदं साम्यानुसन्धानरूपं चित्तसमाधानम्। तद्ध्यनन्तरं प्रशस्यते। कर्ममात्रनिन्दाभ्रमं परिजिहीषन् बुद्धियोगशब्दस्य प्रकरणविशेषितं वाच्यांशं तावदाह योऽयमिति। अजहल्लक्षणया बुद्धिप्राचुर्यहेतुकया लक्षितमाह तद्युक्तात्कर्मण इति।इतरदित्यनेन प्रकरणविहितकर्मव्यतिरिक्तविषयाऽत्र कर्मनिन्देति सूचितम्। दूरावरशब्दयोरत्र विवक्षितं निष्कर्षति महदिति। तृतीया प्रकारे।कृपणाः फलहेतवः इत्यनन्तरवाक्येन बुद्धियुक्त इत्यादिना च वक्ष्यमाणं श्रुतिस्मृत्यन्तरादितश्च सिद्धं वैरूप्यप्रकारमाह उक्तेति। नीतिमन्त्रौषधकेवलयागादिव्यावर्तनाय निखिलशब्दः। तस्योपाधिविशेषावच्छिन्नत्वात् कात्स्न्र्येऽपि प्रयोगादवच्छेदकोपाध्यन्तरव्यावर्तनायोक्तं सांसारिकेति। केवलकर्मसाध्यस्वर्गादिव्यावर्तनाय परमशब्दः। अपरिमितशब्देन स्वभावसङ्ख्याकालादिप्रयुक्तसम्भावितसमस्तपरिच्छेदनिरासः।हिशब्दस्य हेत्वर्थतामभिप्रयन्नाह अत इति। प्रकरणादिविरुद्धसाङ्ख्याद्युक्तकर्मस्वरूपपरित्यागपूर्वकज्ञानमात्रोपादानभ्रमव्युदासायोक्तंकर्मणि क्रियमाण इति।उक्तायामिति। तात्पर्यातिशयव्यक्त्यर्थं पूर्वोक्तमभ्यस्यत इति भावः।उपाये गृहरक्षित्रोः शब्दः शरणमित्ययम् अ.बु.सं.36।34 इत्यादिनाऽवगतं शरणशब्दस्य रक्षकाद्यर्थान्तरं व्यावर्तयन् विवक्षितं वक्तुं वाच्यं तावदाह वासस्थानमिति। नन्विदमसङ्गतं बुद्धेर्वासस्थानभूतगृहाद्याश्रयत्वभावादित्यत्राह तस्यामेवेति। कर्मयोगनिष्ठा ह्यत्रोपदिश्यत इति भावःकदर्ये कृपणक्षुद्रकिम्पचानमितम्पचाः अमरः3।1।49 इति कृपणशब्दस्य पुरुषविशेषे रूढत्वात् बुद्धियुक्त इत्यादिना फलाभिसन्धिरहितपुरुषाणां प्रशस्यमानत्वात्मां कर्मफलहेतुः 2।47 इति पुरुषे फलहेतुशब्दस्य प्रकृतत्वात्कृपणाः फलहेतवः इत्यत्रापि फलाभिसन्धिपूर्वककर्मकारिणः पुरुषा एव निन्द्यन्ते न तु फलमात्रमित्यभिप्रायेणाह फलसङ्गादिनेति। पुरुषाणामपि हि स्वकर्मद्वारा फलहेतुत्वमस्त्येवजन्मबन्धविनिर्मुक्ताः 2।51 इत्यादेः प्रतिरूपतया परमनिश्श्रेयसवैधुर्यस्यात्र कृपणशब्देनाभिधातुमुचितत्वात्संसारिण इत्युक्तम्। अकृपणप्रदर्शनपरानन्तरश्लोकपरामर्शाच्च अयमेवार्थ उचित इति भावः।बुद्धियुक्तो जहातीह इत्यस्येह कर्मणि क्रियमाणे बुद्धियुक्त इत्यन्वयमभिप्रेत्याह बुद्धियोगयुक्तस्तु कर्म कुर्वाण इति। यद्वाकर्म कुर्वाण इति प्रकरणापन्नमुक्तम् इहशब्दस्य तु जहातिनाऽन्वयःइहैव तैर्जितः सर्गः 5।19 इत्यादिवत्। ततश्च प्रतिबन्धकनिवृत्तिरुक्ता भवति। बुद्धिरहितकेवलकर्मादिभिरनिवर्त्यत्वार्थमाह अनादिकालसञ्चिते अनन्ते इति। अनादिकालसञ्चितत्वमनन्तत्वनिदानम्। सुकृतस्य हानिरपुरुषार्थः स्यादित्यत्रोक्तंबन्धहेतुभूते इति। नहि काञ्चनकालायसश्रृङ्खलयोर्बन्धहेतुत्वे कश्चिद्विशेषः मुमुक्ष्वपेक्षया च स्वर्गादिकारणं सुकृतमपि दुष्कृतमेव अलौकिकत्वे सत्यनिष्टसाधनत्वात्। स्वर्गादेरपि हि मुमुक्ष्वपेक्षया निरयत्वम्एते वै निरयास्तात स्थानस्य परमात्मनः म.भा.12।198।11 इत्यादिभिः प्रतिपादितमिति भावः।बुद्धियुक्तः इत्यस्ययोगाय इत्यस्य च भिन्नार्थपरत्वव्युदासायाह तस्मादुक्ताय बुद्धियोगायेति। युज्यस्व सन्नह्यस्व उद्युक्तो भवेत्यर्थः।समत्वं योग उच्यते 2।48 इतिवद्योगशब्दव्याख्याभ्रमनिरासायाह कर्मस्विति। कौशलशब्दस्य तात्पर्यं वक्तुं वाच्यं तावदाह अतिसामर्थ्यमिति। बुद्धियोगस्य कर्मसामर्थ्यात्मकत्वं कथं इत्यत्राह अतिसामर्थ्यसाध्य इत्यर्थ इति। कार्ये कारणशब्द उपचरितः। अनेन श्लोकेन बन्धकसुकृतदुष्कृतहानमुक्तम्।अथ तत्फलभूतबन्धनिवृत्तिपूर्वकामृतत्वप्राप्तिपरस्यकर्मजं इति श्लोकस्य हेतुफलभावक्रमेण अन्वयमाह बुद्धियोगयुक्ता इति। कर्मजं फलं सांसारिकम्। जन्मबन्धो जन्मनो बन्धः स्वच्छन्दत्वहानिः अथवा जन्मैव बन्ध इति कर्मधारयः। अनामयं पदं स्थानविशेषो वा परमप्राप्यं परमात्मस्वरूपं वा प्रकरणवशादत्र ब्रह्मपर्यन्तजीवस्वरूपं वा पद्यते गम्यत इति पदम् त्रयमपि हि साक्षादन्यथा वा मुक्तप्राप्यत्वात्पदशब्दवाच्यम्।हिशब्दस्यात्र हेतुत्वादिपरत्वासम्भवात् प्रसिद्धिपरत्वम्। प्रसिद्धिस्थलं चाह प्रसिद्धं ह्येतत्वसर्वास्विति। एवमुक्तप्रकारो हेयोपादेयविभागो युक्त्यागमनिरपेक्षं तवैव स्पष्टो भविष्यतीति चमत्कारार्थमुच्यते।यदा इति श्लोकेन मोहतरणहेतुं प्रकृतं दर्शयति उक्तेति। पुण्यपापरूपसांसारिककर्मणा हि मोहः स च फलाभिसन्ध्यादिरहितकर्मणा निवर्त्यः। ततः कारणाभावात्कार्याभाव इति भावः।अत्यल्पफलसङ्गहेतुभूतमित्यनेन मोहस्येदानीं निर्वेदप्रतिबन्धकत्वमुच्यते। मोहस्वरूपातिरिक्तस्य तत्साध्यस्य कालुष्यस्याभावात्मोहरूपमित्युक्तम्।कलुषशब्दोऽत्र कालुष्यपरः।अस्मत्त इति आप्ततमेभ्य इति भावः।त्याज्यतयेति निर्वेदयोगत्वायोक्तम्। न हि श्रोतव्येषु श्रुतेषु च उपादेयांशो निर्वेदहेतुः। यद्वाश्रोतव्यस्य इत्यस्योपादेयत्वायश्रुतस्य इत्यत्र त्याज्यतयेति विशेषणम्। हेयसङ्गमुपादेयवैतृष्ण्यं च परामृश्य भवति हि निर्वेदः। स च स्वावज्ञारूपः। यथाहुर्गन्धर्ववेदिनः तत्त्वज्ञानापदीर्ष्यादेर्निर्वेदः स्वावमाननम् द.रू.4।9 इति। श्रोतव्यस्येत्यादेः सम्बन्धसामान्यषष्ठ्या विवक्षितविशेषकथनं कृत इति।स्वयमेवेति। अस्मद्वाक्यादिनिरपेक्ष इत्यर्थः।गन्तासि इत्यत्र पदभेदभ्रमं निरस्यति गमिष्यसीति।गन्तासि इत्यत्र द्वितीयान्वयात्तृजन्तत्वं न युज्यते। तृन्नन्तत्वे तु भविष्यत्त्वविवक्षा न स्वारसिकी। अतो लु़डन्ततयैकपद्यं युक्तम्। एवंजेतासि इति वक्ष्यमाणेऽपि। अनद्यतनविहितलुडन्तोऽपिशब्दोव्यतितरिष्यति इत्येतत्तुल्यतया भविष्यन्मात्रार्थेन व्याख्यात इति।नित्यात्मासङ्गकर्मेहागोचरा साङ्ख्ययोगधीः। द्वितीये स्थितधीलक्षा प्रोक्ता तन्मोहशान्तये गी.सं.6 इति सङ्ग्रहश्लोकमनुसन्दधानो ज्ञानयोगाभिधानोपक्रमभूतमुत्तरश्लोकमवतारयति योगे त्विति। बुद्धिविशेषोव्यवसायात्मिका 2।41 इत्यादिना पूर्वोक्तः।लक्षभूतं उद्देश्यभूतमित्यर्थः।श्रुतिविप्रतिपन्ना इत्यस्य प्रकृतानुपयुक्ताप्रकृतवैदिकवाक्यविरोधार्थताभ्रमंश्रोतव्यस्य श्रुतस्य च इति प्रकृतानुरोधेन व्युदस्यति श्रुतिः श्रवणमित्यादिना।अस्मत्त इति सार्वज्ञसर्वशक्तिपरमकारुण्यादिभिरनाघ्रातभ्रमविप्रलम्भप्रमादादिदोषगन्धात् अव्याजबन्धोरीश्वरादिति भावः। विशब्दस्य विरुद्धार्थताव्युदासाय वैशिष्ट्यार्थतामीश्वराच्छ्रवणेनसिद्धां दर्शयति विशेषत इति। स्थास्यतीति स्थायित्वं ह्युक्तम् विशेषं पूर्वोक्तं व्यनक्ति सकलेतरेति।अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धियाम् सि.त्र. इति भावः। निश्चलाचलशब्दयोः पौनरुक्त्यपरिहारायोक्तंस्वयमित्यादि। उद्देश्यान्तर्गतमचलत्वम् निश्चलत्वं तु तत्र विधेयो विशेष इति स्वयंशब्दस्य भावः। एकरूपार्थविषयत्वादेकरूपा विषयान्तरसञ्चाररहिता चेत्यर्थः। अथवाश्रुतिविप्रतिपन्ना इति श्रवणस्योक्तत्वान्मननस्थिरीकृतत्वं कुतर्कैरकम्पनीयत्वं च पदाभ्यां विवक्षितम्। यद्वा पूर्वोक्तबहुशाखत्वानन्तत्वनिषेधपरोऽचलशब्द इत्यभिप्रायेणोक्तम् एकरूपेति। समाधीयते अस्मिन्नात्मज्ञानमिति समाधिर्मन इति निर्वचनेन तैलधारावदविच्छिन्नस्मृतिहेतुतामभिप्रयतोक्तंअसङ्गेत्यादि। योगशब्दस्यात्र ज्ञानयोगरूपनिश्चलबुद्धिसाध्यफलविषयत्वात्आत्मावलोकनमित्युक्तम्।समाधिशब्दस्यात्र बुद्धिविशेषपरत्वे पुनरुक्त्यादिः तत्कालपरत्वे तु लक्षणा च स्यादिति भावः।योगः सन्नहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु अमरः3।3।179 इत्यादिभिरनेकार्थतया प्रसिद्धोऽयं शब्दस्तत्तद्वाक्यानुकूलमनुसन्धेयः। ननूपायतया हि योगो विहितः स कथं फलतयाऽत्र निर्दिश्यते आत्मज्ञानपूर्वकस्य च कर्मयोगस्यात्मज्ञानमेव साध्यं चेदात्माश्रयादिदोषः श्रवणमननाभ्यां स्थितप्रज्ञस्य ह्यनुष्ठानम् तथा च कथमनुष्ठानसाध्या स्थितप्रज्ञता निश्चलप्रज्ञास्थितिमन्तरेण च कोऽसावपरस्तदापाद्यो योग इत्यत्राह एतदुक्तमिति। तत्र प्रथमचोद्यंकर्मयोगशब्देनयोगाख्यमात्मावलोकनमित्यनेन च परिहृतम्। शास्त्रजन्यात्मज्ञानात्मावलोकनशब्दाभ्यां आत्माश्रयादिनिरासः। आत्मज्ञानज्ञाननिष्ठाशब्दाभ्यां श्रवणमात्रसिद्धतत्त्वनिश्चयज्ञानयोगविषयाभ्यां तृतीयस्य परिहारः। चतुर्थोऽप्युक्तप्रकारेण साक्षात्कारतद्धेतुस्मृतिसन्ततिभेदात् परिहृतः। प्रथमं शास्त्रतस्तत्त्वज्ञानम् ततः स्मृतिसन्ततिरूपमुपासनम् ततस्तन्मूलसाक्षात्कार इति ज्ञानपर्वभेदः प्रदर्शितः।प्रश्नरूपस्योत्तरश्लोकस्यावतारं तत्र पूर्वोत्तरार्धयोः क्रमान्निष्कृष्टप्रश्नार्थं चाह एवमिति। पूर्वार्धस्याभिप्रेतं वक्तुमन्वयं तावदाह समाधीति। समाधिरत्र पूर्वनिरुक्तप्रकारं मनः। तत्र स्थितिः तद्वशीकरणेनावस्थानम्।किं प्रभाषेत इत्यनेन पुनरुक्तिपरिहारायस्थितप्रज्ञस्य का भाषा इत्यत्र कर्तृतयाऽन्वयशङ्कामपाकरोति को वाचकः शब्द इति। ननुस्थितप्रज्ञः इत्येव वाचके सिद्धे किं वाचकान्तरं पृच्छ्यते किं चात्र वाचकप्रश्नस्य प्रयोजनं इत्यत्राह तस्येति। केनचिद्वाचकेन हि कस्यचित्प्रकारभूतप्रवृत्तिनिमित्तविशिष्टं स्वरूपं निर्देष्टव्यमिति भावः। स्थितप्रज्ञशब्दात् स्थितधीशब्दस्यार्थान्तरपरत्वभ्रमनिरासायस्थितप्रज्ञः इति पूर्वार्धोक्तशब्द एवात्रावर्तितः।किञ्च भाषणादिकमितिकिं प्रभाषेत इत्यादयः किंशब्दाः क्रियाविशेषणतयाऽन्वीयमानाः क्रियाप्रकारप्रश्नपरा इति भावः।किं प्रभाषेत इति वाचिकेकिं व्रजेत इति कायिके च पृष्टेकिमासीत इति मानसपरम् ध्यानार्थत्वादत्रासनस्य।एवं करणत्रयानुष्ठानप्रकारप्रश्नस्य साक्षादुत्तरेषुप्रजहाति इत्यादिषु चतुर्षु श्लोकेषु प्रथमस्य स्वरूपप्रश्नोत्तरतामिति दर्शयति वृत्तिविशेषेति। प्रकृष्टानुकूल्ययोगिन्यात्मनि प्रीतिरूपस्य तोषस्य कामान्तरप्रहाणहेतुत्वात्तथान्वयमाह आत्मन्येवेति। सर्वशब्दस्यआत्मनि तुष्टः इत्येतत्सन्निधानसिद्धं सङ्कोचमाह तद्व्यतिरिक्तानिति। यद्वाआत्मन्येवात्मना तुष्टः इति यथाक्रममेवान्वयः आत्मैकविषयेण हि मनसाऽन्यतो जातालम्बुद्धिरूपसन्तोष इत्यर्थः। एतदभिप्रायेणोक्तंमनसाऽऽत्मैकावलम्बनेन तुष्ट इति।तेन तोषेणेति।स त्वासक्तमतिः कृष्णे दृश्यमानो महोरगैः। न विवेदात्मनो गात्रं तत्स्मृत्याह्लादसंस्थितः वि.पु.1।17।39 इतिवत्।प्रकर्षेणेति अपुनरङ्कुरमित्यर्थः। स्थितप्रज्ञविषयश्लोकचतुष्टयं तदवस्थाचतुष्टयविषयमिति मन्वानश्चतुर्थीयमवस्थेत्याह ज्ञाननिष्ठाकाष्ठेयमिति। उक्तं चहैरण्यगर्भैः दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् पा.यो.1।15 इति। ऐहिकामुष्मिकसकलफलविमुखस्य यस्तेषु फलेषु सवासनरागत्यागः सा वशीकरणसंज्ञेत्युच्यत इत्यर्थः।अथैकेन्द्रियसंज्ञाख्यतृतीयावस्थोच्यत इत्याह ततोऽर्वाचीनेति।ओ विजी भयचलनयोः इति धातुरत्र चलनार्थःवीतरागभयं इति भयस्य पृथगभिधानात्। यद्वाअनुद्विग्न ৷৷. इति निर्दुःखत्वमात्रं विवक्षितम्। तत एवदुःखेषु इत्येतदपि दुःखहेतुपरमिति मन्वान आह दुःखनिमित्तेष्विति। आदिशब्देनाप्रियागमनसङ्ग्रहः। भयहेतुव्यावृत्त्यर्थमुक्तं उपस्थितेष्विति दुःखोत्पादनप्रवृत्तेष्वित्यर्थः। दुःखशब्दवदेवात्र सुखशब्दस्यापि हेतुपरतां तत्रापि पृथङ्निर्दिष्टरागविषयाद्विलक्षणतां चाह प्रियेषु सन्निहितेष्वपीति। विगतस्पृहवीतरागशब्दयोरपुनरुक्तितां व्यनक्ति अनागतेषु स्पृहा राग इति। स्पृहारागशब्दौ सामान्यविशेषविषयौ। ततश्च विशेषशब्दसन्निधाने गोबलीवर्दन्यायात् सामान्यशब्दस्तद्व्यतिरिक्तपर इति भावः। पुनरुक्तिपरिहाराय भयस्य दुःखविशेषतामाह प्रियेत्यादिनाहेतुदर्शननिमित्तं दुःखमित्यन्तेन। प्रियविश्लेषाप्रियागमनयोर्दुखरूपयोः सामग्रीदशामापन्नो यो हेतुः सूचकश्च निमित्तादिकः तस्य यद्दर्शनं सकलसहकारिसम्पत्त्युत्प्रेक्षागर्भम् दर्शनमिति ज्ञानमात्रपरं वा तेन यद्दुःखं तदानीमेवाङ्गकम्पादिहेतुरुत्पद्यते तद्भयमित्यर्थः। क्रोधलक्षणे प्रियविश्लेषादिस्त्रैकालिकः सर्वत्र क्रोधोत्पत्तिदर्शनात्। अचेतनेषु वातातपकण्टकादिषु बाधकेष्वपि क्रोधाभावात्चेतनेत्युक्तम्। यस्तून्मत्तस्तत्रापि कुप्यति सोऽपि चेतनत्वाध्यासेन।अन्तरशब्देन स्वदुःखहेतुस्वमनोविकारव्यावर्तनम्। स हि तथाविधो निर्वेदादिरूपः स्यात्। क्रोधादात्महननाद्यपि परपीडाभिसन्धिगर्भम्। मनोविकारोऽत्र रजस्तमस्समुन्मेषकृतो व्यापारविशेषः। तदधीनो ज्ञानविशेष इह तच्छब्देनोपचर्यते। मुनिर्मननशील इति व्युत्पत्तिः तस्य मननस्यात्र साक्षात्करिष्यमाणात्मविषयत्वव्यक्त्यर्थमुक्तम् आत्ममननशील इति। एवमस्यास्तृतीयावस्थाया उद्वेगस्पृहादिविरहसाम्येऽपि औत्सुक्यमात्रक्षमवासनाशेषस्य भस्मच्छन्नदहनवदवस्थितत्वाच्च चतुर्थावस्थातो विशेषः।अथ व्यतिरेकसंज्ञाख्या द्वितीया दशोच्यते इत्याह ततोऽर्वाचीनदशेति। अप्रियेषु स्नेहप्रसङ्गाभावात् प्रियमात्रविषयःसर्वत्र इतिशब्द इति दर्शयति प्रियेष्विति। अभिस्नेहस्य प्रवृत्तिपर्यन्ततया तदभावोऽत्र तद्विशेषोपादानवृत्तिराहित्यपर्यन्त इत्याह उदासीन इति। एतेनप्रियेत्यादिना च व्यतिरेकसंज्ञात्वं व्यनक्ति। अपक्वान् कषायान् पक्वेभ्यः पृथगनुसन्धाय तेषामपि पाकापादनदशा हिव्यतिरेकसंज्ञा। तत्र स्वयम्प्रियेषु प्रवृत्तिरहितो दैवागतप्रियसंश्लेषविश्लेषयोश्चाभिनन्दनादिरहित इत्युक्ते पक्वेतरेषां रागादीनां पाकाभिलाषेण मनोव्यापारविशेषनिवारणमुक्तं स्यात्। अभिनन्दनं चात्राभितो नन्दनम् अनुबन्धिषु कालान्तरेषु च प्रीत्यनुवृत्तिहेतुभूतनन्दनमित्यर्थः। एवं द्वेषेऽपि।अथ यतमानसंज्ञाख्या प्रथमा दशोच्यते इत्याह ततोऽर्वाचीनदशेति। प्रसक्तप्रतिषेधार्थमाह स्प्रष्टुमुद्युक्तानीति। तेन वार्धकरोगादिप्रयुक्ताशक्तिसुषुप्त्यादिकृतनिवृत्तिव्यवच्छेदः।तदैवेति भोगानन्तरनिवृत्तिव्युदासः।कूर्मोऽङ्गानीव इत्यनेनेन्द्रियाणां सङ्कल्पविशेषमात्रनियाम्यत्वमुच्यते।सर्वश इति विलोकनभाषणविलासपरिहासादिनिवृत्तिपरः विषयदोषदर्शनादिहेतुप्रकारपरो वा।प्रतिसंहृत्य इत्यनेनेन्द्रियनिरोधस्यात्ममननाङ्गता दर्शिता। अत्र च ज्ञाननिष्ठावस्थाविशेषप्रकरणे सुषुप्त्यादिविलक्षणव्यापारोपरतिः तत्साध्यात्मगोचरमनोवस्थापनपर्यन्ता विवक्षितेत्याह मन आत्मनीति।किमर्थमिदमवस्थाचतुष्टयं विभज्योपदिश्यत इत्याह आह एवमिति। प्रथमं बाह्येन्द्रियाणि विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य मन आत्मनि व्यवस्थापयितुं यतेत इयंयतमानसंज्ञा। अथ बलात्संहृतान्यपि बाह्येन्द्रियाणि सावशेषरागद्वेषादिदोषकलुषितं मनः पुनः पुनरवसरे प्रेरयेत् स्वयं चात्मनि स्थातुं न शक्नुयात् अतः पक्वावशिष्टरागद्वेषादीनौदासीन्यानभिनन्दनादिक्रमेण पचेत् इयंव्यतिरेकसंज्ञा। ततः पक्वेऽपि दोषशेषे अनादिविषयानुभवभावितवासनामात्रमात्मानमनुबुभूषन्तीं शेमुषीं प्रति बिभत्सेत् तत्र निरतिशयानन्दरूपमात्मानं पुरुषद्वेषिण्या योषित इव युवानं प्रदर्श्यप्रदर्श्य क्रमादात्मनि तोषं समुत्पाद्य तेन तोषविशेषेण दवीयसा च स्मृतिविधुरेण कालेन बाह्यविषयवासनाजालमुन्मूलयितुमीहेत सेयंएकेन्द्रियसंज्ञा। या पुनः समस्तवासनाविलयादौत्सुक्यमात्रस्याप्यसम्भवेन परमवैराग्यदशा सावशीकारसंज्ञा। ज्ञाननिष्ठाकाष्ठा योगाख्यमात्मावलोकनं साधयति। तच्चावलोकनं परम्परया निरतिशयपुरुषार्थभूतामृतत्वाय कल्पत इति दर्शितं भवति। कामानां तथात्वेनादर्शनं तथा दृश्यमानेष्वपि निस्सङ्गतासङ्गलेशेन भुज्यमानेष्वपि नातिस्नेहः प्रचुरेऽपि रागे तन्निरोधसंरम्भ इति चावस्थावैषम्यम् आत्मरतित्वं तस्य स्वरूपम्आश्चर्यवद्वदति 2।29 इति तस्य तदेकभाषणं तदनुसन्धानरूपं तदासनं तत्प्राप्त्यर्थप्रवृत्तिरूपं तस्य व्रजनं चेति प्रश्नचतुष्कोत्तरं सिद्धम्।अथोत्तरप्रकरणं पूर्वेण पृथगर्थं प्रदर्श्य सङ्गमयन्नवतारयति इदानीमिति। ज्ञाननिष्ठायाश्चतुर्विधाया अपीति शेषः।निराहारस्य इत्यनेन भोजननिषेधभ्रमं व्युदस्यति इन्द्रियाणामित्यादिना।न चैकान्तमनश्नतः 6।16युक्ताहारविहारस्य 6।17 इति हि वक्ष्यते। अन्यत्रापिअत्याशनादतीपानात् तै.ना.1।34 इति ह्युच्यते। मोक्षधर्मे चदशैतानीन्द्रियोक्तानि द्वाराण्याहारसिद्धये म.भा.शां.मो. इति सर्वेन्द्रियविषयाणामाहारशब्देन ग्रहणं दृष्टम् न च प्रसिद्धाहारनिषेधमात्रादशेषविषयनिवृत्तिः तस्य कतिपयेन्द्रियविषयत्वादिति भावः।रसवर्जं इत्येतावति वाक्यतात्पर्यमिति द्योतनाय विनिवर्तमाना इत्यनूदितम्। आत्मगोचररागव्यवच्छेदायाह विषयराग इति। प्रस्तुता एव विषयाः परमिति निर्देशस्यावधित्वमर्हन्तीतिविषयेभ्य इत्युक्तम्। कालादिकृतपरत्वमात्रस्यानुपयुक्तत्वाद्विषयरागनिवर्तनौपयिकं परशब्दार्थमाह सुखतरमिति। विषया हि सुखरूपाः आत्मत्वरूपं तु ततोऽप्यतिशयेन सुखरूपम्। अत्रदृष्ट्वा निवर्तते इति दर्शनस्य रागकर्तृकतया निर्देश औपचारिकः। यद्वा दृष्ट्वा स्थितस्यास्य देहिनो रागो निवर्तत इत्यन्वयः। एवमात्मदर्शनेन विना विषयरागो न निवर्तत इत्युक्तम्।अथानिवृत्ते विषयरागे दुर्जयानीन्द्रियाणीत्युच्यते यततः इति श्लोकेन। विपश्चित्त्वं यतमानत्वे हेतुरिति द्योतनायोक्तंविपश्चितो यतमानस्यापीति। अत्र विपश्चित्त्वं शास्त्रजन्यहेयोपादेयविवेकत्वम्। बलवतां प्रमाथित्वं हिबलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति मनुः2।215 इति स्मर्यते इति ज्ञापनायबलवन्तीत्युक्तम्। इन्द्रियाणां बलं च रागादिरेव। उक्तश्लोकद्वयतात्पर्यसिद्धमन्योन्याश्रयणं तत्फलं चाह एवमिति।तर्ह्यन्योन्याश्रयदूषितेऽर्थे साध्यसाधनभावः कथं पूर्वमुपदिष्टः इत्यत्रोच्यतेतानि सर्वाणि इति।अस्येति अन्योन्याश्रयादिदोषस्येत्यर्थः।संयम्येति। विषयस्पर्शनिवारणमात्रमत्रोच्यते न त्विन्द्रियजयावस्था।मत्परः इत्यत्र वक्तृविग्रहवैशिष्ट्यविवक्षया सिद्धं शुभाश्रयविग्रहविशेषवत्त्वंचेतस इत्यादिना विवृतम्। शुभशब्देन हिरण्यगर्भादेः आश्रयशब्देन परिशुद्धात्मस्वरूपस्य च व्यवच्छेदः। युक्तशब्देनात्र विषयस्वभावात्सुकरं चित्तसमाधानं विवक्षितमित्याह समाहित इति।मत्परः इत्येतावता कथमन्योन्याश्रयादिपरिहार इत्यत्राह मनसीति। अत्राशेषशब्देनोपायविरोधिसर्वकर्मसङ्ग्रहः। निर्मलीकृतं रजस्तमोविरहितं तत एव हि शब्दादिविषयानुरागरहितम्। अत्र प्रज्ञाशब्दस्य ज्ञाननिष्ठाफलपर्यन्तत्वमात्मदर्शनशब्देनोक्तम्। शुभाश्रयानुसन्धानस्य कल्मषविनाशकत्वे स्मृत्यन्तरसंवादमाह यथेति। आत्मदर्शनमन्तरेणैव इन्द्रियजयसिद्धेर्नान्योन्याश्रयः। अतः पूर्वोक्तसाध्यसाधनभावोपपत्तिरित्युत्तरार्धेनोच्यत इत्याह तदाहेति।उक्तान्योन्याश्रयणफलभूताया इन्द्रियजयात्मदर्शनयोरसिद्धेः प्रकारः श्लोकद्वयेन प्रपञ्च्यत इत्याह एवमिति। अदृष्टात्मस्वरूपस्य विषयान् ध्यायत इत्यनुवादसिद्धां विषयेषु स्वरसवाहितां सहेतुकामाह अनिरस्तेति। अत्र संयम्येति निमीलनादिमात्रकृतं निवारणमुच्यते। उपजायत इत्यत्रोपसर्गाभिप्रेतं विविच्य दर्शयति अतिप्रवृद्धो जायत इति। सङ्गकामयोरभेदात्कार्यकारणभावानुपपत्तिरित्यत्राह कामो नामेति। विपाकदशाशब्देन सामान्यत उक्तेऽपि व्यावृत्ताकारप्रतिपत्तिर्न स्यादिति तल्लक्षणमाह पुरुष इति। सर्वदा कामस्य क्रोधहेतुत्वं नास्तीत्यत उक्तंविषये चासन्निहित इति। न केवलं कामप्रतिबन्धकानेव पुरुषान् प्रति क्रोधः अपितु कृत्याकृत्यविवेकान्धतया तस्यां दशायामुपलभ्यमानान् सर्वान् प्रत्यपीति द्योतनायसन्निहितानित्युक्तम्। ईश्वरोऽपि हि क्रोधवेगमभिनयन कस्मिंश्चिदेव रक्षसि द्रुह्यतिसदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं जगत्सशैलं परिवर्तयाम्यहम् वा.रा.3।64।76 इत्याह। अयं चाभिजायत इत्यत्रोपसर्गाभिप्रेतार्थः अभितो जायत इत्यर्थः। समित्येकीकारे ततोऽत्र सम्मोहः कृत्याकृत्याविवेकात्मा मोह इत्यभिप्रायेणाह कृत्येति। सम्मोहस्य स्मृतिभ्रंशहेतुत्वेऽवान्तरव्यापारमाह तयेति।कुद्धः पापं न कुर्यात्कः क्रुद्धो हन्याद्गुरूनपि म.भा.3 इत्याद्यनुसारेणोक्तंसर्वमिति।ततश्चेति। सावान्तरव्यापारात्सम्मोहादित्यर्थः। स्मर्तव्ये प्रस्तुतविषये स्मृतिभ्रंशं योजयति प्रारब्ध इति। स्मृतिभ्रंशादित्युत्तरवाक्यश्रृङ्खलावशात् स्मृतिविभ्रमशब्दस्य तदेकार्थत्वायोक्तंस्मृतिभ्रंशो भवतीति। बुद्धिनाश इत्यत्र प्रकृतं बुद्धेर्विशेषमाह आत्मेति। न तावदिह सामान्यतो ज्ञानमात्रं बुद्धिशब्दार्थः न चेतःपूर्वमात्मदर्शनं सिद्धम् न च भविष्यदात्मदर्शनादिकमिदानीं नाशयोग्यम्। अतस्तल्लिप्सया कृतस्तदुपायानुष्ठानाध्यवसाय इहोपायस्मृतिसाध्यो बुद्धिशब्देनोच्यत इति भावः। प्रणश्यतीत्यत्र नित्यस्यात्मनो नाशो ह्यसत्समत्वम्। तच्च यथावस्थिताकारानुपलम्भः। स च देहात्मभ्रमादिकृतः तत्रापि हेतुर्देहसम्बन्ध इत्यभिप्रायेणोक्तं संसारे निमग्न इति।अथ तानि सर्वाणीत्युक्तार्थकरणेऽन्योन्याश्रयपरिहारप्रकारः प्रयोजनभूतसंसारनिवृत्तिश्च श्लोकद्वयेन प्रपञ्च्यते रागद्वेषेति। रागद्वेषवियोगो हि कुतः इत्यत्र पूर्वोक्त एव हेतुरित्यभिप्रायेणाह उक्तेनेति। रागद्वेषवियोगोऽत्र इन्द्रियाणामात्मवश्यताहेतुः विषायंश्चरन्नित्यनेन विषयभोगभ्रमव्युदासाय आत्मवश्यत्वफलितमाह विषयांस्तिरस्कृत्य वर्तमान इति। चरतिरत्र गत्यर्थः आक्रमणरूप गतिपरः भक्षणार्थो वा संहारपर इत्युभयथाऽपि तत्तिरस्कारार्थत्वमत्र विवक्षितम्। तिरस्कारोऽत्रानादरः तथाच नैघण्टुकाः अनादरः परिभवः परीभावस्तिरस्क्रिया अमरः1।7।22 इति। बाह्येन्द्रियतद्विषयविजयो हि मनोविजयार्थ इत्यभिप्रायेणाह विधेयमना इति। विधेयात्मेति मनसः प्रसक्तत्वात्प्रसन्नचेतसः इति वक्ष्यमाणत्वाच्च। प्रसादोऽत्र मनोनैर्मल्यमित्याह निर्मलेति।प्रसादे इति श्लोके प्रसादहानिशब्दयोः क्रमात् षष्ठीद्वयान्वयभ्रमं व्युदस्यन्नन्वयप्रकारमाह अस्येति।दुःखाज्ञानमला धर्माः प्रकृतेस्ते न चात्मनः वि.पु.6।7।22 इत्याद्यभिप्रेतौपाधिकत्वेन हानियोग्यत्वार्थमाह प्रकृतीति। प्रतिबन्धकाभावे ह्याशु कार्योत्पत्तिरित्यभिप्रायेण प्रसन्नचेतस इत्यस्यार्थमाह आत्मावलोकनविरोधिदोषरहितमनस इति। मनःप्रसादस्य सर्वदुःखहानिहेतुत्वमात्मदर्शनहेतुत्वादुपपद्यत इति हेत्वर्थस्यहिशब्दस्यार्थमाह अत इति।अथ पूर्वोक्तान्योन्याश्रयफलभूतामात्मदर्शनासिद्धिंबुद्धिनाशात्प्रणश्यति 2।63 इत्येतद्विवरणरूपेणानूद्य ततः परमप्रयोजनस्यापि अलाभप्रकार उच्यते नास्तीति।युक्त आसीत मत्परः 2।61 इति पूर्वोक्तस्य निवृत्तिरयुक्तशब्देनोच्यत इति तात्पर्येणाह मयीति।यततो ह्यपि 2।60 इति पूर्वोक्तं स्मारयति स्वयत्नेनेति। नास्तीत्यनेनाभिप्रेतमाह कदाचिदपीत्यादिना। अतिचिरकालप्रयासेनापीत्यर्थः। द्वितीयपादस्थमयुक्तस्येति पदं श्रृङ्खलौचित्यायायुक्तत्वफलभूतबुद्ध्यभावलक्षकमिति तात्पर्येणाह अत एवेति। यद्वा तस्येत्ययुक्तपरामर्शः। अत एवेति तु बुद्ध्यभावादेवेत्यर्थः। अथवा परम्परया हेतुत्वमभिप्रेत्यायुक्तत्वादेवेति विवक्षा भिन्नविषयभावनान्तरनिषेधायोगात्तद्भावनेत्युक्तम्।रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 2।59रागद्वेषवियुक्तैस्तु 2।34सुखेषु विगतस्पृहः 2।56 इत्याद्यानुगुण्यन शान्ति विशिनष्टि विषयस्पृहा शान्तिरिति। अशान्तस्यैव स्वर्गादिसुखलाभादमृतत्वप्रकरणसिद्धं सुखस्य विशेषमाह नित्यनिरतिशयेति।अनेन श्लोकेन प्रत्याहारादियोगावयवचतुष्टयस्य तत्फलस्य निश्श्रेयसस्य च यथासम्भवमभिधातात्पर्याभ्यां पूर्वपूर्वाभावादुत्तरोत्तरस्यालाभः सूचितो भवति। अथेन्द्रियनिग्रहाभावे बुद्ध्यभावस्य पूर्वोक्तस्य प्रकारःइन्द्रियाणाम् इत्यनन्तर श्लोकेनोच्यत इत्यपुनरुक्तिः आदरार्थं वा पुनरुक्तिरित्यभिप्रायेणाह पुनरपीति। केवलस्पन्दादिमात्रव्युदासायविषयेष्वित्युक्तम्। इन्द्रियाणां सर्वेषां न विषयेषु सञ्चारोऽस्ति अतस्तदौन्मुख्यमर्थ इति व्यञ्जनायइन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते 5।9 इति प्रयोगान्तरानुसारेणवर्तमानानामित्युक्तम्। यत्तच्छब्दयोर्मनोविषयत्वमेवोचितं प्रज्ञाहरणे तस्यैव प्रधानत्वात् मनसो बाह्येन्द्रियानुविधाने सर्वेन्द्रियसाधारण्येन वक्तव्ये यदिति निर्धारणस्य प्रयोजनाभावात् बाह्येन्द्रियस्य मनोनुविधाने प्रज्ञाहरणाभावाच्च।यद्येकं क्षरतीन्द्रियम् इति मनुवचने 2।99 तु मनसोऽनुक्तत्वादिन्द्रियशब्दाभ्यासात् एकशब्दबलाच्च निर्धारणार्थतैव। न च तत्तुल्यत्वमस्यापि वाक्यस्य निर्बन्धनीयमिति कृत्वावर्तनमनु यन्मन इत्याद्युक्तम्।विधीयते इत्यस्य कर्त्रपेक्षां पूरयति पुरुषेणेति। स्वस्यैवायमविनय इति भावः। अनभिसंहितदेशप्रापणं हि दृष्टान्तेऽभिप्रेतमिति प्रदर्शयन् हरतेर्विनाशनार्थताभ्रमव्युदासाय चाह विषयप्रवणामिति।अम्भसि इत्यस्य हरतिनाऽन्वयभ्रान्तिमपाकरोति अम्भसि नीयमानामिति। अनिष्टविषयप्रापणनिदर्शनत्वायोक्तं प्रतिकूल इति।यदा संहरते 2।58 इत्याद्युपक्रान्त इन्द्रियनिग्रहोपदेश उपसंह्रियते तस्मादिति श्लोकेन।तस्मादिति इन्द्रियानुविधायिनो मनसः प्रज्ञाप्रतिष्ठाविरोधित्वादित्यर्थः। निग्रहहेतुं प्रागुक्तमनुकर्षति उक्तेनेत्यादिना।एवमुपायमुपदिश्य फलमुपदिशतीत्याह एवमिति। प्रागुक्तस्यैव फलस्य प्रशंसापरत्वादपुनरुक्तिः अतोया निशा इत्यादिभिः त्रिभिः श्लोकैःप्रजहाति 2।55 इत्यादिनोक्ताऽवस्थाचतुष्टयसिद्धिर्निगम्यते।विहाय कामान् 2।71निःस्पृहः 6।18 इत्युभाभ्यां यतमानव्यतिरेकसंज्ञयोरुपलक्षणम्। यद्वा श्लोकद्वयेनावस्थाचतुष्टयफलं तृतीयेन त्ववस्थाचतुष्टयं निगम्यत इति विभागः।या इति प्रसिद्धतयेष्टनिर्देशोऽत्र प्रस्तुतप्रज्ञाविषयः। साक्षान्निशाया देशकालभेदेन विपरिवर्तमानायाः सर्वभूतसाधारण्याभावादिति तात्पर्येणाह या आत्मविषयेति। उपचारनिमित्तं व्यनक्ति निशेवाप्रकाशेति। स्वप्रकाशाया अपि बुद्धेरप्रसृतदशायामप्रकाशत्वमुपपद्यते। इन्द्रियनिग्रहस्य प्रकृतत्वात्स एवात्र संयमिशब्दार्थ इत्यभिप्रायेणोक्तम् इन्द्रियसंयमीति। या पुनःत्रयमेकत्र संयमः इति धारणाध्यानसमाधीनां समुच्चितानां संयमत्वेन पातञ्जलपरिभाषा साऽत्र न विवक्षितेति भावः। इन्द्रियसंयमस्य बुद्धिजनने अवान्तरव्यापारं पूर्वोक्तमाह प्रसन्नमना इति। जागर्तीत्यत्र मुख्यार्थायोगादाह आत्मानमिति। बुद्धौ जागरणशब्दनिर्दिष्टं प्रबुद्धत्वं प्रकाशमानप्रसृतबुद्धिविशिष्टत्वमेव सा च सविषया प्रकाशते इति भावः। बुद्धिप्रकरणत्वाद्यस्यामिति निर्देशोऽपि बुद्धिविषयः सा च बुद्धिः भूतानीत्यसंयमिनिष्ठतया व्यपदेशादात्मदर्शिनो निशात्ववचनाच्चशब्दादिविषयेत्युक्तम्।सर्वभूतानामित्यत्र समासनिमग्नोऽपि सर्वशब्दो भूतानीत्यत्रापि बुद्ध्या निष्कृष्यान्वेतव्य इतिसर्वाणीत्युक्तम्।पश्यत इत्यत्र कर्माकाङ्क्षायांआत्मानमिति प्रकरणसिद्धमुक्तम्।एवं शब्दाद्यदर्शिनः पर्यवसितात्मदर्शनमयी सिद्धिरुक्ता एतस्या एव सिद्धेरर्वाचीनामदूरविप्रकृष्टां शब्दादिविषयदर्शनेऽप्यविकारतारूपामवस्थामाह आपूर्यमाणमिति। अत्र प्रवेशाप्रवेशयोरविशेषोपलम्भस्य विवक्षितत्वात्आपूर्णमाणमिति न प्रविशन्तीभिर्नादेयीभिरद्भिरापूरणं विवक्षितम् अपितु दार्ष्टान्तिके विवक्षितायाः स्वात्मावलोकनतृप्तेः प्रतिनिर्देशः क्रियते इति दर्शयति स्वेनैवेति। अचलप्रतिष्ठशब्दोऽत्र सीमातिलङ्घनादिहेतुभूतवृद्धिह्रासराहित्यपर इत्याह एकरूपमिति। नादेया इत्यनेन समुद्रप्रयत्ननिरपेक्षं स्वतस्समुद्रप्रावण्यं सूच्यते। दृष्टान्ते निर्मथितार्थमाह आसामिति। कामा इत्यत्र कर्मणि व्युत्पत्तिमभिप्रेत्याह शब्दादयो विषया इति। अविकारतासिद्ध्यर्थं यच्छब्दस्य पूर्वोक्तसंयमित्वाभिप्रायतामाह यं संयमिनमिति। रूपादिविषयाणां पुरुषे प्रवेशो नान्नपानादिवच्छरीरान्तःप्रवेशः अतः तत्तदिन्द्रियद्वारा ज्ञानविषयत्वमेव विवक्षितमित्यभिप्रायेणाह इन्द्रियेति। यस्येति शेषः। तद्वदित्यनेन सिद्धमाह शब्देति। नित्यनिरवद्यनिरतिशयस्वात्मानुभवानन्दसन्दोहमग्नोनश्वरदुःखमिश्रसातिशयविषयानुभवानन्दबिन्दुषु न सज्जते इति भावः।न कामकामी इत्येतत्पूर्वोक्तस्यार्थस्य व्यतिरेकेण दृढीकरणमिति व्यञ्जयति य इति। विकारस्य प्रसक्तत्वात् कामित्वं स्वकार्यं विकारमप्यजहल्लक्षणया लक्षयतीतिविक्रियत इत्युक्तम्। कामान्कामयितुं शीलं यस्य स कामकामीकदाचिदपीति यावत्कामपरित्यागमित्यर्थः। एतेन यो विक्रियते स न शान्तिमाप्नोतीत्यनयोरैकार्थ्यशङ्का परिहृता। विषयदर्शने विक्रियमाणोऽन्यदापि स्पृहारहितो न स्यादित्यर्थः।किं कामकामिनः सर्वदा शान्तिर्न स्यात् इति शङ्कामपाकुर्वन्नदर्शनाविकारत्वावस्थयोः कारणभूतां विषयसङ्ग्रहणस्पृहाममकारदेहात्मभ्रमाणां क्रमात्कार्यकारणभावनिबन्धनानुलोमप्रतिलोमान्वयव्यतिरेकद्वयानां निवृत्तिरूपामवस्थामाह विहायेति। पूर्वत्रात्र च श्लोके प्रवृत्तं कामशब्दंनिर्वक्तिकाम्यन्त इति कामा इति।चरतीति वर्तत इत्यर्थः। आत्मदर्शिपुरुषपर्वभेदविषयौ पूर्वश्लोकौ अयं त्वात्मदर्शनार्थिपुरुषविषय इति विवेकं द्योतयति आत्मानं दृष्ट्वेति। अनयोः श्लोकयोः 70।71 विषयानुभवनिवृत्तिलक्षणासा निशा 69 इति पूर्वश्लोकोक्तशान्तिरुक्ताएषा इति श्लोकेन परमप्रयोजनतया प्रकृतायाः संसारनिवृत्तिलक्षणशान्तेरुपसंहारः क्रियते यद्वा श्लोकत्रये शान्तिनिर्वाणशब्दाभ्यामेकमेव फलमुच्यते।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति 4।69 इत्यत्रपरं निर्वाणमाप्नोति इति हि व्याख्यास्यति।एषा ब्राह्मी इति श्लोकेनाध्यायार्थस्य निगमनं फलाव्यभिचारस्थापनं च।एषा इति निर्देशस्य पूर्वोक्तनिखिलप्रकारपरामर्शित्वात्तं प्रकारमाह नित्येति। स्थितधीर्लक्षं यस्याः सा स्थितधीलक्षा ज्ञानयोगाख्यस्थितप्रज्ञतासाधनभूतेत्यर्थः। ब्राह्मीत्यत्र तद्धितविवक्षितसम्बन्धविशेषं दर्शयति ब्रह्मप्रापिकेति। एनामित्यन्वादेशोऽपि सप्रकारपरामर्शीति व्यञ्जयति ईदृशीमिति। मोहनिषेधफलितमाह पुनरिति। अन्तकाल इत्युत्क्रान्तिकालभ्रमव्युदासायाह अन्तिमेऽपि वयसीति।उत्तमे चेद्वयसि साधुवृत्तः इत्यादिवत्। एतेन बाल्यादिषु विषयप्रवणस्यापि पश्चान्निर्विण्णस्याधिकारः सूचितः। किं पुनर्ब्रह्मचर्यादिकमारभ्य स्थितस्येति भावः। स्थित्यां स्थितिस्तत्सम्बन्धः। षष्ठीसमासभ्रमापाकरणायाह निर्वाणमयं ब्रह्मेति। निर्वाणब्रह्मशब्दयोः अर्वाचीनविषयतामाह सुखेति। ननु नित्यात्मज्ञानतत्साक्षात्कारयोरपि प्रकृतत्वात् कर्मनिष्ठामात्रनिगमनपरोऽयं श्लोक इत्ययुक्तमिति शङ्कायां प्रधानभूततदनुबन्धेन अन्यकथनमिति दर्शयन् उत्तराध्यायचतुष्टयसङ्गतिं वक्तुमुक्तमर्थं च सङ्कलय्य दर्शयन्नित्यात्मेत्यादिकं द्वितीयार्थसङ्ग्रहश्लोकमपि व्याख्याति एवमिति। मोहस्य हेतुस्वरूपकार्याणि विशदयति आत्मेत्यादिना निवृत्तस्येत्यन्तेन। व्याख्यानव्याख्येयात्मना सङ्ग्रहश्लोकस्थसमासान्तर्गतपदद्वन्द्वद्वयस्य यथासङ्ख्य सम्बन्धं व्यनक्ति नित्यात्मेत्यादिना।साङ्ख्यबुद्धिरिति। कर्मयोगावाक्एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिः 2।39 इत्युक्तमात्मतत्त्वज्ञानमुच्यते तद्व्यक्त्यर्थं हिनित्यात्मविषयेत्युक्तम्। ज्ञानयोगस्तु कर्मयोगसाध्यतयानन्तरं पृथगेवोपादीयते।स्थितधीलक्षेति। अ

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

न चैषा बुद्धिरपूर्वानीयते। किं तर्हिव्यवसायात्मिकेति। व्यवसायात्मिका सर्वस्यैकैव (S सर्वस्यैव) सहजा (N omits सहजा) धीः निश्चेतव्यवशात् तु बहुत्वं गच्छति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

यामिमाम् इतिश्लोकस्य प्रकृतोपयोगादर्शनात्सङ्गतिमाह स्यु रिति। न तु वैदिकान्यप्यव्यवसायात्मकानि। ततः किं प्रकृते इत्यत उक्तं तेऽपी ति। व्यवसायात्मकं मतं वैदिकमतमवलम्बमाना अपि केचित् वैदिकानि सर्वाण्येव कर्माणि स्वर्गादिफलान्याहुः। भवांस्तु काम्यान्येव स्वर्गादिफलकानि निष्कामानीश्वरार्पणबुद्ध्याऽनुष्ठितानि तु ज्ञानार्थानीत्यभिप्रैति। तथाच त्वद्वचने निष्ठानुपपत्तिस्तदवस्थेति भावः। आह तेषां वैदिकाभासत्वप्रदर्शनाय निन्दामिति शेषः। भोगैश्वर्यगतेरपि प्रकृतत्वात्तयेति तत्परामर्शभ्रान्तिं वारयति यामि ति। अन्यथा यच्छब्दः साकाङ्क्षोऽनन्वितः स्यादिति भावः। वाचः पुष्पितत्वं कथं इत्यत आह मोक्षे ति। अत्यल्पत्वेनोपमा। वेदवादरता इत्येतत्कथं निन्दावचनं इत्यत आह वेदे ति। कथमेतस्मात्पदाल्लभ्यते कथं चैषाऽपि निन्दा इत्यत आह वेदै रिति। वादशब्दोऽत्रापाततः प्रतिपादने वर्तते। वक्ष्यते चात्राभिधानम्। आपाततः प्रतिपाद्यं च कर्मादि सावधारणं चैतत्। अब्भक्षो वायुभक्ष इति यथेत्यर्थः। सावधारणत्वं कुत इति चेत् उत्तरपदबलादिति तानि पठति नान्यदि ति। आपाततः प्रतीतार्थादन्यस्य सद्भावे भवेदेषां निन्दा। कोऽसौ कुतश्च इत्यत आह परोक्षे ति। क्वचित्प्रकटवचनादिवेत्युक्तम्। अतएव प्राय इत्याह देवा वेदाभिमानिनः। तत्प्रकारसूचनार्थं मां विधत्त इत्याद्युदाहृतम्। वदन्ति वेदाः।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

अव्यवसायिनामपि व्यवसायात्मिका बुद्धिः कुतो न भवति प्रमाणस्य तुल्यत्वादित्याशङ्क्य प्रतिबन्धकसद्भावान्न भवतीत्याह त्रिभिः यामिमां वाचं प्रवदन्ति तया वाचापहृतचेतसामविपश्चितां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीत्यन्वयः। इमामध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धां पुष्पितां पुष्पितपलाशवदापातरमणीयांसाध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्निरतिशयफलाभावाच्च। कुतो निरतिशयफलत्वाभावस्तत्राह जन्मकर्मफलप्रदां जन्म चापूर्वशरीरेन्द्रियादिसंबन्धलक्षणं तदधीनं च कर्म तत्तद्वर्णाश्रमाभिमाननिमित्तं तदधीनं च फलं पुत्रपशुस्वर्गादिलक्षणं विनश्वरं तानि प्रकर्षेण घटीयन्त्रवदविच्छेदेन ददातीति तथा ताम्। कुतएवमत आह भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां अमृतपानोर्वशीविहारपारिजातपरिमलादिनिबन्धनो यो भोगस्तत्कारणं च यदैश्वर्यं देवादिस्वामित्वं तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादयस्तैर्बहुलां विस्तृताम्। अतिबाहुल्येन भोगैश्वर्यसाधनक्रियाकलापप्रतिपादिकामिति यावत्। कर्मकाण्डस्य हि ज्ञानकाण्डापेक्षया सर्वत्रातिविस्तृतत्वं प्रसिद्धम्। एतादृशीं कर्मकाण्डलक्षणां वाचं प्रवदन्ति प्रकृष्टां परमार्थस्वर्गादिफलामभ्युपगच्छन्ति। के। येऽविपश्चितो विचारजन्यतात्पर्यपरिज्ञानशून्याः। अतएव वेदवादरताः वेदे ये सन्ति वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवमादयस्तेष्वेव रता वेदार्थसत्यत्वेनैवमेवैतदिति मिथ्याविश्वासेन संतुष्टाः। हे पार्थ अतएव नान्यदस्तीतिवादिनः कर्मकाण्डापेक्षया नास्त्यन्यज्ज्ञानकाण्डं सर्वस्यापि वेदस्य कार्यपरत्वात् कर्मफलापेक्षया च नास्त्यन्यन्निरतिशयं ज्ञानफलमिति वदनशीलाः। महता प्रबन्धेन ज्ञानकाण्डविरुद्धार्थभाषिण इत्यर्थः। कुतो मोक्षद्वेषिणस्ते। यतः कामात्मानः काम्यमानविषयशताकुलचित्तत्वेन काममयाः। एवंसति मोक्षमपि कुतो न कामयन्ते। यतः स्वर्गपराः स्वर्ग एवोर्वश्याद्युपेतत्वेन पर उत्कृष्टो येषां ते तथा। स्वर्गातिरिक्तः पुरुषार्थो नास्तीति भ्राम्यन्तो विवेकवैराग्याभावान्मोक्षकथामपि सोढुमक्षमा इति यावत्। तेषां च पूर्वोक्तभोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानां क्षयित्वादिदोषादर्शनेन निविष्टान्तःकरणानां तया क्रियाविशेषबहुलया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो विवेकज्ञानं येषां तथाभूतानामर्थवादाः स्तुत्यर्थास्तात्पर्यविषये प्रमाणान्तराबाधिते वेदस्य प्रामाण्यमिति सुप्रसिद्धमपि ज्ञातुमशक्तानां समाधावन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। न भवतीत्यर्थः। समाधिविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषां न भवतीति वा। अधिकरणे विषये वा सप्तम्यास्तुल्यत्वात्। विधीयत इति कर्मकर्तरि लकारः। समाधीयतेऽस्मिन्सर्वमिति व्युत्पत्त्या समाधिरन्तःकरणं वा परमात्मा वेति नाप्रसिद्धार्थकल्पनम्। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तं व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नोत्पद्यत इति व्याख्याने तु रूढिरेवादृता। अयंभावःयद्यति काम्यान्यग्निहोत्रादीनि शुद्ध्यर्थेभ्यो न विशिष्यन्ते तथापि फलाभिसंधिदोषान्नाशयशुद्धिं संपादयन्ति। भोगानुगुणा तु शुद्धिर्न ज्ञानोपयोगिनी। एतदेव दर्शयितुं भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति पुनरुपात्तम्। फलाभिसन्धिभन्तरेण तु कृतानि कर्माणि ज्ञानोपयोगिनीं शुद्धिमादधतीति सिद्धं विपश्चिदविपश्चितोः फलवैलक्षण्यम्। विस्तरेण चैतदग्रे प्रतिपादयिष्यते।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

नन्वेवं फलोत्तमतां ज्ञात्वा सर्व एवमेव व्यवसायात्मिकां बुद्धिं कथं न कुर्वन्तीत्याशङ्क्याह यामिमामिति त्रयेण। ये इमां पुष्पितां यां वाचं फलादिरहितां कुत्सितपुष्पयुक्तलतावददूरदृष्टरम्यां प्रवदन्ति प्रकर्षेण फलरूपतया वन्दति तेषां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते नोत्पद्यत इत्यर्थः। ननु तेऽपि शास्त्रोक्तज्ञानवन्तः कथं तथा वदन्ति इत्याकाङ्क्षायामाह अविपश्चित इति। मूर्खा अज्ञाना इत्यर्थः। तेषां मूढत्वं विशेषणैः प्रकटयति वेदवादरता इति वेदोक्तफलककर्मकरणमेवोचितं न तु निष्कामतया ते तथा अत एव नान्यदस्तीति वादिनः वेदोक्तव्यतिरिक्तं कर्मफलं नास्तीति वदनशीलाः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

अव्यवसायिनां बुद्धिभेदं निरूपयति यामिमामिति। जैमिनीया वेदवाचं सर्वकाण्डरूपां सर्वां पुष्पितां प्रकर्षेण कर्तृकर्मफलभावेन युक्तां वदन्ति। पुष्पस्थानीयेषु स्वर्गादिषु फलत्वबुद्ध्या रता भवन्तीत्यर्थः। यतो वेदवादेषु फलबोधककर्मवादेषु रताः। न च तत्सत्फलं वेदबोधितत्वादिति वाच्यम् अर्थान्तरेण वेदबोधितत्वात् तत्फलस्ययन्न दुःखेन सम्भिन्नं इत्यादिवाक्यात्. तथा चेयं वाक् पुष्पिता न फलिता। तेषु परं गन्धलोभितचेतस एव ते भ्रान्ता भवन्तीति हृदयम्।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

2.42 Partha, O son of Prtha; those devoid of one-pointed conviction, who pravadanti, utter; imam, this; yam puspitam vacam, flowery talk, which is going to be stated, which is beautiful like a tree in bloom, pleasant to hear, and appears to be (meaningful) sentences [Sentences that can be called really meaningful are only those that reveal the self.-Tr.]; who are they? they are avipascitah, people who are undiscerning, of poor intellect, i.e. non-discriminating; veda-vada-ratah, who remain engrossed in the utterances of the Vedas, in the Vedic sentences which reveal many panegyrics, fruits of action and their means; and vadinah, who declare, are apt tosay; iti, that; na anyat, nothing else [God, Liberation, etc.]; asti, exists, apart from the rites and duties conducive to such results as attainment of heaven etc. And they are kamatmanah, have their minds full of desires, i.e. they are swayed by desires, they are, by nature, full of desires; (and) svarga-parah, have heaven as the goal. Those who accept heaven (svarga) as the supreme (para) human goal, to whom heaven is the highest, are svarga-parah. They utter that speech ( this is supplied to construct the sentence ) which janma-karma-phala-pradam, promises birth as a result of rites and duties. The result (phala) of rites and duties (karma) is karma-phala. Birth (janma) itself is the karma-phala. That (speech) which promises this is janma-karma-phala-prada. (This speech) is kriya-visesa-bahulam, full of various special rites; bhoga-aisvarya-gatim-prati, for the attainment of enjoyment and affluence. Special (visesa) rites (kriya) are kriya-visesah. The speech that is full (bahula) of these, the speech by which that is full (bahula) of these, the speech by which these, viz objects such as heaven, animals and sons, are revealed plentifully, is kriya-visesa-bahula. Bhoga, enjoyment, and aisvarya, affluence, are bhoga-aisvarya. Their attainment (gatih) is bhoga-aisvarya-gatih. (They utter a speech) that is full of the specialized rites, prati, meant for that (attainment). The fools who utter that speech move in the cycle of transmigration. This is the idea.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

2.42 - 2.44 The ignorant, whose knowledge is little, and who have as their sole aim the attainment of enjoyment and power, speak the flowery language i.e., having its flowers (show) only as fruits, which look apparently beautiful at first sight. They rejoice in the letter of the Vedas i.e., they are attached to heaven and such other results (promised in the Karma-kanda of the Vedas). They say that there is nothing else, owing to their intense attachment to these results. They say that there is no fruit superior to heaven etc. They are full of worldly desires and their minds are highly attached to secular desires. They hanker for heaven, i.e. think of the enjoyment of the felicities of heaven, after which one can again have rirth which offers again the opportunity to perform varied rites devoid of true knowledge and leads towards the attainment of enjoyments and power once again. With regard to those who cling to pleasure and power and whose understanding is contaminated by that flowery speech relating to pleasure and lordly powers, the aforesaid mental disposition characterised by resolution, will not arise in their Samadhi. Samadhi here means the mind. The knowledge of the self will not arise in such minds. In the minds of these persons, there cannot arise the mental disposition that looks on all Vedic rituals as means for liberation based on the determined conviction about the real form of the self. Hence, in an aspirant for liberation, there should be no attachment to rituals out of the conviction that they are meant for the acisition of objects of desire only. It may be estioned why the Vedas, which have more of love for Jivas than thousands of parents, and which are endeavouring to save the Jivas, should prescribe in this way rites whose fruits are infinitesimal and which produce only new births. It can also be asked if it is proper to abandon what is given in the Vedas. Sri Krsna replies to these estions.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 2.42?

याम् इमां वक्ष्यमाणां पुष्पितां पुष्पित इव वृक्षः शोभमानां श्रूयमाणरमणीयां वाचं वाक्यलक्षणां प्रवदन्ति । के अविपश्चितः अमेधसः अविवेकिन इत्यर्थः। वेदवादरताः बह्वर्थवादफलसाधनप्रकाशकेषु वेदवाक्येषु रताः हे पार्थ न अन्यत् स्वर्गपश्वादिफलसाधनेभ्यः कर्मभ्यः अस्ति इति एवं वादिनः वदनशीलाः।।ते च

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 18 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 2.42, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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